दूसरी परंपरा कहानी संग्रह ki kahaniyan

 दूसरी परंपरा कहानी संग्रह 

dusari parampra

                             दूसरी परंपरा

 




         दूसरी परंपरा    
                  कहानी संग्रह
              रामनाथ षिवेन्द्र

दूसरी परंपरा

काली रात , हर ओर सांय-सांय, बादलों की तड़क-गरज भी नहीं, कुछ भी दिख नहीं रहा, भयानक अंधेरा-अंधेरा भी बोलता, बतियाता, गुदगुदाता, अब उसे अंधेरे की गुदगुदियों से कुछ लेना-देना नहीं, पहले की बात दूसरी थी........वे पढ़ाई के दिन थे, पिता जीवित थे, घर पहुंचते ही पिता के सवाल उसकी खोपड़ी झनझना देते थे,

‘इतनी रात तक कहां थे? पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे?’

पहले तो नहीं, पर बाद में उसे विश्वसनीय झूठ बोलने की आदत पड़ गई थी, बाद में पिता ने तो पूछना ही बंद कर दिया था... शायद वे समझने लगे थे कि कुछ- कुछ इतर है, उसके बाद तो उसे पिता या मां को कुछ भी न बताना पड़ता कि व अंधेरे की भाषा को झूठ की लिपि पहनाने की कला सीख रहा है, अब तो उसे विशेषज्ञता भी हासिल हो चुकी है...
उसे लगता कि सारी गुदगुदियां अंधेरे की भाषा में कैद हैं... वह वही दौर था जब उसे हर ओर हंसियां ही हंसियां दिखतीं.... खूबसूरत आंखे, पांव, पतले-पतले होठ , पतली कमर का लहराना, दिखता फिर तो उसे लगता कि यह अंधेरे की भाषा है जिससे सारी चीजें चमकदार दिखती हैं,
चमकदार चीजें उसे इतना प्रभावित करतीं कि उसे उजाले से घिन होने लगी थी,
अचानक नहीं हुआ ऐसा कि उसे अब अंधेरे की भाषा व उसकी गुदगुदियों में कोई रूचि नहीं जबकि वह दिखावटी ही सही रामरामी, गायत्री या वेदों वाला कोई संत नहीं.... सन्तई व उसके प्रबोधनों से उसका दूर का भी नाता नहीं.....
वैसे आज भी जरूरी कामों को उसे अंधेरे में ही निपटाना पड़ता है, अंधेरे से बोलना बतियाना होता है पर उसमें गुदगुदियां नहीं, लक्ष्य होता है, बलिदानी उर्जा होती है, उन कामों को उजाले मेें करते समय अप्रत्याशित , बाधाओं, उलझाओं का उसे डर बना रहता है, उसका मानना है कि काम तो काम होता है, काम के समय गुदगुदियों से यदि परहेज नहीं किया गया फिर तो लक्ष्य में भटकाव आना असम्भव नहीं, अब तो उसे पहले वाली गुदगुदियां अंधेरे की भाषा में नहीं दिखतीं....
वही अंधेरा, वही सांय-सांय गुदगुदियों वाला मौका पर अब वैसा नहीं, किसी भी तरह का डर भी नहीं, पहले अंधेरा उसे पीता था पर अब उसे वह पीता है, लेकिन आज वह डर रहा है, उसे आज यह डर क्यों आक्रांत कर रहा है, कुछ भी स्पष्ट नहीं,
डरते हुए ही उसे महसूस हुआ कि उसके पास वाले मोटे-मोटे दरखत दिखने लगे हैं पर साफ-साफ नहीं कि वे पहचाने जा सकें, उसे लगा कि दरख्त भी डरे हुए हैं तथा भयानक चुप्पी में हैं, तभी उसकी कमर में तथा पीठ में तेज दर्द उभरा... वह रस्से का यातनादायी बधाव था, एकदम से कसा हुआ, हिल भी न सको,
बांधे जाते समय ही नहीं उसे पहले से ही गुमान था कि वह पेड़ की तरह सख्त व स्थिर है, पेड़ जैसा ही सालों साल खड़ा रह सकता है, पेड़ों की जड़ों की तरह उसकी जड़े भी काफी गहरे तक धंसी हैं, कोई दुलारे , खिलाए या नहीं फिर भी उससे उसका लहराना, झूमना नहीं छीना जा सकता ,

उसे याद है पहले की बात जब उसने कामरेड मौर्या से कहा था , ‘कामरेड कोई मेरी चमड़ी उतार ले फिर भी नहीं बताऊंगा कि मैं कौन हूं, क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मेरे होने का मतलब क्या है........’
मरेड मौर्या किसी मुर्झाए फूल की हंसी हंस दिए थे, उस वक्त मौर्या का हंसना उसे अच्छा नहीं लगा था, पर आज, पेड़ों की तरह लहराना व झूमना आखिर क्या है कि सारा कुछ छिना जा रहा है, वह डर क्यों रहा है ? क्या उसे नहीं मालूम कि मृत्यु को विज्ञान या कोई विचार स्थगित नहीं कर सकता, कहीं..... पागल तो नहीं हो गया ?
नहीं ऐसा नहीं , उसे पागलपन कभी नहीं जकड़ सकता, उसने मन की चंचलता को दृढ़ किया तथा स्नेहिल आत्मीयता से जंगल के बारे में सोचा, उसे मालूम था कि वह जंगल में है, उसी जंगल में जिसके दरख्तों, झाड़ियों,नालों व पठारों से उसकी मर्मभरी गुफ्तगू होती रही है, अंतरंगता इतनी कि उसे झाड़ियों तक से वह सब बताना पड़ता था जो सामान्यतया छिपाव की बातें होती हैं पर उसे कटे हुए खुत्थों को देखकर अनामंत्रित गुस्सा आ जाता है, उसकी मुट्ठियां कस जाती हैं.....
‘कितने हरामजादे हैं लोग जो दरख्तों तक का कत्ल करते हैं, उनकी आंतों में से कुर्सियां पलंग, टेबुल जैसी किसम किसम की बस्तुएं निकालते हैं....
उसके इस जंगल में होने के बाद से ही तो यह खेल स्थगित है... वरना अब तक तो सूरज यहां के चप्पे-चप्पे पर काबिज होकर जंगल का सारा हरापन सोख चुका होता, पहाड़ियों को छेद कर उसकी दृढ़ता को लुजलुज बना चुका होता....
बंधे हुए ही उसने थोड़ा झुकने की कोशिश की कि जानकारी ले सके, पांवों के पास होने वाली सरसराहट आखिर क्यों है, पर झुक पाना उसके लिए आसान या संभव ही नहीं था, उसे मजबूती से जकड़ा गया था, हाथों को पहले ही बांध दिया गया था, अब उसकी स्थिति उसी पेड़ जैसी थी जिससे उसे बांधा गया था, पेड़ हिलता तभी उसमें हरकत होती,थोड़ा झुकने की कोशिश में उसे दर्द का आभास हुआ लगा कि पीठ दो फांकों में चीरी जा रही है, फिर तो सरसराहट उसके मन से कहीं निकल गई, पर ऐसा नहीं था,सरसराहट जारी थी, जो पांवों ,घुटनों से होते हुए सिर तक जा चुकी थी तभी अचानक सरसराहट नीचे उतरी, पांवों पर आकर स्थिर हो गई....
उसने पैरों को झटका दिया, भद्द जैसी गिरने की आवाज हुई, जैसे कोई मुलायम चीज गिरी हो, वह सांप भी हो सकता था, या गिरगिटान, नेवला, गिलहरी, चूहा, मेढ़क, कुछ भी, उसने अनुमान लगाया फिर विश्लेषित करने लगा कि सांप होता तो उसका ठंडापन पांव पीते, नेवला होता तो उसके पंजे गड़ते, इसी तरह जाने कितने जीव जंतुओं के बारे में किसी जीव विज्ञानी की तरह उसने सोचा, तभी उसे महसूस हुआ कि उसके पांवों पर फिर से सरसराहट होने लगी है....
इस सरसराहट ने उसे डरा दिया पर प्रतिकार स्वरूप कुछ कर सकने की क्षमता उसमें न थी, उसने दुबारा पांव झटकना चाहा पर, सरसराहट थी कि उसके पेट को नापते, मुंह व नाक को सहलाते ऊपर चढ़ चुकी थी फिर अचानक गायब , उसने अनुमान किया कि कोई जन्तु या कीड़ा रहा होगा, पेड़ पर चढ़कर मौज लेने वाला,
हालांकि उसे अनुमान तक न हो सका कि चढ़ने वाला क्या था, किस प्रजाति का था पर उसके चढ़ने से उसे जिस तरह की गुदगुदी का आभास हुआ उस पर उसे हंसी आ गई.... क्योंकि गुदगुदी पहले की तरह थी... दिल सहलाने वाली, कानों में श्रृंगार घोलने वाली , उसे खुद पर ताज्जुब हुआ, आखिर उसे अंधेरे की भाषा भूलने के लिए कितना समय चाहिए....एक ऐसे समय में जबकि उसे बधस्थल पर बांधा जा चुका है बध करने के लिए.... शांति व्यवस्था पर बलि चढ़ाने के लिए फिर भी उसे गुदगुदियों में गोता लगाने की सूझ रही है, उसने खुद को लताड़ा....
अब उसे अपना बंधना महसूस हुआ..... ‘पेड़ से बंधे हुए दो घंटे तो गुजर ही गए होगें, आखिर क्यों देरी कर रहे हैं सब?’ उसे गोली मारनेवालों पर, उनकी लेट-लतीफी व लापरवाही पर घृणा हुई, उसने उन्हें भद्दी सी गाली दी ‘साले तनख्वाह लेंगे मोटी, सुविधा राजा महाराजाओं की तरह और काम, बाकी कामों में तो वे गैर जिम्मेदारी बरतते ही हैं, गोली मारने में भी देरी करते हें... छिः लानत है, उसने गर्दन घुमाया तथा पिच्च से थूक दिया जैसे घृणा से उसके मुंह में खंखार आ गया हो तथा सांस लेने में दिक्कत हो रही हो, जब उसे पकड़ा गया था तभी उसने निश्चित कर लिया था कि उसे गोली मारी जायगी, काउन्टर साहब यहीं होगा कहीं आसपास, उसे कोतवाल बनना है, आखिर किसे तरक्की पसंद नहीं ?
‘तरक्की भी वाह! क्या चीज है’ तभी तो सुधेसर ने ऐसा करवाया , नही ंतो उसे कौन पकड़ पाता, किसी को क्या पता कि मैं कहां हूं, कहां आता-जाता हूं, कामरेड़ मौर्या भी तो नहीं जानते.... सुधेसर का सोचना है कि संगठन में सवर्णों की भर्ती नहीं होनी चाहिए.... फिर यह ठाकुर तो संगठन का आला अगुआ है, इसके रहते उसकी तरक्की नहीं हो पाएगी......
उसे सुधेसर का चेहरा दिखा....लाल-लाल खूनी चकत्तों वाला .... उसे चिंता हुई.... आखिर जाति से मुक्त होने के लिए क्या रास्ते हैं उसके पास ... अक्ल हो तो कोई देख ले उसका काम , आज किसी भी ठाकुर की गर्दन आसमान की ओर तनती नहीं, सभी की आंखे जमीन की तरफ... जान बचाने का रास्ता तलाशती , आखिर यह किसे नहीं मालुम कि सिर का नाता यदि धड़ से बनाए रखना है फिर तो जमीन की तरफ ही देखना होगा तथा माथा पांवों से चिपकाना होगा दूसरों के नहीं अपने पांवों से , सुधेसर के लिए आसान था उसे पकड़वाना तथा मानकर चलना कि काउंटर साहब गोली ही मारेगा फिर तो उसने किसी ठाकुर की मद्द लेकर पुलिस को अवगत कर दिया होगा, नहीं तो पुलिस झोकहवा नाले तक क्यों आती ?

किसी भी हाल में उसे साल में एक बार, निश्चित तिथि पर यानी ठीक सत्रह जुलाई को झोकहवा नाले के पास वाली पहाड़ी पर जाना ही है.... पूरी रात के लिए जहां सत्तो की मुठभेड़ में हत्या की गई थी... सुधेसर भाग लिया था पर सत्तो डटी रह गई थी, रायफल की अंतिम गोली तक, सत्तो सुधेसर के जाति की थी पर थी जाति से बाहर, वह स्त्री होने से भी बाहर थी, कायदा-कानूनों के कष्टदायी लदावों से घृणा करने वाली, वह सिर्फ मनुष्य बनकर रहना चाहती थी, कायदा-कानून , या किसी अप्राकृतिक चीज का उपकरण नहीं.....
सुधेसर सत्तो से चिढ़ता था कि वह उसे क्यों नहीं सहलाती ? किसी ठाकुर के साथ क्यों है? लेकिन यह सब सोचना उसे मजाक जैसा लगा क्या होगा सोचकर ? घंटे दो घंटे में ही काउंटर साहब उसे गोली मार देगा फिर वह प्रकृति में घुल जाएगा लेकिन तभी उसे झटका जैसा लगा, जैसे उसके जिस्म का सारा खून चूस लिया गया हो,
‘कहीं बैजू की तरह उसे भी यातनागृह में डाल दिया गया तो!’
यह डर तो उसे पहले भी था, हो सकता है यातनागृह में डाल दे फिर सिगरेटों व बिजली के करंेट से देह निचोड़ना शुरू करे लेकिन जब उसे थाना तक नहीं ले जाया गया, जंगल में ही पेड़ से बांध दिया गया फिर तो उसके मन से डर जैसी चीज फुर्र हो गई थी....
शायद ऐसा नहीं है ‘गोली मारना होता तो मार दिया होता, उसी समय जब उसे पकड़ा गया था, जब वह झोकहवा नाले के पास वाली पहाड़ी पर बैठकर सत्तो की स्मृतियों से छेड़-छाड़ कर रहा था और सत्तो उसकी आंखों में उन्मुक्त गोता लगा रही थी, हूबहू वही, रूप वही रंग वही, चाल वही’ उसने उस समय अपनी रायफल चट्टान पर रख दिया था तथा जहां बैठता था सत्तों में डूबने के लिए बैठ गया था तभी उसकी पकड़ हो गई,
पकड़ तो होनी ही थी , उसका हाथ पैर मारकर प्रतिकार करना बेकार गया, दो चट्टानों की दरारों में से उगी हुई पत्थर चट्टा घास भी उस समय इतनी मुलायम हो गई थी कि रौंदा गई थी, उसे पत्थर चट्टा तथा सत्तो की सख्ती में कभी फर्क समझ में नहीं आया पर सत्तो पत्थर चट्टा के अलावा भी बहुत कुछ थी उसके लिए,पेड़ से बंधा होना उसे काफी कष्टदायी लगने लगा, अचानक उसने भाग्य को कोसा , हालांकि वह भाग्यवादी नहीं था फिर भी .... उसे सत्तो याद आने लगी थी कि पहली गोली में ही उसकी मुलाकात सत्तो से हो जाएगी क्योंकि पुलिस वाले बंधे हुए आदमी को गोली मारने में असावधानी नहीं करते, ठीक-ठीक खोपड़ी में मारते हैं... पर ऐसा हो कहां रहा था ... पुलिस वालों की वहां गंध तक न थी....
विगत के उतार-चढ़ाव के दौरान ही उसे आहट लगी कि बूटों की आवाज उसकी तरफ आ रही है....... उसने अपना ध्यान उस तरफ मोड़ दिया... उसे समझ में आया कि कोई अकेला आ रहा है, पुलिस अकेली तो होती नहीं....
वास्तव में आने वाला अकेला ही था जो जमीन दबाते हुए आ रहा था हालांकि आने वाला दिखने में बाहर था...झिलमिल जैसा.... उसने आंखों पर दबाब बनाया कि आने वाला साफ-साफ दिखे... कुछ देर बाद दबाब की आवश्यकता न थी.....आने वाले की गंध ही ऐसी थी कि उसने अनुमान पक्का कर लिया,‘पुलिस वाला है’,
आने वाला पुलिस वाला ही था हुक्मरानी गंध में सरोबार, हाथ में रायफल लिए, कड़क चाल, आने वाला इतना पास आ गया कि उसने पहचान लिया ‘काउंटर साहब’, उसे इतनी खुशी हुई कि उसके मन मस्तिष्क से डर जैसी बेबुनियाद चीज फुर्र हो गई, अंधेरे की बदली हुई भाषा उसके अनुकूल लगने लगी.....
काउंटर साहब कुछ ही क्षण में उसके सामने था..... उसने तनेन होकर उससे पूछा..
‘तो तुम कुछ नहीं बताओगे, यहां तक कि अपना नाम भी’,
मैं बताना जरूरी नहीं समझता... उसने बताया,
तुम्हें मालूम होना चाहिए कि तुम बन्दी हो, तुम अपराधी ही नहीं आतंकवादी भी हो और तुम्हारी सजा... काउंटर साहब बोलते-बोलते रूक गया, जैसे जो कह रहा है, वह नहीं कहना चाहिए....
उसने काउंटर साहब की बात का सिरा जोड़ा...
‘मौत, फांसी या गोली, यही न... तुम्हारे जैसे डरपोक गोली नहीं मारा करते’,
‘अच्छा! मैं डरपोक हूं’ कहकर काउंटर साहब ने रायफल की नाल उसकी खोपड़ी पर टिका दिया... फिर पहले वाला सवाल दुहराया,
‘तो तुम अब भी कुछ नहीं बताओगे,’
‘अब भी नहीं, कभी भी कुछ नहीं?’ उसने सगर्व बताया,
‘देखता हूं कितना दम है?’ काउंटर साहब ने राइफल की नाल उसकी खोपड़ी मंे धसांया ... उसे दर्द हुआ वैसे भी रस्से का बंधन उसे काफी तकलीफ दे रहा था, काउन्टर साहब ने नाल थोड़ा जोर से सटाकर उसे धमकाया.....
‘खोपड़ी उधरा जाएगी’ थोड़ी मासूमियत से सरकारी गवाह बनाने की तर्ज पर काउंटर साहब ने उसे फिर फुसलाना चाहा...
‘आखिर बता क्यों नहीं देते संगठन के बारे में ... मैं वादा करता हूं तुम्हें कुछ नहीं होगा ... दो चार साल जेल में रहने के बाद बाहर आ जाओगे... तब तक तो तुम इतने प्रचारित व चर्चित हो चुके रहोगे कि किसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर कम से कम विधायक तो बन ही जाओगे..’.
अच्छा! उसे हंसी आ गई, उसने मजाक किया...
‘तो तुम गोशाले में बंधने की सलाह दे रहे हो?’ आखिर तुम मुझमें किस स्वार्थ के कारण रूचि ले रहे हो... अगर कुछ जानना चाहते हो तो सुनो... वैसे तुम्हारा सवाल काफी बेहूदा है... मैं तो तुम्हारी पुलिस के बारे में नहीं पूछ रहा...
‘फिर भी तुम्हें बता दूं पर तुम्हें यकीन नहीं होगा, मेरे संगठन के बारे में जितना तुम या तुम्हारी पुलिस जानती है उतना भी मुझे नहीं मालूम, चाहूं भी तो नहीं जान सकता- आंध्र से लेकर यहां तक , तुम्हारे थाने से लेकर तुम्हारे गांव व घर तक... कहां नहीं है संगठन... अब ऐसे में भला मैं क्या बताऊं ?’
‘तो तुम नहीं बताओगे... कोई भी अपराधी अपने बारे में नहीं बताता..’ काउन्टर साहब खीझ उठा... तथा उसे अपराधी संबोधित करने पर गुस्सा आ गया... उसने साफ-साफ पूछा...
कौन है अपराधी ? मैं या तुम .... तो सुन लो मैं अपराधी नहीं, अपराधी तुम और तुम्हारे जैसे लोग हैं जो बेमतलब का कानूनी शर्बत हर उस आदमी को पिलाते है जिसकी भूख तथा गरीबी कोई कानून नहीं मिटा सका.....?’
काउंटर साहब ने उसकी खोपड़ी पर से नाल हटा लिया तथा एक ही हाथ से रायफल हवा में लहराया.... फिर धांय... जंगल की प्रति ध्वनि गूंजी, काउंटर साहब ख्यात व कुख्यात के बीच का इन्सान था, अक्सर लोगों के एनकाउंटर ही करता था, एनकाउंटर के लिए वह पल्ले से रूपया खर्चता , अपराधिक इतिहास वालों का पता करता... जंगल के किसी पेड़ से बंधवाकर गोली मरवा देता... फिर ईनाम लेता, अखबारों में मुठभेड़ की खबर छपती... पुलिस के उच्चाधिकारी इस तरह के उत्तर आधुनिक मुठभेड़ पर सीना फुलाते तथा एनजीओ वाले सबाल्टर्न कहानी गढ़कर फंड जोगाड़ लेते,
‘साला गोली नहीं मारेगा’ उसे कामरेड बैजू का ख्याल दुबारा आया, फिर तो उसे आंतरिक कंपकंपी रोकना था क्योंकि काउन्टर साहब सामने था, वह मजाक उड़ाता... उसने खुद को संयत किया फिर दृढ़ होकर बोलना शुरू किया... लगभग आदेशात्मक शैली में-
‘नाल अपनी तरफ कर लो, उसकी मर्यादा होती है, तुम्हारे जैसा हत्यारा इसे नहीं समझेगा, तूने एक गोली बेमतलब हवा में उड़ा दिया, मालूम है जंगल
इस समय गहरी नींद में है, सारे पेड़ दिनभर की थकान मिटाने में हैं, ऊपर देखो पत्ते कांप रहे हैं, पतली सी डार पेड़ से अलग होकर अभी गिरी है, बांई ओर से हटकर थोड़ा दाहिने घूमो... पेड़ों की जड़ के पास कान लगाकर सुनो, तुम्हें कराह सुनाई देगी...
लेकिन पेड़ों से संवाद करना तो तुम्हें पढ़ाया नहीं गया, जंगल का अनुशासन तुम सीखना नहीं चाहोगे, पेड़ों को थोड़ा सहलाओ, फिर देखो तो वहां तुम्हारी मूर्खताओं के काले धब्बे दिखेंगे, खैर तुमसे उम्मीद करना कि प्रकृति का न्याय जो प्रकृति की भाषा में है, उसे तुम पढ़ोगे बेवकूफी होगी....
वैसे बेवकूफी तो यह भी है कि मैं तुमसे बातें कर रहा हूं, जल्दी करो, अपना काम निपटाओ तथा गोली मारो जिसके लिए मोटी तनख्वाह डकारते हो.....?
काउन्टर सहाब उसे देखने में लगातार था, उसने रायफल सीधी कर लिया, कहीं से अचरज का एक अनगढ़ टुकड़ा आया तथा उसके चेहरे पर चिपक गया...
‘बातें इन्ट्रेस्टिंग करते हो, पढ़े-लिखे जान पड़ते हो , वैसे तुम्हारे जैसा अब तक कोई नहीं मिला,’ काउन्टर साहब ने तर्क प्रति तर्क को आगे बढ़ाया जैसे काफी फुर्सत में हो तथा पुलसिया काम को खेल समझता हो, उसने कुछ सोचकर कहा... जो पूछने जैसा था ......
गोया तुम दार्शनिक हो...
तुम मुझे गाली दे रहे हो... उसने फटाका काउन्टर साहब को रोका...
दार्शनिक कहना गाली देना है क्या ? लगता है गलियों को तुम नीतिशतक का हिस्सा मानते हो.... काउन्टर साहब ने उसके ऊपर व्यंग्य फेका....
आखिर तुम देर क्यों कर रहे हो ? क्यों नहीं मारते गोली, उसने झुंझलाकर पूछा... वस्तुतः उसे घबराहट होने लगी थी, कुछ न कुछ गड़बड़ अवश्य है,
‘तो क्या तुम मुंह नहीं खोलोगे ?’ काउन्टर साहब ने पूछा...
‘कभी नहीं, क्योंकि यह तुम्हारी चिंता है मेरी नहीं कि तुम मेरा उपयोग कैसे करोगे... गोली मारोगे या यातनागृह में डालकर जबरिया कहलवाओगे कि मैं अपराधी हूं, वगैरह-वगैरह... इस तरह का घटिया काम तुम्हारे जैसे लोग ही किया करते हैं’,
काउन्टर साहब हंसने लगा... हंसते हुए ही उसने अपना पक्ष रखा....
‘इस समय कोई बेवकूफ ही तुम्हें गोली मारेगा, वैसे भी तुम्हारी काबिलियत किसी को भी गोली मारने से रोक देगी, जरा सोचो तो...’ थोड़ा रूककर काउन्टर साहब बोला.....
इस समय तुम रस्से से बंधे हो, भयानक जंगल में, हर ओर सांय-सांय, फिल्मी दृश्य जैसा...हूबहू वैसा ही... दृश्य....फिल्म का खलनायक हीरो को बंधवा देता है फिर गोली मारने का उपक्रम करता है, दर्शक समझते हैं कि गोली चलेगी पर चलती नहीं, नाटकीय ढंग से कुछ लोग आते हैं तथा हीरो
को छुड़ा ले जाते हैं... लेकिन तुम छुड़ाए नहीं जा सकोगे, पूरा बार्डर सील है... ऐसे में कुछ नहीं हो सकता... मैं तुम्हें आखिरी मौका देता हूं साफ-साफ बता दो...’ कहकर काउंटर साहब ने रायफल की मैगजीन देखा उसमें एक कारतूस और लोड किया...
उसने काउन्टर साहब को आवेशित करने की गरज से टोका...
‘तुम कायर हो मिस्टर एनकाउंटर , गोली मारना तुम्हारे वश का नहीं, साथ ही साथ तुम मूर्ख भी हो , यदि तुम समझते हो कि यातनागृह में मैं अपने होने के बारे में बता दूंगा तो यह तुम्हारी बेवकूफी होगी... कहो तो अपना चमड़ा उतार कर दिखाऊं.....’
‘अच्छा! ऐसा कर सकते हो’ काउंटर साहब ने उसे कसा....
फिर उसने काउंटर साहब से कहा... जहां चाहो छील दो, या कील ठोंको, उफ्फ तक न करूंगा... काउंटर साहब ने वैसा किया भी पर उसने सी तक नहीं किया... यह देखकर काउंटर साहब चकरा गया...एक बार तो उसके मन में आया कि गोली मार दे पर उसने यह विचार समाप्त कर दिया....
आखिरी बार काउंटर साहब से उसने कहा...
साफ-साफ बताओ... क्या अब भी गोली नहीं मारोगे, सुबह होने वाली है...आसमान साफ होने पर गोली मारोगे तो जंगल तुम पर थूकेगा, पेड़ गालिया दंेगे...समझे...
‘सही सही जानना चाहते हो तो जान लो, मैं तुम्हें गोली नहीं मारूंगा... तुम्हारे जैसों को गोली मारना मूर्खता होती है, तुम तो यातनागृह में सड़ने के काबिल हो... जब तुम्हें देखा नहीं था तो निश्चित था कि गोली मारूंगा, तुम्हारी पकड़ के समय मैं था भी नहीं... तुम्हें यहीं देखा, पहली बार देखते ही मुझे महसूस हुआ कि तम्हारी आंखों में तुम्हारे विचार क्या कहोगे आइडियोलाजी... हां-हां वही तैर रहे थे, तुम्हारे चेहरे पर उसकी दृढ़ता थी तथा बलिदान होने की अप्रतिम चाहना भी ... जबकि सिपाहियों ने बताया था कि पकड़ के समय तुम डरे हुए थे...शायद बांधे जाने के समय भी...
काउंटर साहब ठीक उसके सामने था, तथा उसकी आंखें प्रशासनिक नीतियों की तरह ऊपर नीचे हो रही थीं, सहज ही अनुमान किया जा सकता था कि उसमें धोखे तैर रहे हैं, उसने डर के बारे में सफाई देना ठीक समझा तथा काउंटर साहब से बोला...
‘मिस्टर काउंटर , यानी कि दरोगा जी, हालांकि तुम एक संवेदनहीन आदमी नहीं हो फिर भी मैं तुम्हंे बताऊं कि मुझे यातनगृहों से काफी डर लगती है, क्योंकि योगियों जैसे देह साधक भी करेंटों, बेंत की मारों, चूतड़ पर गर्म पानी (खौलता हुआ) का छिड़काव, फिर हाथों, पावों के नाखूनों का खिंचाव नहीं सह सकता, वह चीख पड़ेगा... मनुष्य होने की प्राकृतिक कमजोरी उसके साथ बनी रहेगी...’
सो मैं बांधे जाते समय डर रहा था, अब भी डर रहा हूं क्योंकि तुम पुलिस वाले हो, क्या मालूम कि कब क्या करोगे ?
काउंटर साहब गंभीर होकर उसे सुन रहा था, उसने थोड़ा रूककर काउंटर साहब से पूछा...
मिस्टर काउंटर! मैं समझता था कि तुम धोखेबाज नहीं हो, पर तुम धोखे बाज निकले, मुझे धोखे से पकड़वा लिया...
‘धोखा नहीं कार्य योजना बोलो कामरेड, यह इक्कीसवीं सदी है सारा कुछ वर्क प्लान से किया जाता है, तुम्हारी गिरफ्तारी ‘आपरेशन कैट ’का हिस्सा है, समझे.’ काउन्टर साहब ने खुलासा किया, उसने काउंटर सहाब के खुलासे पर प्रहार किया...
‘बकवास ! यह सरासर झूठ है मि0 काउंटर... आपरेशन कैट...वाह! क्या नाम है,
तुम बाघ हो क्या ? गीदड़ की तरह भागने वाला, मुठभेड़ों से डरने वाला... मैं समझ सकता हूं तुम्हारी मजबूरियां... तुम नौकरी करते हो, जो गुलामी का ही एक रूप है... आखिरी बार तुमसे पूछता हूं...’
‘क्या तुम सही में गोली नहीं मारेगे ?’
काउंटर साहब को हंसी आ गई, वह खूब हंसा, उसकी हंसी में उसे भी घुलना होता पर वह गंभीर था, तथा यातनागृह में जाने की मानसिक तैयारी में था... उसे यातनागृह का उद्धरण बनना है... तभी काउंटर साहब ने साफ बताया...

‘क्षमा करना कामरेड! मैं तुम्हें गोली नहीं मारूंगा... क्योंकि मैं जानता हूं तुम्हारे जैसे आइडियोलाजी वाले लोग गोली लगते ही जीवित हो जाते हैं, एक दो नहीं जाने कितने...तुम्हें मौका है यातनागृह में (तुम्हारे शब्दों में) चलने का मन बना लो..’
उसे काउंटर साहब पर गुस्सा आया जिसका कुछ मतलब न था क्यों कि उसके हाथ बंधे थे... उसने काउंटर साहब से पूछा, जो निवेदन था...
‘क्या तुम मेरा एक हाथ खोल सकते हो ?’
‘नहीं,’ उसका उपयोग जाने क्या करो... काउंटर साहब बोला,
अब उसे पक्का यकीन हो चुका था कि उसे यातनागृह तक जाना ही होगा... उसने सवालों को नाजुक बनाते हुए काउंटर साहब से पूछा...
‘तुम चालीस के आसपास हो...साठ के बाद क्या करोगे ? तब तो बिल्ला तथा वर्दी नहीं रहेगी... तुम्हारे अधिकार जो गिरफ्तारी व हत्या से संबंधित हैं वे नहीं रहेंगे, तो क्या साठ के बाद संत बनोगे... मुझे तम्हारे भविष्य की चिंता है...’
काउन्टर साहब के माथे पर थोड़ा सिकुड़नें उग आई, थोड़ा होंठ सूखे, पर नकली गंभीरता से उसने उसे रूआब में बताया...
‘ये मूर्खतापूर्ण सवाल हैं... मैं वर्तमान में जीता हूं, सपनों में नहीं , तुम्हें भी
समझाऊंगा कि सपना देखना बंद कर दो, दुनिया नहीं बदलने वाली... यह ऐसे ही चलती है...’
उसने काउंटर साहब का दर्शन सुनकर उसें झिड़का... ‘क्या बकते हो, सपना मैं नहीं तुम देखते हो, अपने बच्चे का , घर का ... देखो मैं ऊब चुका हूं तुमसे बातंे कर, लगता है तम्हारे पास समय का अभाव नहीं, जो करना हो जल्दी करो... पीठ में काफी दर्द हो रहा है, मैं कुछ बताने से रहा, यातनागृह में डालना चाहते हो तो वहीं डाल दो... चमड़ी उतारो चाहे नाखून कुछ फर्क नहीं लेकिन वह न करना जो तुम्हारी पुलिस ने बैजू के साथ किया था....
काउंटर साहब ने उसे रोककर पूछा... क्या हुआ था बैजू के साथ...?
मैं नहीं बता सकता, कोई भी नहीं बता सकता... तुम तो दरोगा हो, समझ सकते हो कि पुरूष के साथ ऐसा क्या किया जा सकता है जिसे वह बता नहीं सकता..उसने काउंटर साहब को बताया...
काउंटर साहब ने उंगलियां मोड़ी , घुमावदार घेरा बनाया फिर उसमें दूसरे हाथ की उंगली डाल दी, यही न... उसने उससे सगर्व पूछा... जैसे वह पहेली बूझने का विशेषज्ञ हो...
उसने सिर हिलाया फिर काउंटर साहब ने अपनी नैतिकता का बखान किया... मैं गंदी चीजों, तरीकों के सहारे अपराधियों से नही निपटता ... उनसे कबूलवाने के कई रास्ते हैं... उन्हें आजमाता हूं... यदि तुम्हारा रिमांड मिल गया फिर देखना...
बंधे हुए ही उसने गर्दन सीधी की , पांवों को झटका, हाथ को आजमाया कहीं शून्य तो नहीं हुए, उसे लगा कि वह ठीक-ठाक है फिर उसने काउंटर साहब से पूछा...
‘आखिर क्या करोगे ? कुछ तो बताओ, मुझे मानसिक तैयारी में सुविधा होगी,’
मैं भी चाहता हूं कि सुविधापूर्ण तरीके से तुम संगठन के बारे में बताओ, अपने साथियों के नाम व पते भी बताओ....
लेकिन कैसे, बीच में उसेने टोका...
काउंटर साहब के होंठ खुले, उस पर हंसी नाची , जो भद्दी थी...‘कैसे’ बहुत आसान है कामरेड! लेकिन है बहुत सटीक, अब कुछ इस तरह समझो, ‘मान लो हम और तुम एक आलीशान मकान के आलीशान कमरे में हैं, आलीशान मकान, आलीशान कमरा तथा आलीशान चीजें जो उस कमरे में होंगी उसके बारे में तुम्हारी क्या जानकारी है, मैं नहीं जान सकता लेकिन मैं वीवीआईपी ड्युटी करते-करते बहुत कुछ सीख व जान चुका हूं, जब पहली बार पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ का भारत आना हुआ था, मुझे मौका मिला था... एसपी तथा आईजी साहब के साथ मैं भी उस होटल में आता जाता था तथा उस कमरे में भी जिसमें उन्हें सोना थाः उन कमरों में भी जहां खाना था... जहां वीवीआईपीओ से मिलना मिलाना था... मैं ही तो कमरों की सारी चीजों को ठोकता ठाकता था, तथा उन्हें पारंपरिक स्थानों से हटाकर दूसरी जगह पर रखता था....
काउंटर साहब को जैसे कुछ याद आया हो वह चौंका...फिर बोला....
भला कैसे भूल सकता हूं कि एसपी ने अपनी स्टिक से मुझे मारा था..जब  इधर उधर हटाने में एक आदमक्रद शीशा फर्श पर गिर कर टुकड़ा बन गया था...एसपी ने अनुमान लगाया था कि पचास हजार से ऊपर का रहा होगा... कहीं उनमें विस्फोटक वगैरह तो नहीं!
‘तुम कहानी सुनाने लगे...‘उसने काउंटर साहब को विषयांतरित होने पर टोका.... उसके टोकने के बाद काउंटर साहब ‘कैसे’ वाले सवाल पर आ गया .....
‘तो कामरेड! तुम मान लो कि एक आलीशान कमरे में हो, उसमें आलीशान चीजें हैं एक से एक कीमती व खूबसूरत... रात के ग्यारह बजने वाले हैं , तुम्हें झपकियां आ रही हैं, कुछ सेकेंड के लिए तुम्हारी आंखें बंद हो जाती हैं तुम कमरे में अकेले हो, ऐसे में कोई वर्दी वाला बिना वर्दी के आएगा, तुमसे गहन दोस्ताना अंदाज में पूछेगा... तुम्हें जगाते हुए... ‘ क्यों कामरेड नींद आ रही है क्या?’ इस तरह एक दो बार नहीं जाने कितनी बार... यह तो एक बानगी है....कुछ ऐसे कि तुम नींद में न जा सको...
संक्षेप में बताऊं... तुम्हारी आंखें पानी देखेंगी, प्यास महसूसोगे तुम , पर पानी नहीं मिलेगा... इसी तरह खाना भी तथा देह ! वह तो तुममें इतना गहरे तक जाएगी कि तुम सत्तो को देखोगे, नाचते, गाते, आलिंगनबद्ध होते, किसी दूसरे के साथ नहीं, खुद अपने साथ पर सत्तो तक तुम न पहुंच पाओगे... वैसे भी सत्तो ... मारी जा चुकी है....
बस, बस, बस...बस करो मुझ पर रहम करो, मुझे गोली मार दो... सारा कुछ समझ गया कि तुम मुझसे, नींद, भूख, प्यास यहां तक कि सोचने की शक्ति भी छीन लोगे.... मैं जीवित रहूंगा पर लाश की तरह यही न... फिर भी तुम मुझसे संगठन के बारे में कुछ भी न कहलवा सकोगे... ठीक चौदहवें दिन तुम्हारा रिमांड खत्म हो जाएगा तथा अदालत मुझे जेल भिजवा देगी... क्योंकि अदालतें नक्सल पंथियों की जमानतें करती नहीं... चलो ठीक है....
तो फिर ले चलो यातनागृह की तरफ, थोडा़ जल्दी करो, जंगल जागने वाला है, जागे हुए जंगल में से तुम्हारा निकलना मुश्किल होगा... मैं तो बेमतलब का परेशान था.. अब समझा...बहुत-बहुत धन्यवाद मि. काउंटर !
काउंटर साहब उसके चेहरे की प्रतिक्रिया देखने में था, वहां शांति थी, तथा अदभुत आश्वस्ति... ऐसा तजबीज कर काउंटर साहब चकरा गया, साश्चर्य पूछा...
‘मि. कामरेड, काहे का धन्यवाद’,
‘इतना भी नहीं समझे, धन्यवाद इसलिए कि तुम्हारी वजह से मैं यातनागृह में होऊंगा.... जहां मेरे साथियों की सांसे हैं, गंध हैं... जीवित दिलों की धड़कने हैं...
फिर जाने क्या हुआ कि काउंटर साहब ने रायफल की नाल सीधी किया... धांय...धांय....धांय.. जंगल कांप उठा, पेड़ हिल गए, पत्ते डारों से चिपके हुए कांपने लगे...
यह अंधेरे की दूसरी परंपरा वाली भाषा थी... जिसका कोई अर्थ नहीं....
  हंस अक्टूबर 2006

नोरा और कोरा

किले की चढ़ाई चढ़ते समय दोस्त को शेरपा तेनजिंग याद आया। बर्फ की सबसे ऊंची पहाड़ी शेरपा तेनजिंग ने दुनिया में पहली बार फतह की थी। हर पर्वतारोही उनके नाम को जानता है। उसे अपने नाम पर थोड़ी चिंता हुई- कौन जानता है और कौन जानेगा ? फिर उसने सोचा कि उसे ऐसा क्या करना चाहिए जिससे उसका नाम भी जाना जाए। विजयगढ़ किले की यह चढ़ाई संस्मरण तो है पर उसके लिखे संस्मरण को कौन छापेगा ? छपेगा तो पढ़ेगा कौन ? लिखने पढ़ने, आत्ममुग्ध होने और बने-बनाए सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक जालों में उलझने के सिवाय उसके पास दूसरे काम ही क्या हैं ? अब तक तो वह उन संसाधनों की ही तलाश करता रहा है जिससे उसको सुख , आराम , यश व आर्थिक सुरक्षा मिले जिसे वह अपने छोटे परिवार को भी हासिल करा सके...।
वैसे इस तिलस्मी दुनिया में दोस्त का हासिल कम न था, वह मजे में था और मजे में रहने की कला भी उसे आती थी। हालांकि वह अपनी दुनिया का बेताज बादशाह न था, उसे वह जादूगिरी नहीं आती थी जो बादशाहियत के लिए अत्यंत जरूरी होती है। फिर भी दोस्त उस चेहरेवाला आदमी था जिसकी चमक लोगों को खींचा करती है।
दोस्त की चिन्ता थी कि उसके चेहरे की चमक ताकतवर बने और दूसरे चेहरों की चमक को हूबहू खींच ले। बाद में उसे समझ आया कि दूसरों का चारा-भूसा खाना पशुओं के गुण हैं जिन्हें खूंटे से बांधा जाता है। वह न पशु है, न कोई तानाशाह, सो इस तरह की सोच उसे आदमियत से विस्थापित कर देगी। दोस्त फिर तो आदमी बने रहने की चिंताओं में घिर गया , अब उसके सामने कोई भी चेहरा चमकदार नहीं था, जो चमकदार जैसे जान पड़ते थे या तो वे घपलेबाज , धोखेबाज थे या पूरी कौम के प्रति मक्कार थे। किले की कठिन चढ़ाई दोस्त के लिए उस अतीत की चढ़ाई थी जो खुद के अंतर्विरोधों से मर चुका था। अतीत की चढ़ाइयां जितनी ऊंची थीं, उतने ही गहरे व विस्मयकारी अतीत के रहस्य भी थे। दोस्त की चाह थी कि वह अतीत के रहस्यों तक पहुॅचे...।
दोस्त बनारस का रहने वाला था और बनारस के ही चेत सिंह भी थे जो इतिहास के पन्नों में महाराजाधिराज थे। उन्हें महाराज बनारस के नाम से जाना जाता था एक जमाने में लोग-बाग राजाओं के नाम नहीं जानते थे- राज्यों के नाम से ही वे जाने जाते थे, जैसेः महाराज ग्वालियर , महाराज बीकानेर, जोधपुर आदि। दोस्त को मालूम था कि चेत सिंह बिजयगढ़ किले से ही फरार हुए थे,
विजयगढ़ किले पर तब उनका शासन था। दोस्त इतिहास से प्रभावित नहीं था,
उसके लिए सिर्फ यह था कि बनारसी कभी भागता नहीं ? फिर चेत सिंह क्यों भागे? चंद्रकांता सीरियल में चेत सिंह का नाम क्यों नहीं आया- क्या देवकीनंदन खत्री ने जान-बूझकर मृत अतीत की अपने तरीके से दुबारा हत्या की ?
दोस्त चढ़ाई चढ़ने में लगातार था, दोस्त के साथ देवनाथ भी चढ़ाई चढ़ने में लगातार था पर दोनों थक चुके थे, सो वे थकान से राहत के लिए कुछ न कुछ सोच रहे थे। दोस्त अपनी पहचान विस्तारित करने की चिंता में था जबकि देवनाथ उन हादसों की पड़ताल करने में था जिसके कारण उसके पूर्वजों को विस्थापित होना पड़ा था। एक तरफ से दोनों अपनी वर्गीय पहचान के संकट से निकल सकने की चिंता में थे। ऐसी चिंताएं अक्सर परेशान करती हैं, सो वे दोनों मानसिक रूप से परेशान थे और कुछ सुस्ताना चाहते थे।
सुस्ताने के लिए चढ़ाई पर अच्छी-अच्छी जगहें थीं बाईं तरफ एक चौड़ी सी चट्टान थी जो किसी छत की तरह हवा मे टंगी थी, दो चौड़ी व मोटी चट्टानें उसके बाजुओं को थामे हुई थीं। एक हिस्सा तो किले की पहाड़ी से जुड़ा ही था। रोली-अक्षत वाली गुुफा जैसा अंधेरा वहां न था। पगडंडी की तरफ से गुफा खुली हुई थी। सो यहां जरूरत से अधिक रोशनी थी। चूंकि यह जगह काफी ऊंचाई पर थी और वहां तक पहुंचने के लिए कई ऊंची-नींचीं, ऊबड़-खाबड़ चट्टानों के तोड़दार ठोकरों से बचना होता सो पालतू पशुओं के गोबर वगैरह या जंगली जानवरों के त्याज्य वहां नहीं थे। जगह साफ थी, जगह-खर पतवार से भरी न होती तो देह फैॅलाने लायक भी थी। वे दोनों कुछ ऊंची जगह तलाश कर उकडू बैठे और बातें करने लगे।
बातों में यह था कि अब कितनी चढ़ाई है ? और चेत सिंह क्यों भागे? चेत सिंह से ही जुड़े ढे़र सारे सवाल थे जिनसे कम से कम चेत सिंह के भागने से पहले का सारा अतीत पूरी तरह खुलता कि चेत सिंह यहां आए ही क्यों ? दोस्त यह सब तत्काल जान लेना चाहता था क्यों कि उसे अतीत में से वह तर्क निकालना था जिससे साबित होता कि बनारसी भगोड़ा नहीं होता। दोस्त भगोड़ों व गद्दारों को एक ही नस्ल का मानता था। प्रकारांतर से बनारसी होने के नाते वह स्वयं चेत सिंह के रूप में रूपांतरित हुआ जा रहा था।
वैसे हर काल में अतीत के मुखापेक्षी लोग पाए जाते है। कहीं कहीं तो अतीत की पुनः स्थापना में लगे भी होते हैं। उनका ख्याल होता है कि जब अतीत उनका था फिर वर्तमान क्यों नहीं! हालांकि दोस्त वैसा न था जो अतीत की फसलें वर्तमान में काटता। वह इस मामले में प्रगतिशील था कि आदमी के लिए सबसे जरूरी सबक है कि वह भविष्य को अंधा होने से बचाए। वर्तमान के उन जालों को तोड़े जो भविष्य को अंधा बनाते हैें।
दोस्त अंधा नहीं था सो वह देख सकता था कि विजयगढ़ किले तक की उसकी यह यात्रा किसी खतरनाक समय की यात्रा है, उस समय की जिसकी आवारा व साजिशी कार्यवाहियां भी राजनीतिक कार्यवाहियां मानी जाती थीं।
अच्छा तो चेत सिंह पर वारेन हेस्ंिटग्स ने हमला किया था?
हमला वही कर भी सकता था। देवनाथ ने वारेन हेस्ंिटग्स के नाम को पुष्ट करते हुए दोस्त को बताया।
वजह क्या थी ? दोस्त ने पूछा , फिर दोस्त को उत्तर भी समझ में आया- कहीं ‘चंद्रकान्ता’ के कारण तो नहीं! वारेन हेस्टिग्स को भारत की पसंदगियों में रानिया अव्वल दर्जे पर थीं।
-चंद्रकान्ता के लिए नहीं ?’ दोस्त ने सवाल सुधार कर पूछा।
- नहीं, दोस्त नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं। किले पर चलो सब बता दूंगा।’ चंद्रकान्ता का तो विजयगढ़ अगोरी किलों व चेत सिंह से दूर का भी रिश्ता नहीं। वह शायद देवकीनन्दन खत्री जी द्वारा खास तौर से रचित औपन्यासिक महिला थी। हो सकता है, उस नाम की महिला यथार्थ में भी कहीं रही हो जिससे खत्री जी का लफड़ा रहा हो , मुझे नहीं मालूम।’ उसने दोस्त को बताया और दोस्त के चेहरे पर आंखे टिका दीं, वहां कोई चंद्रकान्ता न थी। पर दोस्त इतिहास में डूबा हुआ था-
दोस्त ने पूछा- कोई वजह तो जरूर रही होगी ? कहीं चेत सिंह अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ तो न थे।’
- अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ वे थे, वे चाहते थे टीपू सुल्तान की तरह लड़ना, वे गुलाम होना नहीं चाहते थे, सो वे बनारस के किले से भागकर विजयगढ़ किले पर आए थे, यह सोचकर कि उधर के राजाओं में रीवां नरेश का उन्हें सहयोग मिलेगा फिर वे उनसे मिलकर अंग्रेजों से लड़ेगें, पर बीच में हेस्ंिटग्स ने हमला करके गुलामी के खिलाफ लड़े जाने वाले जरूरी कथानक का अंत कर दिया, नहीं तो चेत सिंह भगोड़ा नहीं लड़ाकू कहलाते।
विजयगढ़ किले पर हेस्ंिटग्स द्वारा किया जाने वाला हमला वह षड़यंत्रकारी व धोखापूर्ण कार्यवाही थी जिसमें अंग्रेंज माहिर होते थे।
देवनाथ इतिहास का खुलासा करते हुए , निराश हो गया। दोस्त ने उसके चेहरे की भाषा समझना चाहा और एकटक ताकने लगा। वह पल-पल में बदलता, कभी गुस्से में तो कभी घुटन में, अचानक उसने दोस्त को संबोधित किया, दोस्त को लगा कि भावावेश में है।
- दोस्त ! हेस्ंिटग्स का हमला, हमला न था, युद्व तो कत्तई न था, उस जमाने में भी युद्ध का सदाचार था पर अंग्रेजों ने युद्ध के आचरण की हत्या
कर दी थी। हेस्ंिटग्स ने किले पर डकैती डाली थी, वह भी खिड़की के रास्ते से रात के बारह बजे। पहले हेस्ंिटग्स ने चेत सिंह की खुफियागिरी कराकर मालूम कर लिया था कि वे कौन-कोन लोग हैं जो राजा बनने का सपना देख रहे हैं और चेत सिंह के साथ गद्दारी करने में जिन्हें शर्म न होगी। चेत सिंह पर किया गया सीधा हमला अंग्रेजों के विपरीत होता क्योंकि विजयगढ़ और अंग्रेंजी राज के आदिवासियों की गुलेलों एवं धनुषों के वाणों से लड़ना उनके लिए कठिन होता। रांची क्षेत्र के आदिवासियों से हुई लड़ाईयों का अनुभव उन्हें था कि ‘साले! जाने कौन-सी बन्दूक चलाते है जिसमें आवाज भी नहीं होती।’
इतिहास के बारे में किसी कहानी की तरह पाठ करके देवनाथ चुप हो गया जबकि दोस्त आगेे सुनने के लिए उत्सुक था। वह कुछ इस तरह चुप हुआ जैसे उसे कुछ भूल गया हो वह उसे याद करना चाह रहा हो जबकि ऐसा न था, उसे जितना मालूम था सब याद था, भूलने लायक कुछ था भी नहीं।
चुप्पी तोड़कर वह बोला-
‘दोस्त! वह जो ऊंचा-ऊंचा दीख रहा है, किसी बुर्ज या ढ़ूह माफिक , वही किले का मुख्य दरवाजा है, यह पगडंडी हमें वहीं पहुंचाएगी।’
दोस्त अंग्रेजी साम्राज्य की आतताई कहानियों में था। उसे 1857 का गदर और नाविक विद्रोह याद आया देश भक्ति का वह जज्बा , जो भगत सिंह- चंद्रशेखर आजाद जैसे व्यक्तित्वों का निर्माण करता है, उसके काल्पनिक अनुभव में उतराया। फिर तो दोस्त को खुद पर कोफ्त हुई कि वह शब्दों को धार देने में ही लगा हुआ है। उसकी चिंन्ता है कि कविता की उसकी कोई किताब प्रकाशित हो जाए जो पोखरन के बम विस्फोट की तरह सारी दुनिया में विस्फोट कर दे और दुनिया एकदम से बदल जाए। उसे अपना कवि-कर्म कुछ ऐसा लगा जैसे वह किसी फिल्म का निर्देशक हो और वर्तमान के साथ बलात्कार किए जाने वाले दृश्यों का फिल्मांकन कर रहा हो।
आत्मग्लानि के थोड़े समय के दौरान ही दोस्त किले के मुख्य दरवाजे पर था जैसे वह किसी बहुत बड़ी परर्छाइं के नीचे खड़ा हो जिसकी परर्छाइं बडी परर्छाइं ने लील लिया हो। कुछ-कुछ अचंभित-सा दसियों शताब्दी पूर्व भी भवन निर्माण तकनीक हमारे देश की विकसित थी, देवनाथ दोस्त से थोड़ा अलग उस तरफ था जिधर एक चौकोर पत्थर पर खुदाई करके कुछ लिखा हुआ था और वह पत्थर किले के दरवाजे वाले विशाल खंभों के ठीक बगल वाले चबूतरे में चुना हुआ था, जहां से दरवाजे के ऊपर बनी कोठरी में जाने के लिए पत्थर की चुनी हुई सीढ़ी थी। उसने दोस्त को अपनी तरफ बुलाया, फिर दोनों खुदे अक्षरों को पढ़ने लगे। हिंदी का कहीं ‘य’ तो कहीं ‘र’ और बांग्ला का ‘ल’ ‘व’ भी दिखता पर पूरा पढ़ने में न था, सो वे दोनों दरवाजे से पूरब की ओर मुड़े।
पूरब की तरफ तालाब था- पानी से भरा हुआ। दोस्त ने पहली बार पत्थरों वाला तालाब देखा था, जबकि वह तालाबों के शहर बनारस का था। अंतर यह था कि बनारस के तालाबों के घाट पत्थरों से बने होते थे, यह तालाब पत्थर की खुदाई करके पत्थर में से ही निकाले गये पानी से भरा था-
- साथी ! तीन-चार सौ फीट की ऊंची पहाड़ी पर इतना साफ पानी ’ अंजुरी में पानी भरकर दोस्त ने उससे पूछा।
- हां यही तो....। शायद उस जमाने के लोगों को चूने और कोयले के करिश्मों के बाबत जानकारी थी। ’
अधूरा उत्तर देकर देवनाथ चुप हो गया कि दोस्त कोयला और चूना के बाबत पूछेगा ही। हो सकता है, दोस्त जानता हो क्यों कि एलोपैथिक दवाइयों के बढ़ते उपयोगों ने रसायन विज्ञान के अनगढ़ सूत्रों को लगभग याद करा दिया है। वह उस मजार की तरफ चला गया , जो पत्थर वाले तालाब के ठीक बगल में थी। मजार पर एक कमजोर-सी इमारत थी, जो बिना हिफाजत थी तथा कुछ सालों पहले की बनाई जान पड़ती थी। मजार पर जो चादर चढ़ाई गई थी, गाढ़े लाल रंग की और साफ थी। बगल में दानपत्र रखा हुआ था। फर्श ऊबड़-खाबड़ न थी सीमेंट की चिकनी पर्त कुछ काली-काली सी थी। मजार एक बाउंड्री से घिरी थी जिसके दरवाजे के दाएं बाजू से थोड़ी दूर एक झोपड़ी थी, ईटों को चुनकर बनाया गया एक चूल्हा था जिसके भीतर बुझी-सी दो-तीन मोटी-मोटी लकड़ियां थीं, चूल्हे में आग न थी। चूल्हे के बगल में पड़ी लकड़ी की राख ताजी थी, जिससे अनुमान होता था कि झोपड़ी में कोई रहता है, जो उस समय वहां न था।
दोस्त कोयला, चूना तथा पानी तीनों का प्रतिफल समझने मंे था, हालांकि मजार में उसने भी वह सब देखा, जो वहां था। उसने पूछा-
- ‘साथी, कोयला-चूना तथा पानी इन तीनों में रिश्ता...?
- दोस्त! यही तो आश्चर्य है इस इलाके का। कहते हैं यह सब आसुरी कला थी। तिलिस्म की कथा भी कुछ इसी तरह होगी। कार्बन तथा कैलेशियम जब भी मिलेंगें, वे पानी का उत्सर्जन करेंगे। जाहिर है , इस पहाड़ी में दोनों इस तालाब वाले स्थान पर एक जगह होंगे। फिर यह तालाब कैसे सूखेगा जब तक कोयला या चूने में कोई समाप्त न हो जाए!’
फिर उसने जोर देकर कहा-
‘दोस्त , विज्ञान ने तिलिस्मों पर से पर्दा हटा दिया है, जो अंधविश्वासों को सिरजा करते थे।’
- हां सो तो है! ’दोस्त ने हामी भरी। फिर दोस्त ने पूछा- जैसे उसे कुछ याद आ गया हो, ‘साथी! आज के उन्नतिशील विज्ञान ने भी तो अंधविश्वासों को सिरजा है, उसका क्या करोगे ?’
- दोस्त! तुम्हारा इशारा बमों बारूदों असलहों एवं गैर जरूरी तमाम
उत्पादनों की तरफ तो नहीं’ उसने दोस्त को अपना मत सुझाया।
दोस्त ने बताया- हां उसी तरफ! उन्हीं अंधविश्वासों की तरफ जिसे विज्ञान द्वारा सिरजा जाता है, पहले यही काम धर्म से कराया जाता था। उस विश्वास को आखिर क्या कहोगे जो सामान्य से सामान्य आदमी को चिंतित किए हुए है कि वह अपने लिए केवल अपने लिए सुख सुविधा वाली रंगीन दुनिया बनाए कुछ-कुछ विश्वमित्र वाली दुनिया की तरह। काल के चाहे जिस खंड को देखो, हर खंड में तुम्हें दो तरह की दुनिया दिखेगी। एक दुनिया होगी- मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा , गिरजा या कि आविष्कारों को भोगने वाली, धर्मो का पाठ याद करने वाली तो दूसरी होगी आविष्कारों, चमत्कारों, भजनों, पाठों को देखकर, सुनकर, अनुभव करके रोने वाली और खुद को अत्याचारों , शोषणों, बेईमानियों, भ्रष्टाचारों जैसे तमाम कदाचारों की प्रयोगशाला बनने वाली। इस दूसरी दुनिया के पास ‘ अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’ जैसा वह घृणित अंधविश्वास होता है जो पहले उन्हें भीरू, कमजोर व विवेकहीन बनाता है, बाद में वे खुद आज्ञाकारी भेड़ें बन जाते हैे। फिर भी कुछ लोग होते हैं जो भेडे़े बनने से इन्कार कर देते हेै तथा धर्म , विज्ञान व राजनीति के चाबुकों को पकड़ लेने एवं मन माफिक उपयोग करने की क्षमता भी हासिल कर लेते हैं।
वह दोस्त के संक्षिप्त संभाषण को सुनने में लगातार था तथा गुन भी रहा था कि दोस्त का पक्ष वैचारिक रूप से वंचितों उपेक्षितों एवं शोषितों के प्रति है जो आजकल बुद्धिजीवियों की सम्मानित कार्य संस्कृति है। उसने दोस्त के चेहरे को देखा कि कहीं दोस्त थक तो नही गया है, भूख का रंग चेहरे पर उतराया तो नहीं है। दोस्त के चेहरे पर थकान व भूख का तनाव न था , अलबत्ता वहां वह चमक थी जो मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों के चेहरों पर भाषणों-संभाषणों, वार्तालापों के दौरान पाई जाती है।
उसने सोचा कि दोस्त उन सब्जियों की तरह है जो दूसरों के सहारे लटककर या फैलकर फला करती हेै, जो हरी सब्जी के नाम से जानी जाती हैं, जिनमें जानकारों के अनुसार विटामिन भी अधिक पाई जाती है।
वह दोस्त के साथ चलते हुए सोच रहा था कि दोस्त प्रायोजित अतीत से हटकर शायद प्रायोजित वर्तमान के बारे में सोच रहा हो। यदि दोस्त कुछ सोच न रहा होता तो निश्चित रूप से अपने संक्षिप्त भाषण पर प्रतिक्रिया जानने का प्रयास करता, जिससे मालूम होता कि उसका संभाषण वजनदार है या नहीं ? जबकि दोस्त प्रतिक्रिया जानने के मुद्देे पर तटस्थ बना रहा। दोस्त चुप था, जैसे वह निश्चित रूप से कुछ सोच रहा हो।
देवनाथ ने दोस्त की चुप्पी तोड़ने की गरज से कहा-
‘दोस्त! चलो ठीक पूरब की तरफ जिधर कचहरी थी। उसके पास ही में किले की पूर्वी दीवार है। दीवार पर एक गोमटीनुमा बुर्ज है जिस पर पहरेदार रहते थे। वहां से नीचे के टोलेनुमा जंगली गांव काफी मनोरम
दिखते हैं। मनोरम इतना कि जैसे गांव के घरों ने पेड़ों की नीली छतरियां ओढ़ लिए होे।
दोस्त उसके साथ पूरब की तरफ चलने लगा- सामने ही खंडहर हो चली कचहरी थी। वह एक बड़ी चौकोर इमारत थी जिसकी छतों को मौसम ने गिरा दिया था। हो सकता है, हेस्ंिटग्स न ही तोड़ दिया हो। उसे तो मालूम ही था कि विजयगढ़ किले के भीतर ही चेत सिंह का खजाना है। कचहरी की दीवारें पत्थर की थीं तथा जमीन एवं दरवाजों की ऊंचाइयों पर दीवार की चौड़ाई के बराबर मोटे-मोटे पत्थर यानी दाब रखे हुए थे, जो लिन्टर माफिक दीख रहे थे। दीवार की चुनाई चूने व सुर्खी की जान पड़ती थी जिसका जमाव पुराना होने के बावजूद खुरचने लायक न था। आजकल की कचहरियों की तरह उसका आकार-प्रकार न जान पड़ता था। कचहरियों की वह ऊंचाइयां, जिन पर न्यायाधीश बैठा करते हैं तथा उनके बांए-दांए के कठघरों जैसी वहां कोई ऊंची जगह न थी। अधिकांश कमरे छोटे-छोटे थे, हालनुमा एक बड़ा कमरा था, उसमें भी चबूतरे जैसी जगह न थी। सभी कमरों की सतह समतल थी।
दोस्त कचहरी का पुरातत्व कुछ इस तरह देख रहा था जैसे वह उसका विशेषज्ञ हो, जब कि देवनाथ केवल दोस्त का साथ देने के लिए देख रहा था कि कहीं दोस्त अतीत में उतरकर चोटिल न हो जाए या भावुक ही। खतरा दोनों से है एक में खुद को दोस्त जख्मी कर लेगा तथा दूसरे में समाज को जख्मी कर देगा।
‘ साथी ! यह किला छठवीं-सातवीं शताब्दी का तो होगा ही, गोया उस जमाने में भी न्याय तथा व्यवस्था नाम की चीज थी। उसकी कैसी संरचना रही होगी साथी ?’
तब देवनाथ ने दोस्त की निगाहों को देखते हुए कहा, ‘ उस समय दोस्त की निगाहें अतीत के तिलिस्मों को खोदती हुई-सी थीं, तथा काफी गहरे में उतरी हुई जान पड़ रही थीं। उसने दोस्त के मनोभावों के अनुरूप ही उत्तर देना तात्कालिक रूप से समयोचित समझा-
‘हां दोस्त! उस समय भी युद्धकालीन आचरणों के अनुरूप ही ‘न्याय तथा व्यवस्था ’ समाज की सहनशीलता के अनुपात में थी ताकि जनता विद्रोह न कर दे, कमोबेश हर हुकुमत जनता की सहनशीलता पर टिकी होती है। हुकूमतों का लक्ष्य जन-विद्रोहों को न उभरने देने एवं उभर जाने पर दमित करने का ही होता है। समानता, स्वतंत्रता , मानवाधिकार जैसी अवधारणाओं का जन्म उस जमाने में नहीं हुआ था।’
दोस्त तर्क देने के मूड़ में न था, मूड में होता तो हालिया इजाद स्वतंत्रता , समानता व मानवाधिकारों की अवधारणाओं पर भयानक टिप्पणी करता कि यही तो स्वतंत्रता है कि तुम विशेषाधिकारों वाली दुनिया की लोकशाही, अफसर शाही, चुनावशाही, टेक्नोक्रेसी में से या कि दूसरी दुनिया के
उपेक्षितों, वंचितों, शोषितों, उपभोक्ताओं आदि में से जिसे चुनना चाहो चुन लो, सब कुछ खुला-खुला सा है। अपने व्यक्तिगत चुनाव के जरिए तुम जिस दुनिया का सदस्य बनना चाहते हो, बन सकते हो। पर ध्यान रहे जो अधिकार प्राप्त लोग हैं, उनके अधिकारों के प्रति सम्मान करते हुए किसी सर्कसी जानवर की तरह पूरी तरह चाबुक से डरा हुआ आज्ञाकारी बनकर । उस समय दोस्त एकदम चुप था- किसी अंतर्मुखी की तरह जैसे वह खुद ही कोई जानवर या अतीत की कोई भेड़ हो।
कचहरी देख लेने के बाद वे दोनों रनिवास की तरफ बढ़ने लगे। रास्ता ढलुआ तथा उतार-चढ़ाव वाला था। तभी उसे, उस बुर्ज का ध्यान आया जिससे किले के नीचे के गांवों को देखने में सुविधा होती। बुर्ज किले की सुरक्षा दीवार का एक हिस्सा था जो पूर्वी और उत्तरी हिस्से के कोने पर स्थित था।
बुर्ज से टोलेनुमा गांव काफी मनोरम एवं आकर्षक दीख रहे थे। आकर्षक इतने कि कोई फिल्मी हिरोइन पेड़ों की नीली रोशनी में से निकलकर धमाका करने वाली हो या फिर यह भी हो सकता है कि फिल्म चल जाने के बाद शुक्रिया अदा करने गांव में आई हो कि उस दिन तो वह बच गई नही ंतो जाने क्या करते उग्रवादी मार-पीट , अपहरण, बलात्कार, कुछ करते न करते फिल्म की शूटिंग तो रोक ही देते। दोस्त को लगा जैसे वह चंद्रकान्ता सीरियल देख रहा हो तथा चंद्रकान्ता छतनार पेड़ों की पत्तियों पर से चलते हुए सीधे किले के बुर्ज तक, हवा पर पैदल चलती हुई गुरूत्वाकर्षणहीन छुई-मुई की तरह पहुंचना चाह रही हो। पर दोस्त के लिए यह कोई यथार्थ नहीं, वह मनोभाव था जो चंद्रकांता के बाबत भीतर कहीं दबा हुआ था। फिर तो दोस्त को महसूस हुआ कि उसके पैरों में थकान के कारण सूजन आ गई है तथा वह एक साधारण इंसान की तरह थकता भी है। नही ंतो वह कुछ देर पहले फिल्मों दूरदर्शनों के गढ़े गए अंधविश्वासों में तैरता हुआ किसी काल्पनिक स्वर्गलोक की इं्रद्रसभा में था।
रनिवास की इमारत किसी अनगढ़ आकृति की तरह थी, ऐसी अनगढ़ भी नहीं जिससे ज्यामिति की कोई विशेष आकृति बनती हो या पुराने जमाने की बेधशाला की तरह ही हो। गंभीरता से देखने पर दोस्त को जान पड़ा कि उस जमाने की हरम-परंपरा वाली कई-कई रानियों के युग में इस तरह की बेढ़ब इमारतों पर शोध किया जाना चाहिए- आखिर वे रहती कहॉं थीं , कहां होेते थे उनके डबल बेड, स्नान घर , योग केन्द्र, पुस्तकालय, वार्तालाप कक्ष, सुरक्षा व्यवस्था, दास-दासियां, सेवक-परिचारिकाएं- वह उद्यान भी नहीं दीख रहा जहां कबूतर, या सुगना आए, दिल की बातें उड़ा ले जाए ! हंस के जोडे़ भी नहीं दीख रहे। दोस्त जैसे आसमान से गिरकर खजूर पर लटक गया हो, अब जमीन पर आखिर कैसे उतरे।
दोस्त को मालूम था कि खंडहर हर हाल में खंडहर होते हैं तथा अतीत के
खंडहराए अवशेषों को जोड़कर कोई इमारत नहीं बनाई जा सकती। यदि जबरिया बनाने की तकनीक ईजाद भी कर ली जाए तो वह इमारत न अतीत की होगी, न ही वर्तमान की। फिर उस नई इमारत पर पीला केशरिया , हरा, लाल चाहे जिस रंग का झंडा फहराओ, कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। वैसे भी अतीत को महिमामंडित करने वाले जींस दोस्त के भीतर न थे, न ही उसके पास अतीत के प्रति गुस्सेवाला भाव ही था जबकि वह अतीत के प्रति उदार तो कतई न था, बेरहम भी इतना नहीं कि अतीत को जानना ही न चाहे।
रनिवास के बगल में ही संकट मोचक हनुमान का एक मंदिर था जिस पर शिवालय जैसी संरचना न थी, वह एक साधारण से कमरे जैसा था। कमरे के भीतर हनुमान की प्रतिमा थी, जो रोली-सिंदूर से गब-गब लाल थी। पास में कनैल, गेंदा आदि के बासी फूल पड़े थे। हनुमान प्रतिमा की बाईं ओर अगरबत्ती की तीलियां थीं जो अधिकांश जल चुकीं थी उनकी खूटियां ही बची थीं। ऊपर दीवार पर शिव का एक कलैंडर टंगा था जो साल भर पुराना था।
हनुमान मंदिर तथा मजार की दूरी के बारे में कोई निर्णय लेने के पहले दोस्त ने उससे पूछा-
-साथी, वह मजार तथा यह हनुमान मंदिर तो हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव के प्रतीक जैसे जान पड़ते हैं, क्या वे दोनों भी किले के निर्माण के समय रहे होंगे ? या जैसे-जैसे तख्ता पलट होता गया, वैसे-वैसे धार्मिक प्रतीकों के निर्माण होते गए? क्या इस किले पर कभी-मुस्लिम राजाओं, नबाबों की भी हुकूमतें रहीं ? या उन्हीं की थीं फिर हिंदुओं की र्हुइं ? दोस्त जैसे जानना चाह रहा हो कि हुकूमतें जनभावनाओं को प्रभावित करने के लिए किस-किस तरह के नाटक करती हैं तथा धर्म को अपनी कूट-चालों के लिए इस्तेमाल करती हैं-
दोस्त, उसके चेहरे को देखने लगा कि शायद वहां अतीत खुला-खुला व बेपर्द हो जबकि वह भी सुने-सुनाए अतीत में था। या तो मध्यकाल, प्राचीन काल के उस अतीत में था जिसे कालेज में पढ़ाया गया था अंग्रेंजों की किताबों में था। देसी इतिहास लेखकों का अता-पता उसे कतई नहीं मालूम।
सो वह भी दोस्त के सवाल पर उन संभावनाओं की टोह में था जो धार्मिक प्रतीकों का निर्माण या विध्वंस कराती हैं। इतिहास में धर्म के प्रति कठोरताएं, या मुहब्बतें दोनों पाई जाती हैं। उसने खुद को टटोलते हुए दोस्त को बताया,
-दोस्त! मैं इन धार्मिक प्रतीकों के निर्माण के बाबत कुछ भी नहीं बता पाऊंगा, सिर्फ अनुमान कर सकता हूं, और अनुमान सही हों , आवश्यक नहीं।
दो-तीन वर्ग किलोमीटर में फैला विजयगढ़ किला कचहरी, रनिवास, मोटी चहारदीवारियों, विशाल दरवाजों तथा नालों में सिमटा हुआ था। किले के भीतरी हिस्सों में बाहरी चहारदीवारी का निर्माण इस मायने में अर्थपूर्ण था कि उस पर तीन-तीन घुडसवार अपने घोडों को एक साथ दौड़ा सकते थे।
किले से उतरते समय दोस्त ने उससे पूछा था,
-साथी ! वैसे तो हम काफी थके हैं, पर वही दर्द व तकलीफ महसूस कर रहे हैं जितना कि पंद्रह-सोलह सौं सालों की ऐतिहासिक यात्रा में हमें झेलना पड़ता, सहना पडत़ा।’
फिर अपनी बातें जारी रखते हुए दोस्त ने कहा,
-साथी ! किले पर चंद्रकांता की कहीं भी वह गंध न थी, जिसे सीरियल ने महकाया था। लेकिन उस औरत की गंध हर तरफ थी जो किले पर चढ़ते समय मिली थी। कल्पना करो कि चंद्रकांता का आदिम रूप कहीं उस औरत का तो न था !’ कहते हुए दोस्त उस जवान जंगली औरत की फुर्ती, मस्ती, निश्छलता के बाबत काल्पनिक बनने लगा। देवनाथ दोस्त की आधुनिक भावुकता से काफी दूर... अपने पुरखे... नोरा व कोरा के बारे में सोच रहा था कि कहां चुनार, कहां शाहाबाद, फिर पलामू...उसे झटका जैसा लगा... कहीं अतीत अपने आप में धोखा तो नहीं ? वह नोरा व कोरा के कथानकों का कोई अनुभाग बन सकता है क्या जिन्हें वारेनहेस्टिंग्स ने इसी किले पर मारा था और उनके तीर धनुष राम सागर तालाब में फेका गये थे। कोई नहीं जानता कि नोरा और कोरा कौन थे ? आखिर उन्होंने अंग्रेंजों से सुलह कर अपनी परिस्थितियों को अनुकूलित क्यों नहीं कर लिया ? ’ देवनाथ अपने पुरखों को याद करते हुए दोस्त के साथ तिलिस्मी किले से नीचे उतर आया।
   जनसत्ता 2002 वार्षिक अंक


कोर्स की किताबें

इतिहास, कविता के अंत की उत्तर आधुनिक घोषणओं की तर्ज पर यह भी प्रचारित कराया जा सकता है कि दुनिया के बहुत बडे़ हिस्से की चुप्पी के कारण ही इतिहास अपनी नियति से परिपूर्ण होने के बावजूद लगातार भहराता रहा है दुनिया की छाती पर और भिन्न-भिन्न भूगोलों में बंट कर खंड-खंड होता रहा है। भिन्न-भिन्न भूगोलों और संस्कृतियों में विभक्ति दुनिया को कभी जीतने के सपनों का दूध पिलाया गया तो कभी भूगोलों की अपनी स्वाधीनता की लड़ाइयों को अनवार्य बताया गया । बहरहाल इतिहास की सुंदरता या असंुदरता से प्रभावित दुनिया मानव सभ्यताओं के सृजन से लगातार जुड़ी रही। यही जुड़ाव दुनिया को मरने से बचाता है- जीवन जीते रहने की आकांक्षा और उत्साह देता है। इसी दुनिया में सुरेश और मोहन नाम के दो मित्र रहा करते थे अब कहां हैं, हैं कि नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता। एक जमाने में उनकी मित्रता दूसरों के लिए मिसाल थी। दोनों नामी-गिरामी कहानीकार थे हालांकि सुरेश तो कविताएं भी लिखा करता था। कोई कविता संग्रह उसका प्रकाशित भी हुआ था। उस पर गंभीर चर्चा हुई थी कि नहीं आज याद नहीं जबकि मोहन कहानी से बाहर निकला ही नहीं, केवल कहांनियां लिखता रहा हो सकता है कि लघु कथाएं भी लिखता रहा हो। दोनों में समानताएं थीं तो असमानताएं भी थीं बावजूद इसके वे दोनों मित्र बने रहे, कथा गोष्ठियों, आयोजनों में लगातार जाते रहे, अध्यक्षता तथा संचालन करते-कराते रहे। पर उनका अंत उफ!
आलेख पाठ से उन दोनों ने गोष्ठियों में जो भाग लेना शुरू किया वह अध्यक्षता तक साथ-साथ चलता रहा। कहा तो जाता है कि उन्हीं दोनों के कारण ही अब मात्र अध्यक्ष ही नहीं होता गोष्ठियों में लगभग परंपरा ही बन गई है और अध्यक्ष मंडल का गठन किया जाने लगा है। अब समतुल्यों तथा समरूपों को फांकों में कैसे बांटा जा सकता है। उस जमाने में कविताओं का इतना बोल बाला था कि मत पूछो- जिसे देखो वही कविता लिख रहा है। किस विषय पर कविता नहीं ? सूरज, चन्द्रमा, बदरियां, बसंत, नदी, पहाड़, जंगल, रहस्य-रोमांस, प्रेम-द्रोह, विद्रोह सब पर! हंसुआ, तगाड़ी, कुदाल, फावड़ा, टंगारी, हल, कलछुल, हांडी, डेकची थाली-ज्ञात अज्ञात सभी विषयों पर कविताएं लिखी जा रही थीं। साहित्य का जनतंत्र कविता से भरा-पड़ा था। साहित्य के इस बहु प्रचारित जनतंत्र में उन दोनों ने सायास प्रवेश किया और प्रवेश भी ऐसा कि कविताएं जगह-जगह कराहने, रोने लगीं। कौन सुनता विधवा प्रलाप, कौन सुनता विरह गीत, किसे फुर्सत थी कि औरत के पैर को सिर पर रखकर जगह-जगह घूमता और नख-शिख वर्णन वाली कविताओं का सस्वर पाठ करता। कविताओं की स्थापित दुनिया में कंपन हुआ, विखंडन इतना कि साहित्य में कहानियांे को
भी शामिल कर लिया गया। फिर क्या था-जिधर देखो कहांनियां ही कहानियां ! वे दोनों कहानियों के शिखर पुरूष बनते चले गए।
ऐसा नहीं था कि कहांनियों के बारे में उन दोनों के विचार समान थे दोनों में वर्ग-वर्ण को लेकर काफी भिन्नता थी। कहानी के बारे में मोहन की धारण थी- ‘‘कहानी के लिए आवश्यक है उर्वर भूमि की तलाश, फिर उसकी जोताई, सफाई, बांध, ट्यूबेल या नहर की सरकारी/व्यक्तिगत सुविधा हो तो जमीन का पलेवा। पलेवा की हुई जमीन की दुबारा, तिबारा, जोताई। जोत के बाद बीज का छिड़काव गोया बुनाई। निश्चित रूप से सभी दानों का शत-प्रतिशत जमाव। जमीन का पलेवा किन्हीं कारणों से यदि संभव न हो पाए तो सघन जोताई तो करनी ही चाहिए। जैसी जोताई वैसी कमाई।’’मोहन की इस धारणा से सुरेश कितना भिन्न था यह तो आलोचक जानें, व समझें-बूझें पर सुरेश के विचारों का प्रभाव उस समय के पाठक वर्ग पर बहुत ही अच्छा पड़ा। सुरेश को अध्ययनशील, विद्वान कहानीकार के रूप मंे जाना जाता था और महसूसा जाता था कि कितना कठिन है विश्वविद्यालय में अध्यापन करना, शोध कराना और कहांनियां भी लिखना वह भी लगातार। सुरेश का कहानियों के बारे में दृष्टिकोण था- ‘‘ कम पढे़-लिखे लोग चाहे जो कुछ भी लिखें- बोलें, अर्थ का अनर्थ कर दिया करते हैं। पढ़ा-लिखा व्यक्ति ग्लोब के संदर्भों को समझता है, उसकी चुम्बकीय ऊर्जा का उपयोग करता है। अब क्या है कि घूम-घूम कर मांगते रहो, कभी अधिकार, कभी आरक्षण और कभी सामाजिक न्याय। अधिकार, आरक्षण और सामाजिक न्याय की बंद परिभाषाओं पर विचार किया जाना चाहिए कि नहीं ? कौन है नियामक ? कौन दे सकता है अधिकार, आरक्षण और सामाजिक न्याय ? उन कहानियों के बारे में सिर्फ चिन्ता व्यक्त की जा सकती है जिन कहानियों के पात्र आज के वैज्ञानिक युग में भी हल-बैल से खेत जोतने की कामना कर रहे हैं। कहानियों के पात्रों के सिर से गोबर और पाखाना का झउआ नहीं उतर पाया है अभी तक औरतें सड़ रहीं हैं रसोई में। बलात्कार हो रहा है ओर मुंह तोपे-ढ़ाके हुए हैं- आखिर गोबर और पाखाना पर कब तक खड़ी रहेंगी कहानियां ?’’

भिन्नताओं का होना कोई दुर्घटना नहीं है, वे तो स्वाभाविक रूप से हुआ करती हैं। कोस-कोस पर पानी, पांच कोस पर बोली और बीस कोस पर भाषा का बदल जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है। भिन्नताओं के बावजूद दोनों की मित्रता न तो चोटिल हो रही थी और न ही घायल। मित्रता के थुथराए जाने के अवसर कई बार आए। एक बार तो अजीब संयोग हुआ। हुआ यूं कि विदेश की किसी क्रांतिकारी सरकार ने अपने देश में फैसला किया कि साहित्यक और सांस्कृतिक बदलाव लाने और क्रान्तिकारी परिवर्तनकारी चेतना जगाने के लिए गरीब असहाय और लाचार देशों के साहित्यिक और संस्कृतिकर्मियों की पहचान की जाए। उस विदेशी सरकार ने मोहन और
सुरेश को कथाकार, उपन्यासकार के रूप में प्रस्तावित किया। चुनाव की सूची हालांकि अंतिम रूप से निर्णित नहीं थी। इन दो नामों में से किसी एक को ही चुना जाना था। राजकाज में तो देरी हुआ ही करती है। यहां के दूतावास ने मोहन और सुरेश दोनों का नाम प्रस्तावित करके भेज दिया । सुरेश राजधानी आया-जाया करता था, अपने हिसाब से उसने जुगत भी बिठायी, राजदूत से मिला। विदेशी राजदूत ने सारगर्भित आश्वासन भी दिया जबकि मोहन जहां था, उसे पता भी नहीं था कि हो क्या रहा है। वह अपनी कहानियों में परेशान जगह-जगह पात्रों को तलाशता, ढूढ़ता-बतियाता। संयोग तो संयोग होता है, श्रेय तो मोहन को बदा था। विदेशी सरकार का यहां के दूतावास पर निर्णय आ गया। निर्णय अखबारों में छप गया। फिर क्या था मोहन-सभी जगह मोहन, मोहनमय ही पूरा साहित्यिक वातावरण हो गया। लेकिन भाई, वाह !
सुरेश भी जाने किस धातु का बना था ? उसके ऊपर कोई असर नहीं! शायद दूसरा कोई होता तो मित्रता में फांक हो गई होती और दोनों शत्रुतापूर्ण रिश्तों के अनुपालन में भिड़ गये होते। सब कुछ सामान्य रूप से यथावत चलता रहा- सुरेश ने मोहन के चयन पर प्रसन्नता व्यक्त की और पत्र लिखकर मोहन को शुभकामनाएं दी। बदले में मोहन सुरेश से समय निकाल कर मिला और उसके योगदान तथा स्नेह की गंभीर प्रशंसा की। इतना जुड़ाव था उन दोनों में।
दोनों लगातार गोष्ठियों, आयोजनों में एक साथ उपस्थित होते रहे और कहानी के विकास के लिए प्रयास करते रहे। उन्हें इस बात की कतई चिंता नहीं थी कि कहानी लिखते-लिखते किसी दिन वे खुद कहानी बन जाएंगे। उनकी पात्रता को लेकर कटु विवाद भी छिड जाएगा, वे आशंका की दृष्टि से देखे-परखे जाने लगेंगे। बहरहाल जो होगा वो तो होगा ही भविष्य को खंूटे से बांधा नहीं जा सकता न ही फांसी पर लटकाया जा सकता है। फिर कहानी के अंत पर चिंता क्यों ?
मोहन और सुरेश, जो बराबरी के दर्जे पर खड़े थे उस दर्जे में टूट हो गईं। टूट उस विदेशी सरकार के कारण हुई, जिसने मोहन का चुनाव कर लिया था। पाठकों की बहुसंख्यक आबादी ने मोहन को सर्वशक्तिमान की तर्ज पर सर्वश्रेष्ठ का ओहदा देना प्रारंभ कर दिया। पाठकों की क्या गलती। सभी पाठक रचनाकार या संपादक तो होता नहीं, वह मात्र पाठक होता है। पाठक को जो छपा मिलेगा उसे पढ़ लेगा। उस समय की अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं ने मोहन के नाम और काम को आसमान मंे टांग कर महिमा मंडित करने का कुछ ऐसा अजीब काम किया कि पाठकों ने ही नहीं, रचनाकारों ने भी मोहन को सिर पर बिठा लिया। मोहन एक बार जो सूरज की तरह आसमान पर टंगा, टंगा ही रह गया।
सुरेश प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं, प्रकारांतर से जिसे परोक्ष कहा जा सकता है,
प्रयास करता रहा कि मोहन को आसमान पर से जबरन खींच कर उसी धरती पर पटक दिया जाए और उसके व्यक्तित्व के मानकों को उसी हल-बैल से जोत दिया जाए जिसके आधार पर वह आसमान पर चढ़कर मुस्करा रहा है। आदमी जितना चाहे उतना कर ले जाए, ऐसा सदैव तो होता नहीं। वर्तमान की स्थितियों- परिस्थितियों की राजनीति चलती रहती है। सुरेश मात्र सोचता- विचारता और परोक्ष रूप से प्रयास ही करता रहा। यूं उस जमाने में शर्म बड़ी चीज हुआ करती थी। आदमी ! वह भी कथाकार- रचनाकार विशेष रूप से शर्माया करता था।
मोहन के क्रियाकलापों में प्रशंसा और मान-सम्मान के कारण इतनी गतिशीलता आती गई कि वह प्रगतिशील होता गया और भूलता गया कि इस बढ़े मान-सम्मान के कारण सुरेश जल-भुन भी सकता है। मोहन अपने कार्य व्यवहार के अनुरूप गतिशील एवं सक्रिय बना रहा। भूत के प्रेतों की चिंता न तो उसे पहले कभी थी और न उस समय थी। वह जीवित वर्तमान को जीवन देने के काम में लगा रहा। लगातार कहानियां लिखता रहा-एक से -एक अनगढ़ और उपेक्षित निरीह तथा असहाय पात्रों के भीतर जीवन जीने की आकांक्षाएं तथा उत्साह भरता रहा। इसी दौरान उसे विदेशी सरकार से उसके कथा संग्रहों तथा उपन्यासों के प्रकाशन का प्रस्ताव प्राप्त हुआ। विदेशी सरकार का वही राजदूत, जो उस समय भी यहां ही तैनात था, जिसने मोहन के नाम का बतौर कथाकार प्रस्ताव भेजा था, मोहन के घर आकर मिला और विदेशी सरकार का आमंत्रण दिया। मोहन फूला न समाया, प्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती ? उसने राजदूत को धन्यवाद दिया तथा विदेशी सरकार को स्थाई रूप से बने रहने की हार्दिक कामना की।
मोहन की किताबें हिन्दी में तो प्रकाशित हुई हीं, विदेशी सरकार ने अपनी भाषा में भी उनके अनुवादों को प्रकाशित करवाया। वह जमाना थोड़ा महंगी का था तब भी एक लाख रूपया मोहन को विदेशी सरकार ने बतौर पारिश्रमिक भेंट किया तथा अपने देश आने का सानुरोध निमंत्रण भी दिया। मोहन के मान-सम्मान, यश गौरव और वैभव का ग्राफ अगर चढ़ रहा था तो इससे किसी की कोई क्षति तो हो नहीं रही थी। यह तो आम बात है-वैयक्तिक भिन्नताएं हुआ ही करती हैं। सुरेश के यहां भी किसी प्रकार का कोई अभाव न था। वह महत्वपूर्ण, बड़ा और अनिवार्य कथाकार था ही उसके यहां तमाम पत्र-पत्रिकाएं घरेलू काम निपटाया करती थीं-नहलाना, धुलवाना, बिस्तरा लगाना, खाना पकाना, गाड़ी चलाना जैसे तमाम काम। विश्वविद्यालय में प्राध्यापक था ही, आर्थिक संकट का सवाल नहीं, ऊपर से मनचाही रायल्टी का अग्रिम। सुरेश क्यों मोहन से चिढ़ता-जलता, डाह करता। सुरेश तटस्थ रहा। दोनों की दोस्ती बरकरार रही।
बीसवीं सदी के किस दशक में, किस फिजूल हस्तक्षेप ने मोहन और सुरेश के बीच कटीली बाड़ लगा दी ठीक से नहीं बताया जा सकता। बाड़ भी
ऐसी कि वर्णो की तरह साहित्य भी कटा-फटा बंटा हुआ जान पड़ने लगा। साहित्य के जनतंत्रमें संसद की अवधारणा स्वीकृत हो गई और पोलिंग बूथों की अनिवार्यता को गंभीरता से मान लिया गया। फलस्वरूप एक दौर ऐसा भी आया कि कोई भी गोष्ठी बिना मारपीट, गाली-गलौज के समाप्त ही न होती। साहित्यिक आयोजन, प्रायोजित रूप से झगड़ों के कारण बनने लगे। पत्र- पत्रिकाएं एक दूसरे की जलालत-मलालत में मशगूल हो गई। इस दौर में रचनाकारों को कौन कहे पाठकों तक की स्कूलिंग की जाने लगी। ऐसा न था कि यह सब मात्र साहित्य के क्षेत्र में हो रहा था। तत्कालीन राजनीतिक कर्म भी कम विवादास्पद तथा संदेहास्पद न था। लोकतांत्रिक सरकार से लोक विलुप्त होता जा रहा था केवल तंत्र का नाटक बचा रह गया था। जनता थी कि तंत्र की क्रूरताओं और आक्रामकताओं से परेशान हाल थी। रोजगार के अवसरों का कृत्रिम अभाव रच दिया गया था। महंगाई पर अंकुश की बातंे गुजरे जमाने की बातें हो गई थीं। आपसी भाईचारा , सामाजिक संरचना से विलुप्त होता जा रहा था। जनता भूमि कर तथा पानी कर देने और नमक रोटी के जुगाड़ में भी असमर्थ हो गई थी। जन प्रतिनिधियों की हालत तो यह थी कि किसी भी तरह से चुनाव जीतना है। जिस गोली-बारूद और हमलों से बचने के लिए लोकतंत्र और चुनाव का रास्ता अख्तियार किया गया था, वह चुनाव के वक्त मान-सम्मान और जीत का प्रतीक बन गया था। गोया राजनीतिक घटनाक्रम भी कुछ भले नहीं घट रहे थे। यह वही दौर था जब मोहन और सुरेश के बीच ऐसी दरार पैदा हुई जो अंत तक पाटी न जा सकी। विपरीत इसके दरार बढ़ती गई। सुरेश और मोहन दोनों दरारों के इस पार उस पार ! बीच में भयंकर दरार। दरार जो हुई उसके प्रति कुछ गंभीर किस्म के लोग चिंतित भी हुए पर वे दरार पाटने के कौशल में इतने कमजोर और बेबस थे कि कुछ कर नहीं सकते थे सिवाय चिंता व्यक्त करने के।
उस जमाने में भी गोष्ठियों और साहित्यिक आयोजनों का क्रम चलता रहा। शुरूआती दिनों में थोड़ी कमी अवश्य थी पर बाद में उनकी रफ्तार बढ़ने लगी फर्क सिर्फ इतना पड़ा कि जिस गोष्ठी का अध्यक्ष या मुख्य अतिथि मोहन होता उस गोष्ठी में सुरेश कतई नहीं जाता। यही हालत उन गोष्ठियों की भी थी जिनका अध्यक्ष या मुख्ख अतिथि सुरेश हुआ करता। हालांकि दोनों को एक स्थान पर जुटा कर मेल-मिलाप कराने का उपक्रम उन दोनों के समर्थकों द्वारा  किया जाता, पर फैसला तो फैसला ! स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि जब किसी दूसरी क्रांतिकारी विदेशी सरकार ने सुरेश और मोहन दोनों को अपने देश भ्रमण तथा सम्मानित करने का कार्यक्रम बनाया और अपने राजदूत द्वारा आमंत्रण भी भेज दिया उस पर जो हुआ उसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। दोनों ने एक साथ जाने से इन्कार किया ही , उल्टा आरोप भी लगाया कि वहां क्रांति नहीं प्रतिक्रांति हुई है। फिर क्या था क्रांति और प्रतिक्रांति की व्याख्था की जाने लगी। इस कृत्य से उस विदेशी सरकार को काफी धक्का लगा जिसके निवारण हेतु अपने देश प्रमुख को खेद भी व्यक्त करना पड़ा।
साहित्य का पूरा दौर अचानक परिवर्तित हो गया। नीचे से लेकर ऊपर तक वर्ग संघर्ष और वर्ण संघर्ष विमर्श का मुख्य मुद्दा बन गया।
मोहन के समर्थकों और अनुयाइयियोें की तरफ से वर्ग संघर्ष की अनिवार्यता को पूर्ण रूप से स्वीकार करते हुए कहा गया कि ‘‘सवाल मात्र वर्ग संघर्ष का ही नहीं है, सवाल है वर्ग संघर्ष की लड़ाई का नेतृत्व कौन करे। वह जो जाति-भाषा , भूषा, भवन से ऊंचा है और शोषक है या वह जो शोषित है, गरीब है, जाति से अपमानित तथा भाषा में मूर्ख है। जहां तक कहानी के पाठ और आलोचना का सवाल है, उसमें तो अनिवार्य रूप से यह देखा परखा ही जाना चाहिए कि कहानीकार किस वर्ग का है, किस समूह का है, किस मूल का है। ’’
दूसरी तरफ सुरेश वर्मा के समर्थकों का तर्क था ‘‘ वर्ग संघर्ष तो वर्ग संघर्ष है, सर्वहारा की तानाशाही का लक्ष्य उस समाजवादी समाज की स्थापना से है जिसमें वर्णो की अवधारणा का विलोपीकरण हो जाता है। वर्णो के विलोपीकरण की प्रक्रिया आंतरिक प्रक्रिया है, व्यक्ति का संघर्षों के द्वारा व्यक्तित्वांतरण होता रहता है। व्यक्तित्वांतरण के लिए अलग से कोई कर्म नहीं करना पड़ता।
पहले क्रांतिकारी व्यवहार , व्यवहार से ज्ञान। ज्ञान हासिल हो जाने के बाद फिर क्रांतिकारी व्यवहार फिर ज्ञान। यह सतत् चलने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया का अंत नहीं होता।’’
मोहन और सुरेश इस हद तक पहंुच गए कि उसे सामान्य या सहज नहीं कहा जा सकता। इन दोनों ने कतई गौर नहीं किया कि अंतर्विरोध कहां और किस समाज में नहीं होते। जब दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसकी प्रकृति अपनी मूल संरचना में उभयधर्मी न हो फिर अंतर्विरोध तो होंगे ही और इन्हीं अंतर्विरोधों में विरोधों की एकता भी स्थापित होगीं बहरहाल ऐसा न हो पाया। यह साहित्यक परिवेश का दुर्भाग्य ही था कि साहित्य भी दो खानों में बंट गया था। देश में किसी भी तरह का सामाजिक परिर्वतन के लिए अनुकूल वातावरण होता, कहीं से ठंडी बयार आती, जनता परिवर्तन की लड़ाई के लिए तैयार होती, ऐसे प्रयासों से अलगों भी मोहन कहीं होता तो सुरेश कहीं होता। शोषक समाज इनका अपने तरीके से उपयोग करने का अवसर ढू़ढ़ता रहता, यदि अवसर न मिलता तो अवसर भी परोस दिया करता।
ऐसा तब ही नहीं था, ऐसा तो आज भी है,शायद कल भी रहे। समाज बदलने का सपना , मात्र सपना है कल भी था और आज भी है। समाज विचारों की प्रतिबद्धताओं से कब बदलेगा कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता, अलबत्ता यह कहा जा सकता है, जो देखने में आया भी है कि विचारों की प्रतिबद्धताओं से लैश लोग ही बहुत सहजता से विपरीत परिस्थितियों में बदलते गए हैं, समाज तो जहां रहा जिस हाल में रहा, जस-के तस पड़ा रहा।
दुनिया का रंग सदैव मौसम की तरह बदलता रहता है, कभी जाड़ा, कभी गर्मी तो कभी बरसात। जमीन कभी इतनी नम रहती है कि जोताई नहीं हो पाती। कभी कड़ी इतनी कि हल थुथरा जांए। टूट जाए। अब किसे पता था कि इस दुनिया में रहने वाले दो खास मित्र सुरेश और मोहन, जो एक दूसरे के बिना जीवित नहीं रह सकते थे, दुश्मन हो जाएंगे। सूरज नहीं बदला, चन्द्रमा नहीं बदला , धरती समुद्र में नही समाई, आदमी आदमी रहा, पशु पशु बने रहे फिर सुरेश और मोहन क्यों बदल गए। उनमें सर्दी, गर्मी, और बरसात की विपरीत धर्मी ऋतुएं क्यों समा र्गइं। कारण तो नहीं बताया जा सकता क्योंकि किसी की पहुंच इतनी तो थी नहीं जो मोहन और सुरेश तक पहंुच भी पाता, पूछने की बात ही अलग थी। यह उनके जीवन का गरिमापूर्ण दंत-कथा में रूपांतरण था। लोगों को सिर्फ इतना ही याद रहा कि वे दोनों मित्र थे जा बाद में दुश्मनों से भी बदतर होते गए। दोनों में बोलचाल बंद, दुआ-सलाम बंद , देखा-देखी बंद, एक पूरब जाता तो दूसरा पश्चिम जाता। दुश्मनी के मानकों के भीतर स्तरानुकूल कार्य व्यवहार वे करने लगे। गनीमत थी कि दोनों में मारपीट नहीं हुई जो दुश्मनी का अंतिम लक्ष्य हुआ करती है।
कहना चाहिए कि संयोग ठीक था मारपीट बच गई, नहीं हुई। एक बार मारपीट से वे दोनों जो बच गए फिर कभी नहीं सुना गया कि उन दोनों में किसी भी प्रकार का प्रतिवाद हुआ हो। कहा जा सकता है कि जादुई यथार्थ में ऐसा अमूमन हो जाया करता है। दर असल उन दिनों देश की राजनीति में बहुत आक्रामकता आ गई थी। देश आपातकाल में फंसा कराह व चीख रहा था। देश के प्रमुख लीडरान गांव से लेकर राजधानी तक जेलों में ठंूस दिए गए थे। कोई हलचल नहीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं, कोई विरोध नहीं। सारा देश खामोश, तटस्थ, निष्क्रिय, उदास, कुंठित, जड़ हताश और निराश कारण था एक आन्दोलन, जो जनता का था और जनता द्वारा किया जा रहा था। देश के किसी प्रांत से चला आन्दोलन , कैसे राजधानी तक पहॅुच गया इस पर शोध किया जा सकता है, हकीकत में यह शोध का विषय है भी। तो लबो गुलाब यह कि जनता का वह आन्दोलन , बिना किसी विघ्न बाधा के राजधानी तक पहुंचा और एक दिन बहुत बड़ी भीड़ में बदल कर नारा लगाने लगा कि ‘सिंहासन खाली करो’, ‘दम है कितना दमन में तेरे’, इसी तरह बहुत से परिवर्तन कामी नारे हवा में तैरने लगे और भीड़ अपने जोश तथा होश पर मगन और प्रसन्न। मारपीट कब, कहां, किनमें हो जाएगी कुछ कहा नहीं जा सकता। मारपीट को कोई सुभाषित नहीं बचा पाता। जनता के इस विरोध में मोहन और सुरेश दोनों अपने-अपने संगठनों के लोगों के साथ शामिल थे। हुआ यह था कि सत्ताधारी पार्टी को छोड़कर सारे लोग एक साथ मिल गए थे। पता ही नहीं चल पाता था कि कुकुरमुत्ता की तरह उगते रहने वाले दल कहां है और क्या कर रहे हैं। सभी विरोधी दलों का एक हो जाना, एक साथ विरोध में शामिल हो जाना कुछ असंभव सा लगता है आज। पर यह किसी जमाने में सहज रूप से कहा जा सकता है स्वयं स्फूर्त ढंग से संभव हो गया था। अब सवाल है कि राजनीतिक हस्तक्षेपों से मोहन और सुरेश जैसे महत्वपूर्ण  साहित्यकारों को क्या लेना-देना ?
सवाल जितना सीधा है उतना ही इसका उत्तर पेचीदा है। दर असल साहित्य तो राजनीति, समाजनीति, सत्तानीति, सबका प्रतिनिधित्व करता है। बहरहाल साहित्य के प्रतिनिधि के रूप में मोहन और सुरेश को भी इस आंदोलन में शामिल होना ही था, सो दोनों शामिल थे। दोनों आंदोलन के प्रदर्शन के दिन राजधानी में अपनी-अपनी तैयारी कर चुके थे। प्रदर्शन के वक्त जुलूस के रूप में चलते हुए सभी लोगों को पहले राजधानी के किसी पुराने किले के सामने खाली पडे़ मैदान में कतारबद्ध होना था। वह भी तब , जब मंच से उस संगठन के नाम की घोषणा हो। संयोग देखिए, पहले मोहन के संगठन का नाम पुकारा गया। अब नाम बताना तो आवश्यक है नहीं-मोहन नेतृत्व करते हुए झंडा बैनर लगाए चल पड़ा प्रस्थान स्थल तक। सुरेश देख रहा था कि मोहन का लेखक संघ मार्च करते हुए प्रस्थान स्थल तक जा रहा है, उसे बहुत बुरा लगा, उसने भद्दी सी गाली दी। बीच में सुरेश ने देखा कि मोहन के लेखक संघ ने अपने संघ का झंडा बैनर लगा रखा है, उसे बहुत बुरा लगा। यह क्या , कहा गया है कि किसी का झंडा बैनर नहीं रहेगा फिर मोहन का झंडा बैनर ! कहां गए आंदोलन के स्वयं सेवक ? सुरेश बाएं-दाएं देखने लगा, उधर मोहन का संगठन झंडा बैनर लिए मार्च करता रहा।
सुरेश कुछ देर तो मोहन के संगठन के मार्च को देखता रहा, फिर जाने क्या हुआ कि दौड़कर सीधे उस आदमी से भिड़ गया जो आगे-आगे चल रहा था और बैनर खींचने लगा। सुरेश के साथ उसके अन्य सहयोगी भी झंडा बैनर वालों से उलझ गए। मोहन समझ पाता कि क्या हो रहा है तभी कोई आंदोलन प्रमुख जीप से उधर गुजरा... मोहन चिल्लाने लगा... गनीमत थी कि वह आंदोलन प्रमुख को उनके तत्कालीन पद से नही वरन् असली नाम से चीखते स्वर में पुकार रहा था- जीप रूक गई।
दोनों संगठनों के लोगों में कुछ देर के लिए ठहराव आ गया। सभी आंदोलन प्रमुख की तरफ ताकने लगे। मोहन ने झंडा, बैनर के बाबत हुए झगडे़ के बारे में प्रमुख को बताया, उसने यह भी बताया कि उसे इस प्रतिबंध के बारे में कोई सूचना न थी। सुरेश अपने संगठन के लोगों के साथ लगातार विरोध करता रहा, कहता रहा-‘‘जानकारी थी,जानकारी थी।’’
सुरेश ने कहना चाहा कि वह आंदोलन का विरोध करेगा... पर कहते-कहते रूक गया। वह जानता था कि यह आंदोलन स्वतः स्फूर्त जैसा है जिसके चलते वह भी तो आया है वर्ना जहां मोहन हो, वहां वह कैसे ?
मोहन ने झंडा बैनर प्रमुख के कहने पर हटवा दिया तब जाकर मामला शांत हुआ वैसे बैनर पर कुछ खास नहीं लिखा था सिवाय इसके कि ‘यह आंदोलन किसी संगठन का नहीं सिर्फ जनता का है जनता के लिए है’ इसमें सुरेश के लिए दिक्कत की बात थी कि मोहन के संगठन के नाम भी लिखा था।
अचानक देश आपातकाल में चला गया। सुरेश आपातकाल का समर्थक हो गया और मोहन! उसका कहीं अता-पता नहीं।
आपातकाल कब तक रहता। समय के साथ समाप्त हो गया। स्वतः स्फूर्त आंदोलन वालों की सरकार बन गई, आपातकाल वाली सरकार जाने कहां चली गई...। सुरेश सरकार में शामिल होने का रास्ता ढूढ़ता रहा और जब रास्ता नहीं मिला तब जाने कहां चला गया, कहीं विदेश में।
स्वतः स्फूर्त आंदोलन वाली सरकार चलती रही, उसी समय कहीं से एक मोटी पुस्तिका मोहन के नाम से प्रकाशित हुई। इस पुस्तिका के माध्यम से मोहन ने बताना चाहा था कि उसने अब तक जो कुछ भी लिखा है वह गलत है, झूठा है, उससे समाज नहीं बदला करता। मेरी कहांनियां यथार्थ के नाम पर पैरोडी हैं, जिसमें तमाम अनर्गल प्रलाप और विद्वता के विलाप भरे पडे़ हैं।
स्वतः स्फूर्त आंदोलन वाली सरकार का मोहन की इस किताब से क्या लेना-देना। वह चुप रही पर विचारकों में इस किताब ने हलचल पैदा कर दी- सन्नाटा पसर गया हर तरफ। इस किताब के पक्ष-विपक्ष में तर्को की मीनारें गढ़ी जाने लगीं। साहित्यिक गोष्ठियों के आयोजन होने लगे। अकादमिक बहसें हो ही रही थीं कि खबर आई मोहन नहीं रहा, मोहन की हत्या कर दी गई।
मोहन को क्या हो गया था, मोहन की किसने हत्या कर दी ? पुलिस ने, सामंतों ने , कारखानेदारों ने, प्रतिद्वंद्वी संगठनों ने ,जनक्रांति कर्मियों ने... मोहन कैसे मार दिया गया। क्यों मारा गया मोहन ? कौन बताएगा कि यह किसका अंत है ? मोहन का, सुरेश का, या इतिहास का ?
चलो कोई बात नहीं, उन दोनों की किताबें कोर्स में लग गईं, पढ़ाई जाती हैं विश्वविद्यालयों में। वे नहीं हैं तो क्या हुआ। किसी न किसी दिन तो उन्हें मरना ही था। उनके सारे पाठ तो सुरक्षित हैं- सुरक्षित रहती हैं रचनाएं, वही पढ़ी जाती हैं। लेखक का अंत तो रचनाओं के बाद स्वमेव हो जाता है।                                                         अछर पर्व मई 1999


आपद धर्म

 कथाकार सोमेश के उपन्यास ‘लाल सूरज’ को निर्णायक समिति ने वर्ष का सर्व श्रेष्ठ उपन्यास घोषित कर दिया था और परंपरानुसार आर्थिक राशि भी दिया जाना निश्चित हो गया था, कथाकार सोमेश की कई कहानियां तथा उपन्यास एवं कहानी संग्रह इस ताजे उपन्यास लाल सूरज के पूर्व प्रकाशित हो चुके थे, सोमेश की चर्चा यथार्थवादी कथाकार के रूप में पहले से ही प्रारम्भ by हो गयी थी, इस बार तो उसे सर्वश्रेष्ठ कथाकार ही घोषित किया जा चुका था, उसके शुभचिन्तकों को निराशा तब हुई जब सोमेश ने इस पुरस्कार को प्राप्त करने से इन्कार कर दिया और सरकार को सूचित भी कर दिया। अपने पत्र में सरकार को पुरस्कार वापसी के कारणों का जो लेखा-जोखा सोमेश ने दिया, काफी आक्रामक था, जिसे मीडिया ने गंभीरता से लिया, और प्रकाशित भी किया, खूब चर्चा हुई , जगह-जगह बहसें छिड़ गयीं। लेखक संगठन एक राय हों ऐसा नहीं हुआ करता सो सोमेश के पुरस्कार वापसी के निर्णय की कुछ संगठनों ने निंदा भी की... जिनमें नामी-गिरामी से लेकर नवागंतुक भी थे, उधर ‘लाल सूरज की बिक्री का अनुपात काफी बढ़ गया था और प्रकाशक भी चाहने लगे थे चलो जितना विवाद होगा, ठीक रहेगा,’ किताब तो बिकेगी।
सोमेश ने पुरस्कार वापसी की बात अपनी देहातिन पत्नी से नहीं बतायी थी, उन्हें तो तब मालूम हुआ जब सोमेश से निखिल मिलने आया था और सोेमेश के घर पर न मिलने पर रोक लिया था सोमेश की पत्नी ने निखिल को, ‘अरे चाय-वाय तो पीते जाओ, भाई साहब नहीं हैं तो क्या ऐसे ही,’ रूक गया था निखिल, चाय पीने लगा था, उसी दौरान निखिल ने बताया था कि वह महीने भर से बाहर रहा है और जब मालूम हुआ कि सोमेश भाई ने पुरस्कार लौटा दिया तो वह भागा-भागा आया, आखिर ऐसा भी क्या, पुरस्कार लौटाने से कौन क्रांतिकारी परिवर्तन होने की संभावना बढ़ जायेगी, दुबारा आने की बात कह कर चला गया था निखिल। देर रात तक लौटा था सोमेश , पत्नी प्रतीक्षा ही कर रही थी, बात करना चाहती थी पुरस्कार वापसी पर, काफी थका मांदा देख कर रोक लिया था खुद को, इस समय तो चिड़िया चुन-मुन भी सो रहे होंगे अपने खोथे  में। सुबह बात हो ही जायेगी... खाना खिलाया था सोमेश को , पूछ लिया था, ‘काफी परेशान लग रहे हो..’ नहीं ऐसा तो कुछ भी नहीं है, ठीक ही तो हूं, कहीं तुम तो परेशान नहीं हो ?’ पूछा था सोमेश ने,
हां, निखिल कल ही बाहर से आया है आज आया था, अब फिर कल सुबह
आयेगा, बोल कर गया है,’
अच्छा ! निखिल आ गया है ?’
सोमेश अपने बिस्तरे पर लेटा था, नींद को आमंत्रित करता हुआ देर रात तक बेजान पड़ा रहा बिस्तरे पर, सो जाना चाहता था तत्काल, ताकि उसे याद न आयें वे दिन जिन्हें उसने बुद्धन को सौंप दिया था, ग्रास रूट पर कार्य करने की आवश्यकता महसूस करते हुए जाने कितने नौजवान पढे़ लिखे साथी छितरा गये थे गांवों की तरफ , तय किया गया था कि बहुत कुछ ऐसा है जिसे तरह-तरह की सरकारें गांवों के दलितों एवं पिछड़ों के उत्थान के लिए कुछ करना कराना चाहती हैं, तमाम योजनाएं इस निमित्त बनाई गयी हैं, पर धन के आवंटन का सीधा लाभ ग्रामीणों को न मिलकर दलालों को मिल रहा है। इसे रोकने का प्रयास जन-जागरण के माध्यम से  किया जा सकता है। सोमेश ने अपनी जन्म भूमि को इस निमित्त चुन लिया था, चलते-चलाते मिल गया था बुद्धन, एक होनहार लड़का जो पढ़ रहा था दलित परिवार का , काफी जागरूक व समझदार।
पर्चा छपवाना, जवाहर रोजगार योजना के कार्यक्रमों की जानकारी देना, समाज कल्याण के बारे में बताना, गोया सरकार द्वारा संचालित सभी सहायता संबंधी कार्यो के बारे में लोगों को अवगत कराना सोमेश तथा उसके साथियों का प्रमुख कार्य था। जन जागरण के इस अभियान को इतनी सफलता मिलने लगी कि इसका रूप धीरे-धीरे एक आंदोलन जैसा होने लगा, इसी दौरान सोमेश के साथ बुद्धन भी जुड़ गया, पहले घूम-घूम कर नौकरी तलाश की, पर नौकरी कोई संसद सदस्यता तो है नहीं जो साल दो साल में ही फिर से भरी जायेगी, नौकरी-नौकरी होती है जो जहां जम गया, जम गया .. कहां है रोजगार और नौकरी के अवसर ?
बुद्धन जैसा सहयोगी मिल जाने के कारण सोमेश की कार्य क्षमता बढ़ गयी थी... गांव-गांव घूम कर मीटिंग करना, खास तौर से उन गांवों में अवश्य जाना जहां निर्बल वर्ग के आवास बन रहे होते थे या स्कूल बन रहा होता था या कोई सड़क, इन कार्यो पर लगे मजूरों को सरकार द्वारा घोषित मजदूरी भी नहीं दी जाया करती थी, सोमेश तथा बुद्धन के साथियों द्वारा कम मजूरी दिये जाने का विरोध किया जाना, कहीं-कहीं ही नहीं लगभग सभी जगहों पर इसे अपराध मान लिया जाता था और हर प्रकार से डराने धमकाने का प्रयास भी शुरू हो जाता था, ऐसे ही एक मौके पर बुद्धन का भाई रामपती मार डाला गया था और एक  सरकार समर्थित ठेकेदार ने तो बुद्धन की बहन का अपहरण भी कर लिया था जिसके मरने जीने का आज तक पता नहीं चला, सोमेश को अच्छी तरह से याद आ रहा है कि दरोगा ने बुद्धन की बहन के अपहरण के मामले को किस तरह दबा दिया था और कहा था... कौन परी थी जो कोई उठा ले गया, हां किसी के साथ भाग गयी होगी, जवान थी , भागती नहीं तो क्या करती ?’ बहुत कठुज्जत के बाद भी रपट नहीं लिखी थी दरोगा ने एस.पी. के यहां जाना भी बेकार साबित हुआ... और अखबारों की बात...?
राम-पती मर्डर केस का हाल तो बहुत ही बुरा हुआ था सारे गवाहों को तोड़ दिया गया था और भी बहुत कुछ हुआ था जिसका अंदाज तक न रहा होगा न्यायपालिका को। क्षेत्र की सारी शक्तियां बु़द्धन और सोमेश के खिलाफ हो कर हर स्तर पर सक्रिय हो गयी थीं, प्रशासन तो केवल प्रशासन के लिए होता है। सोमेश समझ नहीं पाता आखिर इस व्यवस्था का मतलब क्या है ? सरकार सुविधाएं प्रदान करना चाहती है जनता को, फिर इन सुविधाओं पर कौओं और गिद्धों को क्यों बैठा देती है? हर सरकारी काम के पीछे कोई न कोई हिंसक जानवर ठेकेदार और जूनियर इंजीनियर के रूप में खड़ा हो जाता है... जब कि पैसा जनता का , मिलना जनता को, फिर ये कहां से चले आते हैं ?
सोमेश रात भर सो नहीं पाया था, जब-जब सोने का उपक्रम करता उसका अतीत मिलिट्री छावनी में तब्दील हो कर... हर तरफ गोला-बारूद, आग में जलता हुआ दीखने लगता, खौफनाक सपनों की आवंाक्षित श्रृंखलाएं जेहन में उतारने लगतीं, किस तरह से गुजर गये उसके जीवन के पचास साल... पिता जी की मृत्यु से लेकर पत्नी की बीमारी तक का मामला, लगातार अभावों की आवृत्ति, कल पर अकूत विश्वास ... ठीक हो जायेगा, पर सदैव सोमेश का ’कल’ क्षत विक्षत ही होता रहा और वह लगातार टूटता रहा, घुटन और संत्रास की हद तक, निखिल का जीवन उसके जेहन में कैसे उतराता-धंसता चला गया, समझते हुए भी नहीं समझ पा रहा था सोमेश। बुद्धन से निखिल बनने तक के कारणों के पीछे क्या रहा है... सब कुछ जानते हुए भी सोमेश अनजान ही होता चला गया है।
सोेमेश आंदोलन के दौर में भी बाल-बच्चों वाला सचेत क्रांतिकारी मिजाज का था और आज भी है, उसका अतीत अपना होते हुए भी बहुत कुछ निखिल का भी है और वर्तमान भी शायद , कहां-कहां ठोकरें खाता फिरता है निखिल पर जब बनारस आता है तो बच्चों के लिए कुछ न कुछ ले अवश्य आता है, जेब में चाहे जितना रूपया हो सब दे जाता है, अपनी तथा कथित भाभी जी को, मुझे भी समझाता रहता है... ‘मेरा क्या? घर में अब कोई है भी तो नहीं, भाई मार डाला गया, बहन का कहीं अता-पता नहीं और मां-पिताजी हैं नहीं, अच्छा हुआ जो मैंने शादी नहीं की, ’ अब तो पूरी दुनिया ही मेरा परिवार है, जब सोमेश और बुद्धन ग्रास रूट पर एक साथ रणनीतियां बना रहे थे, और कार्यक्रम लोक-प्रिय होने लगा था- तथा खतरे भी बढ़ने लगे थे तभी निखिल ने सोमेश को अपने से अलग करवाना चाहा था पर सोमेश कई सालों तक लगा रहा एक साथ, पत्नी के बीमार होने तथा दो बच्चे हो जाने के बाद ... बच्चों की देख-रेख और परवरिश के लिए उसे आंदोलन से बाहर निकलना पड़ा था, फिर भी वह जुड़ा ही रहा

है अब तक , कविता पोस्टर, पैंफलेट और विभिन्न अखबारों में आंदोलन की बातें प्रस्तुत कर एक प्रकार से वैचारिक प्रचार प्रसार का कार्य करता रहा है
सोमेश, स्वतंत्र लेखन तथा ट्यूशन को आधार बनाकर रहने लगा था सोमेश बनारस में।
‘लाल सूरज’ उपन्यास का कथानायक बुद्धन यही निखिल हैं। जिसके पीछे बिहार और उ.प्र. की खोजी पुलिस लगी रहती है, और निखिल है कि... उसे खुद पता नहीं कि उसे कब और कहां होना चाहिए पर यह अवश्य पता रहता है कि कहां उसका रहना आवश्यक है और वहां उपस्थित होकर उसे करना क्या है? सोमेश रात भर कई-कई किस्म के सवाल अपने से पूछता रहा है, कल आयेगा निखिल... । कल ही क्यों वह अभी और इसी वक्त भी आ सकता है, आखिर जिद्दी भी तो कम नहीं है। सारा कार्यक्रम रद्द कर सकता है... क्या उत्तर देगा वह निखिल को, घबरा जाता है सोमेश। अभी सुबह होने में काफी देर थी सूरज उगेगा... उसके पहले... लाल-लाल रौश्नी अंतरिक्ष में फैल जायेगी, गंगा के किनारे के मकान से साफ-साफ देखा करता है सोमेश इस लाल सूरज को उगता हुआ , हां , सूर्यास्त वह कम ही देख पाता है , अक्सर यही होता रहा है, जब से पत्नी बीमार चल रही है... रात भर सो नहीं पाती, दर्द से कराहती रहती है, गर्भाशय का कैंसर है, आंपरेशन होगा, रूपया लगेगा और भी बहुत कुछ इस कैंसर की सूचना ने कुछ मनोवैज्ञानिक ढंग से भी उसकी पत्नी को बेवश बना दिया है, ‘कोई बचता थोडे़ है कैंसर से आदि-आदि। निखिल जानता था कि इस उपन्यास पर कुछ न कुछ होना चाहिए पर उसे यह अन्दाजा नहीं था कि... इतनी बड़ी राशि पुरस्कार स्वरूप भी मिल जायेगी।
खुश हुआ था निखिल ‘चलो’ मेरा जीवन चाहे जैसा रहा, गुजरता रहा और गुजर जायेगा भी , भले ही मेरा जीवन , जीने के संदर्भ में किसी को स्वीकार न हो पर उसकी कथा तो लोगों ने स्वीकार की न,’ फिर सोमेश लिखता भी तो खूब है, यदि प्रकाशक चोरी न करें तो कम से कम जीने लायक खर्च वर्च इंतजाम तो लिखा पढ़ी से हो ही सकता है, भीतर और बाहर निखिल के क्या है, कुछ भी छिपा नही है सोमेश से। सोमेश घड़ी देखता है तीन बजे हैं बाथरूम जाता है, हाथ मुंह धोकर चाय बनाता है, चाय प्याले में छानने जा ही रहा था कि बाहर से कुंडी खटखटाने की आवाज आयी, ‘निखिल ही होगा,’ था भी निखिल ही,सोमेश निखिल को भी चाय देता है, फिर बीडी निकालता है,दोनों पीने लगते हैं, जिंदगी का सौंदर्य पीने की तरह , चुप्पी छा जाती है उस दौरान, निखिल महसूसता है सोमेश बोलेगा और सोेमेश महसूसता है, निखल बोलने के लिए ही तो आया है, निखिल की बीडी बुझ जाती है... माचिस मांगता है, चुप्पी टूटती है... पूछता है भाभी के आंपरेशन के बारे में, कुछ सोचा तुमने ? नहीं तो एक छोटा सा उत्तर दे देता है सोमेश, ‘क्यों समय नहीं मिला ?,
नहीं ऐसी बात नहीं है, समय का अकाल कभी नहीं रहा इस जीवन में...’सोमेश झटके से कह जाता है।
इधर-उधर की बातों से निखिल का काम चलने वाला नहीं था, वह आया था, खास मकसद से , मकसद कुछ दूसरा क्या हो सकता था निखिल के लिए सिवाय इसके कि इस समय कितना आवश्यक है पुरस्कार और पुरस्कार की राशि , ‘आखिर क्या फैसला लिया तुमने ‘लाल सूरज के बारे में ? सोमेश हालांकि इसका उत्तर नहीं देना चाहता था, क्योंकि यह उसका निजी निर्णय था,
पर ऐसा निखिल के लिए नहीं था उसने बताया ‘बस यूं ही,निखिल को सोमेश का जबाब अच्छा नहीं लगा, यंू ही का क्या मतलब ? ‘क्या भाभी का आंपरेशन नहीं कराना है ? एक लाख रूपए का पुरस्कार कम होता है क्या ? फिर इस समय उन रूपयों की कितनी आवश्यकता है, एक कथाकार के नाते तुम्हें तो अच्छी तरह से समझना चाहिए’,
‘हां तभी तो लौटा दिया पुरस्कार,. मेरे कथाकार ने ही ऐसा निर्णय लिया था, तुम जो बात कर रहे हो सोमेश से कर रहे हो और पुरस्कार वापस करने का निर्णय कथाकार सोमेश का था,’सोमेश जानता है कि उसकी पत्नी का इलाज पुरस्कार की इस राशि से हो जायेगा, और घर का काम भी चल जायेगा पर उसके साथ इस तरह की परेशानियों का सिल-सिला अनवरत चलता रहेगा। कभी कुछ कभी कुछ , जिस ‘लाल सूरज’ उपन्यास पर यह पुरस्कार मिला है उसमें मेरा क्या है, उसमें सिर्फ तुम ही तुम हो, यह पुरस्कार तो तुम्हें मिलना चाहिए था पर तुम्हारे लिए तो जाने कितने वारंट है जेल भेजने के लिए और पुरस्कार भी हैं तो तुम्हारी जान की कीमत पर,।
‘कैसी विडंबना है मेरे साथी ! मैं तुम्हारे जीवन को सिर्फ एवं सिर्फ लिखने वाला व्यक्ति हूं, भोगा तो तुमने है, आखिर कब होगी ‘लाल सुबह’ जब लोग-बाग कथाकार को नहीं, कथानायक को पुरस्कृत करना सीख पायेंगे,’
सोमेश के भावनात्मक तर्कों से आहत हो जाता है निखिल, यहां निखिल का अपना यथार्थ धराशायी होकर चित्त पड़ जाता है, ठीक ही तो कह रहा है सोमेश राणा प्रताप से लेकर सुभाष तक का जीवन कई भगत सिंहों और चंद्रशेखरों के जीवन का योग ही तो रहा है, पर किसके साथ उनके वर्तमान ने अच्छा सलूक किया? फिर भी सोमेश को तो अपने बारे में थोड़ा सोचना चाहिए,
‘नहीं सोमेश, ऐसा तुम्हें नहीं करना है, तुम्हें फिर से इस पुरस्कार को वापस लेना ही होगा, यह तुम्हारे रचे हुए यथार्थ की मांग है, संभवतः सारी दुनिया, मौजूदा सरकारी इंतजामों से इतनी निराश है कि सिर्फ और सिर्फ अपने यथार्थ की तरफ देखने के लिए विवश है और यदि तुम विवशता में ऐसा करते हो और पुरस्कार ले लेते हो तो यह तुम्हारा आपद धर्म होगा, अपने
प्रति मोह नही,’थे
कमरे के भीतर से सामेश की पत्नी के कराहने की आवाज आती है, फि:
पूछती हैं... क्यों निखिल आया है क्या ? सोमेश हां कहता हुआ , बढ़ जाता है उस कमरे की तरफ , उन्हें उठाता है, बाथरूम की तरफ ले जाता है, थोड़ी देर बाद सोमेश की पत्नी भी आकर बैठ जाती है... शरीर टूट चुका है, हंसमुख चेहरे से हंसी गायब हो चुकी है... फिर भी अभिनय शांत रहने का, ‘अरे! कल देर रात तक आये, मैंने बता दिया था कि तुम आओगे... चाय-वाय पी कि नहीं... उठती है चाय बनाने के लिए... सोमेश रोक देता है.
‘तुम निखिल से बात करो, मैं चाय ले आता हूं, सोमेश चाय ले आता है, बच्चे अभी भी सोये हुए ही थे... निखिल... शिकायत करता है... भाभी आपने भी नहीं रोका, इन्होंने पुरस्कार वापस कर दिया, पुरस्कार होता तो.... रोक देती हैं सोमेश की पत्नी... यही न मेरा आंपरेशन हो जाता... आंपरेशन के बाद भी क्या गारंटी है कि मैं बची रहूंगी, फिर मैं रोकती भी कैसे ? इन्होंने तो बताया भी नहीं था कि पुरस्कार मिला है... वो तो मैने देख लिया था उस चिट्ठी को जिसके साथ इन्होंने जबाब लगाया था। कम से कम इतना तो पढ़ ही लेती हूं। मुझे क्या रोकना था... जब ‘लाल सूरज’ लिख रहे थे तो उसका एक-एक पन्ना पढ़कर सुनाते थे और पूछते थे क्यों ?’ ‘निखिल’ इसमें दिखाई पड़ रहा है कि नहीं? उसका चरित्र हूबहू आ रहा है कि नहीं? मेरे थोडा-बहुत ना-नू कहने पर उसे दुबारा लिखते थे, और मुझसे पूछा तक नहीं कि पुरस्कार वापस करूं या नहीं, सच बता दूं निखिल, मैं इन्हें कभी नहीं रोकती, न कभी रोका है किसी काम के लिए , उस समय भी जब ये तुम्हारे साथ फील्ड में काम कर रहे थे, मैं किसी तरह से घर-गृहस्थी चला रही थी कि नहीं, चलो अच्छा किया जो इन्होंने उसे वापस कर दिया , मैं तो बस इतना ही समझती हूं कि फिर उसे छपने के लिए भी नहीं देना चाहिए था, आखिर यह सब हुआ छपने के बाद ही न,’ सोमेश खामोश था, लोैट गया था अपनी बीती जिन्दगी के तरफ। अभावों से जूझते हुए भी कभी निराश नहीं हुर्इ्रं थी उसकी पत्नी और निखिल , अपनी व्यथा-कथा की तरफ तथा छुद्र भद्रता और मध्यमवर्गीय झूठी आत्म -प्रवंचना की तरफ , मघ्यम वर्गीय चरित्र का यह दोगला मानक व्यक्ति ही नहीं रहने देता। सोमेश कभी अपनी तरफ और कभी उन आधारों की तरफ देख रहा है... जहां मान-अपमान, दोनों हथकड़ी में बंद हैं। भाभी ने ठीक ही कहा है, फिर ‘लाल सूरज’ को छपवाना ही नहीं चाहिए था,’ निखिल पूछता है सोमेश से, ‘आखिर क्या फैसला कर रहे हो... ?
सोमेश तटस्थ बना रहता है... निखिल के पास समय का अभाव था, उसे हर हाल में अपने क्षेत्र में होना चाहिए था इस समय, कई कार्यक्रम पहले से ही वहां आयोजित थे... निखिल आखिरी बार पूछता है सोमेश से, सोमेश फिर
भी कुछ जबाब नहीं देता,
निखिल आवेश में हो जाता है... देखो सोमेश यह पुरस्कार तो वापस इसी घर में आयेगा चाहे तुम पुरस्कार वापस लो या न लो , तुम्हारे ‘लाल सूरज’
उपन्यास की कथा, मुझे ही पूरी करनी होगी, तुम्हारी इस अधूरी कथा पर ही जब वाह-वाही और पुरस्कार मिल सकता है तो पूरी कथा पर तो बहुत कुछ होगा न, और कथा अधूरी न रह जाय, पूरी हो जाय इसके लिए भी सरकार ने एक लाख रूपए का ईनाम रखा है। मुझे मारने वाले या पकड़वाने वाले को यह राशि मिलेगी, है न बराबर। तुम्हें कथाकार के नाते और मुझे कथानायक के नाते यह सम्मान और गौरव दिया जा रहा है, बुद्धन से निखिल बना बुद्धन हालांकि तुम्हारे बराबर की समझ नहीं रखता। फिर भी इतना तो समझ ही सकता है कि सिद्धांत, सिद्धांत होते है मेरे दोस्त ! और ये कभी भी आपद धर्म के लिए व्यवधान नहीं उपस्थित करते,
मैं जा रहा हूं तुम्हारे ‘लाल सूरज’ की अधूरी कथा को पूरी करने आज ही गिरफ्तारी दे दूंगा और ईनाम की राशि से भाभी जी का इलाज जरूर करवा लेना, कृपया इस राशि को मत लौटाना मुझे यकीन है कि तुम मेरी अंतिम इच्छा का अनादर नहीं करोेगे, कंधे पर झोला लटका लेता है निखिल और दरवाजे की तरफ बढ़ जाता है झटके से।
सोमेश की पत्नी की सांसे फूलने लगती हैं, घबड़ाकर उठती हैं, उसी समय सोमेश भी झटके से उठता है... संयोग से सोमेश टकरा जाता है अपनी पत्नी से... फिर भी आगे दौड़ कर रोक लेता है निखिल को... लौटा ले आता है। इधर सोमेश की पत्नी उससे टकराकर फर्श पर गिर जाती हैं। कुर्सी के हत्थों से सिर में चोट लग जाती है, खून बहने लगता है और बेहोश हो जाती हैं, दोनों दोड़ आते हैं, उनको उठाते हैं और अस्पताल ले जाते हैं....,
दवा-दारू होती है, एक टांका लगता है, इस बीच न तो सोमेश ने कुछ कहा और न निखिल ने ही, दोनों भीतर ही भीतर एक दूसरे को आजमाते रहे... सोमेश सोचता रहा निखिल को गिरफ्तार नहीं होने दूंगा और निखिल ‘यदि मैं भाभी के काम आ जाता तो कितना ठीक था... अच्छा नहीं किया मैंने... सोमेश से बात ही करना अपराध था पुरस्कार की बाबत... पुरस्कार लेना न लेना यह सोमेश का काम था मेरा नहीं... मैं वंचित रह गया इस आपद धर्म से ... जिन्दा रहने की इतनी बड़ी जिद्द... मैं समझाने चला गया सोमेश को,सोमेश को यह पुरस्कार तो बादमें मिला मेरे ऊपर तो कब का है...
सोमेश की पत्नी ठीक हो जाती हैं... अस्पताल से सब घर चले आते हैं, सोमेश रोक लेता है निखिल को....आज किसी भी हालत में नहीं जाना है, निखिल दूसरे दिन जब जाने लगता है तब सोमेश की पत्नी अजीब सा वादा लेती है निखिल से, ‘मेरी कसम खाओ कि तुम गिरफ्तारी नहीं दोगे, इलाज मुझे कराना है, आंपरेशन मेरा होना है, तुम्हारी लाश की कीमत पर
यह सब नहीं होगा निखिल,निखिल को कसम खाना ही पड़ता है... और सोमेश अपने तमाम आग्रहों को ठुकराकर पुरस्कार प्राप्त कर लेना ही आपद धर्म मान लेता है।
कथाबिम्ब जुलाई-सितम्बर 1996

कागज पर मकान

रमेशरी जब धान की लवनी करके घर लौटी तब मदनशाह घर पर नहीं था। घर पर एकान्त का पहरा था, बाहर का टटरा, माटी की दीवारें, खपरैल सभी चुप्पी में  थे चुप्पी भी ऐसी जिससे डर जाये कोई। रमेशरी डरी नहीं, आशंकित हुई जरूर।
हल-चल रमेशरी के घर के आगे तिराहे पर थी, कुछ ऐसी जैसे गांवों में ही हलचलें पैदा होती हों, धान, गेंहूं या रोज के झगड़ों की तरह जो शहरों में नहीं पैदा होते या पैदा भी होते हों तो उनका मिजाज पर्दा-नशीन रहता हो। किसी को कानांे-कान कोई खबर नहीं, थाना, नेता-परेता, चोर-बदमाश, लफंगा कोई भी न जाने।
रमेशरी मदन शाह का पता लगाने तिराहे तक गई, वहां मदनशाह न था। तिराहे पर भीड़ थी। भीड़ में छोटे-बडे़ सभी थे। सबके चेहरों पर अपने-अपने ढंग की खुशियां थीं। नौका परधान ने अपना वादा पूरा किया। परधान के दो-चार अगुआ-पछुआ भी अतिरिक्त खुशियां गठियाए वहां उपस्थित थे। अन्यों के लिए यह था कि पानी के लिए चुंआड़ या नदी की तरफ न जाना पडे़गा। पुरूषों से अधिक औरतें खुश थीं जिनके जिम्मे पानी का इन्तजाम काफी पुरातन है।
स्कूल न जाने वाले बच्चों की भीड़ अलग जमात में थी, उनके लिए बोरिंग का पाइप जमीन में धंसना कौतुक जैसा था। ट्रक पर लदी कम्प्रेशर वाली मशीन तो अचरज जैसी थी ही। उसकी आवाज गुर्राहट लिए थी जिससे कान सुनने में मन्द से हो गए थे। सो जिन्हें बतियाना होता वे तेज-तेज बोलते।
तिराहे से लौट कर रमेशरी ने बाहर का टटरा खोला। ओसारे से होते हुए आंगन में दाखिल इुई। आंगन छोटा था मुश्किल से उसमें दो चार-पाई की जगह थी। आंगन से सटा हुआ पूरब की तरफ एक कमरा था। इसी कमरे में रमेशरी ‘अनमोल’ रखा करती थी। अनमोलों के अलावा एक कुठिला था, कुठिला का आन उसने खुला देखा। कुछ चावल के दाने जमीन पर भी गिरे थे। वह सन्न हो गई।
चावल के अलावा.... कहीं ‘अनमोल भी’। ‘अनमोल’ को वह मायके से मिले टीन के छोटे से सन्दूक में रखा करती थी। सन्दूक का ताला बन्द था, उसे थोड़ी राहत मिली। फिर भी जाने क्या हुआ उसने सन्दूक का ताला खोला...
सन्दूक में एक साड़ी थी ‘विहुअती’ साड़ी के अलावा। उसे उसने अलग हटाकर ‘विहुअती’ को उलट-पुलट कर देखा। इच्छा हुई कि पहन ले, विवाह के समय वाला सिंगार पटार कर ले, थोड़ा इतराए पर उसने यह सब नहीं किया। सन्दूक में रखे दूसरे सामानों को वह देखने लगी। सन्दूक में
एक छोटे साइज का शीशा था , दो कंघियां थीं, दो-तीन जोड़े फीते थे, नागिन सी चमक वाली एक चोटी थी। कागज में फंसी हुई टिकुलियां थीं। अलता की एक शीशी, तथा एक नेल पालिश भी था। इन सब चीजों के अलावा एक प्लास्टिक की डिबिया थी जिसमें बाल बांधने वाले रबड़, दो-तीन जोड़ी क्लिप, गीलट का पायल, दो जोड़ी बिछिया के साथ एक अलग पोटरी में बंधी थी। प्लास्टिक की डिबिया में नाक का लवंग था जो सोने का था, वही उसका अनमोल था।
रमेशरी ने रोल्ड-गोल्ड के लवंग को नाक में से फटाका निकाला तथा सोने वाला लवंग डाल लिया। मदन शाह की कमाई जब ठीक थी, तब मदन शाह ने उसे दिया था। उसी साल रमेशरी की शादी भी हुई थी। मदन शाह ने जबरन उसकी नाक में खुद पहनाया था, जब कि उसके हांथ कांप रहे थे। कांपते हांथ कहीं से कहीं चले जाते फिर बिना प्रयोजन न लौटते।
तब मदन शाह जंगल के ठेकेदार के यहां मेठई करता था। ठेकेदार का ठेका बांस कटवाने का था। वह बांस कटवाता, बांस के साथ सीसम व साखू के बोटों को भी ट्रकोें पर लदवा देता, बाहर ले जा कर बेचता। उसे न कोई रोकने वाला न टोकने वाला। ठेकेदार के यहां थाने के तथा जंगल के अमला भी आते। ठेकेदार अपने अड्डे पर महीने में पांच-छह दिन रूकता। खूब दारू चलती, एय्याशी होती जंगल के हिरनों , खरगोशों, मोरों को बारूदी गोलियां सुंघाई जाती। रात जब नींद में होती जंगल में इधर-उधर कहीं भी धांय-धांय होता...
ठेकेदार के डेरे पर जंगल के मुर्झाए, सूखे चेहरे अपना पेट लिए दूसरे दिन जा खडे़ होते। मदन शाह सबको हंकाता। किसी को पाव तो किसी को दो पाव मांस की बोटियां देता। जंगली लोग खुशियां पीते उसके डेरे से वापस लौटते।
मदनशाह का काम शिकार बन जाने के बाद शुरू होता। दारू की छौंक लग जाने के बाद ठेकेदार की आंखों में ढ़हते किलों की रानियां नाचने लगतीं जहां वह अक्सर जाया करता था। जंगल में गिरते-खंडहराते किलों पर वह कोई किताब भी लिख रहा था।

ठेकेदार कहा करता कि यहां की राजकुमारियों के कारण जाने कितनी लडाइयां हुई जो बहुत ही भयानक थीं लेकिन इतिहास में उन लडाइयों की कोई चर्चा नहीं। ऐसे ही वह तमाम सही-गलत किस्से सुनाता तथा किसी राजकुमारी की चर्चा करने लगता। खासतौर से तब जब उसकी बाहों में जंगल की कोई लड़की छुई-मुई बनी होती जिसे पटाकर मदन शाह लाया होता। लड़की तो रूपयों की लालच में आती ‘काम निपटे तथा वह भाग ले’। मदन शाह के साथ रास्ते में जो कुछ ऊपर-नीचे होगा उसे लडकियां काम का निपटना न मानतीं।
जंगल, जंगल का अन्धेरा, आजाद हवा, उसमें पेड़-पौधों की गन्ध , दारू,
लड़की तथा ठेकेदार। मौसम कोई फिल्म दिखाना शुरू कर देता। कोई भी क्यों खास तौर से हालीवुड वाली जिसमें शरीर का विज्ञान अपने सुगढ़ तर्कों के आधार पर खड़ा होता। एकदम से बोलता बतियाता। फिल्म ज्यों-ज्यों आगे सरकती ठेकेदार अपनी शरीर के पार होने लगता। लड़की भी धीरज खो बैठती।
मदन शाह दर्शक, पहरेदार की तरह उंगलियांे पर गिनती गिनता। अचानक बिना किसी पूर्व सूचना फिल्म रूक जाती। मौसम हंसने लगता। हंसने तो पास के पेड़ पौधे, झाड़ियां भी लगतीं फिर डेरा में कोई भयानक सन्नाटा पसर जाता।
मदन शाह पहले मदना था। ठेकेदार ने उसे मदन शाह में रूपान्तरित किया था। रूपान्तरित करने का कारण भी बताया था। कारण की जडे़ं हजार साल पुरानी थीं जिसे चन्देलों ने उखाड़ फेका था। यह पूरा इलाका उस जमाने तक द्रविणों का था , वृहद्रथ, मदन शाह, व घाटम वाला..... यहां तक मुगल भी न आ पाए थे। अंग्रेज तो धोखा-धडी करके इधर आए तब तक यहां चन्देलों गहरवारों, बघेलों, मौनसों वगैरह की हुकूमतें स्थापित हो चुकी थी। मदन शाह का पाला साम्राज्य सिकुड़ चुका था।
सन्दूक में ‘अनमोल’ सुरक्षित देखकर रमेशरी खुश हुई। फिर उसने कुठिला देखा जिसमें दस-पॉच किलो चावल पड़ा होगा। यानि पन्द्रह किलो चावल उठा ले गया मदन शाह। बच्चे स्कूल से न आए थे। वे करीब दो बजे तक आएंगे। भला हो वनवासी आश्रम के गुरू जी का जिन्होंने बच्चों का नाम लिख लिया तथा दोपहर का खाना भी देने लगे।फीस वहां किसी की नहीं लगती... सरकारी स्कूल तो कब का बन्द पड़ा है।
वन विभाग का बांस कटान रूक गया है। लोग कहते है पर्यावरण बचाया जा रहा है। ठेकेदार भी अपना डेरा डंडा उठा ले गया है पर मदन शाह की आदतें जस के तस बनी हुई हैं... कहता है ‘लड़कियों वाले काम में रूपयांे के अलावा भी तो फायदे हैं।’ अच्छा खाना पीना तथा नामी गिरामी लोगों से जान पहचान हो जाती है।’
‘भला परमुख जी कभी बुलाते मुझे, या रेंजर साहब ही’ रेंजर साहब ने बिना किसी लेन देन ना-नुकूर एक पेड़ सेखुआ दिया कि नहीं इनाम-ओकराम घलुआ में। महीने में दो तीन दिन भी काम मिल गया, समझ लो महीना मुट्ठी में जो निकल पाए एक दिन भी मुट्ठी से बाहर।
कभी-कभी करिश्मा करता मदन शाह।
घर में न पैसा था न अनाज। छोटकू की दवाई करानी थी। किसी तरह पचास रूपया उधार मिला, इससे अधिक मिलता भी कैसे। गांव पर गरीबी, भुखमरी का दब-दबा था। जंगल विभाग का कठोर व कुटिल पहरा था। पेड़ अपनी जडे़ं छोड़ उखड़ जाते थे। इल्जाम गांव पर लगता था कि टांगियां चलाई गई हैं।
डाक्टर चेहरे से सुस्त, पर मन से रंगीला था। उसने मदन शाह को परमुख जी के यहां आता-जाता देखा था। मदन शाह को पहचान कर उसने छोटू की बढ़िया दवाई की और न फीस लिया न दवाइयों का दाम। दो तीन दिन बाद मदन शाह डाक्टर के यहां गया जब लौटा तब उसकी जेब में सौ की कड़-कड़ाती नोट थी। रमेशरी चुप-चुप थी, शायद खुश भी। उसका छोटू बच गया था नहीं तो जाने क्या होता ? वह उल्टी दस्त के कारण सांय-सांय कर रहा था।
मदन शाह को रमेशरी हरदम मना करती। ‘इज्जत व मर्यादा’ की बातंे बताती पर वह कुछ आधुनिक किस्म की भाषा बोलता। एक-एक बोले वाक्य को विखंडित करता, फिर संस्कृत के श्लोकों की तरह अन्वय करता जिसका मतलब होता ‘देह का क्या जिसे जलना ही है एक दिन’ फिर कुछ भी ऐसा नहीं जो चिपका रहे देह से’।
‘फिर जब उन्हें शर्म या घिन नहीं जो हाथ का छुआ पानी तक नहीं पीते, और देह चूसते, चाटते है साथ ही साथ नोट भी देते हैं तब हम काहे चिन्ता करें। ’ मदन शाह रमेशरी को समझाता तथा ठेकेदार की तरह फिल्म बनाने लगता। रमेशरी फिल्म में डूब जाती, सुखान्त की कल्पना उसे हवा में उड़ाने लगती। कभी इधर तो कभी उधर। मदन शाह किसी जाबांज की तरह रमेशरी को हवा की उड़ान से खींचता, इस खींचा खांची में रमेशरी को पकडे़ हुए वह खुद भी उड़ने लगता। आकाश की सीमाएं जब सिकुड़ जातीं दोनों धम्म से गिर जाते।
‘आखिर कहां गया होगा मदन शाह ’ ?
रमेशरी चिन्तित हो गई, परमुख के यहां रेंजर के यहां। कई तरह के चेहरे उभर,े पर कहीं भी रमेशरी स्थिर न हो पाई। खुद से सवाल-जबाब करती रही हो सकता है दारू पीने ही गया हो, पहाड़ी वाली बस्ती में।’
इस बार वह नहीं छोडे़गी उसे , ‘हराम की कमाई नहीं खानीं’। अगर वह यह धन्धा नहीं छोड़ता है तो बच्चों को साथ लेकर नैहर चली जाएगी या घाघर में डूब मरेगी।’ ‘मुंह-फूंकना जाने का करने पर तुला है निरवंशा। हट्टा कट्टा है, ‘मजूरी करता तो पांच किलो धान मिलता कि नहीं ख्याल भी नहीं करता कि बिटिया पांच साल की हो गई , उसे भी बेचेगा मुअना।’
गुस्से में रमेशरी के पांव हाली-हाली थे। देह में आग की तपन थी, पगडन्डी जलती सी उसे दिखी पहाड़ी वाली बस्ती दूर थी - रास्ते में मिलने वालों से वह मदन शाह के बारे में पूछती भी, फिर बच्चों की चिन्ता करती लेकिन अभी घंटे भर का समय था। कहते हैं गुस्से में असंभव , संभव जैसा हो जाता है, फटाका पहुंच गई रमेशरी, पहाड़ी वाली बस्ती में।
वहां मदन शाह न था। बस्ती तीन घरों की थी। सभी घरों में महुंआ की दारू बनती , पीने पिलाने वाले आते-जवान बूढे़, बदमाश, शरीफ यानि आदम जात की सारी नस्लें वहां होतीं। वे एक दूसरे को टटोलते, सूंघते,
गुद-गुदाते तथा किसिम-किसिम के प्रोग्राम भी बनाते कहां आग लगानी है, किसकी भैंस छोड़वाना है, वोट किस को देना है इसके अलावा कुछ विशेष किस्म के प्रोग्राम भी वहां बन जाते, जिसकी कानो-कान किसी को खबर न होती मसलन वह जो रेखा है... उसे पार...। लड़की का नाम रेखा न होता वह तो शोहदों का दिया नाम होता जिसे वे हर उस लड़की को दे देते जो आकर्षक तथा गदराई होती। वे उन लड़कियों को हिरोइनों के नाम से पुकारते तथा लार-टपकाते रहते, किसी दिन मौका देख कर उठा भी ले जाते। इसके अलावा वे दूसरे किस्म का प्रोग्राम भी बनाते कब साखू काटना है किसके घर की सफाई करनी है-
रमेशरी बस्ती के आखिरी घर पर जब पहुंची तो वहां तीन चार लोग जमा थे। वे दारू पी रहे थे तथा हो-हल्ला कर रहे थे। रमेशरी ने उन लोगों को देखा तथा उन्हें शरीफ न समझकर मदन शाह के बारे में नहीं पूछा। वह सीधे आगे बढ़ गई, उस रास्ते की तरफ जो उसे वापस लौटाकर घर पर छोड़ देता। मुश्किल से दो कदम आगे वह बढ़ी होगी कि उनमें से एक शोहदा उठा, आगे बढ़ा तथा रमेशरी को छेक लिया, रमेशरी की ठुड्डी उठा कर बोला, ‘अरे भउजी! चल थोड़ा पी ले’।
शोहदे की आंखे लाल-लाल थीं, रमेशरी उनमें तैरने लगी। दो बच्चों की मां गदराई, छेमियां फट जाए जैसे अंग-अंग उत्तेजित, आवेशित रत्ती भर की जगह नहीं विचार-आचार के लिए। शरीर का भूखा शास्त्र शोहदे की आंखों में जवानी तथा जोश की छट-पटाहट लिए-
शोहदे ने मधु-पान करना चाहा, खोद दिया भंवरों का छत्ता... चीखी रमेशरी.
‘चल भाग कमीने, मूंछ नोंच लूंगी तेरी ये हिम्मत।’
घर वाला चला आया वह जानता-पहचानता था रमेशरी को। मदन शाह सुनेगा तो आग लगा देगा... सारा कुछ स्वाहा हो जाएगा। उसने शोहदे को डांटा तथा उसे पकड़ लिया, लगभग बांधने जैसा... ‘का हुआ कक्का! हम भी सौ दो सौ दे देंगे इसे, हम हराम का माल नहीं खाते पीते। मदन शाह भी तो इसी की कमाई खाता है न’ शोहदा भी गरजा....
रमेशरी अपने रास्ते पर हो ली। रास्ता बढ़ने लगा कदम-कदम पर मदन शाह का चेहरा खून से लथ-पथ दिखता, पापी, हरामी। अगर वह ऐसा न होता तब इस अहीर की हिम्मत होती ऐसी’ रस्तेभर रमेशरी धुन्ध में घिरी रही, कुछ भी साफ-साफ न दिखता। हर तरफ से खूनी पंजे उसकी तरफ आते, गला दबाते, वह चीखना चाहती पर चीख न पाती। धुन्ध कालिख ओढ़ और भी काली हो जाती, एकदम भयावह , डरावनी।
रमेशरी पसीना-पसीना। डर तथा गुस्सों की चपचपाहट, खून के लस-लस जैसा। चकत्ते बनते खून को देख कांप-कांप जाती रमेशरी, फिर भी उसके पास सोच बची हुई थी मदन शाह के बाबत। ‘जरूर ही कहीं गया होगा किसी को पटाने, सभी पटने वालियां होतीं भी तो नहीं’।
घिन भर गई रमेशरी के नथुनों में लगा उल्टी करे पर ऐसा हुआ नहीं। रास्ता अपनी तरह से कम हो रहा था, जिसका एहसास उसे न था। एहसास तो दूसरी जगह टहल रहा था अपनी तकलीफों के साथ। आखिर वह क्या करे मदन शाह के साथ। बाप ने गले में खंजर बांध दिया है तो वह धंसेगा ही... लेकिन नहीं उसे हिम्मत से काम लेना होगा...
हिम्मत औरतों के पास कहां होती है ? होगी भी कैसे ? किसी ने टोक दिया, किसी ने छू दिया तो खतम। इज्जत बारूद होती है, चिनगारी देखते ही जल जाती है और मर्द, मर्द चाहे जो करे... यह नहीं चलेगा...रमेशरी को लगा कि उसकी समझ वापस लौट आई है तथा रास्ता साफ हो गया है। धुन्ध छंट गई है
फिर उसे अपना घर दीख पड़ने लगा जो उठने-बैठने फिर खड़े होने की दूरी पर था... एकदम सामने।
रमेशरी ने देखा कि बच्चे औसारे पर बैठे हुए हैं, उसने अनुमान किया कि तीन बज गए होंगे.... इतनी धूप है आखिर कहां जायें ? ‘उसे देखते ही बच्चे उससे चिपक लिए। माई! कहां गई थी’ वह का उत्तर देती, बच्चे का समझते। उसने हार्दिक दुलार से बच्चों को सहलाया और टटरा खोल कर अन्दर चली गई। कुछ देर के लिए मदन शाह से वह बाहर हो गई। दिमाग की नसों में सोच व समझ का ताजा पन आया उसकी आंखे थोड़ी बड़ी हुई.
रमेशरी ने बच्चों को खाना खिलाया फिर उन्हें सो जाने के लिए बोला तभी उसकी आंखे बिटिया पर टंग गई ‘दस साल में सयानी हो जाएगी’
गांव शहर हो रहा था। ‘बहु’ बिटिया चीन्हने गुनने का विचार संस्कृति का खंडहर बन रहा था। घर का मालिक इसे कार-बार समझता है। इच्छा हुई फफके, बिलपे, माथा फोड़ डाले, पर का होगा इससे मदन शाह लौट आएगा मदना में, वह तो बदल चुका है जिसके सामने न आगा न पाछा। सोचते ही उसकी देह ऐठने लगी। पोर-पोर में गाठें उग आईं।
समय पर समय चस्पा होता रहा दिन गुजर गया। देर रात तक मदन शाह घर वापस आया। वह नशे में था। उसके मुंह से दारू के भभोके लगातार थे। हांथ पैर सब पर नशे की दर्दनाक छट-पटाहट थी। वह बोलता तो बोल पीछे छूट जाती। होठों से बोले हुए को दुबारा-तिबारा बोलता, कोशिश करता कि जो बोलना चाहता है बोल ले। रमेशरी उसे देख घबरा गई... पर घबराने जैसी स्थिति न थी सो चार-पाई पर जहां थी पसरी ही रह गई। कुछ तो गुस्से के कारण, कुछ जान-बूझ कर।
मदन शाह एकालाप करते हुए कहता ‘ अब हम अपना रोजगार करेंगे, दुकान खोलेंगे’ ऐसा कहने में वह एक-एक अक्षर को चबाता चूसता। रमेशरी तटस्थ, स्थिति प्रज्ञ की तरह हतप्रभ ‘नशा जो न कहलवाए, दारू पीकर बहादुर बनने वाले अपनी तारीफ करते कभी नहीं थकते’
थोड़ी देर में मदन शाह ने अपना रूप बदला, उसकी आवाजें साफ होने लगी थीं। रमेशरी के पास जाकर , क्या सट कर अबोले ही उसे मनाने लगा। बिना बोले भी रूठे को मनाया जा सकता है... देह को सचेत कर। मदन शाह इसमें कलाकार था पर उसकी कला पर जाने कितनी बार आक थू.-आक थू किया रमेशरी ने। मदन शाह को अपनी कला पर यकीन था, होता भी है, वह अंग-अंग को जिम्मेवार बनाने में लगातार था शायद ऐसा संभव न होता उसके लिए, दारू हवा में उड़ने लगी थी अचानक रमेशरी को लगा कि वह दृढ़ न रह पाएगी, चुप रह कर सन्तुलित रहना, मन को बेड़ियां पहनाए रखना कठिन होगा सो वह विफर पड़ी तथा मदन शाह को करारा झटका दिया। वह चारपाई की पाटी पर उकडूं बैठा हुआ था, धम्म से गिर पड़ा जमीन पर। उसकी जेब में रखे नोट छितरा गए , कुछ रमेशरी की देह पर भी गिरे...
गिरने के बाद मदन शाह पल भर में ही संयत हो गया, उसने नोटों को इकट्ठा किया , उसका हिसाब लगाया पूरे दो हजार हैं कि नहीं.... फिर गर्व से बोला जो पुरूषों का स्थायी भाव होता है। ‘ले रख ले पूरे दो हजार हैं, परमुख जी ने दिया है। आज परधान जी के यहां आए हुए हैं, वहीं से आ रहा हूं’
‘रमेशरी का गुस्सा लौट आया, जा भाग जा यहां से मुझे नहीं चाहिए हराम की कमाई’।
मदन शााह मनौती करने लगा ‘कल पांच हजार रूपया और मिलेगा, मेरा ‘इन्दिरा आवास मंजूर हो गया है, जिसे बनवाना नहीं पडे़गा। परधान जी ने कहा है कि बाकी नौ हजार सात आठ दिन में मिल जाएगा, जोड़ लगा कुछ सोलह हजार हुए कि नहीं, खुद ही मंत्री जी ने कहा है कि ‘मकान की चिन्ता न करना मदन शाह। वह कागद पर बन जायेगा’
रमेशरी थोड़ी सचेत हुई....
‘ का तूं सही बोल रहा है, इन्दिरा आवास मंजूर हो गया है’
‘हां रे! तूं तो जानती है दारू पीकर मैं झूठ नहीं बोलता, चाहो तो राजा घाटम की किरिया ले लो’, ले ले रख ले इसे पूरे दो हजार है’
‘नाहीं तूं इधर-उधर से लाया है इसे’ कोई तुमको इतना रूपया नहीं देगा। देना होता तो परधान हमें बुलाया होता’ रमेशरी बिदक गई, तथा चारपाई में समा गई।
मदन शाह बेवश हो कर सच्ची उगल गया। आखिर कितनी देर तक मन में दाबे रहता। कोई उसे एक धेला तक न देता। ‘चलो, परधान के यहॉ परमुख के यहां आया है सिर्फ एक रात की बात है’।
रमेशरी आपा खो बैठी, आग लग गई उसके अंग-अंग में, सोचा सलाई लगा दे घर में तथा जल मरे... मदन शाह दांत दबाए खड़ा था ढूह माफिक... रात के सन्नाटे में रमेशरी की चीख फैलने लगी, अगल-बगल के सोते
घरों में जगरन हो गई, ‘का हुआ’ ‘का हुआ’। बन्द घरों के दरवाजे खुल गए लोग रमेशरी के घर की तरफ दौड़ आए...
यहां रमेशरी व मदन शाह में तूफान मचा हुआ था। तभी परमुख की जीप चली आई। जीप का ड्राइबर मदन शाह के घर पर उठा बवाल देख घबरा गया। वह किससे पूछे जीप घुमाकर एक किनारे खड़ा हो गया। रमेशरी फटाका ड्राइबर के पास पहुंची, उसे भला-बुरा कहा तथा परमुख को भी दो तीन गालियां दी, जबकि परमुख जीप में न थे।
‘मुआ रूपया दिखाता है, मुझे खरीदेगा’ फिर अपना मरद ही जब सौदा कर रहा हो तो उस बेचारे की का गल्ती ?’
रमेशरी फिर स्वरबद्ध रोने लगी जो महिला विलाप से अलग था। ड्राइबर मदन शाह के घर की कथा सुन कर भाग खड़ा होना चाहा पर जागे हुए युवकों ने उसे रोक कर दो चार झापड़ लगा दिया ‘ जा कह देना परमुख से ’। इन्हीं युवकों ने मदन शाह को भी धर दबोचा जो रमेशरी को मारने पर उतारू था।
गालियां पर गालियां दिए जा रहा था, सती बनी है, सावित्री है, रंडी कहीं की’ का मैं नहीं जानता, कलुआ दिन भर अगोर कर काहे बैठा रहता है।
पड़ोस के युवकों को कलुआ का नाम सुन कर बहुत गुस्सा आया। उन सबों ने मदन शाह को मार-पीट कर दोहरा कर दिया , क्यों कि वे कलुआ को जानते थे जो रमेशरी का चचियाउत भाई था कम से कम सात आठ साल उम्र में उससे छोटा भी। युवक रमेशरी को भी जानते तथा नजर मार औरतों व लड़कियों को भी, उनमें रमेशरी न थी। रमेशरी चाहे जैसी रही हो सभी उससे प्यार करते थे जबकि मदन शाह से घृणा। सभी डरते रहा करते थे ‘जाने कब किसे फंसाकर वह सौदा कर आए, किसी भी लड़की का जीवन बर्बाद कर सकता है मदन शाह। सो युवकों में गुस्सा पहले से ही था मौका पाकर जल उठा।
मदन शाह का हांथ पीछे की तरफ बांध दिया गया। रूपया गिना गया। मदन शाह को जीप पर लादा गया फिर वे युवक तथा कुछ सयाने लोग, रमेशरी के साथ परधान के दरवाजे पर जा पहुंचे... जीप की आवाज सुन कर परधान बैठका से बाहर निकला...
युवकों ने परधान को घेर लिया - आ गई रमेशरी ! बुलाइए परमुख जी को... हम लोगों को भी कागद पर वाला मकान दीजिए-
परधान हत-प्रभ था। उसकी जुबान सूख चुकी थी। बैठका में से परमुख गायब हो चुका था ... शोर गुल सुनकर परधान का दरवाजा, गांव का चौपाल बन गया, हर तरफ थू-थू । परधान के घर के लोगों की आंखों में भी घृणा भर गई थी। कैसे बचेगी किसी की इज्जत। गुस्से में लोगों ने परधान को पकड़ लिया। परधान फिल्मों बाला आदमी न था जिसके पास बन्दूकें होती जिन्हें वह दन-दनाता, करिन्दा होते जिन्हें वह ललकारता।
दूसरे दिन परधान व मदन शाह के सिर , मूछ, दाढ़ी के आधे हिस्से को छूडे़ से मूड़ दिया गया फिर उन्हें गदहों पर बिठा कर गांव भर घुमाया गया। सबके सामने कसमें खिलाईं र्गइं कि वे अब ऐसा नहीं करेगें। किसी ने इस घटना की सूचना थाने पर दे दी। अपने रोब-दाब के साथ थाना गांव मे आया। जगह-जगह सूंघा, कहीं चाटा भी फिर वह रमेशरी के यहां पहुंचा - वहां मदन शाह की देह पर रमेशरी गर्म-गर्म हल्दी प्याज का लेप लगा रही थी।

 परिचय अक्टूबर 2002

नकलची

लगभग ग्यारह बजे दिन हम एच.आर.पी.जी. के कार्यालय पर थे, हालांकि हमें करीब दो घंटा पहले होना चाहिए था, हम होते भी वहां , पर टेªन लेट थी जिस पर किसी का वश नहीं। हमें खुशी थी कि हम सकुशल थे, ट्रेन में किसी हादसे का शिकार नहीं होना पड़ा। हमें एच.आर.पी.जी. का कार्यालय ढूढ़ने में भी दिक्कत नहीं हुई। एक आटो वाला मिला जो एच.आर.पी.जी. के कार्यालय से मेल जोल रखता था।
हाल के सालों में मेरे लिए यात्रा पर निकलना एक कठिन काम है, कभी महसूसता हूं पचास को धकिया रहा हूं, फिर पचास की कोई उम्र होती है क्या ? तो कभी साठ के जाल में मछली की तरह उलझ जाता हूं। डिप्रेसन का ऐसा चक्कर कि दुनिया घूमती नजर आती है फिर लगता है ये गिरा! ओ गिरा... कभी-कभी तो गिर भी जाता हूं...
तो इस कारण मैं कहीं आता-जाता नहीं, खास तौर से लम्बी यात्राओं पर तो कत्तई नहीं निकलता पर यह यात्रा मजबूरी थी।
मजबूरी इसलिए कि इस यात्रा के प्रयोजक मेरे पुत्र व पत्नी थीं। पत्नी धर्म-कर्म तथा राम-श्याम को पूजने वाली और पुत्र ! उनके क्या कहने ?
ये बेचारे समाज बदल के वाक्-योद्धा। कभी थानेदार से तो कभी बी.डी.ओ., तहसीलदार वगैरह से आये दिन उलझते रहते। एक बार तो एक कड़ियल व रंगबाज दरोगा ने इनकी ऐसी ठोकाई की थी कि अस्पताल दाखिल होना पड़ा था। इनका जीवन फले-फूले, मीठे-मीठे गीत गायें इस बाबत काली माई के दरबार में पत्नी ने ऐसी मनौती किया था कि उसे उतारने के लिए मुझे पड़ोसी से कर्ज लेना पड़ा क्योंकि घर की जमा पूंजी पहले ही अस्पताल के हवाले हो चुकी थी।
मैं पुत्र को समझाता ‘यार! छोड़ो समाज बदल का काम , थोड़ी बहुत जो खेती है उसे संभालो पर उन्हें मेरा समझाना चुभता। ये समझते कि मैं मन्द बुद्धि का समझदार हूं, जिसके पास दूर दृष्टि नहीं होती सो वे अपनी गति और तेज कर लेते।
वे समाज बदल के जज्बा में काफी गहरे तक डूबे थे, उनका मानना था कि समाज को नेताओं की नहीं कार्यकर्ताओं की जरूरत है जो समाज को जागरूक कर सकें फिर तो समाज के लोग खुद ब खुद अपने अधिकारों की लड़ाई-लड़ना शुरू कर देंगे।
मेरे जनपद में एक एन.जी.ओ. हैं जिसके बारे में चर्चा है कि उसके ऊपर विदेशी दौलत की वारिस होती है। उस संस्था में अक्सर गोरे-स्त्री पुरूष देखे जाते हैं। उनकी बोली आश्रम में स्थाई रूप से निवसने वाले कार्यकर्ता भी नहीं समझते।
हां कृपा भाई की बात अलग। कृपा भाई कई भाषा के जानकार, कई बोलियों के रियाजी - यही संस्था के मंत्री । इनका देश ही नहीं विदेश तक में गहरा जोगाड़....
आश्रम से जुडे़ जानकार बताते हैं कि कृपा भाई क्रान्तिकारी पृष्ठभूमि के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति के वारिश हैं जो कभी नेहरू ही नहीं सुभाष जी के सहयात्री हुआ करते थे। आजादी के बाद नेहरू जी प्रधानमंत्री बने। उस समय कृपा भाई के पिता श्री को मंत्रिमंडल में नहीं लिया जा सका इनको मंत्रिमंडल में लेना नेहरू के लिए मुश्किल काम था।
मुश्किल इसलिए कि माउन्बेटन नाराज हो जाता..... वह क्यों नाराज हो जाता यह साफ था, उसने साफ-साफ मना किया हुआ था कि अंग्रेजों को मारने-पीटने वाला कोई भी आदमी मंत्रिमंडल में नहीं लिया जाये। यही हुआ और मंत्री पदसे वंचित होना पड़ा कृपा भाई के पिता को।
लेकिन उस समय कृपा भाई के पिता श्री को मंत्रिमंडल में शामिल न करना आसान नहीं था क्यों कि वे एक ऐसे नेता थे कि उनका असन्तुष्ट होना मंत्रि-मंडल के चूलों को हिला सकता था। नेहरू जी शिखर राजनीति के गुणा भाग में कलाकार थे उन्होंने कृपाभाई के पिता श्री को मंत्रिमंडल में शामिल न कर, मानव संसाधन मंत्रालय का बहुत बड़ा जमींनदार बनवा दिया। फिर तो कृपा भाई के पिता श्री के मुंह से वह जीभ ही गायब हो गई जिस पर विरोध या विद्रोह की भाषा लप लपाती थी।
कृपा भाई के पिता श्री कई मायनों में अद्भुत थे, थे तो क्रान्तिकारी पर गांधी के सत्य, सहकार, अहिंसा व अवैभव के भी काफी करीब थे, सीधा-सरल व सहज एक तरह से वे नेहरू की प्रत्यक्ष आलोचना भी थे। उन्होंने मानव संसाधन मंत्रालय की जमीनदारी अपने नाम न लेकर अपने पुत्र कृपा भाई के नाम से लिया तथा नेहरू से संतृष्ट भी हो गये ‘चलो राजनीति के उठा पटक से राहत मिली’।
इस प्रकार से कृपा भाई मेरे जनपद में मानव संसाधन मंत्रालय की जमीनदारी के रूप में एक एन.जी.ओ. लेकर आये। सरकार द्वारा लगभग सौ गांवों के विकास का जिम्मा इस संस्था के ऊपर डाला गया था जिसके लिए संस्था को सैकड़ों एकड़ जमीन तथा करोड़ो का फंड आवंटित किया गया फिर क्या था ?
संस्था चल निकली जगह-जगह स्कूल खुले तेल व दाल मिलें खुली। अच्छी नस्ल की गायें व भैंसों की एक डेयरी भी दूध उगलने लगी। जाहिर था यह सब कार्यकर्ता ही करते- कुछ सौ के आसपास सीमित मानदेयों पर उनकी भर्ती हो गई।
एम.ए. समाज कार्य पास कर लेने के बाद मेरे पुत्र भी इसी संस्था के कार्यकर्ता हो गये। चार पांच साल के भीतर ही इन्होंने यह प्रमाणित कर दिया कि ये योग्य व आज्ञाकारी कार्यकर्ता हैं जो मंत्री जी की आंखें देखकर ही अगले काम पर चल पड़ते हैं।
यह सब चल ही रहा था कि एच.आर.पी.जी. (ह्मूमन राइट प्रोटेक्सन ग्रुप) की तरफ से फेलोशिप देने की बात चल पड़ी- बडे़-बडे़ अखबारों में छपे विज्ञापनों ने मेरे पुत्र की नींद हराम कर दी-
फेलोशिप को पांच साल चलना था तथा मानदेय दस हजार रूपयों का था। इसकी विशेषता थी कि यह जन जातीय क्षेत्रों से जुडे़ उन सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए था जो किन्हीं कारणों से शोध (पी.एच.डी.) नहीं कर पाये थे। पर कार्य उनके बीच कर रहे थे।
फिर क्या था  मेरे पुत्र विज्ञापन पढ़कर झूम उठे। उनकी छोटी-छोटी आंखों में दस हजार की नोटें इधर-उधर तैरने लगीे। उन्होंने मुझे कुरेद डाला।
‘पिता जी ! आप चाह लेंगे तो यह फेलोशिप मुझे मिल जायेगी।’
‘वह कैसे ? विज्ञापन का पन्ना देखते हुए मैंने पूछा- ‘ बहुत आसान है पिता जी।’ एच.आर.पी.जी. के कोआर्डिनेटर ए.टी.बनर्जी साहब हैं। वे आपके पूर्व परिचित हैं। आपके साथ उन्होंने इस क्षेत्र का एक सोसल स्टडी किया था तब आप समाजवादी पार्टी में थे- वह बुकलेट मैंने अपनी संस्था में देखा है, कृपा भाई भी बोल रहे थे- मेरा पुत्र मुझे अतीत दिखा रहा था जिसे मैं भूल चुका था।
अतीत भूलना आसान नहीं होता- वैसे भी वह स्टडी प्रकाशित हुई थी तथा उसे देखकर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं में लिखने-पढ़ने की ललक पैदा हुई थी फिर तो जनपद स्तर पर कई-कई- बुलेटिनें प्रकाशित हुई थीं.
‘तो क्या तुम आशुतोष की बात कर रहे हो’ ?  मैंने पूछा
‘हां हां उन्हीं की’ मरे पुत्र का सहज स्वीकार था
आशुतोष का चेहरा मेरी जेहन में घूमा, बहुत तेज गति से एक तरफ से लेकर दूसरी तरफ तक, मुझे झकझोरता जगाता। साधारण कुर्ता-पाजामें में लिपटा कामरेड आशुतोष, क्रान्तिकारी कम भावुक अधिक। वह मेरे पास समाजवादी पार्टी के एक विधायक की चिट्ठी लेकर आया था- क्योंकि तब इस क्षेत्र में कम्युनिस्टों की अच्छी या बुरी कोई नस्ल ही नहीं थी सो वह किस कम्युनिस्ट से संपर्क साधता ?
कामरेड आशुतोष एक गंभीर पर हंसमुख आदमी था। उसके पास कम्युनिस्टों वाली चतुरता तो कत्तई नहीं थी। वह वाक्योद्धा भी नहीं था, बहुत कम बोलता था, तथा कोशिश करता था कि मार्क्स या लेनिन के नाम बात चीत में न आये। संभवतः वह छिपाने की कोशिश करता था कि उसे कोई कामरेड न समझे शायद उसका एक कारण यह हो कि उन दिनों कम्युनिस्टों को बन्दूक समझा व माना जाता था।
जनपद के सामाजार्थिक व राजनीतिक तथा सांस्कृतिक अध्यन के सिलसिले में आशुतोष मेरे गांव में मेरे साथ लगभग दो महीने तक रहा पर गांव वाले अन्त तक नहीं जान पाये कि वह बांग्ला भाषी तथा कामरेड है। वह अच्छी
भोजपुरी बोलता, इलाहाबादी टोन वाली जो मेरे क्षेत्र से थोड़ा भिन्न टोन की होती। वह किसी से भी चाचा भइया भाभी जैसा रिश्ता जोड़ने में निपुण था। मेरी पत्नी से उसके रिश्ते भाई बहन जैसे थे पर वह उन्हें भाभी कहता।
तो हम इसी आशुतोष से मिलने के लिए एच.आर.पी.जी. के कार्यालय पर थे। कार्यालय में हाजिर हम आशुतोष को तलाशने लगे कि जब वह को-आर्डिनेटर है फिर तो उसका खूबसूरत सा एक कमरा होगा, बाहर नाम पट्टिका लगी होगी। वैसे नाम पट्टिकाओं की वहां कमी नहीं थी- वे दूर से चमक जातीं पर आशुतोष का नाम न दिखता न ही पद। कार्यालय का भूगोल पूरी तरह दूसरी मंजिल पर पसरा था।
कार्यालय में भीड़-भाड़ थी। कहीं फोन या मोबाइल की स्वर लहरियां गूंजती तो कहीं चपरासी बुलाने वाली घंटी कर्कशाती- थोड़ी देर में आशुतोष वाली नाम पट्टिका दिख गई, उसे देखते ही हमें खुशी हुई।
हम कमरे में प्रवेश के लिए आतुर थे। ‘मे आई कमिन सर’ कुछ ऐसा ही सधा हुआ, मैं बोल पड़ा फिर ख्याल आया कि ससुरी अंग्रेजी फिर चढ़ गई पीठ व दिमाग पर।
अनुमति मिलते ही हम कमरे में दाखिल हुए। वह एक भव्य कमरा था। कमरे में एक साहबनुमा आदमी था जिसका चेहरा अधपकी दाढ़ी में दबा दबा सा था, वहीं उसके सामने जो एक महिला बैठी थी अपने कटे हुए बालों के साथ इतनी चमक रहीं थी कि उसके होठों पर चढ़ा गाढ़ा लिपिस्टिक कतई बुरा नहीं लग रहा था।
बहर हाल हमें तो अपना काम करना था, सो मैंने फटाका आशुतोष के बारे में पूछा तथा यह भी बताया, कि हम एक अत्यंत पिछड़े जिले से हैं, पांच सौ किलोमीटर दूर से आये हैं, उनसे मिलना जरूरी है... ‘वे तो अमेरिका में हैं,’ साहबनुमा आदमी ने यांत्रिक ढंग से बताया।
‘कब तक आयेगें’ मैंने आतुर भाव से पूछा...
‘पन्द्रह बीस दिन बाद। हो सकता है उधर से ईराक चले जाये, जहां संस्था का कार्य प्रारंभ होने वाला है...। बताते हुए वह साहबनुमा आदमी ने सामने बैठी महिला से पूछा-
‘क्या झारखण्ड और छत्तीसगढ़ वाली रिपोर्ट आ गई ?
‘हां सर! केवल छत्तीसगढ़ वाली आई है ? महिला ने बताया... पर साहबनुमा आदमी लगता था जैसे उसे कुछ भूला याद आ गया हो...
‘वहां सब ओ.के. है न ? क्या हुआ झारखंड का ?
‘ वहां कल या परसोेे मानवाधिकार की टीम गई है। किसी गांव में चार सीधे सादे लोगों को उग्रवादी करार कर पुलिस ने मार डाला है’ जरा फोन मिलाना तो अमित को, आखिर वह वहां क्या कर रहा है ? इतनी गंभीर सूचना हमें नहीं मिली। साहब लौटेगें तो यही पूछेंगे - मानवाधिकार वालों
को मालूम हो गया आपको खबर तक नहीं...।
’मैं परेशान-परेशान था, आना बेकार हुआ। यह साहबनुमा आदमी होमवर्क कर रहा है - अरे भाई फोन...वोन से ही बातें करवा दो, अब अमेरिका दूर नहीं। मैंने उसे टोका...
गनीमत थी कि उसने मेरी बात पर ध्यान दिया, तथा बताया कि इस कमरे से ठीक बाईं तरफ, चौथे कमरे में जायें, वहां होगे मि. बी. राजन उनसे मिलिए वे मि. आशुतोष से सम्पर्क में रहते हैं। बी.राजन का कमरा खुला-खुला सा था। वहां कोई महिला न थी, न ही आलमारी या सेल्फ जैसी  चीजें ही वहां थीं-वह एक सादा कमरा था। हां इस कमरे में कुर्सियां काफी थीं - फोन जैसी चीजें थी पर कम्प्युटर का कहीं पता न था जब कि आशुतोष वाले कमरे में कम्प्यूटर व कापियर कई थे... प्रथम दृष्टया यह कमरा आफिस की गंध से बाहर था- या हो सकता है कि मातहतों की गंध से अलग वाली नौकरशाहों के दफ्तरों की तर्ज पर यह कमरा हो... बहरहाल हम कमरे में थे जिनसे हम बाते कर रहे थे वे मि.बी.राजन ही थे।
वे एक पतले-दुबले आदमी थे। चेहरे पर हल्की दाढ़ी थी, जिस पर सफेदी काबिज थी। मि.बी. राजन से भी आशुतोष के बारे में वहीं सूचना मिली जो पहले मिल चुकी थी। इसके अलावा बी.राजन ने आश्वस्त किया कि आशुतोष का फोन एक दो घंटे के भीतर आएगा फिर बातें हो सकती हैं।
मि.बी.राजन के कार्यालय में मेरे साथ पुत्र भी थे वे खुश-खुश थे कि आना सफल हो जाएगा क्योंकि आशुतोश से संपर्क हो सकेगा - पर मैं आश्चर्य चकित था...
‘यह आदमी देखा जान पड़ता है’
‘कहां देखा ? कब देखा, कोई सूत्र न मिलता... अंदर खोज जारी- दाढ़ी पकने से चेहरा तो नहीं बदल जाता, तर्क प्रति तर्क, तभी बी. राजन ने अपना बांया हाथ ऊपर उठाया तथा बाल फेरा अब मेरे देखने में साफ था कि उनकी ऊंगलियां कटी हुई हैं। बांये हाथ का अंगूठा व पास वाली एक ऊंगली ही साबूत बच पाई थी-
अचानक मुझे पिछला याद आया जैसे मेरा पिछला किसी फिल्म का कोई जरूरी हिस्सा हो...
पिछला याद आते ही बी. राजन का चेहरा किसी खतरनाक व डरावने आदमी में तब्दील हो गया। एक बार तो मैं डर गया, जैसे उस बार डर कर कांप रहा था पर वहां डरने की बात नहीं थी। वह जगह पढ़े-लिखे, सभ्य नागरिक समाज बनाने वालों की थी जो मानवाधिकर बचाये रखने के जनतांत्रिक लड़ाकू थे।
फिर भी डर डर होता है। वह कभी भी देह व दिमाग थर-थरा सकता है, सोच व बिचार पर खून के चकत्ते उभार सकता है... इस डर से खुद को अलगिया कर मैं पिछला दुहराने लगा। कहां देखा ? इस आदमी को... कुछ
विगत का दिखता तो कुछ मिट मिट जाता, अतीत का सारा कुछ अचानक
प्रकट नहीं हो रहा था फिर भी इतना था कि वह आदमी जाना-पहचाना है..
थोड़ी देर बाद अचानक दिमाग को झटका लगा... फिर तो सारा कुछ साफ-साफ था...‘फिर तो इसकी पीठ पर कटे का निशान होगा, जहां मेरे भाई ने गंड़ासा मारा था’ लेकिन पीठ कैसे देखी जा सकती है ? वहां तो अब दूसरी लिपि व भाषा है’ तो यह बी.राजन वही है...
पूरा गांव इक्ट्ठा हो गया था- यह उस समय की बात है जब वामपंथी उग्रवाद पश्चिम बंगाल से समाप्त हो रहा था। मेरे गांव में एक जमीनदार थे, जो दबंग व सरहंग आदमी थे। जमीनदारी टूट चुकी थी फिर भी वे खुद को जमीनदार समझते व मानते तथा पहले की तरह ही बेगार लेते डराते-धमकाते-मारपीट करते। जमीनदारी से निकली जमीन पर अपनी ही खेती करते या बटाई पर देते। रूआब व दब दबा इतना था कि थानेदार, तहसीलदार व रेंजर उन्हें सलाम कर अपनी पीठ थपथपाते....।
इन्हीं जमीनदार का घर (महल) एक दिन घेर लिया गया.... महल की चार अगनई थी आधी कच्ची तथा आधी पक्की काफी ऊंचाई पर - इसी से सटा हुआ एक आलीशान बैठका था लोग बताते हैं कि उस बैंठका में कभी वारेन हेस्टिंग्स ठहरा था। रात में उसने जिस आदिवासी बाला की पीठ पर अंग्रेजी राज का इतिहास लिखा था, वह बेचारी दूसरे दिन कुएं में कूद कर मर गई थी। मैं विगत को धीरे-धीरे जोड़ ही रहा था कि मि.बी. राजन ने चपरासी बुलाया , उसे सहेजा कि वह हम लोगों को गेस्ट रूम में बिठाये जब मि. आशुतोष का फोन आएगा फिर वे बुलवा लेंगे। अब हम गेस्ट रूम में थे। यह एक बड़ा कमरा था जिसमें पन्द्रह बीस जन आराम से बैठ सकते थे। कमरे में चार जन पहले से ही बैठे थे जो एक की हत्या तथा एक के अपहरण के बाबत बातें कर रहे थे। उनकी बातें थर-थराने वाली थी। कमरे की दीवारों पर टंगे पोस्टरों को देखने के बजाय मेै उन चारों की बातें सुनने में लग गया- आखिर किसकी हत्या ? किसका अपहरण ? वैसे अब वह चौंकाने वाले कृत्य नहीं फिर भी मैं उन चारों की तरफ था... उन चारो में तीन जन जीन्स पेंट और शर्ट में थे, एक कुर्ते पाजामें में था। चारो धकाधक सिगरेट फुुंक रहे थे। वह जो कुर्ते पाजामें में था, थोड़ा सुस्त व परेशान सा दीख रहा था। वह तीनों को उलाहित कर रहा था ‘यार ! यह क्या है कि एच.आर.पी.जी. भी सुमित की हत्या व अंकुर के अपहरण पर घ्यान नहीं दे रहा’।
‘राजन साहब से बात नहीं हुई्र क्या ? जीन्स पैन्ट धारियों में से एक ने पूछा। वह काफी स्मार्ट दीख रहा था, तथा उसकी आंखें भी बोल बतिया रही थीं, जो औसत से अधिक लाल व चढ़ी थीं - शेष दोनों कुर्ता व पाजामाधारी की तरफ थे कि वह जो जबाब दे उसमें से वे कुछ हासिल कर सकें- कुर्ता पाजामाधारी ने आहिस्ते से हवाला दिया कि बात हुई है...
लेकिन काफी नकारात्मक, उसका कोई मतलब नहीं-
‘राजन सर ! कहते हैं कि सुमित तो बहुत पहले ही संगठन छोड़ चुका है तथा अंकुर तो कभी भी इससे जुड़ा ही नहीं था फिर हम उनके बारे में क्या सोचें’ ‘क्या बकवास है, स्मार्ट दीखने वाले ने सिगरेट ऐशट्रे में डाला और कुचला
मानो गुस्सा ठंड़ा कर रहा हो... फिर उसने गस्से में कहा-
‘फिर सुमित को हर महीने वेतन काहे के लिए देते थे?’ उन तीनों में से एक को याद आया फिर उसने पूछा...
‘ क्या वही अंकुर जो डब्लू.एस.एफ. के बंबई वाले अधिवेशन में मिला था एन.आर.पी.जी. के बैनर पोस्टर के साथ।’
‘हां हां वही , काफी तेज व जागरूक था’ वे दोनों तो इसी संस्था के कार्यकर्ता थे... तो क्या सुमित की हत्या हो गई ? और अंकुर का अपहरण... उन तीनों में से एक ने चकराकर पूछा...
कुर्ता-पाजामाधारी काफी नर्वस था- उसने फिर सारा प्रकरण बताया। कैसे और कब हुआ ? मैं उन चारों की बातों में था, इसी दौरान दीवार पर टंगे पोस्टरों को भी देख लिया करता था। पोस्टर आकर्षक थे- खासतौर से वे जो महिला अधिकारों के बाबत थे- पोस्टरों के साथ दुनिया का एक रंगीन नक्शा भी था। नक्शों में उन स्थानों -देशों को हरे रंग से रंगाया गया था जहां जहां एन.आर.पी.जी. अपना काम करता था।
हत्या और अपहरण की बातें सुनकर मेरा माथा ठनका - तथा खुद को रोक न पाया सीधे कुर्ता पाजामाधारी से पूछा-
‘किसकी हत्या किसका अपहरण भाई’
‘मेरे पूछने पर कुर्ता-पाजामाधारी ने साफ-साफ बताया कि वे दोनों सामाजिक कार्यकर्ता थे जिन्हें पुलिस ने मार गिराया - एक की लाश बरामद हुई, दूसरे की लाश भी नहीं मिली-शायद अपहरण हुआ हो... ?
ये चारो जल्दी में थे - उन्हें कहीं जाना था सो वे मुझे हल्की सी जानकारी देकर कहीं चले गये। अब मैं अपने पुत्र के साथ कमरे में था वैसे भी मुझे एकान्त चाहिए था ताकि मैं बी. राजन के बारे में सोच सकूं-
संयोग ठीक था , थोड़ा सोचने के बाद मुझे पीछे का सारा दिखने लगा- मार-काट, आगजनी चीखें फिर भयानक किस्म का सस्पेंश सारा कुछ साफ था- यदि वाम उग्रवादियों ने सही अनुमान लगाया होता फिर वे मेरे गांव के जमीनदार की हवेली न घेरते... वहां तो मारपीट हो गई - गांव के लोग जमीनदार की सुरक्षा में खडे़ हो गये... हर तरफ - मारो - मारो...
वाम उग्रवादियों की संख्या पचास से उपर न रही होगी। तीन तो मौके पर ही मारे गये- शेष भाग गये पर यह बी.राजन उस समय जाने क्या नाम बताया था। भागकर मेरे गोशाले में छिप गया था। अंधेरा होते होते सारा कुछ छट चुका था। देर रात तक गांव वाले जमीनदार के बैठका में जमे रहे
तथा सलाह मशविरा करते रहे कि पुलिस को क्या बताया जायेगा ?
पुलिस दो घंटे के भीतर गांव में थी - उसने अपना काम धाम निपटाया- लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा पहले शिनाख्तें की गई। पुलिस के वापस होने के बाद मैं अपने छोटे भाई के साथ अपने घर लौटा। मेरा घर गांव से थोड़ी दूरी पर था। घर पूरी तरह आतंक में डूबा था। कहीं सायं सू नहीं, घर की औरतें एक कमरे में बन्द खैरियत की दुआयें मांगती, मनौतियां करतीं। मेरे भाई ने मुख्य दरवाजे का सांकल खटखटाया। तभी मुझे किसी की कराह सुनाई पड़ी गोशाले की तरफ से। मैंने छोटे भाई को कराह के बाबत कुछ नहीं बताया, वह वैसे भी काफी घबराया हुआ था।
दरवाजा खुलते ही हम घर के भीतर थे। खाना वगैरह नहीं पका था- किसी तरह दूध चूड़ा मिला। मेरा छोटा भाई गड़ासा एक किनारे फेंक अपने कमरे में चला गया। आंगन में मैं ही रह गया। मां पहले ही सो चुकी थी, वह बीमार भी थी। मेरे बच्चे भी सो चुके थे। पत्नी अपने कमरे में मेरी प्रतीक्षा कर रही थीं, मैं था कि आहटें पी रहा था ‘ भाई सोया कि नहीं’
‘भाई सो गया होगा’ आश्वस्त होने के बाद मैं अपने कमरे में दाखिल हुआ - देखा पत्नी नींद में है यह स्थिति मेरे लिए ठीक थी- हालांकि मैने सोचा कि पत्नी सो गईं फिर मैं कमरे से निकला, मुख्य द्वार धीरे से खोला- सीधे गोशाले की तरफ - वहां यही बी.राजन कराह रहा था...
‘ भाई साहब ! मुझे बचा लीजिये ? किसी तरह बोल पाया। इसके बायें हाथ की उंगलियां कट गई थीं तथा पीठ पर गड़ासे का गहरा घाव था। खून का बहना बंद हो चुका था। उसके पैर में डंडे की चोटें थीं सो वह पैर फैला नहीं पा रहा था, किसी तरह उकडू बैठ पाया...
तो ...! एक बार इच्छा हुई कि इसे पुलिस के हवाले कर दूं- जो गांव में पहरा दे रही थी, पर जाने वह कौन सा अज्ञात कारण था कि मैं उसे पुलिस के हवाले न कर सका बल्कि इसके उलट उसे साइकिल पर लादकर जहां उसने बताया वहां पहुंचा दिया। गनीमत थी कि जाडे़ का समय था, रात बड़ी थी - इस बड़ी रात का लाभ मिला - सूर्योदय होते होते तक मैं गांव पर था।
दुबारा एक बार फिर वह वामपंथी प्रोफेसर के घर मिला जो अपने समय का प्रतिवद्ध कथाकार था। वह आज कल साहित्याध्यात्म के प्रवचनों के लिए पूजा जाता है। वहां उससे दुआ सलाम के अलावा वाम उग्रवाद पर काफी बातें हुई। मुझे महसूस हुआ कि उसके तर्को में दम है। ’
‘तो क्या दो-दो बार का पहचाना आदमी आज पहचाना नहीं जाएगा’? मैं ऐसा ही खुद से तर्क प्रति तर्क कर ही रहा कि दफ्तर का चपरासी आ गया-
‘साहब ने बुलाया है केवल आपको’ केवल मुझे ही क्यों... क्या पहचान गया मुझे ? थोड़ी देर में मैं साहब के कमरे में था- उसने सीधा पूछा- आशुतोष से क्या काम है ? साफ-साफ बतायें हो सकता है मैं ही कुछ कर सकूं। ’
मैंने बी.राजन को अपना काम बताया फिर उसने मेरे पुत्र को भी बुलवा लिया- मेरे पुत्र को उसने एक फार्म दिलवाया तथा भरने के लिए उसी महिला को सहेजा जिससे हम मिल चुके थ,े उक्त महिला मेरे पुत्र को फार्म भरवाने के लिए अपने साथ ले गई, अब कमरे में सिर्फ हम दोनों थे। बी.राजन ने चपरासी को काफी लाने के लिए निदेशित कर उसे भी वहां से हटा दिया-
अब बी.राजन सीधे मेरी ओर था- ‘कहिए गोपाल जी कैसे हैं आप... इसके साथ ही ढे़र सारे सवाल... यानि इसे मेरा नाम तक याद है मैंने सोचा... बी.राजन ने आश्वस्त किया कि मेरे पुत्र को फेलोशिप मिल जाएगी... फार्म भरा जाने के बाद- फिर हम उसके आवास पर थे - उसका आवास सादगी का नमूना था- रात में हमने ढ़ेर सारी बातें की - वाम अतिवाद से लेकर एन.जी.ओ. वाद पर । उसके साथ रात गुजारना मुझे काफी अच्छा लगा- हम देर रात तक व्यक्तिगत जीवन की गतिशीलता पर भी बातें किये-
दूसरे दिन सुबह मैंने ट्रेन पकड़ा- लोटते समय बी. राजन मेरी सोच में था अब तो उसे संतुष्ट रहना चाहिए- पर करोड़ों रूपयों के एन.जी.ओ. रोजगार से भी वह संतुष्ट नहीं, उसने साफ बताया था बन्दूक की आवाजों या रूपयों के बिछौनों से समाज नहीं बदलता’ अब मैं समझता हूं कि मैं पहले भी नकलची था और आज भी हूं।
मैं रास्ते भर गुनता रहा आखिर बी.राजन किसकी नकल कर रहा- पर इसे समझ पाना मेरे वश में नहीं- सो थक कर मैनें मान लिया कि इस नकलची की गुत्थी को कोई विद्वान नकलची ही सुलझा सकता है। 
 
 -मार्च 2006



रक्त संबंध

लगभग दो-तीन सालों से वह देखता रहा था अपने अपने बडे दाऊ को किसी यथार्थ बोध वाली प्रभावशाली कहानी में तब्दील होता हुआ, ऐसा नहीं था कि वे अचानक या स्वयं स्फूर्त ढंग से परिवर्तित होते जा रहे थे बस यही था कि वे परिवर्तित होते जा रहे थे और गांव पर सभ्यता और संस्कार के अपने बने बनाए घर के बारे में कई तरह के अनुतरित सवालों की खबरें छोडे़ जा रहे थे, सवालों में सबसे बड़ा सवाल था,आखिर वे घर में ही बिस्तर पर क्यों पडे़ रहा करते हैं? उन्हें क्यों नहीं किसी बडे़ अस्पताल में दाखिल कराया गया ? खाते-पीते आदमी थे, उन्हें किसी बात की कोई कमी नहीं थी, फिर भी उन्हें क्यों नहीं उनके मन माफिक खाना-पीना दिया जा रहा ? उनके दोनों भाई उन्हें अकेला छोड़ कर इस दुनिया से चले गए थे, जीवन जीने की आकांक्षा उन्होंने कहां से हासिल की, यह प्रश्न उनके लिए क्या, किसी के लिए भी अहम नहीं था,

ओसारे में पड़ी चारपाई पर पडे़ रहा करते थे दाऊ, चारपाई भी क्या, चौखंबा राज्य की यूटोपिया की तरह, चारो पाए अलग-अलग भाषा बोलते हुए और भिन्न-भिन्न संस्कृतियों का तांडव करते हुए, हां, इतना अवश्य था कि कसे हुए थे मजबूत शिरई और पाटी से, जैसे कसा हो सकता है कोई देश संवैधानिक नियमों से, दाऊ के लिए एक तोसक व रजाई भी उपलब्ध थी, यह बात और थी कि उस पर स्वस्थ-अस्वस्थ कई-कई नस्लों के चिल्लर भूमिगत आन्दोलन कारियों की तरह छितराए रहते थे। कभी भी देखा जा सकता था बड़ी भाभी को पुलिस की तरह उन्हें बीनते हुए और हाथ के दोनों अंगूठों पर टिपटिपाते हुए, इधर दो-तीन महीनों से बीमार चल रहे थे दाऊ, मर्दो को तो कम फुर्सत मिला करती थी औपचारिकता में भी वहां पहुंचने की पर औरतें अक्सर पहुंच जाया करती थीं। छोटे-छोटे लड़के और लड़कियां भी। अन्य कामों के अलावा वे अपने-अपने तरीके से चिल्लर बीनतीं, बाप रे बाप ! कहा जाता है, चिल्लर का होना रूपये का होना है, रूपया तो, होगा ही दाऊ के पास, नहीं भी हो सकता, इनके दोनों भाइयों ने अपने-अपने हिस्से की जमीनें अपने जीवन काल में ही बेच दी थीं, दाऊ ने दुख तकलीफ सह कर बिता लिया अपना जीवन , जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं बेचा आज तक। दाऊ का मानना था कि वे सौवां पार कर चुके हैं, उनका यह मानना क्रिकेट के शतकों के दुराग्रह का तो नहीं ही था। उनकी कमजोर होती काया से चिपके तमाम कटु सत्यों में से घर के लोगों द्वारा बरती जाने वाली लापरवाही का बेहया सच गांव के अन्तः पुरों तक सेंध लगा कर कुछ इस तरह घुसा कि अलाव पर आती सूरज की रोशनी से भी लोग इतनी गर्मी नहीं पाते थे, जितना इस परिचर्चा से कि दाऊ को केवल मरने के
लिए ही बाहर ओसारे मेें छोड़ दिया गया है। गांव है तो चर्चाएं होंगी ही, किसे फुर्सत है जो अपने गिरेबान में झांके, दाऊ को जब चारपाई पर से हटा कर देखा गया तो मालूम हुआ था कि उस चारपाई की पाटी का चूल टूटा हुआ है। ऐसा नहीं था कि बीमारी से दाऊ का वजन बढ़ गया था और पाटी बीच से झुकने लगी थी, जैसे बीच से जब सरकारें झुकनें लगती हैं तब उनका टूटना सुनिश्चित हो जाता है। नए चुनाव होते है, कमजोर या मजबूत कोई भी जो बहुमत जुटा लेता है किसी जमाखोर की तरह, उसकी, सरकार बन जाती है, गोया एक टूटी सरकार की जगह दूसरी जुटी सरकार , पाटी भी इस दूसरी सरकार की तरह बदली जा सकती थी। दाऊ की कमाई थी इतनी दाऊ क्या पूरा क्षेत्र जानता है कि दाऊ के चिरंजीवियों ने पूरा जंगल उगा रखा है अपनी जमीन पर पाटी न बदल कर सुविधानुसार ओसारे में ही पहले पुआल की मोटी परत , फिर दरी और उस पर तोसक डालकर भीष्म शैया बना दी गई थी जिस पर लिटा दिया गया था दाऊ को , मृत्यु रूपी अर्जुन के आने तक। दाऊ को सूरज से क्या लेना-देना था, वे अलस्सुबह उठ जाया करते थे, गांव में यह रहस्य ही बना हुआ है कि वे दीसा के लिए कब जाया  करते थे, क्योंकि ज्यादातर लोगों की झुकी गर्दनें और गात पर सकुचाए पंजों से बनने वाली मिश्रित आकृतियों को कभी पोखरे के भीटे पर तो कभी चालू रास्ते वाले खेतों के बगल में अक्सर देख लिया जाता था, बच्चों पर निगाह जमाए रखने वाले दाऊ जवान बहू-बेटियों पर भी यदा-कदा क्या, अक्सर बिगड़ जाया करते थे, सिर से घूंघट हटा नहीं कि दाऊ का पारा गरम, आज जब दाऊ असमर्थ होकर खों...खों कर रहे हैं, गले की गरगराहट बढ़ती जा रही है तो उनके अगल-बगल वहीं औरतें बैठी हैं जिनके जिस्म पर परदा और लोक-लाज की तमाम गालियां मौके ब मौके दाऊ चस्पा कर चुके हैं और उनके दुलरूआ चिरंजीवियों का पता नहीं है। अक्सर गांव में एक ही जात-बिरादरी के लोग बसा करते हैं ,उसी के अनुसार गांव भी पहचाना जाता है, ठाकुरों का, कुनवियों का, अहीरों का या बाभनों का। गांव में पारिवारिक रिश्ते, खासकर मरनी और शादी-ब्याह में तेजी से पसर जाते हैं, दाऊ के बीमार होते ही और अब-तब की स्थिति आते ही औरतें अपने-अपने इष्ट देवों-देवियों की मनौतियां करने लग गई थीं, ‘किसी तरह बच जाते दाऊ, कुछ दिन और जिन्दा रहते तो वरच्छा हो जाता, कथा हो जाती, हवन हो जाता...’ आदि-आदि,
अपनी-अपनी आशंकित मनौतियां लिए औरतें दाऊ को देखने अवश्य जातीं और उनसे कुशल-क्षेम पूछ वापस लौटतीं... कभी दाऊ कुछ मांग भी लेते अपनी लपलपाती जीभ की खातिर, मोहनभोग, गुझिया या कुछ और
केवल खूं खां कर पाते थे, खरखराती तोतली जबान का आशय समझ कर औरतें जो कुछ बना कर उन्हें खिला-पिला देती थीं, उसी से आश्वस्त भी हो जाया करते थे,

‘दाऊ ने जो-जो मांगा, खिला-पिला दिया, दाऊ की आत्मा संतुष्ट रहनी चाहिए,

संतुष्ट आत्माएं भले ही बेरोजगारों की तरह इधर-उधर भटकती रहें, पर किसी का नुकसान नहीं किया करतीं,’ दाऊ के अब-तब होने की सूचना सरकारों के गिरने की सूचना की तरह पूरे गांव में फैल गई थी, समय के युद्ध क्षेत्र में कुशल सैनिक की मानिन्द जिए दाऊ को देखने के लिए लोग-बाग आने लगे थे। पंडित किस्म के लोगों ने पंचांग में दाऊ की मृत्यु बाधा के कारणों की खोज भी की थी। पचखा चल रहा था , अर्थ लगाया गया था कि ‘पचखा उतरने के बाद ही कुछ होगा, दाऊ शायद इसीलिए अपनी पवित्र देह का परित्याग नहीं कर पा रहे हैं। दाऊ को काफी कष्ट भोगना पड़ रहा है, आने-जाने वाले लोग दाऊ को देख कर अलग-अलग ढंग से स्थितियों की व्याख्या किया करते थे, मृत्यु थी कि सब्र रखने वालों को वेसब्र किए जा रही थी।

उसके लिए दाऊ कहानी में तब्दील होते जा रहे थे, उसे इस बात से चिढ़ थी कि कैसे बदल जाता है आदमी ? कौन बदल देता है आदमी को ? वह जानता था कि साठवां पार करते ही दाऊ समय के हाशिये पर फेंक दिए गए थे और जीते जी ही भूत बना दिए गए थे, किसी का भी भूत कहानी का अच्छा सब्जेक्ट हुआ करता है, वह जानता था, उसके सामने दिक्कतें भी कम न थीं क्योंकि दाऊ का भूत स्वतंत्रा संग्राम के भूत से जुड़ा हुआ था, बाद में बनते-बिगड़ते जमींनदारी बिनाश अधिनियम से जुड़ गया था, इन बदलावों के कारण दाऊ लगातार कमजोर होते जा रहे थे, जब सीलिंग अधिनियम आया था, तब तो दाऊ पूरी तरह से टूट गए थे वह निश्चित नहीं कर पा रहा था कि दाऊ के भूतों में से कौन सा भूत समकालीन होगा,

दाऊ का मृत्यु शैया पर होना उनकी मृत्यु का भूत होगा, जिसे आज नहीं तो कल होना ही है समयानुसार दाऊ के वर्तमानों का अलग-अलग तरीकों से बदलते जाना और खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ भूत होते जाना, यही वह यथार्थ था जिसे वह समझता था कि दाऊ लगातार कहानी में तब्दील होते जा रहे हैं। उसके सामने प्रमुख सवाल था कि दाऊ के महत्वपूर्ण भूतों को किस प्रकार लिपिबद्ध किया जाए, और इसी से जुड़ा दूसरा सवाल था कि महत्वपूर्ण भूत की पहचान किस तरह की जाए ? वह जानता था, उसने सुना भी था कि दाऊ का सारा वर्तमान खंड-खंड विभक्त था, उनमें एकरूपता और समरसता का अभाव भी था , दाऊ के साठवें के पहले का भूत जो स्वतंत्रता संग्राम का वर्तमान था, दाऊ के लिए मजाक सरीखा था, दाऊ समझा करते थे कि लेटा करो सड़कों पर, भरा करो जेल, करते रहो

सत्याग्रह, इससे अंग्रेज भागेगा, सो उस समय उन्हें सबसे अधिक चिढ़ स्वतंत्रता संग्राम से ही थी, यह बात और थी कि गांधी जी का सम्मान उनके दिल में काफी था,

आजादी के बाद दाऊ का भूत फिल्मी विलेन बनने लगा था, जमीनदारी टूटने की खबर से ही वे गुसिया गए थे, कंगरेसियों को चुनीन्दा गालियां बकने लग गए थे, बाद में तो कहने लग गए थे कि जो काम अंग्रेजों ने कर दिया क्या करेंगें ये लोग? अंग्रेजों ने धधरौध बांध बनवा दिया नहीं तो खेतों को पानी मिलता क्या?

जमींनदारी विनाश के बाद से ही दाऊ का दिमाग बिगड़ता चला गया था, उन्हें यकीन था अंग्रेंजी हुकूमत पर और यकीन कर लिया तो कर लिया, उनके यकीन को न कोई तोड़ सकता था, न बदल सकता था , सूरज पूरब में उगता है तो उगता है, पहले भी उगता रहा था और सृष्टि के अंत तक भी उगता रहेगा, इसी सचाई की तरह दाऊ का यकीन हुआ करता था, हालांकि इस यकीन ने उन्हें काफी धोखा भी दिया था। सीलिंग के दौरान उन्होंने कुछ जमान दूर के विश्वसनीय रिश्तेदार के नाम करवा दी थी ताकि सरकार निकाल न ले, जमीन तो दाऊ ने बचा ली पर चार-पांच साल बाद उक्त जमीन उनकी न रही थी। दाऊ के विश्वसनीय ने उसे चोरी से बेच दिया था। वैसे कई और कथाएं भी हो सकती हैं दाऊ के निश्छल यकीन की पर उसे दूसरी कथाओं के बारे में कोई प्रमाणिक जानकारी न थी,

दाऊ को मृत्यु शैया के अगल-बगल छिटका उनका वर्तमान कहां और कैसे घायल हो रहा था, दाऊ को क्या पता था दाऊ तो खांसते-खखारते पडे़ थे। वर्तमान घायल हो रहा था तो होता रहे, संस्कृति बदले की आग में जलती हुई बस्ती की तरह जल रही थी तो जलती रहे, मनुष्यता का तापमान आर्थिक गर्मी से घट-बढ़ रहा था शेयर बाजार की तरह तो घटता-बढ़ता रहे, दाऊ तो जहां और जिस हाल में पडे़ थे,। दाऊ इतने जड़ नहीं थे कि समय के साथ समझौता कर खुद को बचा लेना न जानते हों, भली-भांति जानते थे दाऊ, गांव में जब जबरिया मजदूरी कराने का मामला उठा था, तब सवर्णो ने सबक सिखाने की गरज से सिनेमाई मांडल के जुर्मो को आजमाया था मजूरों पर , मजूर भी मोर्चा बनाकर डट गए थे, आमने-सामने। काम-चलाऊ मार-पीट हो गई थी, पूरे शहर में चर्चा फैल गई थी, गिरफ्तारियां भी हुई थी, दाऊ के कारण कुछ इस तरह सुलह सफाई हो गयी थी मानो कुछ हुआ ही न रहा हो इस तरह से दाऊ के व्यक्तित्व का लगातार समाजीकरण होता रहा था,

वह जब-जब दाऊ को देखकर अपने घर लौटा करता था, तब-तब उसके साथ कई किस्म की कहांनियां और कविताएं भी लौटा करती थीं, यह  बात महत्वहीन है कि साथ आती कहानियों और कविताओं में से कितनी उसके घर तक पहुंचती वह दाऊ के बारे में किसी को बताता तो उसे लगता कि उसकी बातें दाऊ की कहानियों से सराबोर है उसे लगता, दाऊ बस एक-दो दिन के मेहमान हैं। उसे लगने लगा था कि दाऊ को देखने जाना बेकार है क्यों कि दाऊ का मरना निश्चित है कभी वह सोचता, उसे क्या पड़ी है, जो वह दाऊ को लेकर माथापच्ची करे, उनके मरने पर वह भी अन्य लोंगों की तरह उनके किरयाकरम में चला जाएगा,

कई तरह के स्वयं स्फूर्त प्रश्नों के साथ वह अपने घर में पड़ा हुआ है, उसे अनमना लग रहा था, रक्त संबंधों की गर्मी उसे क्यों जलाती रही है ? यही न कि रिश्ता है उसका दाऊ से कि दाऊ उसके पिता के सगे बडे़ भाई हैं और उस पीढ़ी के आखिरी व्यक्ति, वह क्यों भयभीत हो रहा था उस वर्तमान से जो मृत्यु शैया पर पड़ा-पड़ा अतीत बन जाने के लिए छटपटा रहा है ?

दाऊ के जीवन की कहानियों में कहीं कुछ ऐसा नहीं था, जो रक्त संबंधों से बाहर निकल कर दुनिया की क्रूर प्रवृत्तियों के खिलाफ हस्तक्षेप जैसा हो, परंपराओं , रीति-रिवाजों की कठोर व्यवस्थाओं, को जीवन भर ओढे़ रहे थे दाऊ। दाऊ को इतनी उम्र का जैसे जीवन दान मिल गया था, तभी तो वे रक्त संबंधों के सुरक्षा घेरे में जी सके इतने वर्षों। रक्त संबंधों की हिफाजत के इतिहास ने जाने कितने निरीह गरीबों का खून बहाया है और दुनिया लड़ती रही है महाभारत जैसी लड़ाईयां। वह सोचते सोचते कंपकंपा गया था, कहां हुई थी ऐसी लड़ाईयां  ? महाभारत ? सब विकृत दिमाग के लोगों के खिलवाड़ जैसा था, उन्हीं की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के बीच घृणास्पद ढंग से लड़ी गई थी और बहादुरी तथा कायरता के किस्सों से इतिहास रच दिया गया था,

रात का अंधेरा समाप्त हो चुका था, चिड़ियों की चहचहाहट उसके कानों तक पहुंचने लगी थी। सुबह का समाचार सुनने का आदी था वह रेडियों से घोषणा हो रही थी-‘कभी भी यु़़द्ध छिड सकता है भारत और पाकिस्तान के बीच, सेनाओं को सतर्क रहने का आदेश दे दिया गया है,’ इतना ही सुन पाया था कि उसकी पत्नी भागी-भागी आई और बोली, ‘दाऊ नहीं रहे’

वह उठा और दाऊ के घर की तरफ चल दिया अंत्येष्टि मेें अन्यों की तरह शामिल हुआ दाऊ की चिता जिस गति से जल रही थी, उसके भीतर विचार भी उसी गति से जल रहे थे, सब रिश्तों के स्थापित प्रतिमानों को भी वह मन ही मन जलाता जा रहा था और बनाता जा रहा था। भीतर नए-नए प्रतिमान, सामाजिक सरोकारों के केन्द्र में सामाजिक अनिवार्यताओं को बिठाता जा रहा था, चिता जल कर राख बन चुकी थी और वह जल जल कर भी बचा रह गया था
वैचारिकी संकलन फरवरी-1998


यह जो शिवलाल है

सोनभद्र में क्या है, क्या था, क्या नहीं है, क्या होना चाहिए, ये सारी बाते उन प्राक्मानवों की सोच की बातें हैं जो सभ्यता के विकास के क्रम में चल रहे हैं, उनकी नहीं हैं जो अपनी सभ्यता और संस्कृति से तुष्ट हैं, पुष्ट हैं और आश्वस्त हैं तथा अपनी भदेस गृहस्थी के बैंक खातों , वेतनों, सुविधाओं में मस्त हैं। शिवलाल उनमें से नहीं है। वैसे शिवलाल के बारे में जो भी राय बनाई जाएगी, समय के संक्रमण के साथ खुद-ब-खुद गलत हो जाएगी। बहुतों द्वारा शिवलाल के बारे में राय स्थापित करने का प्रयास किया गया पर सब बेकार , सभी टूटते रहे, दरकते रहे और पौन इंच की गिट्टी में तब्दील होकर खदान विभाग के कागजातों में निकासी परमिट के लिए पडे़ रह।’
शिवलाल का अपना कार्यक्रम, अपनी सोच और अपने ढंग का कार्य- व्यवहार । लगभग दो बजे तक सोनभद्र के मुख्यालयी कस्बे में पदार्पण, अभयनाथ के कार्यालय में हल्का ठहराव , चाय-पान, थोड़ी बहुत राजनैतिक बातें, जो अंत तक किसी बरगद पर लटक जातीं या तालाब में किकुड़ियाएं कमल की मुलायम सुंदरता मेंरीझ कर फिल्म के किसी अश्लील पोस्टर में दुबक जातीं।
अभयनाथ के कार्यालय पर शिवलाल उपस्थित हों और सोनभद्र के विकास और विनाश के बारे में चर्चा-कुचर्चा न हो, जबकि अभयनाथ अपनी कुर्सी पर कुर्ता-पाजामा में समाए , गोड़ उठाए बैठे हों, कुछ असंभव जैसा! अभयनाथ की महारथ को ललकार कर वहां से फुर्र होना, उनके दुबारा-तिबारा चाय के आग्रहों को ठुकराना शिवलाल को अच्छा नहीं लगता। वह ठहर जाता अभयनाथ के कार्यालय पर। मन में खलबली होती, उन निरीहों के यातनाग्रस्त परेशान हाल चेहरे दिखते, जो हरिजन समाज कल्याण विभाग, अस्पताल, बिजली विभाग, थाने पर या कस्बे में कहीं अपना काम कराने की प्रतीक्षा में होते।
अभयनाथ और शिवलाल दोनों अपने रिस्तों की किन मजबूत शिराओं को पकड़ कर एक-दूसरे की पारदर्शिता की टोह करते, कोई नहीं जानता। लोग सिर्फ इतना ही जानते हैं कि शिवलाल को ढूंढना हेरना हो तो अभयनाथ के कार्यालय पर देखो। वहीं उसकी खंडहराती साइकिल होगी, कुछ टूटी-टूटी-सी... सीट पर कवर या कि पहिए पर मेडगार्ड हो भी सकता है नहीं भी। साइकिल होगी तो शिवलाल होगा कचहरी में क्योंकि अधिकतर परेशान हाल लोग पहले सफेद न्याय के लिए काली कोट की जेब में से फंसी राय निकालना चाहते हैं और ऐसे लोग शिवलाल के लिए आवश्यक और अनिवार्य हुआ करते हैं। यह हो ही नहीं सकता कि शिवलाल
कस्बे में न आए। यह अलग बात है कि उसे किसी नातेदारी या घर से कहीं बाहर जाना पड़ जाए और वह इस पूरे क्षेत्र में ही सुलभ न हो।
शिवलाल की उम्र यही कोई अड़तीस-चालीस और अभयनाथ की मुश्किल से चार-पांच साल अधिक, एक पंचवर्षीय योजना का फर्क। दोनों स्वस्थ, चमकदार, गब-गब। अभयनाथ सुख-सुविधा और संपन्नता से परिपूर्ण , हरियाए, टहटहाए, बरगद की डार की तरह डी.एम. से लेकर एस.पी. तक छितराए। जनजातियों के विकास वाले कार्यक्रमों से जुडे, स्वयं सेवी संस्था चलाते फिल वक्त परेशान ... फंड नहीं, अनुदान बंद, सहायता बंद! शिवलाल अमरबेल की तरह हवा में लटका, पानी मे डूबता-उतराता, आकाश निहारता सोनभद्र की सीमेंट, बिजली, अल्युनियम की चिंनगारियों की तरह जनता के लिए टहलता-भटकता। अभयनाथ के दरबार में क्या नहीं है ? उनके दरबार की दीवारों में विचारों का ही गारा लगा है, खोजों की सीमेंट से छत ढली है। दरबार को मालूम है कि सोनभद्र का आम आदमी आर्यों के आगमन का दुष्परिणाम है। सबसे पहले आर्यों ने ही यहां के लोगों की स्वाधीनता छीनी, मुक्तता छीनीं और गुलाम बनाया। आर्यों की ही परंपराएं मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक दुहराई जाती रहीं। शोषित , इतिहास में, कविता में, कहानी में, जंगल में, पहाडों पर सभी जगह यहॉ का मूल निवासी गुलामी से कराहता रहा।

शिवलाल ने अभयनाथ के दरबार से निकली इस महत्वपूर्ण सूचना व जानकारी को गठिया लिया और महसूस किया कि उसे गौरवान्वित होना चाहिए क्योंकि वह निरीहों, असहायों की भर काबू सहायता का कार्य करता हैं बिना परवाह के कि उसका कार्य रूपयों में शास्वत रूप से अपरिवर्तनीय है। शिवलाल चिंतित रहता-आखिर वह कितनों तक अपनी सेवा सहायता को विस्तारित कर सकता है ? वह आकाश तो नहीं जिसके नीचे सब समा जाएं, वह धरती तो नहीं, जिसके ऊपर सब रह लें। वह महज शिवलाल है।

शिवलाल क्या करता ?

‘ भइया अस्पताल पर खून की जांच करवा दो, मुझे वृद्धा पेंशन नहीं मिला, पोस्ट आफिस वाला रूपया मांगता है, रूपया दो तो खाता खुलेगा, पुलिस मुझे जबरिया चोर बना रही है’

किस-किस को दरवाजे से भगा देता शिवलाल, मजबूरन उसे अस्पताल, थाना, विकास कार्यालय जाना ही पड़ता, वह किस-किस को जबाब दे किस-किस को समझाए ?

भाई! शिवलाल करता क्या हैं ? प्रतिदिन कस्बे में हाजिर। वही सफेदी, वही चमक , गब-गब धोती-कुर्ता में लिपटा शालीन आश्वस्त और गंभीर व्यक्तित्व। चेहरे पर बिजली माफिक निश्चिंतता की दमक, आंखों में कुलबुलाती सभ्यता की चीखें, सब कुछ स्थित प्रज्ञ जैसा।

लोग समझने की आकांक्षा लिए रहें, एक दूसरे से पूछते-पाछते रहैं।

शिवलाल को समझ पाना आसान तो नहीं नहीं तो अभयनाथ को तो मालूम हो ही गया होता कि यह जो शिवलाल है, है क्या चीज! किस माटी का बना है! किस पानी से गलेगा ? घाघरा के , सोन के, बेलन बकहर या रिहंद के ? दफ्तरों से प्रवाहित होने वाला अप्रदूषित गंगा जल शिवलाल को गला-पचा नहीं पाएगा। भला शिवलाल के बारे में अभयनाथ को पता नहीं होगा। सारा जिला प्रशासन अभयनाथ पर भौरों की तरह मुग्ध और अभयनाथ भी अपनी कला में कुशल! बांध लें उफनती, फुफकारती नदी, निकाल लें बगल में नहर, सींच ले परती और ऊसर , सुविधाओं की हरियरी और आकांक्षाओं की सुगंध फैल जाए चहुंदिश। अभयनाथ ने बारहा प्रयास किया कि शिवलाल बदल जाए पर ! शिवलाल ही बना रहा। अभयनाथ शिवलाल को समझााते-

यह क्या है कि लड़ जाते हो अधिकारियों से !

यह क्या है कि गरीब-गरीब , आम आदमी-आम आदमी रटते रहते हो। यार तोता भी भूलता है, भूल जाया करो !

यह क्या है कि, दूसरों के लिए दफ्तर-दफ्तर अपमानित होते रहो, लोगों से झगड़ते रहो...!

पुल भहरा गया , सड़क उखड़ गई, लेखपाल ने घूस ले लिया तुम्हारा क्या चला गया ?सब कुछ तो देश में ही है न ! देश के बाहर क्या जा रहा है ?

यह क्या है कि तुम्हें कुछ अच्छा दिखता ही नहीं! कैसी आंखें हैं तुम्हारी, कैसा है तुम्हारा मन !

अभयनाथ भी उस दिन थे शिवलाल के साथ एस.पी. कार्यालय में हनुमान की तरह बन्धा गये। शिवलाल। एस.पी. के यहां नौकरशाही की भाषा की रस्सी की कमी कहां, जब जितना जरूरत हो बढ़ती जाए।

‘‘ क्या है शिवलाल जी, यही काम रह गया है कि पता लगाता रहूं किसकी गोमटी हट गई ? किसका पाखाना जाम हो गया?किसकी रसोई उड़ गई ? गोमटी हट गई तो ऐसा क्या हो गया ? कह दीजिए नक्सलाइटों ने हटवा दिया, यही तो हो रहा है सोनभद्र में। अब मैं किस को पकडू़ं पकडवाऊं और उसका चालान करवाऊं। नक्सलाइटों के नाम पर सरकार के कान खडे़ हो जाते हैं, पैर कांपने लगते हैं। गोमटी हट गई तो क्या हो गया, कोई तूफान खड़ा हो गया क्या ? गोमटी भी स्थायी रहती कहां, वो तो हटा ही करती है इधर-उधर...

‘‘ वे साले गोमटी वाले, खोमचा वाले कम हरामी होते हैं क्या ? भीड़ वाली जगह पर ऐसे जम जाएंगे जैसे इनके बाप का हो। यातायात का क्या होता है ? आप जानते हैं शिवलाल जी....!

‘‘कहां की गोमटी....

‘‘ अरे वहां तो नगर पालिका सफाई अभियान चला रही है। आप नगर

पालिका वालों से बातें करो भाई ! मैं कुछ भी मद्द नहीं कर पाऊंगा’

शिवलाल की ललचाई आंखें अभयनाथ की तरफ। अभयनाथ चुप, आश्वस्त शिवलाल का आकाशचारी मन अभयनाथ को लेकर उड़ने लगा आसमान में। अभयनाथ का शक्तिशाली और प्रभावकारी व्यक्तित्व एस.पी. को मोड़ सकता है- अभयनाथ की तरफ ताकता रहा शिवलाल पर अभयनाथ चुप तो चुप। काहे बोलते ? किसके लिए बोलते। शिवलाल आकाश से नीचे गिरा , चोटिल हुआ, माथा फूटा-अभयनाथ आइना नहीं हैं वे रास्ता हैं। चिकनी पक्की सड़क माफिक , उस पर कारें चल सकती हैं, कारें चलती हैं। उस पर बैंलगाड़ी चलाना, गदहे की पीठ पर बैठकर लम्बी यात्रा पर निकलना... संघर्ष लम्बी यात्रा का सिलसिला है।

शिवलाल के भीतर आग-ही-आग , धधकने लगी।

क्या करेगा ? धक्का दिलवा कर निकलवा देगा बाहर, बंद करवा देगा...देखा जाएगा...।

‘‘हां साहब! गोमटी एक जगह पर रहने वाली चीज कहां ? फिर क्या है ऐसा जो एक ही जगह पर टिका रहे। वह कस्बा जहां गोमटी है, थी, कल कहां था, परसों नहीं रहेगा। और आप ? आज यहां हैं कल नहीं रहेंगे। कल जो कुछ यहां था आज नहीं है। सवाल गोमटी हटाए जाने का है, उसे चाहे कोई व्यक्ति हटाए या संस्था। संस्था में भी संस्था का नियमाक कोई व्यक्ति ही होता है...

‘‘ गोमटी वाले बहुत गरीब हैं श्रीमान्। उनके पास कमाने-खाने का दूसरा साधन नहीं। मात्र गोमटी। पांच-छह जन का परिवार। आप देख लें चलकर। गोमटी से यातायात बाधित नहीं होता। वह तो पड़ी है ट्रांसफार्मर के खंभों के बगल मेें। तोड़-फोड़ तो दिया ही गया है, अब हटाया भी जा रहा है.....

‘‘मेहरबानी करें श्रीमान्। गरीब की रोजी-रोटी बचा लें श्रीमान्। कस्बे की सफाई तो नाली और सड़क से होगी, गंदगी हटाने से होगी, गोमटी हटाने से नहीं श्रीमान्।’’

किसे मालूम नहीं कि एस.पी.जो होता है वो एस.पी.होता है, वह लाखों लोगों द्वारा दी गई प्रतिभा परीक्षा का सफल परीक्षार्थी होता है और उसे जिले के लाखों लोगों को शांतिप्रिय, अनुशासन प्रिय, आज्ञाकारी और कानूनों को मानने वाला बनाना होता है। वह बाईं ओर भी जा सकता है और दाई ओर भी । वह लूटपाट रोक भी सकता है और लूटपाट करा भी सकता है।

वही हुआ जो शिवलाल को पता था।

‘‘ क्या गरीब-गरीब चिल्ला रहे हो, तुम्हारी बकवास कब से सुन रहा हूं। वो तो अभयनाथ के साथ आए हो नहीं तो कब का बाहर करवा दिया होता। मैं भी देख रहा हूं यहां के लोगों को। सभी गरीब-गरीब शोषित-शोषित चिल्लाते हैं। अरे शिवलाल! यहां गरीबों के हमदर्द होते नऽ तो मैं चैन से बैठा न होता। भाषण वीरों का मानस चिंतन न सुनता। कहीं क्षेत्र में होता। पूरा क्षेत्र बारूद पर खड़ा है शिवलाल। देख लेना, कभी आग लगेगी अवश्य। यहां का गरीब आज चुप है, कल चुप नहीं रहेगा फिर देखना।......

‘‘किसी ने देखा किसी ने सुना कि गरीब अपने पक्ष में कुछ इस तरह खडे हो गए हैं कि संकट हो गया है अमीरों के लिए और अमीर जगह. जगह गोलबंद होना शुर कर दिए है प्रशासन की नींद हराम हो गई है

‘‘बकवास बंद करो और अपना काम करो.... गरीब-गरीब चिल्लाना,चीखना बंद करो ,लेखक,पत्रकार, विचारक बनने का नाटक छोडो गरीबों को अपनी निरीहता, असहायता, असमर्थता से क्षत-विक्षत आहत होने दो। गरीब अपनी मंजिल खुद तय करेगा, उसे तुम्हारी जैसी बैसाखी नहीं चाहिए। क्यों अभयनाथ ?’’

अभयनाथ ने इतना धीरे से ‘हां’ कहा जिसे वे ही सुन पाए होगे। हां, धड़ पर टंगी उनकी गर्दन कुछ यूं हिली जैसे कोई कठपुतली हिला करती है।

वैसे भी अभयनाथ क्या बोलते, वे बोलते भी तो एस.पी. का मूड देखकर। एस.पी. का मूड खराब होना अभयनाथ के लिए सुविधापूर्ण ही रहा । परेशान सा शिवलाल। शिवलाल प्रतिउत्तर दे सकता था एस.पी. के नवनीत या सुभाषित का। पर शिवलाल चुप ! ये अधिकारी भली-भांति जानते हैं मेढ़क की तरह रंग बदलना। भाषा और नौकरशाही के व्याकरण को जनता के पक्ष में खड़ा करना। जनता को हथियार बनाकर जनता को ही लूटना। शिवलाल को लगा कि वह किसी घुड़सार में बंध गया है। उसकी गर्दन में चना और जी की भरी झोली लटका दी गई है सईस आएगा और दाना खतम देखकर उसे बाहर निकालेगा, एड़ लगाएगा, चल देगा गंतव्य की तरफ। शिवलाल घोड़ा है क्या ? वफादार, आज्ञाकारी, कानून भक्त... क्या है शिवलाल...!

कल ही तो गया था शिवलाल सुमेशर के घर पर। घर क्या... रेलवे लाइन के बगल में मिट्टी की दीवारों और खपरैल के झोपड़े में किसी तरह गुजर-बसर करने लायक अगल बगल कस्बे का गंदा पानी बज-बजाता सड़ता बेहया का घना जंगल, भिनभिनाती मक्खियां।

कितना गिड़गिड़ा रही थी सुमेशर की पत्नी, गिर पड़ी थी पैरों पर- ‘‘ भइया गोमटी ही सहारा है। मां बीमार पड़ी हैं, उसकी दवा-दारू हो रही है। ये भी बीमार थे, मलेरिया से उठे हैं। बच्चों की पढ़ाई बंद है, फीस कहां से जुटाती। नर्सरी में पढ़ते हैं तथा प्राइमरी स्कूल काफी दूर है बच्चे वहां जा नहीं सकते, रेलवे लाइन पकड़ कर जाना पड़ता है।.....

‘‘दो-तीन घरों में चौका-बर्तन करती हूं, उससे का होगा भइया! गोमटी के पास की दुकान का सहारा था... सब छिना गया। चेयरमैन ने नाराजगी से कुचलवा दिया गोमटी। हम लोग उसको वोट नहीं दिए थे भाजपा को दिए थे, जीता है कांग्रेसिया।’’

एस.पी. के यहां बैठे-बैठे ही याद आ रहा है सब कुछ शिवलाल को।
शिवलाल के पास यह सवाल आज भी सुरक्षित पड़ा है उत्तरहीन कि जब देश में गरीब अधिक हैं फिर हुकूमत पर कुछ थोड़े से अमीर लोग क्यों काबिज हैं ?

भाषा-भूषा का छद्म, ज्ञान-विज्ञान का धोखा सब कुछ तो है शोषित जनता के लिए बाधक! आखिर गरीब, गरीबी की भूख क्यों नहीं महसूसता ? उसकी आतें क्यों सूख जाती हैं, क्यों वह ट्रांसप्लांट करा लेता है विचारों की किडनी ? उसके हाथ झूले हुए क्यों हैं ?

एक मिनट भी बैठे रहना मुश्किल हो रहा है शिवलाल के लिए पर अभयनाथ एस.पी. का आफिस छोडें तब नऽ। शिवलाल निकल जाना चाहता था कि सिपाही चाय-बिस्कुट ले आया और एस.पी. के लिए मिनरल वाटर का एक बोतल। बोतल हाथ में पकड़ते ही एस.पी. ने उस बोतल का रहस्य खोला।

‘‘ डांक्टरों ने मना कर दिया है। आंत में इन्फेक्शन आ गया है, परहेज कर रहा हूं पिछले साल से ही। चाय वगैरह तो पीना ही नहीं है। पानी ब्वायल या मिनरल।’’

चाय तो पीनी ही थी शिवलाल को, अपेक्षा और उपेक्षा के द्वंद्व से ऊपर उठना ही क्रियाशील व्यक्तित्व है। चाय पीते-पीते ही शिवलाल किसी दूसरे भारत में पहुंच गया, जो उसकी अपनी खोज थी, किसी वास्कोडिगामा की नहीं। उस भारत में शिवलाल को एक पसंदीदा प्यारा मंत्री मिला, जो शिवलाल का परिचित , शुभचिंतक तथा हितैषी था। उस शुभचिंतक मंत्री मंत्री ने शिवलाल को आश्वासन दिया था कि यदि वह कभी सरकार में शामिल हुआ या उसे शामिल किया गया तो तुम्हें आदमी बना दूंगा शिवलाल! शिवलाल को लगा कि क्या वह आदमी नहीं है ? उसने अपने दोनों हाथ बारी-बारी से झटके, फिर पैरों को झटका, कुछ दूर चला, मंत्री को देखा, आंखें भी काम कर रही थीं, दिमाग भी ठीक-ठाक था, वह चल-बोल सकता था, सोच सकता था फिर आदमी क्यों नहीं है। मंत्री के समझाने पर शिवलाल ने समझा कि रूपयों-पैंसों वाला आदमी! बहरहाल शिवलाल के समझ में आ गई आदमी बनने की प्रक्रिया।

आदमी बनने की इस प्रक्रिया में शिवलाल ने मंत्री महोदय के सामने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। प्रस्ताव के अनुरूप मंत्री महोदय को प्रस्ताव को स्वीकृत करते हुए उस पर व्यय किए जाने वाले प्रस्तावित धन का आवंटन करना था और यदि मंत्रिमंडलीय तथा विभागीय कमीशन न दिया गया या न देना पड़ा तो लगभग दो लाख रूपया बच जाता जो शिवलाल का होता। बहुत ही सरल ढंग से शिवलाल ने अपना प्रस्ताव इस विश्वास के साथ प्रस्तुत कर दिया कि इसे तो हर हाल में स्वीकृत होना ही है, अलबत्ता जो देर हुई प्रस्ताव प्रस्तुत करने में, इसका शिवलाल को काफी दुख था। शिवलाल ने इस दुख को किसी भगवान को कोसते हुए तथा अपनी किस्म को गरिया कर दूर किया।
प्रस्ताव पेश करने चुकने के बाद शिवलाल को अपने खोजे भारत के कई स्थानों की यात्रा करनी पड़ी और हर उस स्थान पर जाना पड़ा जहां मंत्री जी से मजबूत और सार्थक मुलाकात की संभावना हुआ करती थी। गोया तीन-चार महीने का समय कुछ यूं गुजर गया जैसे किसी प्रेमिका के साथ बिताया गया समय हो, पर बाद में खर्च और समय का हिसाब भारी लगने लगा शिवलाल को और प्रस्ताव किसी बृक्ष जैसा! अपनी जगह पर जस-के-तस खड़ा किसी नदी के किनारे भी नहीं जो बरसात में बाढ़ के कारण गिर सकता हो। दूसरी तरफ शिवलाल लगातार विचारता रहा कि दो लाख रूपयों का सार्थक और व्यवसायिक उपयोग कैसे किया जा सकता है।
समय अपनी गति से गुजरता रहा। जब साल भर गुजर गया तब शिवलाल ने आर-पार का फैसला करना चाहा। मंत्री जी से मुलाकात हुर्इ्र बिल्कुल पहले जैसी, वही अभिन्नता, वही स्नेह, वही दुलार। शिवलाल को लगा कि प्रस्ताव गिरा नहीं है खड़ा हो गया है अब चलेगा, रेंगेगा.....।
शिवलाल के पूछने पर मंत्री जी ने कहा-‘‘यार शिवलाल क्या बताऊं-हमारा सी.एम. सनक गया है। कोई नया कार्य कराना ही नहीं चाहता। मात्र पुरानों पर धन आवंटित करने का आदेश दिया हुआ है ताकि वह कार्य शीघ्र पूरा हो और फटा-फट उदघाटन पटिट्यां हर कार्य पर लगा दी जाएं।’’
शिवलाल अपने खोजे भारत में भटकने लगा। उसे जान पड़ा कि उसकी आंखें फूट गई हैं और वह अंधरा गया है। पास में बचे रूपयों का हिसाब लगाया और फैसला किया कि शीघ्र ही यहां से निकल जाना चाहिए। उसे इस बात की भी तकलीफ हुई कि उसे दूसरा भारत खोजने की क्या आवश्यकता थी ? इस तरह के भारत में तो उसका जन्म ही हुआ है जहां जन्मते ही आदमी जाति का हो जाता है, वर्ण में विभक्त हो जाता है। उस भारत मंे तो ऐसे-ऐसे मंत्री तथा सरकारी नौकरशाह हैं कि पूरी दुनिया निगल जाएं और मजाल कि डकार भी आए।
शिवलाल अपने खोजे भारत भ्रमण पर था ही कि अभयनाथ ने टोका- ‘‘क्यों शिवलाल जी चलना है न!’’
पुराने भारत में लौट आया शिवलाल। उसने एस.पी. कार्यालय की मजबूत और चिकनी दीवारों को तजबीजा। एस.पी. का चेहरा देखा। उसने संचित शब्दों में से दो शब्द निकाले ‘कटनहा’,‘मरखनहा’। एस.पी. की कटीली और भयानक आकृति के लिए उसे ये दोनों शब्द अपने जैसे निरीह और कमजोर लगे। अचानक क्या हुआ कि एस.पी. का चेहरा तीन मुंहों वाला हो गया। बीच वाला तो एस.पी. का था। दूसरा और तीसरा चेहरा शिवलाल की समझ में नहीं आ रहा था। शिवलाल ने किसी तरह दूसरे चेहरे का जोड़ बिठाया विधायक के चेहरे से। गौर से देखने पर शिवलाल को लगा कि विधायक
जैसा नही विधायक का ही है। तीसरा किसका है... ? शिवलाल मतिभ्रम में ही एस.पी. कार्यालय से अभयनाथ के साथ बाहर निकल आया।
बाहर अभयनाथ की चमचमाती अम्बेसडर खड़ी थी। ड्राइबर सीट पर बैठ कर ऊंघ रहा था। रात ऊपर चढ़ गई थी। सड़क सुनसान होने लगी थी, जाड़ा धरती पर पसरने लगा था। सूरज पूर्ण विश्राम पर गया था। अंधेरा जवान हो रहा था। शिवलाल को कंपकंपी महसूस हुई...

‘‘ भाई साहब! ठंड बढ़ गई है, गाड़ी में शाल वगैरह है क्या ?’’

‘‘कार में ठंड नहीं लगती भाई।’’ अनुभव का सुभाषित उचारे अभयनाथ। पिछली सीट पर अभयनाथ के साथ शिवलाल भी धंस गया।

अम्बेसडर चल पड़ी। मुश्किल से दस मिनट का रास्ता जो काफी उबाऊ लगा शिवलाल को। यह कार, यह जिला, अभयनाथ और मैं! शिवलाल के समझ में कुछ नहीं आया, कैसी है यह छंद मुक्त कविता 

कार चलती रही। कुछ दूर आगे जाने पर किसी रोड ब्रेकर कारण उछली। शिवलाल को याद आया पत्नी ने दवा का पुर्जा दिया था। रूपए नहीं हैं। अच्छा! अस्पताल से दवा मिलती नहीं, खरीदना पड़ता है। अम्बेसडर कस्बे के चौराहे पर आ गई, थोड़ा आगे चलकर मुड़ना होगा अभयनाथ को। अभयनाथ ने जानना चाहा- ‘‘शिवलाल जी कहां उतरेंगे आप ?’’

‘‘ किसी दवा की दूकान पर।’’

अम्बेसडर दवा की दुकान पर रूक गई। शिवलाल अभयनाथ को रोककर दवा की दूकान में घुस जाता है, दवाई लेता है और अम्बेसडर तक वापस आता है...

‘‘ भाई साहब सत्तर रूपयों की दवाइयां हैं ! इतना तो होंगे ही आपके पास।’’ अभयनाथ बिना हां-ना के सौ की नोट थमा देते हैं शिवलाल को।

दवा का दाम देकर दस-दस की तीन नोट लिए वापस लौटता है शिवलाल। अभयनाथ को वापस करता है... ‘‘ भाई साहब- इसे रख लें।’’

अभयनाथ की दयालु आंखें शिवलाल से टकर्राइं। शिवलाल ने महसूसा कि तीसरा चेहरा अभयनाथ का हो सकता है।
 अक्षर पर्व नवम्बर 1999

 नामांतरण

‘सरकार’ कह कर किसी को संबोधित करने का चलन अब गांवों तक में भी नहीं, फिर भी वे मुझे सरकार कहते हैं, मजा देखिए वे मुझसे आठ-दस साल बडे़ हैं, वित्त-पोषित विद्यालय के प्रधानाचार्य हैं एवं बीसियों किताबों के सम्पादक है या संकलन कर्ता। अब जो बीसियों किताबों का निर्माण कर सकता है, भला वह काहे नहीं प्रकाशक होगा ? मरें दिल्ली, इलाहाबाद के प्रकाशक, समीक्षा छपवाने के लिए ‘पक्षी’ नामधारी जैसी पत्रिकाओं के दफ्तरों के चक्कर लगायें बयरहाल वे किसी दफ्तर का चक्कर नहीं लगाते।  वे कहते हैं कि पत्रिकाएं पेट-काटकर निकाली जाती हैं, सो उनके यहां वह सब तो न मिलेगा जो शिक्षा विभाग, संगीत अकादमी या संस्थानों वगैरह से मिल सकता है, मिलता है और मिलता है।

संस्थानों आदि से मिलने वाले पुरस्कारों की राशि इतनी कम नहीं होती कि किताबों के प्रकाशन का खर्च न निकल जाएं , शिक्षा विभाग के दफ्तरों की नव संस्कृति का लाभ उठाते तथा पुरस्कार वगैरह हासिल कर लेते... इतना ही नहीं एक ही समय व कार्यालयावधि में यदि वे विद्यालय में हाजिर होते तो दूसरी तरफ कहीं कोई कार्यशाला भी करवा रहे होते... सो वे एक ही समय में एक काम करने वाले संकीर्ण व्यक्ति न थे,

वे मुझे बहुत सम्मान देते तथा गोष्ठियांे या सभाओं में एक दो मिनट मेरे व्यक्तित्व की चर्चा में खर्च देते... सभा में उपस्थित कुछ लोगों को यहा बुरा लगता... सो वे लोग भुन-भुना कर रह जाते तथा वक्ता-मंच तक कभी न पहुंच पाते... वैसे कोई आज की तारीख में मूर्ख तो नहीं जो हम दोनों की अन्योन्याश्रिता न भांप ले...

हकीकतन हम दोनों मंे अन्योन्याश्रिता तो कतई न थी, हो भी नहीं सकती थी, यह तो मुझे बहुत लंबे अंतराल के बाद मालूम हुआ कि वे मुझे ‘सरकार’ कह कर क्यों संबोधित करते हैं तथा... सम्मान वगैरह देते हैं,

दरअसल मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि सामंती रही है, जमींदारों वाली... मेरे बाबा अंग्रेजों की कृपा से स्थानीय राजा से टकराने की क्षमता रखते थे... लोेग बताते हैं कि जब वारेन हेस्टिग्स बनारस के राजा चेत सिंह को नेस्तानाबूत करने के अभियान पर था, उस समय वह मेरे गांव में आया था, उसका पड़ाव गांव के पोखरे पर था, उसने बाबा से चेतसिंह को ध्वस्त करने के बारे में सलाह मशविरा किया था, हुआ यह कि बाबा ने वारेन हेस्टिग्स के पहुंचने के पहले ही चेत सिंह को खबर कर दी... चेतसिंह किला छोड़कर रीवां की तरफ कहीं भाग गये... वारेन हेस्टिग्स का पड़ाव मेरे गांव के पोखरे पर पड़ा था कि नहीं... इसे कौन साबित कर सकता है आज, फिर भी यह तो है ही सोचने लायक कि पोखरे वाली बस्ती का नाम ‘गोर डीहवा’ कैसे पड़ गया... पोखरे का भीटा काला, अगल-बगल की मिट्टी काली, माटी की दीवारें पुती न हुई तो वे भी काली...यह तो अचरज ही कहा जायगा कि जमींदार परिवार सीमांत जोतों तक सिमट कर सीमांत कृषक हो जाये। मेरे बाबा परिवार वृद्धि रोकने वाले आदमी न थे, उनके पांच पुत्र हुए... पांचों बालिग थे जब जमींदारी टूटी... पांचों को कानून के मुताबिक जमीन मिली... बाद में पांचों पुत्रों के कुल सत्रह पुत्र हुए... इन्हीं में से एक मैं हूं,
तो क्या यह सब वे नहीं जानते या जान बूझ कर मेरा उपहास करते हैं... इस बारे में मैं कभी विचारता ही नहीं...। मान-अपमान का फर्क समझने में मैं कभी माहिर भी नहीं रहा, वे जब मुझे सरकार कह कर संबोधित करते तब मुझे उनके संबोधन में विचारने लायक कुछ न सूझता, सो मैं प्रतिक्रियाहीन रहता... नहीं तो व्यंग्यात्मक संबोधन को बर्दाश्त करने की शक्ति सभी में होती कहां है ? वैसे भी वे मुझसे बडे़ थे, नाम-धाम वाले थे, उनसे मेरी पटती भी खूब थी...।

मेरे एक चाचा थे, गांव उन्हें सत्याग्रही जी के नाम से जानता था, गांधी जी से प्रभावित होकर उन्होंने, सविनय अवज्ञा व असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था...। कई  बार जेल भी गये थे... खान-पान , वेश-भूषा सब में में गांधीवादी थे...। एक दिन गांव में एक घटना घट गयी... घटना भी बहुत बड़ी नहीं, जिस पर थाना आता...। हुआ यह था कि कुछ गरीब लोगों ने साखू का पेड़ काट गिराया था, कच्चे मकान के छाजन के लिए, देश आजाद हो चुका था, चाचा समझते थे कि सही अर्थो में आजादी मिल गयी है सो वे भिड़ गये सिपाहियों से... जो गिरफ्तारी के लिए गांव में आये थे...।

चाचा ठहरे देश भक्त.... जज्बा पुराना था, नियति पुरानी थी, समझते थे कि सरकार गाय की तरह होगी.... पूज्यनीय व पवित्र... दूध भी देगी बछड़ा भी, जिससे खेती बारी होगी... बछिया होगी तो बड़ी होकर गाय बन जायेगी, उन्हें क्या पता... कि सिपाहियों को सरकारी काम-धाम से रोक देना अपराध होता है, वह भी गिरफ्तारी के समय... फिर सिपाहियों ने भी तो...सुलह समझौते की बातें की थी। जमाना महंगी का था, कुल बीस-पच्चीस रूपये में मामला रफा-दफा होना था, वैसे बीस रूपये उस जमाने में गरीब क्या बड़े भी न दे पाते...। खैर चाचा चाहते तो बीस रूपये दे देते तथा थाने का कृपा पात्र भी बने रहते...। चाचा के पास शायद समय का ज्ञान था...। सो उन्होंने घूस लेने के मामले को सामान्य सी मार-पीट में बदल दिया... दोनों सिपाहियों को दो-दो झापड़ लगा दिये...।

थानेदार देश भक्ति में चाचा से कम न था, यदि थोड़ा बहुत कम भी था तो क्या ? उसके पिता ख्ूानी क्रांतिवाले थे...। चंद्रशेखर आजाद के सहयोगी...
किसी जमाने में अंग्रेजों ने उन्हें मार गिराया था... सीना , बंदूकों ने छलनी कर दिया था... थानेदार पट ताव खा गया... फिर तो पूरा गांव घेर लिया गया... गांव में एक भी आदमी ऐसा न था जो चाचा के पक्ष में रहा हो... थानेदार ने चाचा को पकड़ा... मारा-पीटा तथा गिरफ्तार करके जेल भिजवा दिया...
चाचा जमानत हो जाने के बाद , जब जेल से वापस घर आये फिर तो पूरी तरह बदल गये...। उन्होंने गांव के सारे बच्चों को एक नारा रटा दिया...।
बोलो-बोलो कौन सरकार ? बच्चे जबाब देते, ‘मूछ वाला थानेदार’... ?  
लेकिन मैं तो मूंछवाला भी नहीं फिर वे मुझे सरकार क्यों कहते हैं... सीमांत कृषक बन जाने के बाद से ही मुझे पारिवारिक स्मृतियां जिनका रिश्ता अतीत के सामंती वैभव से जुड़ता था। काफी घृणित जान पड़ती...सो चाचा ही नहीं दूसरे लोग भी मुझे याद न आते... सिर्फ पिताजी को छोड़कर... पिताजी भी इसलिए कि वे परिवार के सारे बच्चों को क ख ग घ से लेकर ए बी सी डी तक लिखना सिखाते तथा सभी को पढ़़ने की सीखें देते...। मेरे परिवार में जो भी पढ़ सका वह उन्हें अवश्य याद करता है..।
वे मुझे सरकार कहंे चाहे और कुछ फिर भी मैं चाचा जी को याद न करता, पर याद करना पड़ा.... इसलिए कि समरूप प्रसंग आ गया...। कमाल देखिए प्रसंगों का... चाचा जी असहयोग आंदोलन में भले ही जेल गये पर वे... न जेल गये और न जायेंगे...
वे दूसरी तरह का असहयोग आंदोलन चला रहे थे... जिससे जेल व थानेदार से दूर का भी रिश्ता नहीं। उनके असहयोग आंदोलन  का आलम यह था कि पहले वह बच्चा था, अब प्रौढ़ है तथा समझदार भी.... समझदार इतना कि दूध का दूध , पानी का पानी वाली जांच न हो तो कुछ भी मालूम न चले...।
वे एक बार जांच के घेरे में आ गये, जांच की खबर हवा बन कर पूरे कस्बे में फैल गयी... उनके दूसरे अनन्यों की तरह मुझे जान पड़ा कि आजादी के बाद वाला उनका असहयोग आंदोलन बुरी तरह कुचला जायेगा फिर तो वे निलंबित ही होंगे... या कम से कम सस्पेंड...।
हुआ यह था कि जांच वालों ने उन्हें विद्यालय में हाजिर पाया था जब कि वे भोैतिक रूप से... उसी समय एक कार्यशाला के अपने आयोजन में थे... किसी अध्यापक ने इस रहस्य को खोल दिया था जो प्रश्न बन गया था... ‘क्या एक आदमी एक ही समय में भिन्न-भिन्न स्थानों पर रहते हुए भिन्न-भिन्न कार्यो को संपादित कर सकता है ?’
इस सवाल ने जांच करने वालों को अचरज में डाल दिया... सो जांच वाले फटाका पहुंचे कार्य-शाला वाले स्थान पर । वे मजे में तथा बेखबर कार्यशाला के संयोजन में जुटे थे...। बात थाने तक ले जायी गयी... पर हुआ कुछ नहीं... पचास हजार रूपयों में मामला सलट गया तथा मान लिया गया कि इस विशेष क्रिया से एक ही आदमी , एक समय में दो भिन्न-भिन्न स्थानों पर कार्य सम्पादित कर सकता है।
जांच में क्या हुआ ? जानना मेरे लिए बहुत आवश्यक था... सो मैं उनके यहां आनन-फानन में पहुंचा वे सो रहे थे... सारा मामला रफा-दफा कर देर रात में लौटे थे... आंखे मलते हुए प्रसन्न भाव से मुझसे मिले... मेरे पूछने पर सारा हाल अहवाल सिल-सिलेवार उन्होंने बताया फिर मुझे संबोधित कर आश्वस्त करने लगे...

‘ सरकार ! सरकारी आदमी ही सरकार का असहयोग के जरिये विरोध कर सकता है... जनता तो बे-मतलब के विरोध के नाम पर मिमियाती है... मैं शुद्ध रूप से गांधी का अनुयायी हूं तथा अपनी तरह से सरकार का विरोध करता हूं... देखियेगा एक दिन भी पढ़ाने नहीं जाऊंगा... दो लाख रूपया दिया है तब जाकर विद्यालय को वित्त-पोषित की मान्यता मिली है... जांच कराओ... देखता हूंु कितनी जांचे कराते हो...’

मैने साफ-साफ उनका चेहरा देखा , वे सफलता की गरिमा अपने चेहरे से चिपका चुके थे, जांच का मामला रफा-दफा हो ही गया था...। सगर्व वे सारा प्रकरण बता गये, छिपाये तो सिर्फ इतना ही कि पचास हजार रूपये खर्चना पड़ा ... उनकी बातें सुनते हुए मैं सोचने लगा... क्या इक्कीसवीं सदी में असहयोग आंदोलन का उत्तर-आधुनिक रूप ऐसा ही होगा जैसा वे निपटा रहे थे... तो क्या चाचा उस जमाने में इस तथ्य का अनुमान लगा चुके थे कि असहयोग व सत्याग्रह जो गांधी के काल में चल चुका आगे नहीं चल पायेगा... शायद हां तभी तो उन्होंने बच्चों को रटाया था.... ‘बोलो बोलो ! कौन सरकार , मूंछ वाला थानेदार... अब भला मूंछ वालों के खिलाफ कैसा असहयोग ?

जब भी मैं कस्बे में होता , वे कहीं न कहीं मिल जाते, कुछ विशेष बात होती तब वे मेरे मकान पर भी चले आते... ऐसे ही किसी दिन अल-सुबह वे आये, मार्निग टहलाव पर निकले थे... दूसरे किस्म के हाल-अहवाल के बाद वे फौरन अपने उद्देश्य पर ठहर गये... उन्होंने एक निमंत्रण दिया जो उनके अभिनन्दन कार्यक्रम में शामिल होने के लिए था... वे एक विशेष नाम धारी पुरस्कार पा चुके थे... भला ऐसी परिस्थति में मैं कैसे इंकार कर पाता, इंकार करना भी नहीं चाहिए,

कुल मिलाकर यह कि उनके अभिनंदन कार्यक्रम में मैं सम्मिलित हुआ , मेरे भाषण पर तमाम तालियां बजीं... ऐसा मैं अपनी प्रशंसा मं नहीं बता रहा , मुझे भी तालियों पर अचरज था... क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ... पहले तो यही होता था कि श्रोता मुझे गालियां देने लगते कुछ समझदार हुए तो मुंह कान बंद कर बैठे होते...। उस अवसर को याद कर अब मैं सोच रहा हूं कि वैसा ही भाषण अपनी किताब के लोकार्पण के अवसर पर दूंगा...
मेरी किताब के लोकार्पण का अवसर आयेगा ! यह संभव नहीं जान पड़ता ,
ऐसा इसलिए नहीं कि मुझे हताशाओं ने गुलाम बना लिया है... ऐसा कतई नहीं , असल मामला है, कविता, कहानी, निबंध वगैरह लिखने की मेरी क्षमता नहीं... सो किस बात की किताब ?
किसी तरह जन जातियों के गीतों का तीन चार सौ की संख्या में संकलन किया था... दो साल लगे थे... फिर दो सौ के आस-पास उनमें से छॉटा... खास तौर से उन गीतों को जो जन-जातियों के दुख-दर्द , विस्थापन वगैरह को प्रदर्शित करते थे...। बहुत खुश हुआ था उस दिन... खुश इतना कि अपनी श्रीमती जी को भी उसमें शामिल कर लिया, हालांकि वे मेरी खुशियां के स्वप्न महल से भाग निकलीं , कुटिल हंसियों के बीच उनके होठ मोटे हो गये थे तथा आंखो में निरीहता के लोर आ गये थे...‘पहले अपनी किताब तो लिखिए, दूसरों की क्या लिखेंगे ?’ श्रीमती जी की उपेक्षा कर मैं अपनी किताब के प्रकाशन का सपना देखता रहा... इसी बीच वे आये...
वे बहुत-बहुत खुश हुए मेरी किताब देखकर .... यानि किताब की शक्ल की टाइपशुदा पांडुलिपि... फिर उन्होंने अपनी खुशी मेरी तरफ उछाली... जो मेरी तरफ आयी तथा मुझसे चिपक ली...।
‘सरकार’! इसे मैं छापूंगा अपने प्रकाशन से ... यह तो बहुत ही मौलिक कार्य है... ‘मुझे लगा कि भूखे के मुंह में रोटी डाल दी गयी...।
कितना खर्च आयेगा...? मेरे पूछते ही वे विदक पड़े... ‘सरकार! कैसी छोटी बात करते हैं आप ! खर्चा में लगाऊंगा। बेचकर वसूल लंूगा ,’
गूंगे का जुबान चाहिए न , जुबान मुझे मिल रही थी... मिल क्या रही थी, मिल चुकी थी... वे इतना झूठ तो न बोलेगे... फिर किसी की नैतिकता को संदिग्ध मान लेना यह नैतिकता तो नहीं? उन्होंने उसी दिन पांडुलिपि , मुझसे ले ली... मेरे पास उनका बड़प्पन बचा था जो बहुत बड़ा हो रहा था तथा किताब छपने की रंगीन खुशियां थीं...। खुशियां भी ऐसी जैसे जिनकी किताबें छप जाती हो, वे युग-पुरूष होते हों, होते हांे न होते हों, मैं मन की खीर तो पकाने ही लगा था... अब बनी, तब बनी फिर खाऊंगा, मन की खीर , मीठी-मीठी... काजू-किशमिश वाली....।
खीर न पकी, न खाने का मौका मिला... जिस दिन अमेरिका ने इराक पर हमला किया उसी दिन मुझ पर भी हमला हुआ, शब्दों, अक्षरों, नामों, लयों, तानों के बम मुझे खंड-खंड फोड़ने लगे... हाथ कहीं गिरा, कहीं कान, कहीं पैर, कहीं सिर... मेरे हाथ में एक चमचमाती सी किताब थी ...।  किताब में वे थे... उनका नाम था, उनकी दूसरी किताबों के विवरण थे, पुरस्कारों की सूची थी, पद व पदवी थी... गंभीर अध्येयता जैसी एक तस्वीर थी...।
किताब देखता रहा, देखता रहा, इसके अलाबा कर ही क्या सकता था... किताब तो छप गयी थी... वे आदिवासी गीत मेरे तो न थे... संकलित कर लेने मात्र से वे गीत मेरे तो न हो जाते, तो क्या वे ... ऐसे भी ... कहीं
दूसरी किताबें भी इसी तरह.....
जमीनों के नामांतरण तो होते हैं, कानूनी ढंग से... किताबों के नामांतरण के बारे में नहीं जानता था... आखिर मैं भी तो उनके लिए ‘सरकार’ ही तो था...

वे सरकार का विरोध करते ही थे, वह तो सविनय विरोध था.... ऐसा भी नहीं था कि वे गीत मेरे रचे हुए थे... रचे हुए भी होते तो क्या नामांतरण न होता...?

आस्था व विश्वास से संबंधित एक आदिवासी गीत जो संकलन में संकलित था... मुझे याद आया.... ‘विधि के विधान हे करम देवता..., पड़ल पहाडे़ डेरा हो करम देवता, पहाड का डेरा बचा रहे यही काफी है.... मैंने खुद को आश्वस्त किया तथा नामांतरित किताब को बेरहमी से रैक की तरफ उछाल दिया....जो रैक पर न जाकर धम्म से जमीन पर गिरी... तो क्या होगा इराक का ? बिनाश, विकास या राष्ट्रीयता का नामांतरण....? मेरी संकलित पाण्डुलिपि की तरह।
कथाबिम्ब जून 2003

डाईंग डिक्लेरेषन

मुंह में जीभ चुभलाने रहने की कलात्मक त्वरा के साथ गूॅगा बने रहने का अप्रतिम शिल्प मुझे किसी सेलीब्रेटी कथाकार की तरह कभी नहीं आया। जब तक मैं दिल्ली में रहा अपने ऊपर गुस्साता रहा। एक तो बीस साल बाद वहां जाना हुआ था। गूंगा बने रहने और लगातार हां-हां कहते रहने का भद्दा अभिनय भी मुझे आता तो मेरा अनुमान है कि मदमस्त दिल्ली मेरे अनुकूल हो जाती, फिर तो वहां महीनों रहने की मेरी इच्छा पूरी हो जाती।

अप्रैल महीने की कोई तारीख, गिनती के कुछ महीनों बाद बीसवीं शताब्दी का अंत। प्रयागराज एक्सप्रेस मुझे दिल्ली पहंुचा देती है निश्चित समय पर, जब कि रास्ते में उसके लेट होने की खबर थी। इस यात्रा में मेरे साथ मेरे मित्र प्रेम भाई और एक हाईकोर्ट के वकील साहब हैं। हम तीनों, पूरी यात्रा एकाकार बने रहे तथा अपने-अपने अंतर्विरोधांे में वांक्षित संगति बनाए रखे रहे। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरते ही हम सवारियों के रेले में विलीन हो गए। किसी तरह धक्का-मुक्की खाते-खिलाते हम स्टेशन से बाहर आए।

हमें कोई जल्दी न थी क्योंकि हमें न कहीं होटल की तलाश करनी थी और न ही किसी ऐसे शुभचिन्तक के आवास की जिनका हम मेहमान होते। हमारे लिए यू.पी. भवन में ठहरने का पहले से ही बंदोबस्त था।

मेरे लिए नई दिल्ली का रेलवे स्टेशन कौतुक जैसा, इतनी भीड़, सभी आश्वस्त और मस्त, कोई परेशान नहीं, किसी के चेहरे पर अलाव,सूखी फसलों के तनाव, जली हुई बस्तियों की खबरें कुछ भी तो नहीं सांप्रदायिकता का धुआं, जातीय उन्माद का खून, कुछ भी तो नहीं दिख रहा। ला एंड आर्डर तथा कर्फ्यू नहीं दिख रहे, कहां है सब ? राजधानी जैसे पवित्र स्थान पर इस तरह के अश्लील विचार। मैंने अंतस में कुलबुलाते कहानीकार को धिक्कारा।

यह कैसा पिछड़ापन है? चूल्हा चौका, पत्नी की उलाहना, बच्चों की जरूरतें, मानसिक भूगोल की आक्रांत सीमाएं।

हे कथाकार,जागो! उगते सूरज को सलाम करों जगमगाती दुनिया के इन्द्रधनुषी रंगों में खुद को विलीन कर दो। फिर पाओगे अपने भीतर उगी हुई जनवादी प्रवृत्तियां। विरोध, अंतर्विरोध, क्रिया, प्रतिक्रिया से पूरी तरह आजाद।

हंसो कहानीकार,हंसो! मत देखो उस फांसी घर की तरफ, मत याद करो यातना शिविरों की क्रूर तथा जघन्य कार्यवाहियां। मत डूबो अतीत की गहराइयों में।

हम तीनों टेम्पो पर सवार। टेम्पो पर हम चल रहे हैं। सड़क पीछे की तरफ

ः 82:

भाग रही है। हमारे भीतर दूसरे किस्म का टेम्पो चल रहा है। दिल्ली का वैभव सड़क की मानिंद सरक रहा है। संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, प्रेस रजिस्ट्रार का कार्यालय, पी.टी.आई. भवन, दूरदर्शन का टावर, जे.एन.यू. सभी के सभी भागते नजर आ रहे हैं, अतीत के किस्से बनते हुए दिख रहे हैं सब। विजयगढ़ और अगोरी के किलों की तरह खंडहराते हुए चीख रहे हैं। यह किस तरह का अजीब टेम्पो मेरे भीतर गतिशील है, यह मैं किसका ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ सुन रहा हूं ?

अरे ! अतीत और वर्तमान के मिले-जुले प्रतीकों !

तू अंत होती सदी का आखिरी बयान मुझे क्यों सुना रहे हो ? सदी को जाने दो, इसने महाभारत से भी बडे़ दो-दो विश्वयुद्ध झेल लिए हैं। तू आत्महन्ता क्यों बन रहे हो प्रतीकों, तूने सोचा है, उस निरीह, असहाय शोषित, यातनाग्रस्त जनता का क्या होगा ? वह जनता अब किसे सलाम करेगी। हजारों हजार साल के पुराने सांस्कृतिक , धार्मिक राजनीतिक राष्ट्रवाद का क्या होगा ?

मेरे अंतस का गतिशील टेम्पो अचानक कहीं चला गया, मैंने पाया कि हम चौराहे के टेªफिक की भीड़ में हैं और सड़क पार करने का सिग्नल नहीं है। थोड़ी देर के बाद टेम्पो चल पड़ा अब हम कम भीड़ वाली सड़क पर थे। प्रेम भाई सुप्रीमकोर्ट के कार्य की चिंता में थे-कैसे निपटेगा ? मेरे भीतर खामोशी का दरिया था, जिसमें दिल्ली अपने ऐतिहासिक विशेषणों के साथ किसी लाश की मानिंद बहती नजर आती। ऐसा क्यों होता है ? हीनता का विस्तार ? मैं खुद को कोसता और अश्लील गालियां देता... ‘यार! शिवेन्द्र अपने देश की राजधानी को शिष्टों की तरह देखने, सूंघने, चखने की तुम शालीनता कब सीखोगे ? बालिग अंतराल के बाद तुम्हें यह कुटिल अवसर मिला है, लानत है, तुम पर ’ टेम्पो गतिशील था। रेलवे स्टेशन और यू.पी. भवन के बीच जब हम कनाट प्लेस पहुंचे तो वहां का काफी हाउस जहां मैं कभी गोरख पांडे के साथ गप्पंे किया करता था, किसी जलावनी पेड़ की तरह उगा जान पड़ा- जिसकी नियति ही कट और जल जाने की हो।

वे भी दिन थे, जब हम कांग्रेस के पतन पर खुशियां मना रहे थे और निश्चित भविष्य का स्वाद चूस रहे थे कि ‘कांग्रेस गई, वंश -राज गया’ और आज का दिन ... लगता तो दिन जैसा ही है। वही सूरज, वही चांद, वही बदरियां, वही आसमान, स्वाभिमान इतना, ताकत इतनी कि हमने पांच-पांच विनाशकारी बम फोड़ लिए हैं फिर भी इतने डरे हुए, अपनी कमजोरियों से आक्रांत... हम परेशान हैं, कोई फरिश्ता आए और हम पर हुकूमत करे... वाह रे ! अतीत की गोरी चमड़ी से मुहब्बत, हुकूमत की विदेशी शैली का सत्कार, अंग्रेजों की महिमा!

मेरे लेखकीय जीवन के पलायन के वर्षो में भी गोरख पांडे की हाजिर

ः 83:

जबाबी लगातार मेरे साथ रहीं। कांग्रेस पार्टी की पुनसर््थापना के कारणों में संभवतः गोरख पांडे का वह तर्क काम कर रहा हो, जो उसने कभी कनाट प्लेस के काफी हाउस में किसी दक्षिण भारतीय को उसके प्रश्न के उत्तर में दिया था- ‘हां-हां कमलापति जी भी बनारस में रहते हैं। ’

साले ! ये नहीं पूछते कि बनारस में बच्चन सिंह , काशीनाथ सिंह, शिवप्रसाद सिंह , ठाकुर प्रसाद सिंह , भोला शंकर व्यास या कि गोरख पांडे रहते हैं कि नहीं, पूछेंगे कमलापति जी के बारे में और हम बनारसी भी कम मूर्ख नहीं- फट बताएंगे कि ‘हां-हां हमारे घर के पास ही उनका महल है और हमारे उनसे अच्छे संबंध हैं आदि-आदि।’

नेहरू के काम से उनका नाम निश्चित रूप से इसलिए विदेशों में महत्वपूर्ण और जरूरी हो गया तथा उन्हें जनाधार संपन्न व्यक्ति महज बत्तीस-तैंतीस प्रतिशत वोट पाने के बावजूद भी मान लिया गया ? ऐसे में गोरख की हंसी भी किसी गंभीर कविता से कम न होती।

कुछेक मिनटों में ही हम यू.पी. भवन तक आ गए। अब हमारे सामने यू.पी.भवन का खूब सूरत आर्किटेक्ट था, और हम उबलते, जलते, सूखते सोनभद्र से नौ सौ किलोमीटर दूर ही गए थे। दोनों के बीच दिल्ली की अनुभूति का अंतराल था और हमारे पास इतना भी अवकाश नहीं बचा था कि हम दिल्ली में रहकर यू.पी. सीमेंट कार्पोरेशन की जबरिया बंद की गई , चुर्क और डाला की सीमेंट इकाइयों के बारे में सोच पाते। धीरे-धीरे हम दिल्ली के होते जा रहे थे। यू.पी. भवन के रिसेप्सन हाल को चूसते हुए हम कमरा नं. 116 में उपस्थित हुए जहां यू.पी. के खेत-खलिहान, पहाड़-जंगल, कर्मनाशा और बेलन जैसी नदियां न थीं, कमरे में दो बेड थे, दो कुर्सियां थी, दीवार में एयर कंडीशनर था, साथ जुड़ा हुआ बाथरूम और शौचालय था। फर्श पर कीमती कालीन बिछी थी। अब हमें उस कमरे के एकांत और शालीनता से छेड़-छाड़ करने का अधिकार था। कमरा हमें बाहरी दुनिया से अलगिया रहा था और हम उस दुनिया से अलग होकर कमरे में बंद हो रहे थे।

जब हम कमरे के एकांत को आजाद कर रिसेप्सन हाल में आए तब दिन के नौ बज रहे थे, हमारे भीतर सुप्रीम कोर्ट हिलकोरें ले रहा था, हम उन हिलकोरों में समा जाने की जल्दी में थे। बाहर निकालते ही हमें आटो रिक्शा मिल गया। उसने हमें यू.पी. भवन से सुप्रीम कोर्ट तक विस्थापित करने में जल्दी की।

हमारे साथ प्रेम भाई का वजनदार ब्रीफकेस था, जिसमें नोटों की गड्डियां तथा मुकदमें की कुछ फाइलें थीं। हमारा ध्यान ब्रीफकेस पर रहता और हम अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत बनाए रखने की कोशिश  में होते। हमारे पास समय था क्योंकि वांक्षित वकील साहब के आने में एक घंटे की देरी थी। हमने इस आतिरिक्त समय का नाश्ता करने में उपयोग किया।

ः 84:

अदालत का भीतरी तहखाना , जो नाश्ता और भोजन घर के रूप में था मुझे अपनी आंत जैसा दिखा, पूरी तरह जिस्म के भीतर अदृश्य ! हमने नाश्ता वहीं किया नाश्ते के बाद जब हम वकील साहब के चेम्बर तक पहुंचे तब हमने उन्हें चेम्बर में पाया।

हम अपनी बातों, स्थितियों के साथ उनके चेम्बर में भर गए। वहां कूलर की सरसराती हवा, कम्प्यूटर की टिप-टिप , किताबों की उमस , फाइलों के झोकें, वकील साहब का धीर गंभीर व्यक्तित्व, खानदानी वकील का व्यवसाय कुशल व्यवहार, सामने बैठे किसी मुवकिक्ल की कानूनी सिसकियंा। पूरे चेम्बर मे कानूनी उलझनों, जकड़नों, पेचीदगियों, जटिलताओं की सड़ांध। मुझे छींक आई।

मैं जानता हूं मेरी चीखों और छींकों के बीच यदि राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर या कि विष्णुचंद्र शर्मा होते तथा उसे रामविलास शर्मा, नामवर सिंह सहला रहे होते तो निश्चित ही मेरी चीखों तथा छींकों में विशिष्ट शिल्प होता, कथ्य होता, नवीनता होती तथा विश्वचिंता की त्वरा होती।

मुझे तत्काल अपने ‘अक्षर-बटोर’ प्रवृत्ति पर विद्रूप हंसी आई-

’यह भी कोई काम है, अक्षर बेटोरना, कविताएं, कहांनियां गढ़ना, किसी प्रकाशन के अश्लील आदेशों की प्रतीक्षा करना।’

हम लोगों के साथ के वकील साहब ने हमें सुप्रीम कोर्ट के वकील से परिचित कराया। अब हम सुप्रीम कोर्ट के वकील की निगरानी में थे उसके व्यवसाय के घेरे में। सुप्रीम कोर्ट के वकील ने हाई कोर्ट की खारिज फाइल के पन्नों-दर पन्नों को देखा। रिट के रिजेक्सन आर्डर और उसके रिलीफ की प्रार्थना को देखा। उसने अपने होंठ फैलाए, नाक के दोनों छेदों को छितराए, चश्मा उतारा फिर कहा- ‘‘ यह रिट कैसे खारिज हो गर्इ्र? ग्राउंड तो ठीक है। ’’

हाईकोर्ट के हमारे सहयोगी वकील ने उन कारणों का बयान किया जिनके कारण रिट खारिज हो गई थी। कोर्टो के फैसलों को प्रभावित करने वाली अपमानजनक स्थितियों की चर्चा में हमारा समय कुछ अधिक लगाया। हमें संतोष था कि सुप्रीम कोर्ट का वकील हमरे केस की सरलता पर आश्वस्त था उसने कहा भी-‘‘ हम अवश्य ही सफल होंगे’’

फिर प्रार्थना के पक्ष में दाखिल बयान हल्फी पढ़ कर वह प्रेम भाई पर झल्ला उठा। ‘‘ जेल जाना है क्या ? संस्था का रिन्यूअल बाद में बयान हल्फी पहले, आप कोई ले मैन तो नहीं ?’’ उसने प्रेम भाई के बचाव के किसी तर्क को नहीं माना।

कुछ देर बाद प्रेम भाई के हाथ में सुप्रीम कोर्ट के वकील द्वारा बनाया गया वह पुर्जा था, जिसके आधार पर उसे फीस के रूप में रूपया दिया जाना था।

‘पैंतीस हजार’-मैंने देखा

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मुझे लगा कि मैं अपनी असली उम्र से पन्द्रह साल छोटा होकर फिर पन्द्रह साल छोटा हो गया हूं और किसी बीस वर्षीय नवयुवक की तरह मतदान का अधिकार पाकर फदक रहा हूं। मेरे मुंह से गाली निकली अनुदान योजनाएं। इंदिरा आवास के बीस हजार और श्वेत क्रांति के पन्द्रह हजार गोया एक भैंस और एक घर-पूरे पैंतीस हजार। मरो प्रेम भाई मरो- चलाओं जनजाति बहुल क्षेत्र नगवां में साक्षरता विद्यालय। स्वयं सेवी संस्था का मंत्री होकर इतना परजीवी, इतना दयनीय, फडिंग एजेंसी के तलवे चाटने की निरीहता। हे कथाकार! आओ हम कागजमय हो जाएं।

‘ कहानियां, कविताएं, संस्मरण, अदालतों के फैसले, नोटें, योजनाएं, क्रांति, सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षाएं, चूल्हा, चौका, कारखाने और ताजे परमाणु बमों को लेकर हम कागज की चीख हो जाएं। हम कागजों की तह चीखें, हंसे, गुनगुनाएं, फडफड़ाएं। ’

सुप्रीमकोर्ट से निकलते समय ब्रीफकेस की औकात कम हो गई थी। प्रेम भाई ने रूपयों की गड्डियां रूपहले भविष्य की आशा में वकील को थमा दी थी - पूर्व योजनानुसार अब हमें साहित्यिक किताबों की मुस्कुराहट में विलीन होने के लिए राजकमल प्रकाशन जाना था। अशोक माहेश्वरी जी से फोन के द्वारा मैंने उनका समय ले लिया था।

अब हम तीनों सड़क पर थे, वहीं हमने निश्चित किया कि राजकमल का कार्यालय ढूढ़ने के बजाय हंस का कार्यालय ढूढ़ा जाए, अंसारी रोड़ पहंुच जाने पर उसका पता आसानी से मिल सकता है। दो मकान बाद ही राधाकृष्ण प्रकाशन चल कर राजकमल तक पहुंचने के रास्ते की जानकारी ली जा सकती है।

आटो रिक्शा ने हमें दरियागंज उतार दिया। अब हमें अंसारी रोड़ पर स्थित 2/36 या 2/38 तक पहुंचना था। हमें विश्वास था कि पान वाले या चाय वाले सही पता बता दिया करते हैं पर वहां पान या चाय की कोई दूकान न दिख पा रही थी।
दरियागंज और अंसारी रोड़ के ठीक मुहाने पर बाई तरफ चौकी पर पान की उठउआ दूकान दिखी। हम उस ओर तेजी से लपके। वहां शिष्ट जैसा पान की प्रतीक्षा में कोई खड़ा था। हमने भी तीन मगही पान का ललकारू हुक्मनामा जारी किया। अधेड आदमी हमारी इस कृत्रिम बेवकूफी पर चौंका। हमने उसे देखा, संभवतः उसने भी हमें देखा होगा। मैंने उससे पूछा- ‘भाई जी सामने अंसारी रोड़ है क्या ?’
उसने पान मुंह में ठूसते हुए कहा- ‘‘ हां‘ जो कुछ  ‘आं’ की तरह सुनाई पड़ा। फिर मैंने उससे पूछा-‘यहां हंस कथा मासिक का कार्यालय कहां है?’
‘‘हंस कथा मासिक! यह क्या है ? यार ! हम मर्द हैं हमसे मासिक से क्या मतलब/ताज्जुब है कथा के बाद मासिक !’ संस्कृत भाषा के अन्वय जैसा उसका यह संवाद हमें हंसा गया... फिर उससे मैंने राधाकृष्ण और राज कमल के बारे में पूछा, वह कुछ नहीं बता पाया। पान वाले को भी इन कार्यालयों का पता न मालूम था। अब हम उन वांक्षित कार्यालयों तक पहुंचने की लालसा लिए हवा में लटके हुए लोग थे। कभी पुरवइया पश्चिम की तरफ ढकेलती तो पछुवा पूरब की ओर ढकेल देती। ऐसे में न हम यू.पी. भवन लौट सकते थे और न ही हमें हंस, राजकमल या राधाकृष्ण का पता ही मिल रहा था।

मुझे टाइम्स भवन ख्याल आया। अंसारी रोड के मुहाने की पक्की सड़क पर खड़ा मैं टाइम्स के वैभव एवं प्रचान के धंुध में विलीन होने लगा। मेरे गले में टाइम्स भवन के घुसने की माला लटक गई। हालांकि उस समय मेरी आंखों के सामने धंुध थी फिर भी मैं उस कल्पना को देख रहा था कि फौजी संस्कृति के लोंगों ने हंस कार्यालय को घेर लिया है और उसका भवन जला दिया गया है तथा अंसारी रोड़ ही नहीं दरियागंज से संसद भवन तक खबरें फैली हुई है। हंस कथा मासिक ने मौजूदा जन तांत्रिक व्यवस्था के प्रतिकूल एवं विघटनकारी प्रकाशन किया है। यदि ऐसा सम्भव हुआ तो वहां का बच्चा-बच्चा हमें हंस कार्यालय का पता बता सकता था। साहित्यिक प्रकाशनों के बौनेपन पर मुझे तरस आया तथा समझदार लोगों के साहित्य के सरोकारों से विरत रहने पर गुस्सा। मैंने महसूस किया किया कि ‘असुविधा’ के बारे में मेरी सोच की यह गूंगी और दोगली कुंठा थी।

भला हो ‘हंस’ कार्यालय के दो-तीन मकान पहले वाली पतली गली में चौकी पर चाय बनाने वाले का। उस बेचारे ने बताया-

‘‘ थोड़ा आगे बाई बाजू चले जाओ, फाटक पर कोई झबरा कुत्ता भूकेंगा उसके ठीक बाईं तरफ हंस कार्यालय है। उसके ठीक दो मकान आगे राधाकृष्ण प्रकाशन ऊपरी मंजिल पर है। ’’

अशोक माहेश्वरी ने जो समय हमें दिया था, हम उससे बाहर हुए जा रहे थे सो हम राधाकृष्ण पहंुुचे। राधाकुष्ण के एक कर्मचारी ने हमें राजकमल तक पहुंचाया। अब हम राजकमल में थे पर मेरे भीतर ‘हंस’ कार्यालय की सात्विक कल्पना थी राजेन्द्र आहुति की राजेन्द्र जी के बारे में बताई गई बातें थीं, कुछ पत्रिकाओं में छपीं राजेन्द्र जी की तस्वीरें थीं, मुक्त हंसी, काला चश्मा और काले पाइप वाली।

अशोक जी जल्दी में थे, चंद्रभूषण जी को उपन्यास की पाण्डुलिपि देने के लिए कहकर वे कहीं चले गए। मैंने महसूस किया कि यह ‘आंफ आवर ’ है तथा लंच लेने का समय, मुझे चार बजे तक आना चाहिए था। राजकमल से प्रेम भाई और हाई कोर्ट के वकील साहब मुझसे अलग हो गए क्योंकि वकील साहब को इलाहाबाद लौटना था और औपचारिकता के निर्वाह में प्रेम भाई को उन्हें विदा करने के लिए व्यवस्था करनी थी। राजकमल प्रकाशन के बैठकनुमा कमरे में मेरे मित्र रामकुमार कृषक और रामनारायण स्वामी मेरी
प्रतीक्षा में बैठे हुए थे। हम खुल कर मिले, एक दूसरे को उलाहे, गरियाए और भी बहुत कुछ...। राम कुमार कुषक जी ने मेरा परिचय चंद्रभूषण जी से कराया, उन्हें मेरे वहां पहुंचने का प्रयोजन मालूम था... मैंने उन्हें ‘जल समाधि’ की पाण्डुलिपि थमा दी।

उपन्यास का चर्चा हुई, फिर चंद्रभूषण जी ने प्रकाशकों की व्यवसायिक विवशता पर विस्तार से बातंे की। उपन्यास उलट-पुलट कर, बाएं-दाएं देख कर चंद्रभूषण जी ने कहा...‘‘ उपन्यास प्रथम दृष्टया घ्यान खींचता है, इसे गंभीरता से पढ़कर ही टिप्पणी दे सकूंगा जिसमें दस दिनों का समय लग सकता है।’’ चन्द्रभूषण जी के हवाले उपन्यास की पाण्डुलिपि करके मैं राम कुमार भाई और रामनारायण स्वामी के साथ सादतपुर विस्तार चला गया।

कृषक भाई के घर चाय पी, बनारसी विष्णुचंद्र शर्मा से भेंट की, अस्वस्थ भाभी जी को प्रणाम किया। कुछ देर बीतने के बाद जब विष्णु जी चाय की प्यालियां लिए दिखे तब मैं चकराया। मुझे लगा कि दिल्ली वाले विष्णु के भीतर गंगा की धारा और संकरी गलियों की अक्खड़ता आज तक बह रही हैं, जो नामवर जी की वैश्विक संरचना के भीतर कभी न दिखी। जे.एन.यू. आकर गोरख भी बदल गया था, जो उसके व्यक्तित्वांतरण के पूर्व का बदलाव था। बाद में तो उसने लम्बा कुर्ता धारण कर लिया था, दाढ़ी बढ़ा ली थी, जूता-चप्पल से विरत हो गया था, किसी को भी ‘ कामरेड’ कह कर संबोधित करने लगा था। लम्बे कुर्ते में वह ठिगना दिखता था फिर भी गोराई दक-दक थी। काशीनाथ जी का आचरण तथा आवरण की अपरिवर्तनशीलता मुझे प्रभावित करती रहती है लोलारक कुंड, बी.एच.यू. कैम्पस या कि ब्रिज इन्कलेब कभी वे बदले हुए न दिखे जबकि अपनी कहानियों, उपन्यासों तथा संस्मरणों में लगातार बदलते रहे।

फोन पर मुलाकात का समय निश्चित हो जाने के बाद भी कुबेर दत्त जी से न मिल पाना मेरे लिए काफी कष्टकर रहा। इसीलिए मैने राजेन्द्र जी से समय नहीं लिया और अपनी कहानी का प्रथम श्रोता बनाने की चाह लिए उनके कार्यालय में अचानक उपस्थित हो गया। जब मैं उनके सामने पहुंचा राजेन्द्र जी अपने लोगों से घिरे थे, मुझे उन्हें प्रथम श्रोता बनाने की चाह तथा गप्पें मारने की आकांक्षा चरितार्थ होती जान पड़ी। औपचारिक परिचय के बाद मैं अधिकृत रूप से उनके सामने की कुर्सी पर बैठ गया.... अन्य बातों के अलावा उन्होंने मुझसे गंभीरता से पूछा-

‘आप हंस से नाराज हैं क्या ?’

‘नहीं हुजूर, मेरी ऐसी हैसियत नहीं जो हंस से नाराज होऊं, मुझे कोई शर्मनाक कहानी नहीं बनना’ तुरंत छलके इस उत्तर को जाने कैसे मैं चबा गया- धीरे से कहा... ‘नहीं तो।’

चलने के कुछ पूर्व राजेन्द्र जी ने मुझसे कहा।

‘शिवेन्द्र जी किसी पर्सनालिटी पर लिखिए, चरित्र उभारिए, उस पर फोकस

कीजिए।’

एक तरफ असंतोष का कोना, दूसरी तरफ सुकुमार आत्मीयता, मुझसे कुछ कर गुजरवाने की चाहत। वैचारिक भिड़ंत ऐसी कि हंगामा खड़ा हो जाए, सब कुछ पर्दे के बाहर।

‘आखिर कैसा है यह आदमी?’ सवाल मन में उभरा- फिर मैंने पाया कि हंस कार्यालय की वस्तुएं मुझमें समाई जा रही हैं-पुरानी कुर्सियां, रंग पेंट छोड़ती आलमारियां, उखड़ी फर्श। आलमारियों में कुलबुलाती कुछ बासी, कुछ ताजी किताबें, कमरे में फैली हुई पुरातात्विक हवाएं, बुढ़ौती का सोमरस पिए सामने संपादक की कुर्सी पर बैठा कोई नौजवान।यह कैसा देहांतरण ?

अचानक मुझे ख्याल आया नामवर जी को दी जाने वाली उस चिट्ठी का, जिसे उनके राबटर््सगंज के रिश्तेदार ने दिया था कि मैं आसमान में शीघ्र से शीघ्र टंग जाऊं। मैंने उस चिट्ठी को न देने का निर्णय लिया। ‘हंस’ कार्यालय से निकलते हुए मुझे लगा कि मुझसे मेरा अपनापा छीना जा रहा है पर मुझे तो निकलना ही था। रिजर्वेशन हो चुका था प्रेम भाई यू.पी. भवन में प्रतीक्षा कर रहे होंगे।

इस तरह दिल्ली से मैं घर वापस आ गया। मेरे वापस आने के कुछ दिनों बाद वह ‘अनावश्यक विवरण’ तथा ‘एक फोकस की कमी’ वाली कहानी भी ‘हंस’ से वापस लौट आई।

इसी कहानी का श्रोता मैं राजेन्द्र जी को बनाना चाहता था ताकि इसकी निकृष्ट खामियों पर बातें हो सके, जब ऐसा संभव न हो पाया तब उन्हें उक्त कहानी बिना वापसी लिफाफा के थमा दिया था।

अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार और आत्महन्ता दिल्ली की उपलब्धियां, दोनों को देखने, समझने की दृष्टि शायद मेरे पास नहीं है, यदि होती तो अटल सरकार पर इठलाता और दिल्ली पर रीझता। नए किस्म का उगता उत्तर आधुनिक राजनीतिक सौंदर्यशास्त्र अपने अंतर्विरोधों तथा विकृतियों के कारण घ्वस्त हो चुका है। ऐसे में हे कथाकार! स्वप्नदर्शी, निरीह आशावादी-आओ! गेहूं से भूसा अलगियाएं। दोनों से बाते करें। बातों में दानें भरें, दानांें में बातें भरें और भूसा छोड़ दे, हवा, पानी, मौसम के जनतंत्र में। मैं क्या कर सकता हूं यदि नामवर जी के नाम के पत्र के एक-एक अक्षर गोबर-माटी, कीचड़ के गांव में मेरे साथ भटक रहे हैं।

हे कथाकार! अपनी कथाओं से पूछ लो, वे जानती हैं कि तुम कथाकार बने रहने का अभिनय करते हो। तुम्हारे सारे ‘डाईंग डिक्लेरेशन’ जाने क्यों भोथरे होते जा रहे हैं।
अक्षर पर्व सितम्बर 1999

उपकरण

तो वह एक खूबसूरत जगह थी जितनी कि कोई जगह खूबसूरत हो सकती है। जगह चाहर दीवारी से घिरी थी। चाहरदिवारियों की वहां लम्बी कतार थी। कतार को तोड़ने वाले कई-कई गेट थे। गेट के बगल में लगभग सभी जगहों पर गेट के भीतर बने खूबसूरत आवासों में बसने वालों के नाम और पद लिखे थे जो साबित करते थे कि यह कालोनीनुमा जगह प्रोफेसरों व लेक्चररों की है जिन्हें सामान्यतया बुद्धिवाला या संक्षेप में ज्ञान का भंडार माना व समझा जाता है।

वे तीन थे, तीनों हम उम्र दिखते थे पर शक्ल भिन्न-भिन्न थी। उनमें पहला मोटा व थुल-थुल था उसका चेहरा किसी गोल कद्दू की तरह था। फूला हुआ। होठ पतले थे जो लड़की की आवाज में बोलता था। दूसरा सामान्य था, न मोटा न पतला और एक दम काला। नाक गोल, होठ मोटा तथा आंखें भीतर की तरफ रास्ता बनाती और तीसरा शहर तथा देहात का जुड़वा उत्पाद जैसा था। उसकी शक्ल भी सामान्य थी। उसकी सामान्य शक्ल में इसके अलावा कुछ उल्लेेखनीय नहीं था।

वह जो मोटा व थुल-थुल था, वह एक कनस्तर लिये हुआ था और ऐसे चल रहा था मानो कनस्तर बजाकर कुछ घोषणायें करने वाला हो। वह जो भीतर धंसती आंख वाला एक भरी हुई बोरी लिये था तथा तीसरे के हाथ में भी कुछ दूसरे सामान थे।

जाडे़ का महीना था। सुबह की नरम धूप उन तीनों को अच्छी लग रही थी, सो वे मैडम के. कुमारी पी. एच. डी. , डी. लिट का बंगला ढूढ़ते-ढूढ़ते कहीं किसी पुल पर बैठ जाते तो कहीं खडे़ होकर धूप की नरमी सोखने लगते पर कहीं उन्हें मैडम के. कुमारी का बंगला नजर नहीं आता। जबकि वे तीनों प्रोफेसर कालोनी के चिकनी सड़क पर थे।

प्रोफेसर कालोनी में जो फूलों की सुगन्ध थी उसमें उन तीनों को सुगन्ध कम अनुशासन अधिक समझ आता। अनुशासन इसलिए कि बंगलों में से निकलता हुआ उन्हें कोई न दिखता गांव या इसी शहर का मुहल्ला होता तो जाने कितने अन्दर-बाहर होते और किसी से भी पूछ कर जाना जा सकता था कि मैडम के. कुमारी का बंगला किधर है?

वे उलझन में थे, समय भाग रहा था, आठ बजने वाले थे। उन्हें आठ बजे से लेकर बारह बजे तक मैडम के. कुमारी के बंगले की साफ सफाई व रंगाई पुताई करनी थी जिसके लिए उन्हें विश्वविद्यालय की तरफ से प्रति छात्र प्रतिदिन बीस रूपया हासिल होना था।

उनकी चिन्ता थी एक दिन गया। संभव है मैडम आठ बजे के बाद काम पर न लगायें। आखिर क्या नहीं हो सकता ?
‘बहुत होगा तो एक घंटे का पांच रूपया कट जाएगा और क्या’ यह उन तीनों का सामूहिक विकल्प था जिस पर वे आश्वस्त नहीं थे। विकल्प आश्वस्ति दायक हों कोई गारंटी नहीं- सो वे धुक-धुका रहे थे फिर भी मैडम का बंगला था कि उन्हें नहीं मिल रहा था।

वे बार-बार मैडम के बंगले का नम्बर मिलाते जो कभी थोड़ा ऊपर चला जाता तो कभी नीचे उतर जाता बीच में मैडम के बंगले का नंबर होता जो न मिलता......

कहते हैं मेहनत रंग लाती है सामने ही साफ-साफ चमक रहा था मैडम का बंगला नम्बर चार।

‘साला! यहां छिपा हुआ है टंकी के पीछे’ यह तीनों की देसी प्रतिक्रिया थी जिसमें उनकी परेशानियों का लस-लस घोल था एक दम घुला हुआ।

समय आठ से ऊपर चढ़ गया था, बंगले पर सूरज की पतली धूप थी जो टंकी की ऊंचाई से बचकर आ रही थी। बंगले के गेट के ठीक बगल में घंटी का स्वीच था। मोटे वाले लड़के ने स्वीच दबाया उन तीनों ने महसूस किया कि बंगले के भीतर घंटी घुन-घुना रही है। गेट के बाहर से साफ-साफ दिख दिख रहा था कि बंगले के बरामदे वाला गेट खुला हुआ है जो इस बात की सूचना था मैडम कहीं न कहीं भीतर हांेगी।

मैडम भीतर ही थीं वे तीनों खुला फाटक देख रहे थे कि ज्यों ही मैडम निकलेंगी फाटक का खुलना ढंक जाएगा। यही हुआ।खुला फाटक पूरी तरह से ढंक गया और एक महिला आहिस्ते-आहिस्ते बंगले के लान में दाखिल हुई जो गेट तक आईं....

‘क्या है?’

उन तीनों ने मैडम को एक कागज थमाया जो विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से उन्हें दिया गया था...

‘अच्छा आओ, आओ, तुम तीन हो क्या?’

मैडम हूबहू वही थीं जो कागज थाम रही थीं तथा आओ- आओ हुकुम दे रही थीं लेकिन जब उन्होंने क्या है पूछा था उस समय कैसे दूसरी हो गई थी, यह रहस्य उन तीनों की समझ से परे था। क्या है वाली मैडम हन्टर वाली जान पडी थीं।

मैडम एक खूबसूरत महिला थीं पतली, छरहरी ,गोरी, पूरी देह नाप तौल कर बनाई हुई, मैडम चाहे जैसी थीं उन तीनों से क्या मतलब ? लेकिन वह जो शहर व देहात का उत्पाद था, मैडम को देखने के मामले में गंभीर था। अब वह कितना गंभीर था उन दोनों को क्या मालूम? वे तो मस्त-मस्त थे कि नागा नहीं गया..... खास तौर से वह लड़का जिसकी आंखे भीतर की तरफ थीं ,वह कहीं गहरे में काफी मगन था....

मगन रहता भी क्यों नहीं? उसे इन्ही रूपयों का सहारा था। महीने में उसे दस दिन का काम मिल जाता। दो सौ रूपयों में वह महीना काट लेता। कमरे का किराया तथा दूसरे खर्चे निपटा लेता... इसमें एक भी दिन का नागा उसके लिए किसी मुश्किल से कम नहीं...........

वैसे मुश्किलों से दो चार होना उसने जन्म से ही सीख लिया था क्यों कि उसका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जिसकी तीन पीढ़ियां विस्थापित हुई थीं। पहली पीढ़ी तब विस्थापित हुई थी जब अंग्रेज भारत में लड़-खड़ा रहे थे शायद वह जमाना 1857 वाला था- दूसरी बार का विस्थापन पहले वाले विस्थापन से काफी कुछ मिलता-जुलता था। दोनों में उसके खानदान की औरतें ही मुख्य कारण थीं पहले वाले विस्थापन में दादी, परदादी या अठदादी में से किसी एक ने वारेन हेस्टिंग्स की नाक काट ली थी, तो दूसरे वाले विस्थापन में किसी दूसरी ने राजा के बदचलन लड़के की अंतडी, हंसुआ से खींच ली थीं लेकिन तीसरा वाला विस्थापन तो एकदम अलग था जो उसके जनमने के आठ साल बाद हुआ था उस समय वह स्थितियों को समझ सकने की उम्र का था। उसे याद है कि उसके गांव के सारे आदिवासी मार-मार कर भगा दिए गये थे और वहां एक बड़ा सा कारखाना खड़ा कर दिया गया था। यह सब आजादी के बाद की बातें हैं।
सो भीतर धंसी आंख वाला लड़का काफी मगन था ‘चलो नागा नहीं हुआ’। यह तब की बातें हैं जब वह बी.ए. के तीसरे साल में था अब उसके अलावा वे दोनों लड़के कहां हैं उसे नहीं मालूम।
भीतर धंसी आंख वाले लड़के का नाम पहले भले ही घुरहू प्रसाद था अब वह जी. प्रसाद है। यही जी.प्रसाद आज मैडम से मिलने उनके शहर जा रहा है। मैडम रिटायर हो चुकी हैं, बीमार हैं, घर पर पड़ी हुई हैं। अभी ट्रेन आने में देरी है-पूछ-ताछ से मालूम हुआ कि दो घंटे लेट है, हालांकि वह तैयार है...
दो घंटा प्रतीक्षा करना कि ट्रेन आये फिर वह उस पर सवार हो, उसे कुरेदने लगा। कुरेदने में उसके जीवन का वह हिस्सा था जो घने अनुभवों का था कि जिन्दगी महज रोजनामचा नहीं होती। उसे मैडम याद आईं पतली, छरहरी और सुकोमल।
उसने मैडम के आवास पर पूरे दस दिन तक साफ-सफाई का काम किया था...फिर तो वह मैडम के आवास का ही होकर रह गया था। मैडम ने उसके सारे खर्चे का बोझ उठा लिया था। मैडम ने ऐसा क्यों किया उसे आज तक नहीं मालूम...
क्या केवल रातों को कलाओं के सहारे गुजारने के लिए-क्योंकि रात में वे खाली रहतीं - किताबें पढ़तीं या दारू पीतीं... वह मैडम के आवास की सफाई करता, खाना बनाता, खुद खाता, मैडम को खिलाता और उन किताबों को पढ़ता जिनके सहारे वह रोजी-रोजगार हासिल करने का सपना देखता।
मैडम रात में कहीं नहीं रूकतीं। ठीक नौ-दस बजे के बीच आ धमकतीं।

गुडिया जैसी कार गैरेज में खड़ी करतीं और बेडरूम में जाकर पसर जातीं, कभी चाय पीतीं, अक्सर मना कर देतीं। देर रात में खाना खातीं वह भी एक या दो रोटी। उस वक्त जी. प्रसाद उनकी मानसिक अवस्थिति पर कम, उनकी कायिक बेदना पर अधिक घ्यान देता...... वह धीरे से कहता...
मैडम एक रोटी और! यह क्या है ? इसे तो कत्तई नहीं।
हालांकि मैडम काफी उदार थीं फिर भी मध्यम वर्गीय मानसिकता वाली थीं-उन्होंने जी. प्रसाद को कई बार मीठी घुड़की दिया है कि वह उन्हें खाने-पीने के मामले में किसी बुजुर्ग की तरह सलाहित न किया करे-
जाओ पढ़ो , अच्छा नंबर लाओ’
पर एक दिन जी. प्रसाद को जाने क्या हो गया कि उसने मैडम का हाथ पकड़ लिया, दारू की गिलास छीन ली और दारू की बोतल बाहर सड़क पर फेंक दिया। मैडम ने जी. प्रसाद का सचेतन विरोध किया एक तरह से छीना झपटी करने लगीं लेकिन थीं तो एक औरत... जिन्हें कराटे या आज कल की औरतों  की तरह सुरक्षा युद्ध न आता था।
जी. प्रसाद अपने में न था। वह क्या कर रहा था और क्या करना चाहिए इसका अन्तर उसे भूल गया था वह मैडम को अपना आदर्श और अभिभावक मान रहा था, उसका सोचना था कि अच्छी महिलाओं को दारू नहीं पीना चाहिए जब कि उसके घर में मां बहन, पिता, भाभी सभी दारू पीते थे। दारू बनाने में उसकी मां का कोई जबाब न था।
अच्छा हुआ कि जी. .प्रसाद ने मैडम से मार-पीट नहीं की। छीना-झपटी में ही मैडम पलंग पर गिर कर कराहने लगीं... उनके हाथ में मोच आ गई थी।
जी. प्रसाद अवाक व किर्तव्य विमूढ़ वहीं खड़ा था किसी अपराधी माफिक ‘आखिर उसने ऐसा क्यों किया...? वह इस बाबत कुछ सोच पाता कि उसके हांथ मैडम के हाथ सहलाने लगे... मैडम अबोला थीं, केवल कराह रही थीं। तभी जी. प्रसाद को घरेलू इलाज की याद आई। फिर तो वह किचन में था, प्याज पीसता हुआ। उसने हल्दी और प्याज का घोल बनाया, उतना जल्दी जितना बना सकता था। ‘‘गरम-गरम ही लगाना होगा बांह पर...
पलंग पर मैडम छट-पटा रही थीं... और उतान पड़ी थीं। उनकी होश ताजा थी लेकिन दर्द काफी था। वे हाथ उठाने की कोशिश करतीं, जो थोड़ा ऊपर उठता फिर धम्म से गिर जाता। जी. प्रसाद बिना कुछ बोले मैडम के पास गया और पलंग के एक किनारे अजाना सा बैठ कर मैडम के हाथ पर हल्दी का लेप लगाने लगा, उस समय मैडम एक करवट हो गई थीं जिससे उनका मुंह और पूरी धड़ विपरीत दिशा में थी-
‘क्या लगा रहे हो ? यह दर्द भरा सवाल था फिर....
‘लगता है टूट गया है’
नहीं ऐसा नहीं उगंली सीधी हो रही है... कहते हुए जी. प्रसाद ने उंगली को ऐसा घुमाया कि उससे पट की आवाज निकली... जी. प्रसाद को हाथ में मोच
का सन्देह हुआ। मोच तो वह ठीक कर सकता है पर मैडम तो करवट लेटीं हैं। मोच बैठाने के लिए आमने-सामने होना पडे़गा...अब वह स्त्री-पुरूष की अछूत सोच में था वैसे भी किसी परी सरीखी औरत को इतने पास से पहली बार छू और देख रहा था। यद्यपि मैडम हम उम्र नहीं थीं। कम से कम उससे पन्द्रह साल बड़ी थीं पर उस समय वहां उनकी उम्र न थी। वहां रात का सन्नाटा था, सन्नाटे से जुड़ी वर्जनायें थीं जो उसे डरा देतीं पर मोच कैसे ठीक होगा ?
उंगली से जब पट्ट की आवाज निकली थी मैडम चिहंुक गई थीं, शायद ‘बाप रे बाप’ एक धुर देहाती अवसाद उनके मुंह से निकला था...
उसी रात जी. प्रसाद ने मैडम के हाथ का मोच बिठा दिया था फिर हाथ में हल्दी और प्याज का गाढ़ा लेप लगाया था... वह रात जी. प्रसाद के लिए अद्भुत थी... अद्भुत इतनी कि मैडम ने दारू पीना छोड़ दिया। खैर दारू पीना तो उन्होंने उस रात के बाद छोड़ा पर उस रात जी. प्रसाद को पक्का विश्वास हो गया कि वह भी एक आदमी है कम से कम इन चमकदारों के बीच जिनके चेहरों की चमक, दूसरों के चेहरों की चमक छीन लेती हैं।
लेकिन जी. प्रसाद के चेहरे की चमक एम.. ए. पास करने तक लगातार बनी रही। मैडम उसके चेहरे का ध्यान रखतीं, मौके-गर मौके उसे साफ करतीं, सहलातीं। बदले में जी. प्रसाद मैडम को विगत भूल जाने के लिए प्रेरित करता....
‘मैडम भूल जाइए तलाक तो होते रहते हैं’
इसके आगे जी.प्रसाद कुछ न कहता जबकि कहना चाहता दूसरी शादी कर लीजिए, चालीस   पैतालिस की कोई उम्र होती है क्या, पर वह न कह पाता... केवल कहता ‘भूल जाइए..’
मैडम भूलने व याद करने के बाबत कुछ विशेष न बतातीं। शायद इसका कारण उनका चिड़-चिड़ापन हो। उनका मायका था, वहां से उन्होंने अपना नाता तोड लिया था, उनका कोई साथी दोस्त न था। एक सहेली थी जो जब.. तब मैडम के पास आती थी। उसका आना गदराये बसन्त का आना होता था.. दूसरे दिन जी. प्रसाद उन्हें चमकता हुआ पाता, उनका चेहरा मादा रहस्यों से सना होता वह सिर्फ अनुमान करता कहीं मैडम समलैंगिक तो नहीं पर इस अनुमान के लिए उसके पास मजबूत साक्ष्य न होते सिवाय कुछ होस्टाइल साक्ष्यों के जो तब उपस्थित होते जब खाने-पीने का दौर शुरू होता। वह समय कामों को जल्दी निपटाने वाला होता। मैडम, जी. प्रसाद को सहेजती.ं..
‘तुम भी जल्दी खा पीकर जाओ पढ़ो। एक्जाम हो रहे हैं न। ’
वह खाना जल्दी निपटाता और अपने कमरे की तरफ चला जाता। जो बंगले के बाहर था, गैरेज और मैडम के कमरे से सटा हुआ। मैडम के कमरे में एक
रोशनदान था जो हरदम आधा खुला रहता जिसके ऊपर जाली थी। जी. प्रसाद अपने अनुमानों को रोशनदान पर टांग देता।
वह शायद ऐसा न करता पर मैडम की समलैंगिक्कता वाला उसका अनुमान प्रमाणित कैसे होता.? वह उस समय नींद तथा पढ़ाई से अलग हो जाता तथा खुद को न समझा पाता कि मैडम समलैंगिक होंगी भी तो उससे क्या? उसे तो सोना या पढ़ना चाहिए...। लेकिन वह रोशन दान ताकता उसमें से छन कर आने वाली खुसुर-फुसुर दुहता। खुसुर-फुसुर में समलैंगिकता का दूध होता फिर तो वह खुद चिप-चिपा हो जाता। लेकिन अब तो वह भी नहीं आती... हो सकता है मैडम ने उसे भुला दिया हो। इसके अलावा एक कारण यह भी था कि मैडम की उस विशेष सहेली ने केन्द्र के विशेष प्रभाव व दब-दबे वाले एक मंत्री से विवाह कर लिया था और दिल्ली रहने लगी थी... अब उसे मैडम की क्या जरूरत थी?
भला हो उस बेचारी का, उसी ने तो जी. प्रसाद को नौकरी दिलवाया था। एम..ए. पासों को कौन पूछता है। मैडम उसके पास गई थीं, साथ में जी. प्रसाद का सारा बायोडाटा था। तीन-चार महीने बाद जी.प्रसाद को एक डिग्री कालेज में लेक्चरर के पद के लिए साक्षात्कार हेतु बुलाया गया था। मैडम ने अपनी सहेली को फोन से दुबारा याद दिलाया था... सहेली ने सकारात्मक उत्तर दिया था...
इस प्रकार जी. प्रसाद इतिहास का लेक्चरर बन गया था। यह जी. प्रसाद के लिए बहुत बड़ा हासिल था लेकिन मैडम चाहती थीं कि वह इसी विश्वविद्यालय या शहर के किसी डिग्री कालेज में रहे जो कभी संभव नहीं हो पाया...
जब जी. प्रसाद एम. ए. फाईनल में था तभी उसकी शादी हो गई थी, विवाह बाद वह मैडम के पास आया उस समय एक अन्तरंग मौके पर मैडम ने उससे वचन लिया था कि ‘तुम तलाक नही दोगे’ उसने दबे मन से ‘हां’ कहा था, ‘‘नहीं मुझे तलाक नहीं देना।’’
सोचना कोई प्रतीक्षा तो नहीं जिसका एक-एक पल सांस टांगे होता है। जी.प्रसाद का सोचना गुजर गया। अब उसे स्टेशन जाना चाहिए... घर में कोई कहने वाला भी तो नहीं कि जाओ ट्रेन का समय हो चुका है।
कहता भी कौन ? बिहुअती तो तीसरे साल ही भाग गई, किसी ठीकेदार के साथ सालों गुजर गये वह कहानी बन गई फिर दूसरी शादी का सवाल ही कहां था, कोई हो भी तो कृपा करने वाली। एक थीं, मैडम! जो कुुंवारी थी उसके कालेज में हिन्दी पढ़ती थी तथा नामी कथाकार थीं... उनसे थोड़ा संपर्क बढ़ा तो लगा कि उसका अकेला पन कट जाएगा लेकिन यह उसका भ्रम था। कथाकार मैडम ने साफ उलाहा था...
‘तुम बच्चे तो नहीं। शादी! काहे के लिए शादी? क्या अपना रूप गढ़ना चाहते हो ? क्या करोगे अपनी प्रतिकृति उपजा कर। कम से कम मुझसे तो तुम यह
उम्मीद न करो। मैं तुम्हारी इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए खाली नहीं’.समझे आदि मानव। कथाकार मैडम उसे प्यार से आदि मानव ही संबोधित करतीं, खास तौर से अन्तरंग अवसरों पर।
पहली बार जी. प्रसाद को मादा जिस्म की छिः छिः ने कथाकार मैडम से काफी दूर कर दिया था। वैसे भी कथाकार मैडम दूसरे महीने ही किसी आलोचक के साथ विदेश चली गईं थीं जहां उन्हें पढ़ने, पढ़ाने की नौकरी मिली थी।अब जी. प्रसाद अकेला था। उसका संपर्क पहले वाली मैडम से भी छूट चुका था... आखिर वह मैडम को क्या बताता कि उसकी पत्नी भाग गई किसी ठीकेदार के साथ। मारे शर्म वह मैडम का हाल चाल न लेता। किसी तरह रहता और तनहा रहने की यातनाओं को झेलता...टेªन पर सवार होते ही वह परेशान, परेशान हो गया...
‘आखिर मैडम ने उसे क्यों बुलवाया?’ इस सवाल का उसके पास कोई उत्तर न था, जब कि वह बार बार संभावित उत्तरों में से कुछ बीनता पर वे सब सूखे दीखते। फिर वह इस कोशिश में सफल हो गया कि अब क्या सोचना... वह मैडम के यहां जब जा ही रहा है। फिर भी उसका सोचना बन्द न हुआ, लगता है बिमारी के कारण ही बुलवाया होगा... क्योंकि ऐसे समय कोई अपना ही देख रेख, सेवा टहल कर सकता हैतो इसका मतलब मैडम भूली नहीं हैं यानि वह उनके लिए सहवास का उपकरण मात्र नहीं था। ऐसा सोचते ही उसका चेहरा बसन्त बसन्त हो गया। यह गर्व से परिपूर्ण रहस्यमयी खुशी थी... फिर तो उसे महज ट्रेन पर सवार होना ही ध्यान में रह गया...
दूसरे दिन वह मैडम के नये आवास पर पहुंचा। मैडम का आवास शहर के दक्षिणी सिरे पर था जो आधुनिक तरीके से किसी खूबसूरत कागद की गुड़िया माफिक खड़ा था। यह जगह ईमारतों की किसी नुमाइश जैसी लग रही थी। वह सबसे पहले उस गेट पर खड़ा हुआ जहां आमतौर से घंटी का स्वीच हुआ करता है उसे लगा कि समय की पुनरावृत्ति हो रही है, इस बार फिर कोई दिब्य महिला आएगी और बेरूखी से सवाल दागेगी ‘क्या है’?
लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। गेट का फाटक किसी अजनबी महिला ने खोला जो नौकरानी जैसा दीख रही थी। उसने थोड़ा जबाब सवाल किया फिर वह उस जगह पर था जहां मैडम थीं... पर मैडम बिमार तो नहीं......
साठ के बाद भी आकर्षक दिख रही थीं हालांकि अब वह बात न थी जो पहले थी। अब मैडम के चेहरे पर उम्र ढ़लने के बिगड़ैल रेखा-चित्र थे, जिनमें उनके एकाकी जीवन की रेखाएं काफी सघन थीं...
‘आओ ! आओ। मुझे यकीन था, आओगे जरूर’ यह आत्मीयता से छल-छलाता खुला प्रस्ताव था जिसे हंसते हुए मैडम ने उससे कहा...

वह मैडम की आकर्षक हंसी मंे बीते दिनों की वापसी सूंघने लगा... दर असल यह वापसी ही थी। वापसी इसलिए कि मैडम बिमार नहीं थीं फिर बिमारी के बहाने उसे बुलाने की क्या जरूरत? आखिर मैडम ने उसे किस लिए बुलवाया, वह भी एक दम आवश्यक... अब वह मैडम की योजना का हिस्सा था जो पूरी तरह से रहस्य मय था...

‘ तो मैडम कोई काम ’

‘ काम! हां है। बहुत जरूरी , मुझे यकीन है तुम निराश नहीं करोगे....’

आदेश करें मैडम।

‘ आदेश नहीं, अनुरोध और प्रार्थना है, जिसे शायद तुम स्वीकार न करो....’

ऐसा नहीं है मैडम! आप आदेश तो करें...

‘ मैं अकेली नहीं रह सकती , मुझे तुम्हारा साथ चाहिए...,

मैडम अपनी बात पूरी भी न कर पाई थीं कि नौकरानी ने घर जाने के लिए उनसे छुट्टी मांगा। छुट्टी लेकर नौकरानी बंगले से बाहर निकल गई। अब बंगला खाली था जहां सिर्फ मैडम और जी.प्रसाद ही थे। जी. प्रसाद असमंजस में था , उसे समझ नहीं आ रहा था कि मैडम चाह क्या रही हैं- साथ चाहने का आशय क्या हो सकता है आखिर ?

इसके पहले कि जी. प्रसाद आशय समझ पाता , मैडम उठीं, बंगले के बाहर जाकर उन्होंने गेट लाक किया फिर वह बैठकनुमा कमरा भी जहां जी. प्रसाद बैठा था... उन्होंने दरवाजा पूरी तरह बन्द होने की एक बार जांच भी किया...‘दरवाजा बन्द था...’
फिर.........जो मैडम ने किया वह जी. प्रसाद के लिए अप्रत्याशित था। वह कभी सोच नहीं सकता था कि साठ पार की कोई औरत अपने शरीर के सारे कपडे़ फाड़ देगी, निर्वस्त्र हो जाएगी। निर्बस्त्र हो जाने के बाद ऐसा कुछ करने लगेगी जिसे कोई पागल तक नहीं करेगा। मैडम किसी हिंसक पशु की तरह जी. प्रसाद पर टूट पड़ीं - जी. प्रसाद हत प्रभ, अपना नुचना, चुथना देखता रहा।
अब जी. प्रसाद पूरी तरह नंगा था अवाक और हत प्रभ। वह कभी छत देखता, कभी दीवारें, कभी मैडम को जिनके मुंह से झाग निकल रहे थे तथा वे बुरी तरह हांफ रही थीं। तो क्या मैडम पागल हो गईं ? या उनका यही  स्वभाव ही बन गया है।
नहीं... मैडम उसे आज भी लैंगिक उपकरण समझ रहीं हैं।
श्रद्धांजलि

 निहायत पिछड़े प्रदेश के एक निहायत पिछडे़ जिले का एक कस्बा, आबादी यही कोई तीस-चालीस हजार, एक नगर पालिका समेत कई एक छोटे-बड़े किराए के मकानों मे चलने वाले दफ्तर, सड़कें इतनी कमीनी कि किसी जिलाधिकारी की कार में भी जर्क लग जाय, गलियां, जनाब! रात में कुत्तों के आरामगाह और जो चार-पांच फीट चौड़ी हुईं तो उनपर स्थानीय दादाओं की गाय-भैंसों का कब्जा, दूकानें कुछ चमचमाती, कुछ रोतीं और कुछ नए चुनाव के इन्तजार में परेशान, इतना ही नहीं सिर्फ दो-तीन शराब की दूकानें , उस पर तुर्रा यह कि यह कस्बा जिला मुख्यालय होने लायक है, वह तो सरकार की अनुभवी निगाहों की कृपा है जो यह कस्बा जिला मुख्यालय नहीं बना। चार-चार मुख्यमंत्रियों का कृपा पात्र यह कस्बा, किन्हीं न किन्हीं बारीकियों को ढूंढ़ ही लेता है, आए दिन बदलती रहने वाली सरकारों के करिश्में में, वरना  कोई दूसरा संवेदनशील और सचेत कस्बा होता तो निश्चित ही मुख्यालय का मामला दिल्ली सरकार के विचाराधीन होता, और फौज बुला ली गई होती, कइयों को गुण्ड़ा एक्ट , कुछ को टाडा या किन्ही और आपराधिक धाराओं में गिरफ्तार कर लिया गया होता, फिर... तो श्मशानी शान्ति छा जाती पूरे कस्बा-परिक्षेत्र में, जो सरकार के लिए आवश्यक हुआ करता है। इसका मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि इस कस्बे को कई-कई जयन्तियां मनाने का अनुभव नहीं है या कि स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस का।

इसी महान अनुभव की परंपरा में एक सौ पच्चीसवीं वर्षगांठ महात्मा गांधी जी की, मनाये जाने का, सर्वत्र उत्साह देखा जा रहा है कस्बे मंे। कई-कई आयोजनाओं की घोषणाएं हो चुकी हैं। साहित्यकारों-रचनाकारों का खेमा राजनीतिज्ञों और सरकारी, अधिकारियों के खेमों से साफ-साफ बंटा हुआ दीखने लगा है आजकल। एक छोटा सा कस्बा , और अलग-अलग कार्यक्रम हालांकि अच्छा नहीं होगा पर खेमा बंट गया सो बंट गया। जब से गांधी विवादास्पद हो गये हैं तबसे अधिकारियों की दिलचस्पी भी बहुत ज्यादा नहीं रह गई है उनमें, किन्तु औपचारिकता की औपचारिकता का निर्वाह करना ही होगा। कार्यक्रमों के श्रोता भी वैसे तो उंगलियों पर गिने-चुने लोग हैं, पर ऐसा नहीं कि श्रोता बिना कोई कार्यक्रम फेल हो जाय क्योंकि न्यूनतम दर्जे पर स्वल्प आहार या नाश्ता तो निश्चित ही, पारंपरिक ढंग से मिल जाया करता है। इन्हीं कुछ अच्छे और लाभप्रद सपनों में खोया यह कस्बा भड़क उठा एक दिन, चर्चा होने लगी कि ‘देखा
आपने, मानव संसाधन मंत्रालय तथा अन्य जगहों से कितना रूपया गांधी के

नाम पर आया, पर हुआ क्या, दो-चार बाहरी और कुछ स्थानीय बोल लिए, हो गया सेमिनार’। सामान्य से दिखने वाले किसी पार्टी से जुड़े एक नेता ने समझाया बद्रीनाथ जी, पंफलेट न छपवाइये, कौन नहीं कमा रहा है। इस देश में कमाई के नाम पर यही बचा है न। फिर भी बद्रीनाथ का गुस्सा कम नहीं हुआ, कस्बे में घूम-घूम कर गांधी जी के एक सौ पच्चीसवीं वर्षगांठ पर हुए सेमिनार की मुखालिफत करते रहे , पूरा कस्बा इस संभावित विरोध पर चर्चा करने में मग्न हो गया।
हर चर्चा थोडे़-बहुत दिनों में स्वतः चर्चा के काबिल नहीं रह जाती पर इस वर्षगांठ की चर्चा कम न हुई, सेमिनार के आयोजक शशि भैरव का थोड़ा रूआब था, पर्सनालिटी बड़ी हो गई थी, छोटी जगहों में अक्सर ऐसा हो जाता है, अरे जनाब ! मैं बताता हूं, ‘आपलोग जानते हैं न कि यहां साहित्यकारों, राजनीतिज्ञों और अधिकारियों के अलग-अलग कार्यक्रम होने थे, तय यह था कि अधिकारियों का दो अक्टूबर को और दूसरों का इससे पहले। यह दूसरा ही हम लोगों को करना था न। इस कार्यक्रम की जिम्मेदारी मेरे ऊपर डाल दी गई थी मैने सफल आयोजन करके दिखा दिया, कोई आज से लिख-पढ़ रहा हूं क्या ? उस कार्यक्रम का विरोध बद्रीनाथ इसलिए कर रहे हैं कि वे मेरे यहां रूपया मांगने आये थे, कार्यक्रम कराने के आधार पर। मैं रूपया कहां से देता, बस हो गए खफा, और खफा ही चल भी रहे हैं आजकल
शशि भैरव के इस दमदार बयान का असर हुआ, कस्बा दूसरी तरफ मुड़ गया, और राजनीतिज्ञों के चरित्र पर घृणापूर्वक थूकने लगा‘साले सब भ्रष्ट हैं, क्या यह कस्बा, क्या दिल्ली। भला बताओ, शशि भैरव कहां से रूपया देंगे बद्रीनाथ को।
शशि भैरव को कौन नहीं जानता, कई-कई किताबें लिख चुके हैं, छपा चुके हैं, दूर-दूर तक उनका संपर्क है ।’
बद्रीनाथ राजनीति में दरी बिछाने से लेकर मंच पर बोल सकने तक की कला सीख चुके हैं, हालांकि इनके खर्चे औसत खर्चों से ऊपर चढ़े हैं फिर भी कम लोग ही जानते होंगे कि बद्रीनाथ का खर्चा-पानी कैसे चलता है? बद्रीनाथ की स्कूटर जब तिराहे के पास लल्लू पान वाले के यहां रूकी तभी लल्लू समझ गया कि बद्रीनाथ एक बीड़ा खायेंगे और कम से कम एक चौखड़ा स्कूटर में रखेंगे। बद्रीनाथ ने किया भी वही, पर चौखड़ा नहीं था जो वह उन्हें देता, कहने लगा ‘अरे एक मिनट साहब, लगाय देत हई।’ बिगड़ गये बद्रीनाथ, ‘क्या बकते हो, यहां जान पर आई है, हमारे राष्ट्रीय मंत्री आ चुके हैं डाक बंगले पर और हम यहीं हैं, तुम्हें एक मिनट चाही। लल्लू भी बैठक बाज था, ‘का साहब कुछ जुगाड़-पानी बा का, हमहूं के दिअउत चार-पांच हजार। हमतऽ जीवन भर आप लोगन कऽ सेवा करय
बदे बनऽल हईनऽ।’ उसी वक्त किसी पार्टी के जिलाध्यक्ष शंकर सिंह भी आ गए , उन्होंने लल्लू की बात सुन ली थी। बद्रीनाथ को शायद शशि भैरव के आक्षेपों की जानकारी हो चुकी थीं, लल्लू पर बिगड़ गए , भला-बुरा बघारने लगे। लल्लू कम न था। उसने साफ-साफ कह दिया शशि भैरव से उनके रूपया मांगने की बात। शंकर सिंह ने भी ताइत कर दिया। अब बौखला गए बद्रीनाथ... सब बताऊंगा, मेरे पास सब लिखा-पढ़ी में है, कितना रूपया कहां से शशि भैरव को मिला और कार्यक्रम में कितना कहां खर्च हुआ, यह सब तो मैंने ही किया था कहते हुए झटके से स्टार्ट किया बद्रीनाथ ने स्कूटर और फुर्र हो गए।

शंकर सिंह और लल्लू की आपस में बहुत बातें हुई, इस हद तक कि पार्टी-फार्टी में नहीं रहना चाहिए, हम विकास के नाम पर अविकसित हो रहे हैं, सभ्य के नाम पर असभ्य हो रहे हैं- जानते हैं सिंह साहब! ‘हमारा भतीजवा भी तो शशि भैरव के यहां ही पढ़ता-लिखता है न, कह रहा था , चाचा बात सही है, लगभग पचास हजार रूपया आया है बाहर से। बहुत पटती थी शशि भैरव और बद्रीनाथ में , रात-रात भर लोग जगे रहते थे शशि भैरव के यहां , झटके से सुना था एक दिन, कुछ नहीं बचेगा तो तीस हजार बच ही जाएगा। हिस्सा बराबर-बराबर, दस-दस अपने लोगों का और दस रूपया दिलाने वालों का।’ तब तक मैं चाय लेकर कमरे में आ गया था, वे लोग चुप हो गए थे।‘अंय’ चिहुंक गए शंकर सिंह, तभी तो बद्रीनथवा हल्ला कर रहा है। क्यों लल्लू यह सब गांधी बाबा के नाम पर हो रहा है, गांधी को याद करने के लिए।

शशि भैरव ने सेमिनार के माध्यम से कमाई किया है और इस कमाई की योजना बद्रीनाथ ने बनाई थी, बराबर-बराबर लाभ लेने की गरज से, महीनों गुजर गया, पर यह साबित न हो सका कि सच क्या है ? सच परदे में ही नाचता रहा, देश में होने वाले तमाम घोटालों की तरह।
अचानक कस्बे में एक दिन चर्चा चल पड़ी कि पंडित बद्रीनाथ का श्राप लगा और शशि भैरव लाइलाज बीमारी में पड़ गए, घोटाले की शर्मनाक बीमारी के अलावा। कुछ ही दिनों बाद पूरा कस्बा शोकाकुल हो उठा, जगह-जगह शोक सभाएं होने लगीं और श्रद्धांजलियों का दौर चल पड़ा शशि भैरव के निमित्त। शशि भैरव की मृत्यु कैंसर की वजह से हो गई। घर की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं थी। किसी तरह जोड़-तोड़ करके घर की गाड़ी चल रही थी। कुछ सुदृढ़ लोगों ने घर जाकर उनकी पत्नी को सहयोग करने का आश्वासन भी दिया।
पारंपरिक ढंग से शशि भैरव का क्रिया कर्म निपट गया, नगर का भरपूर सहयोग मिला इस आयोजन में। बच्चे छोटे-छोटे थे, उनकी परवरिश की चिन्ता देखी गई लोगों में। शशि भैरव की साहित्य, संस्कृति एवं कला की सेवा करने वाली संस्था के अध्यक्ष महोदय भी इस अवसर पर पधारे थे,
काफी शोकातुर होकर लौटे थे, अपने शहर, शीघ्र ही संस्था के कार्य हेतु वापस लौटने का आश्वासन दिया था, तथा शशि भैरव के परिवार को आर्थिक सहायता राशि जुटाने के लिए भी। इधर शहर के उत्साही लोगों ने भी सहायता कार्य में हाथ बंटाया। औसत रूप का संग्रह भी हुआ, इसी बीच संस्था के अध्यक्ष जी का आगमन भी हो गया था। बच्चों ने उन्हें संस्था के सभी कागज पत्रों को दे दिया। संस्था के रजिस्टेªशन का कागज तथा बैंक के खाते का पास-बुक, संस्था की कार्यवाही पत्रावली आदि लेकर अध्यक्ष जी बैंक गए, वहां बैंक के लोगों ने उन्हें बताया कि मानव संसाधन मंत्रालय के यहां से चेक क्लीयर होकर आ गया है, कुल पचास हजार रूपये आए हैं। आप हस्ताक्षर करके रूपया ले जाइए, हमारे यहां स्पेसीमेन हस्ताक्षर सिर्फ दो ही हैं आपके और मंत्री शशि भैरव के।

अक्ष्यक्ष जी ने रूपया निकासी का चेक भर दिया और अपना हस्ताक्षर बना दिया, हस्ताक्षर स्पेसीमेन से नहीं मिला। कई दस्तखत बनवाया गया उनसे पर स्पेसीमेन से मिलान नहीं हो पाया। बैंक मैनेजर को बड़ा ताजुब हुआ कि रजिस्टेªशन का जो दस्ताबेज हमारे यहां शशि भैरव जी ने जमा किया है उसमें आपका हस्ताक्षर है, उन्होंने स्पेसीमेन और रजिस्टेªश्न दोनों दिखाया। अध्यक्ष जी ने ईमानदारी से कबूल कर लिया कि ये मेरे हस्ताक्षर नहीं हैं।
बैंक मैनेजर की हमदर्दी शशि भैरव से थी, वे चाहते थे कि रजिस्टेªशन के कागज पर जितने हस्ताक्षर हैं , उनमें से किसी दो का हस्ताक्षर ही मिल जाय तो हम किसी प्रकार से यह रूपया निकाल देगें ताकि शशि भैरव के परिवार की सहायता की जा सके। पर अफसोस यह कि, समय विपरीत था, शशि भैरव की संस्था के जो जो लोग बाहरी थे उन्हें तत्काल बुलाया जाना संभव नहीं था पर जो कुछ कस्बे के थे या समीपवर्ती जिलों के थे उन्हें बुलाया गया, पर दस्तखत किसी के नहीं मिले। बैंक मेैनेजर का व्यक्तिगत प्रयास भी असफल हुआ कायदों के चक्कर में। दो लोग बाहरी थे उन्हें भी कुछ दिन में बुलवा लिया अध्यक्ष जी ने पर उनके भी दस्तखत नहीं मिले। मानव संसाधन का वह पचास हजार तथा कुछेक अन्य हजार रूपया बैंक से निकलने के लिए छटपटा रहा था किन्तु हो क्या, कायदा-कानून भी तो कोई चीज है। कोई रूपया जमा तो करना था नहीं चाहे जिस किसी ने जमा कर दिया, चाहे जिस किसी खाते में, कोई पूछने वाला नहीं। यह रूपया निकासी का मामला था पता नहीं संस्था कैसी हो, फर्जी या और कुछ। रूपया लाख प्रयास करने के बाद भी नहीं निकल पाया।

बैंक के ऊपर के अधिकारियों ने भी रूपया निकालना संभव नहीं बताया। साबित यही हुआ कि संस्था के लगभग सभी सदस्यों के हस्ताक्षर फर्जी थे, जिन्हें शायद शशि भैरव ने ही बनाया हो, वगैरह-वगैरह। अब बेचारे शशि भैरव को क्या पता था कि समय उनकी कौन सी कहानी लिख रहा। जिसके वे खुद पात्र होंगे और इस तरह की घटना घटेगी। घटना जो
घटनी थी घट गई। अन्ततः बैंक से रूपया नहीं निकल पाया।

कस्बे में शशि भैरव के कार्यों की समीक्षा में बैंक से रूपया न निकल सकने का एक अनिवार्य तत्व गंभीरता से जुड़ गया। मान लिया गया कि स्वयंसेवी संस्था के लोगों का यही काम है। अपने लोगों का नाम संस्थाओं में गिनाने से लेकर घर तक को संग्रहालय, पुस्तकालय में साबित करने-करवाने का काम ये लोग बखूबी किया करते है। बहरहाल इस छोटे से कस्बे के लिए यह बहुत बड़ी घटना थी, इस अर्थ में भी कि जो कुछ आर्थिक सहायता हो सकने की संभावना शशि भैरव के बाल-बच्चों की खातिर थी वह भी लगभग समाप्त हो गई। शशि भैरव की पत्नी ने भी काफी दौड़ धूप किया- उन्हें भी कागजों पर फर्जी दस्तखत करने की बात मालूम हुई ‘लगता है ये लिखने-पढ़ने वाले लोग सभी फर्जिये करते हैं का’ थक हारकर बैठ गई थीं शशि भैरव की पत्नी।
कुछ दिन बाद शशि भैरव के घर बद्रीनाथ आए। शशि भैरव की पत्नी को प्रणाम करते हुए बोले- ‘ भाभी आप यदि बैंक मैनेजर से बात कर लंे तो रूपया निकल सकता है। उन्होंने पूछा- कैसे ? असल में संस्था के रजिस्टेªशन वाले कागज पर कुछ दस्तखत मैने बनाया था और कुछ शशि भैरव ने। जो मैने बनाया था जिन लोगों का वे दस्तखत तो मिल ही जाएंगे। कुछ मैनेजर ले-देकर रूपया निकाल देगा। यह रूपया तो मिल ही जायेगा साथ ही शशि भैरव जी के नाम पर भी तो श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ न कुछ सरकार देगी ही। इस प्रकार संस्था भी बची रहेगी और रूपया भी निकल जायेगा, फिर पूरा कागज बदल दिया जायगा।’
भाभी जी गंभीर होकर बद्रीनाथ की तरफ ताकने लगीं... अच्छा।
बद्रीनाथ की यह अश्रुपूरित श्रंद्धाजलि शशि भैरव की पत्नी को काफी गंभीर जान पड़ी।
प्रभा-रश्मि दिसम्बर 1996

 






 

 

 

 

 

 

 

 

 

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