डफली बजाए जा कहानी संग्रह ki kahaniyan
dafli bajaye jaa
हम तुम्हें खोना नहीं चाहते कामरेड
‘जयकरन पाडे़ को छोड़कर तुमने अच्छा नहीं किया कामरेड ! सेक्रेटरिएट की बैठक में क्या जबाब दिया जाएगा ?‘ कहते हुए चुप हो गए थे कॉमरेड दŸा , और सतीश का चेहरा बुझ सा गया था ,
हां गलती तो हो गई है पर करता क्या ? वह बेचारी औरत पैर पर गिर पड़ी थी, ‘भईया‘, ‘भईया ‘ कह कर देह से लिपट गई थी, सामने पेड़ में बंधा था उसका पति , उसके ससुर को मार ही दिया गया था, पूरी बखरी धंू-धूं कर जल रही थी, सामने दो-दो लाशें झुकी गर्दनें, पेड़ में लटकी हुई, गोलियों से छलनी हुआ सीना, हमारा लक्ष्य पूरा हो गया था, केवल जयकरन ही तो छूट गया....... क्या फर्क पड़ जाएगा इससे ?‘
कामरेड सतीश आगे कुछ नहीं बोल पाया, एक अंतहीन उदासी में लीन हो गया,
कामरेड सतीश का जबाब अच्छा नहीं लगा कामरेड़ प्रभुदŸा को , पर होता भी क्या ? जयकरन को तो छोड़ ही दिया गया था, वर्ग -दुश्मन सफाया अभियान के लिए भविष्य में घातक हो सकता था जयकरन, इतिहास की वैज्ञानिक व्याखांए भी अवांक्षनीय के विनाश और वांक्षनीय की प्राप्ति की पक्षधर हैं, बुद्धि और बल सभी स्तर पर, बहुत ही संकटपूर्ण स्थिति थी कामरेड प्रभुदत्त के समक्ष ,कामरेड प्रभुदत्त अभियान के मुखिया हैं, सारी जबाब देही इनके ऊपर है, पर सतीश के साहस ; संकल्प ; और समर्पण से इतना प्रभावित कि उसके विरूद्ध कुछ निर्णय लेना, इस अनुशासनहीनता के खिलाफ; अब उनके वश का नही रह गया है, जयकरन का छोडा़ जाना, कई वर्षों से चल रहे अभियान की बहुत ही त्रासद घटना थी, ऐसा कभी सुना नहीं गया था , अभियान में संलग्न तमाम कामरेड, कामरेड सतीश के इस कृत्य से सख्त नाराज हो गए थे, उनमें कामरेड सतीश को लेकर कामरेड प्रभुदत्त के प्रति संदेह के बीज अंकुरित होने लग गए थे, जगह-जगह गोष्ठियां होने लगीं थीं , मार्क्स , एजिंल, लेनिन और माओत्से तुंग की छितराई व्याख्याएं-व्याख्यायित होने लगीं थीं, सवाल था....‘फैसला तो फैसला‘, ‘क्या हमें अपने अभियान की सफलता के लिए भावनाओं, इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखना चाहिए, वहीं भावनाएं , इच्छाएं जो बदचलन समाज की कुप्रवृत्तियां हैं,‘अभियान के एक महत्वपूर्ण कामरेड रवि सक्सेना तो अपना आपा ही खो बैठे थे-
खूब करो वर्ग दुश्मनों की पहचान, और सफाया का काम, लाओ सर्वहारा की तानाशाही, घूम-घूम जलाते रहो घरों को जहां कुछ अपने काम का दीख जाए; उसे छोड़ते जाओ, मार्क्सबाद....मार्क्स तो नहीं रहे, उनकी बातें भी मर जाएंगी इसी तरह, मार्क्स को कोई धन-पशु थोडे़ मारेगा,हम लोग ही मार डालेगें, इससे भी बड़ा मजाक और क्या हो सकता है, कि कोई वांक्षित दुश्मन सामने हो और भावनाओं ,उदारताओं, दया तथा कृपा जैसी वाहियात संवेदनाओं के कारण जीवित छोड़ दिया जाए बिना विचार के, कि कल वह क्या करेगा ?
कामरेड रवि घूम-घूम कर संगठन में सबसे इसी तरह कहने लगे थे, मार्क्सबाद की मोटा-मोटी समझ रखने वाले अन्य कामरेड भी उनकी बात से प्रभावित होते जा रहे थे, ‘हां बहुत गलत हुआ‘ यहीं तक संगठन का माहौल रह जाता तो ठीक था, किन्तु कामरेड प्रभुदत्त के बीसों साल के समर्पण, प्रतिबद्धता और संघर्ष को त्याग कर, उन्हें भी सवालों के घेरे में रख लिया गया था-‘आखिर सतीश अब तक छुट्टा सांड़ की तरह क्यों घूम रहा है ? संगठन का नियम एक समान सब पर लागू किया जाना चाहिए और संगठन का नियम ऐसे में किसी को मृत्यु-दान नहीं देता ,‘
ऐसा नहीं था कि , कामरेड प्रभुदत्त को ; संगठन में चल रही कानाफूसी और रवि सक्सेना के षड्यंत्रकारी कार्यों की जानकारी नहीं थी, उन्हें बराबर सूचनाएं प्राप्त हो रही थीं , फिर भी कामरेड सतीश के बारे में चुप ही रहे ,कामरेड प्रभुदत्त। संगठन के हित में सतीश की गलती को भूल जाना ही ठीक था , पर संगठन के लोग तो सतीश को दंडित किया जाना आवश्यक समझते थे। दंड़ देने की परंपरा पुरानी थी संगठन में , कई कामरेडों को इस तरह की गलतियों के कारण गोली से भूना जा चुका था , वे लोग भी समर्पित तथा प्रतिबद्ध लोग हुआ करते थे।
कामरेड प्रभुदत्त ने संगठन के लोगों को अलग-अलग तरीकों से समझाना भी चाहा था , प्रयास भी किया था ; पर सफलता नहीं मिली थी , उन्होंने इसी क्रम में रवि सक्सेना से भी बात की थी ,पर वह तुनक गया था , यह वही रवि सक्सेना है जो कामरेड प्रभुदत्त की विद्धता एवं प्रतिबद्धता की घूम-घूम कर तारीफ किया करता था ,जब कभी कामरेड प्रभुदत्त के क्लासों को वह छोड़ दिया करता था , उसे कोफ्त होती थी, भौतिक द्वंद्ववाद का ज्ञान इन क्लासों में जाने से ही उसे हासिल हुआ, पर अब वह प्रभुदत्त को सतीश के मुद्दे पर संवेदनशील, भावुक और प्रतिक्रिया-वादी तथा संशोधनवादी करार दे रहा था, कामरेड प्रभुदत्त किसी भी तरह से सतीश को दंडित किए जाने के पक्ष में नहीं थे, संगठन बनाने से लेकर,चलाने तक की पूरी प्रक्रिया में सतीश उनसे अलग नहीं हुआ था। पढ़ाई-लिखाई समाप्त हो जाने के बाद जब घर-गृहस्थी का सवाल आया , कामरेड प्रभुदत्त घर-बार छोड़कर भाग खडे़ हुए थे, पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र और लेनिन की प्रसिद्ध पुस्तक ‘क्या करें‘ का अध्ययन कर लिया था, बाद में ‘पूंजी‘ तथा विभिन्न इंटरनेशनल्स में हुए निर्णयों का भी, रूस की अक्टूबर क्रांति और चीन में हुई सांस्कृतिक क्रांति की वैज्ञानिक समझ भी उन्हें कड़े अध्ययन से ही हासिल हो पाई थी,
‘जनता के साथ, जनता का काम ‘ करने का फैसला उन्होंने स्वेच्छा से लिया था, सत्ता बंदूक की नाल से ही हासिल होगी, इसे पूर्ण सत्य मानते थे, इतिहास में मजाक और घटी तमाम घटनाओं के क्रूर परिदृश्य भी तो इसी तरह दीखते हैं,
अतीत को बिना जीते भविष्य को नहीं जीता जा सकता ,ऐसा कुछ मानने लगे थे प्रभुदत्त। वे निकल पडे़ थे सोचे-समझे अभियान की तरफ, जगह-जगह जो थोड़े-बहुत लोग इस दिशा में सक्रिय थे उनसे संपर्क भी किया था कामरेड़ प्रभुदत्त ने, फिर बाद में अपना संगठन बना लिया था उन्हंे ,संगठन बनाने के दौरान ही कामरेड सतीश मिल गया था, बी.ए. में पढ़ने वाले विद्यार्थी के रूप में , सतीश के भीतर की आग पहचान लिया था उन्होंने , धीरे-धीरे जोड़ने लगे थे सतीश को अपने साथ, जब भी शहर आना होता सतीश के यहॉ निश्चित रूप से ठहरते कामरेड प्रभुदत्त। सामाजिक ,राजनीतिक धार्मिक तमाम तरह की बातें होतीं जिनसे निरंतर प्रभावित होता चला गया सतीश। पढ़ाई समाप्त होने के बाद सतीश के विधायक पिता श्री ने चाहा था कि वह ‘कम्पटीशन‘ दे, पर उनका प्रयास बेकार गया, किसी दूसरे किस्म की नौकरी या व्यवसाय करने का दबाव उसके ऊपर पड़ा ,पर सतीश ने सब नकार दिया, बाप की इच्छाओं को ठुकराकर संगठन में शामिल हो गया, कामरेड! प्रभुदत्त के साथ।
कामरेड प्रभुदत्त के लिए संगठन और सतीश दोनों ही पर्याय हैं एक दूसरे के। कई-कई मोर्चों पर सतीश ने ही बचाया था कामरेड़ प्रभुदत्त को जान से, किसी भी जटिल एवं संघर्ष पूर्ण मोर्चें को आसान बना देना आसान हुआ करता था सतीश के लिए ...... और संगठन चलाना , नए लोगों को शामिल कर लेना , कोई सतीश से सीखे , आज संगठन का यह बढ़ता स्वरूप उसी के कारण ही तो है, इसलिए कामरेड प्रभुदत्त ,सतीश के बारे में कुछ फैसला नहीं ले पा रहे थे, जबकि संगठन में विद्रोह तेजी से उभरता जा रहा था, कामरेड रवि सक्सेना ने विरोधी मोर्चा संभाल लिया था, संगठन में उभरते-असंतोष के कारण सेक्रेटरिएट की बैठक आहूत कर ली गई थी , कामरेड रवि सक्सेना ने सतीश को दंडित किए जाने के निर्णय के पक्ष में अन्य कामरेडों को खुलकर सामने आने के लिए, प्रयास तेज कर दिया था, एक पल भी गंवाना उनके वश में नहीं रह गया था इससे अलग , यहां तक कि उसने कहना शुरू कर दिया था कि ‘जयकरन की औरत कामरेड सतीश की पूर्व प्रेमिका है, और उसका मायका उसके गांव की तरफ है भी,कामरेडों में कृत्रिम घृणा उत्पन्न होती जा रही थी, निश्चित ही सेक्रेटरिएट सतीश के लिए मृत्युदंड का ही फैसला लेगा,यह करीब-करीब तय था,कामरेड प्रभुदत्त टूटते जा रहे थे, इस तरह के अनावश्यक बदलाव अंौर उभरते असहमतियों के कारण, लगातार बीस वर्ष का उनका प्रयास विखरता जा रहा था ,ख्ंाड-,खंड होकर टूटता दीख रहा था उन्हें। उन्होंने जो संगठन की ईमारत बनाई थी वह धूं-धूं कर वर्ग-दुश्मनों की बखरियों की तरह जलती जान पड़ रही थी, उन्हें महसूस हो रहा था कि इस समय वे जयकरन की औरत की तरह रवि सक्सेना के पेैरों पर गिर कर सतीश के जीवन-दान की भीख मांग रहे हों फिर भी रवि सक्सेना ठोकर मार-मार कर उन्हें चोटिल कर रहा हो। उन्हें ऐसा भी लग रहा था कि रवि सक्शेना सतीश की हत्या करने के बाद उनके पट में संगीन घोंपना चाहता है। कामरेड प्रभुदत्त ऐसा सोचकर कांप जाते हैं अब सेक्रेटरिएट की बैठक तो नाटक की तरह है, फैसला तो पहले ही करा चुका है रवि सक्सेना । खूब दारू पीते हैं, कामरेड प्रभुदत्त फिर सो जाते हैं उन्हीं के बगल में बैठा रह जाता है सतीश रात भर बिना सोए। अच्छी तरह से महसूस कर रहा है सतीश , कामरेड प्रभुदत्त में आए बदलाव का कारण। सुबह होते ही झगड़ जाता है प्रभुदत्त से ,‘आखिर क्यों हैं परेशान कामरेड ! यही न कि मुझे गोली मार दी जायेगी, कोई जीवित रहने के लिए जनमा है क्या? संगठन को बचाइए कामरेड ! मुझे छोड़िये मैने वस्तुतः अपराध किया है सामूहिक निर्णय को व्यक्तिगत निर्णय से क्षति पहुंचाया है , भला बताएं मैंने संगठन के लिए किया ही क्या है ? मैं वर्ग-च्युत भी तो नहीं हो पाया अब तक.........सर्वहारा समाज का भी नहीं हंू कामरेड ! मैं आत्म-हत्या कर लेता अब तक .....और आपको चिंतित भी न होना पड़ता मैं जानता हंू ‘विश्वास जब मर जाय तब मर जाना ही बेहतर होता है ‘ पर मुझे बहुत कुछ कहना है सेक्रेटरिएट में , इसी लिए जीवित हूं .........‘निवेदन है ,आप मेरी चिंता न करें,‘
‘चुप रहो‘! डांट दिया था कामरेड प्रभुदत्त ने कामरेड सतीश को, ‘बहुत सालों से संगठन के संचालन का काम देख रहे हो तुम ,जो कार्य हमारे लिए लक्ष्यगत तथा अनिवार्य रहे हैं और हमारे दुश्मनों के लिए भयानक, घृणित तथा क्रूर ,क्या कभी विरत हो पाए थे उनके कार्यों से तुम जयकरन को गोली मारना तय था, फिर तुम उसकी औरत के कारण ,कैसे भावुक हो गए ? कहॉ से उपज गई तुम्हारे भीतर संवेदन-शीलता ,वही संवेदनशीलता जो करोड़ों-करोड़ की हैं जिसके लिए हम प्रयास कर रहे है, फिर किसी एक के लिए कैसे-क्यों ? बता सकते हो, मैं जानता हूं तुम उस औरत को जानते तक नहीं.............. फिर उससे संबंध होने का सवाल ही नहीं, ‘सतीश चुप था , अकुलाया हुआ भीतर से , वह भी सोचता रहा है ‘ क्यों छोड़ दिया उसने जयकरन को ‘ इसका जबाब उसे नही मिल पा रहा था , वह इन थोथी संबेदनाओं से , संगठन के कार्य के निमित्त बाहर हो चुका था , फिर भी छोड़ दिया जयकरन को ............
‘कामरेड! मैं समझ नहीं पाया अब तक; आखिर क्या हो गया था मुझे उस
दिन, उस औरत की रूलाइयों और चीखों ने मुझे कैसे भटका दिया उस
दिन,मेरे लक्ष्य से ,उसने भइया कहा था शायद और मैं बेबस ,बेसहारा बहन का भाई बन गया था, संभवतः यही हुआ होगा, हालांकि हमारे किसी से कोई रिश्ते नहीं है‘ , फिर भी रिश्तों से बाहर नहीं हो पाए हम ..... ताज्जुब है कामरेड,‘
सतीश को आश्वस्त करते हुए कामरेड प्रभुदत्त ने कहा- ‘यही रिश्तों की भावुकता का यथार्थ है जो हमारे-तुम्हारे बीच है, जिसके कारण हम तुम्हें नहीं खोना चाहते कामरेड , और न ही संगठन तोड़ना चाहते हैं पर यह रवि सक्सेना.....,लगता है तोड़ डालेगा हमारे घरौंदे को, रवि ने हमारे संगठन को व्यक्तिवादी राजनीति का अखाड़ा बना दिया है, उसका लक्ष्य सिर्फ तुम्हें ही नहीं ,मुझे भी समाप्त करने तक का है ,अजीब तरह का षड़यंत्र रच रहा है वह। पचासवां पार कर चुके हैं कामरेड प्रभुदत्त, शरीर के अधिकांश हिस्सों से कभी छर्रे तो कभी गोलियां निकाली जा चुकी है उनके, पुरवइया बहते ही देह ऐंठने लगती है ,अब घर की याद नहीं आती, मां-पिता के मृत्यु का समाचार उन्हें मिला था, पर संगठन के कार्यों एवं नीतियों के चलते नहीं जा पाए थे गांव, जहां वे जन्मे थे, उनके कर्म का हिस्सा नहीं रह गया था यह सब, पूरी दुनिया उनकी है और उस पर वे अपनी नीतियों तथा कार्यक्रमों के साथ काबिज होना चाहते है ,उनका संगठन देश के एक दो जिलों तक ही प्रसार पा सका था, अन्य संगठन जो दूसरी जगहों पर कार्यरत थे, उनके साथ ताल-मेल हो ,ऐसा प्रयास भी किया गया था ,पर सब बेकार गया था। वैचारिक भिन्नताओं एवं पार्टी लाइन के चलते सभी संगठनों की हैसियत जुगनू से ऊपर नहीं- इसे जानते थे कामरेड प्रभुदत्त! इसी उधेड़-बुन और नई सुबह की आशा में गुजर चुके हैं बीस साल कामरेड प्रभुदत्त के। वे जानते है, सिर्फ दस साल आगे ही कुछ किया जा सकता है, फिर तो शरीर ही साथ नहीं देगा, इधर का सामाजिक एवं राजनीतिक माहौल भी तो काफी कुछ बदल गया है ,बीस वर्ष पहले जिन वर्ग-दुश्मनों की पहचान जिन आधारों पर की गई थी; वे आधार भी तो काफी कुछ घिस-पिट गए हैं, बीस वर्ष पहले वाला वर्ग-दुश्मन अपना ही शत्रु बनता जा रहा है , आज जमीनों पर का उसका एकाधिकार सरकारी छद्म उदारताओं के कारण बहुत कुछ कम हुआ है, चुनाव की प्रक्रियाओं से लघु-मानव बहुत अर्थाें में सचेतन हुआ है,आज पुराना वर्ग-शत्रु नए रूपों में समाज में स्थापित होता जा रहा है, सरकार से सीधा तालुक रखने वाला राज-पोषित व्यक्ति आज सामंती चरित्र जी रहा है जिसमें अधिकारी भी है और नागरिक तथा प्रतिनिधि भी ,कामरेड प्रभुदत्त महसूसने लगे हैं कि आज की सामाजिक संरचना काफी-कुछ बदल गई है, जिसके संदर्भ में ही कामरेड प्रभुदत्त वर्ग-संघर्ष को व्याख्यायित करना चाहते हैं,खेतिहार मजदूर,औद्योगिक मजदूर, तमाम गरीब लोगों को एक साथ शामिल करना चाहते हैं कामरेड प्रभुदत्त, एक नया रास्ता बनाना चाहते हैं- वे इसे भी विश्लेषित करना-कराना चाहते हैं कि वे कौन से कारण हैं जिसकी वजह से भूख से परेशान आदमी भी गरीबी की भूख नहीं महसूस करता ? यातना और शोषण से त्रस्त आदमी सब कुछ ईश्वरीय मान लेता है ,क्यों नहीं चुनता संघर्ष का रास्ता ? जीवन और मृत्यु का कारण , वह खुद क्यों नहीं बनना चाहता ? बहुत कुछ लिखा है अपनी डायरी में प्रभुदत्त ने , यह भी लिख लिया है कि कामरेड सतीश हमारे न रहने के बाद भी अच्छी तरह समर्पित भाव से संचालित करता रहेगा हमारे संगठन के कार्यों को, बदलाव की इस दिया को कभी बुझने नहीं देगा कामरेड सतीश। सेक्रेटरिएट की बैठक की अध्यक्षता करते हुए कामरेड प्रभुदत्त,कामरेड सतीश को गोली से उड़ा देने का आदेश दे देते हैं , हालांकि यह कार्य कोई नया नहीं था कामरेड प्रभुदत्त के लिए, फिर भी साफ-साफ महसूस कर रहा था सतीश कि कामरेड़ प्रभुदत्त कांप रहे हैं और उनकी जुबान लड़खड़ा रही है , फैसला हो चुका था ,संगठन के नियमानुसार कामरेड़ सतीश को अस्थाई हवालात में बंद कर दिया गया था ,ऐसे अवसरों पर जश्न मनाया जाता रहा है संगठन में ,ताकि अभियुक्त से जुड़ी तमाम संवेदनाओं को भुलाया जा सके और स्मृति क्षय हो सके , नियमानुसार ठीक तीसरे दिन कामरेड सतीश को गोली से उड़ा दिया जाना था।
कामरेड प्रभुदत्त के लिए उनके संघर्षपूर्ण जीवन का सबसे क्रूर और अनिष्टकारी फैसला था यह , सेक्रेटरिएट की कार्यवाही समाप्त होते ही अपने नियत विश्राम स्थल तक लौट आते हैं कामरेड प्रभुदत्त। सेक्रेटरिएट की बैठक में कामरेड सतीश ने कहा था.......
‘महोदय मुझे तीन दिन तक जीवित रहने का मौका न दिया जाए, यह मेरे साथ अन्याय होगा , मैं अपराधी बनकर एक क्षण भी नहीं जीना चाहूंगा ,आज और अभी ,इसी क्षण मुझे गोली मार दी जाए , यह तीन दिन बाद गोली मारे जाने का नियम भी संभवतः हम कामरेडों ने छद्म भावुकता में ही बनाया था, कृपया इसे आज और इसी वक्त तोड़ दीजिए ,‘ ऐसी भावुकता व संवेदनशीलता नहीं चलनी चाहिए।
कौन सुनता एक अपराधी की बात ,सभी जश्न मनाने में मशगूल हो गए थे, पर रवि सक्सेना सक्रिय था ,वह कुछ और ही चाहता था, उधर कामरेड प्रभुदत्त के लिए कठिन होता जा रहा था वक्त काटना, सतीश से मिलना चाह रहे थे, पर नहीं मिल पा रहे थे......मानसिक अंतर्द्वद्व के शिकार प्रभुदत्त ; अनिर्णय की स्थिति में काफी लाचार और बेबस हुए जा रहे थे, लेनिन की पुस्तक ‘क्या करें‘ को आखिर कितना पढ़ते ? कहां से मिलता उसमें इस तरह की कार्यवाहियों पर कोई विचार ? सक्रिय , समर्पित तथा प्रतिबद्ध कामरेड़ों की एकाध भूलों को किस प्रकार माफ किया जा सकता है, वैसे एंजिल ने भी तो कई-कई बार अपनी स्थापनाओं में काफी फेर बदल किया था , अंततः कामरेड प्रभुदत्त बिफर पड़ते हैं, आंखे छल-छला जाती हैं, क्रांति का यह क्रूर दर्शन उन्हें काफी बोझिल लगने लगता है, हिंसा-प्रतिहिंसा यह क्या है ? उत्पीड़कों का सफाया उत्पीड़न के द्वारा, हिंसा की समाप्ति हिंसा के द्वारा ,कदापि नहीं ,चीख पड़ते हैं कामरेड प्रभुदत्त ‘नहीं-नहीं , ऐसा नहीं होने दूंगा ,‘
कामरेड प्रभुदत्त जान चुके थे कि रवि सक्सेना हमारे संगठन की जमीन में बो चुका है उन्नत किस्म का षड़यंत्रकारी बीज, और मौजूदा राजनीति की व्यक्तिवादी संस्कृति से संस्कारित करना चाहता है पूरे संगठन को, छोड़ देना चाहता है संगठन की अनिवार्य प्रक्रियाओं को ,कामरेड सतीश को हटाकर , वह अपना लक्ष्य पा सकता है और बदल सकता है संगठन को एक उग्रवादी दल में, सिद्धांत हीन..कामरेड प्रभुदत्त को अपनी मानसिक संरचना की तिलिस्म में हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा दीखने लगता है ,रात काफी जा चुकी थी....सो नहीं पा रहे थे प्रभुदत्त, सोना भी कहां था ?
थोड़ी खड़-खड़ाहट होती है, जग जाता है सतीश ,कौन है ? पूछना चाहता है, तब तक उसका मुंह ढक जाता है,एक बलिष्ठ पंजे से, हंू धीरे से.....मैं हूं ‘
‘अरे कामरेड ! आप ! ‘
‘चुप ! वक्त नहीं है बातें फिर होंगी, चलो, ‘फैसले की दूसरी रात थी यह, घुप्प अंधेरे में काफी दूर निकल आए थे दोनों लोग, स्टेशन थोड़ी ही दूर पर था, कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद रेल आ जाती है ,दोनों लोग डिब्बे में सवार हो जाते हैं, बिना जाने कहां जाना है और क्यों जाना है, भीतर से व्याकुल था सतीश ‘यह क्या किया कामरेड़ आपने, अब क्या होगा संगठन का, आखिर हम सब ने जो किया अब तक उसका क्या होगा ?
गाड़ी में बैठने के बाद ही, पूछता है सतीश , कामरेड प्रभुदत्त से ‘यह क्या किया आपने कामरेड ?
चाहे जो हो, जिस संगठन में रवि सक्सेना जैसा महत्वाकांक्षी हो ,जिसके राजनीति का आधार ही षडयंत्र हो, उस संगठन का भविष्य क्या और क्या वर्तमान? जिस दिन तुमने जयकरन को छोड़ दिया था उस अभियान में रवि सक्सेना भी तो था, वहीं मौके पर ही उसने विरोध क्यों नहीं किया था ? आखिर वह क्या चाहता था, यही न कि सतीश को संगठन के फैसले से ही मारा जाए और संगठन पर अपना दबाब बनाया जाए,‘
मैं तुम्हें नही खोना चाहता था कॉमरेड ! तुम्हें खोने का मतलब ;खोना बहुत कुछ और पाना कुछ भी नहीं,‘ कॉमरेड प्रभुदत्त ने कहते-कहते कॉमरेड सतीश को गले लगा लिया था ,
‘हमें तुम पर उतना ही नाज है जितना अपने आप पर घ्णा , मै अनायास ही टकरा गया था सिंद्धांतों के पहाड़ों से...सिर फूटते-फूटते बचा है कामरेड सतीश,‘हमें फिर से सोचना समझना होगा ,सामाजिक संरचना को ,जीवन के द्वंद्व को, प्रकृति और पुरूष को, व्यक्ति तथा समष्टि के यथार्थ को नए संदर्भों में व्यक्ति और पदार्थ के रिश्तों को व्याख्यायित करना होगा, फिर नई रूप-रेखा निकलेगी संघर्ष की, वही हमारे लिए आवश्यक होगा‘,
गाड़ी अपनी रफ्तार से चली जा रही थी , निश्चित ही वे लोग वहीं उतरे होंगे जहां गाड़ी का आखिरी पड़ाव होगा और उन लोगों का प्रस्थान स्थल।
नवम्बर 1997 हंस कथा मासिक, अंक 4
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वापसी लिफाफा
साहित्य संस्कृति और राजनीति के विभिन्न सरोकारों पर केन्द्रित ‘‘प्रति छाया‘‘ के विशेष अंकों ने संवादहीनता ही नहीं अर्थहीन तटस्थता को भी तोड़ने का मूल्यवान कार्य किया था। अन्त होती शताब्दी के दस वर्षों का वास्तविक ‘लेखा -जोखा ‘ पत्रिका के पक्ष में कई-कई चर्चाएं और विशेषताएं लिए खड़ा था। लोग बाग इन्हीं विशेषताओं और चर्चाओं से कुछ इस तरह चिपके हुए थे कि अनायास ही वे कह उठते थे, ‘इस संक्रमण कालीन माहौल में जहॉ किसी पत्रिका का निकलना ही असंभव है, ऐसी स्थिति में ‘‘ प्रति छाया ‘‘ के लोगों की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। कहां रंग बिरंगी तरह-तरह के राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय शिष्टाचारों को बघारती और मल्टीनेशनल्स के विरूद्ध स्वदेशी की वकालत करती, उपभोक्ता संस्कृति का विरोध करती । इतिहास के अन्त की घोषणाओं का सार्थक प्रतिकार करती और मनुष्य की स्वायतता का रास्ता तलाशती, विस्मयकारी जिद लिये जाने किन सपनों के लिए आलोक जी ‘प्रति छाया‘ को सजाते संवारते रहे हैं लगातार पन्द्रह बीस वर्षों से पढ़ाई लिखाई के बाद से ही वे जुट गये थे, संपादन और प्रकाशन के क्षेत्र से मां-बाप की नसीहतों तथा घर की जरूरतें उन्हें विवश नहीं कर पाई थीं नौकरी के लिए । फलस्वरूप तनहा पैदा होने की तरह तनहा ही बने रह गये थे। अपनी जीवित तथा मृत जिदों की खातिर झोले में पत्रिका लेकर बेचते रहे तथा विज्ञापन के लिए जगह-जगह ठोकरें खातेे रहे। पत्रिका निकलती रहे उस समय इससे अधिक उन्हें कुछ चाहिए भी नहीं था , बहरहाल इससे अधिक आलोक जी के बारे में कोई नहीं जानता शायद किसी को कुछ मालूम भी नहीं था। उनके अविवाहित रहने के कारणों की तलाश कुशाग्र आलोचकों ने अवश्य की थी। यह तलाशी सी.बी.आई. की तलाशी से कुछ अधिक गंभीर थी मसलन.... उनके कुछ पत्र छांट लिये गये थे, उन पत्रों की व्याख्याएॅ हुई थीं। इत्तफाक भी ऐसा था कि उन पत्रों से प्रेम ही प्रेम नहीं प्यार की संवेदन गंध भी पन्द्रह वर्षों के अन्तराल के बाद भी निकल रही थी, महक गया था पत्र के व्याख्याकारों का मन मिजाज। लोग उन पत्रों के साथ अपनी स्थिति जोड़ने लग गये। किसी ने कालेज में पढ़ने वाली के बारे में सोचना आरम्भ कर दिया तो किसी ने गांव की अल्हड़ पड़ोसी लड़की के बारे में व्याख्याकारों की मजबूरी भी थी, उन्हें उतरना ही था संबंधों की नाजुक गहराई में जो कभी भी, किसी मोड़ पर सक्रिय और सचेत हो सकती थी। आलोक जी के पत्रों में एक दो जगह दिल, आत्मा और मन पूरी तरह से रोमान्टिक हो गये थे और भाषा तो गुदगुदी पैदा करने वाली थी ही। लिंग-भेदी संबोधन नहीं था। उन पत्रों में ऐसा क्यों था ? इस पर आलोक जी भी कुछ नहीं बता पाये थे, पता भी साफ-साफ नहीं पढ़ा पा रहा था। कुल मिलाकर अन्त तक आलोक जी का प्रेम प्रसंग तलाशा नहीं जा सका था। प्रेम प्रसंगों से बच पाना कठिन तो हुआ ही करता है, होगी कोई अन्त वेदना जिसके कारण बच गये थे या कि बचे रह गये थे आलोक जी! ‘प्रति छाया‘ का इतिहास तथा राजनीति अंक विशिष्ट श्रेणी का अंक बन गया था। सारी सामाग्री का संयोजन अज्ञात और अलोकप्रिय बुद्धिमत्ता से किया गया था। अलोक प्रिय इसलिए कि उस अंक को समझने के लिए विशेष प्रकार की समझ की दरकार थी जिसे फैलने में काफी असंभव विलम्ब है। इतिहास की मार्क्सवादी व्याख्याएॅ बुद्धिबल पर कुछ इस तरह से केन्द्रित हो गयी थीं कि समकालीन कर्म का सन्दर्भ काफी सिकुड़ा जान पड़ने लगा था। बुद्धि किसी पक्षकार की हैसियत से परिवर्तन कामी अदालत में कर्म के खिलाफ षड़यंत्रों की गवाही देने लग गई थी। हकीकत जब कि इससे अलग थी उस पूरे अंक का आयोजन इस निमित्त नहीं किया गया था। स्वयं आलोक जी कर्म के क्षेत्र में इतने सक्रिय थे कि उन्हें आम बोल चाल में नक्सलाइट ही समझा जाता था। आलोक जी ने कोई मुद्दा उठाया नहीं कि बगल से कोई न कोई व्यंग्य उछल पड़ता था ‘अरे भाई! वह बात कब कही गयी थी ?‘‘प्राकृतिक हथियारों से लड़ो। व्यंग्य सीधा आलोक जी पर पड़ता पत्थर की तरह। शायद बंगाल के नक्सल विद्रोह का अन्त इसी कथन में निहित था और सारा विद्रोह दब गया था हथियार की कमी और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के अभाव के कारण।
आन्ध्र प्रदेश से लेकर बिहार के किसान विद्रोह , कुछ इस तरह हुए थे या हो रहे हैं जिससे आलोक जी निरंतर कर्म के स्तर पर भी जुडे़ रहे थे। बुद्धि और कर्म का संयोग आलोक जी की तरह विरलों में हुआ करता है। कोका कोला की बुरी नीयत सबसे पहले आलोक जी ने ताड़ लिया था। और ‘प्रति छाया‘ में इसका खुलासा भी किया गया था। आलोक जी के इस गंभीर प्रयास को मजाक के रूप में लिया गया था। वामपंथी हल्कों में तो उन्हें संशोधनवादी तक कहा गया था। राजनीतिक परिवर्तनों पर गिद्ध दृष्टि जमाए आलोक जी ने उन्नीस सौ सतहत्तर के राजनीतिक परिवर्तन को ‘‘छद्म भूचाल‘‘ कहा था। कुछ नहीं बदला है, सत्ता बदल जाने से समाजिक बदलाव का सपना देखना अन्धी मूर्खता होगी। सत्ता बदल की ऐसी धूर्त परंम्पराओं से इतिहास भरा पड़ा है। सत्ता परिवर्तन तो होते रहते हैं , देखना होता है कि परिवर्तन के निमित्त क्या हैं आशय क्या हैं ? जनता के स्वयं स्फूर्त निर्णयों पर अंकुश लगाने के लिए सक्रिय , समर्पित और सचेतन लोग हैं कि नहीं यदि ऐसा नही है तो बदलाव का कोई मतलब नहीं, दो तीन साल के भीतर ही उन्नीस सौ सत्हत्तर का बदलाव जमीन के भीतर दफन हो गया था। लोग-बाग जो परिवर्तन लाने का दम भरा करते थे सबके सब बिखर कर छितरा गये थे और जनता थी कि जहां के तहां मुंह निपोरे खड़ी थी पहले की तरह।
‘‘प्रति छाया‘‘ के कुछ दूसरे अंक भी कम चर्चित नहीं हुए थे खास तौर से वे अंक जिनमें जनवाद की व्याख्याएं प्रस्तुत की गयी थीं और उपभोक्ता संस्कृति की खिलाफत की गई थी। इन अंकों में वामपंथियों को साफ तौर से अलग-अलग खानों में विभक्त कर दिया गया था।पहला खाना उन वामपंथियों का था जो समझा करते थे कि ‘सर्वहारा के अधिनायकत्व‘ में ही वर्ग संघर्षों को देखा-परखा जाना चाहिए और दूसरा खाना उन लोगों का था जो समझा करते थे कि भारतीय परिवेश में असंभव है वर्ग की पहचान सुनिश्चित कर पाना। समान आर्थिक सामाजिक, सांस्कृतिक, परिवेशों का नहीं है यह देश । तमाम भिन्नताओं में उलझी सामाजिक व्यवस्था का विश्लेषण किसी कठोर नियम के तहत् असंभव ही नहीं असंगत भी है। जनवाद की व्याख्याओं को मार्क्सवाद के खिलाफ माना गया था। बहुत आहत हुए थे आलोक जी। वे समझ नहीं पा रहे थे आखिर कहां से और किस तरह से प्रारम्भ किया जाये परिवर्तन कामी सोच की वैज्ञानिक अवधारणाओं को, किस तरह विश्लेषित किया जाए अतीत को, और कैसा सगुण कर्म वर्तमान के लिए आवश्यक समझा जाए। वे लगातार महसूस करते थे कि उनके अंकों के आलोचकों की प्रशिक्षित सेना पहले से ही तैयार है, उनके पास बौद्धिक तर्कों की नई-नई देशी विदेशी टेक्नोलोजी पहले से ही उपलब्ध रहा करती है। यह तयशुदा होता है कि पक्ष क्या है और विपक्ष क्या है ?
तमाम तरह के राजनीतिक परिवर्तन होते रहे , उन पर सतर्क दृष्टि से विवेचनाएं करते रहे आलोक जी। देश विदेश की घटनाओं पर उनकी प्रतिक्रियाएं मार्ग दर्शक भी रही हैं। आरक्षण का सवाल जब देश में उभरा था और इसके खिलाफ आत्मदाह जैसी आत्महत्याएं की जाने लगीं थीं तब आलोक जी बहुत घबराए थे ।
अपने संपादकीय में ‘राजपोषित‘ तथा ‘राजकुपोषित‘ ऐतिहासिक समाजों का उन्होंने जिक्र किया था। आदिम काल से लेकर तमाम तरह की सभ्यताओं के अक्रमिक विकास का व्यौरा भी दिया था। बताने की कोशिश की थी कि मानव सभ्यताओं के मूल में सदैव व्यक्ति द्वारा प्रकृति पर विजय पाने का प्रयास ही मिलेगा अन्यथा कुछ नहीं , इसके अलावा जो दूसरी बात मिलेगी वह होगी उत्पादन संबंधों की, जिसे शक्तिशाली व्यक्ति समूह सदा अपने कब्जों में रखता रहा है।
राजपोषित या राज्याश्रित व्यक्तियों का ही धन और समाज पर नियंत्रण रहा है साथ ही साथ कानूनों पर भी जातिगत व्यवस्था की जकड़बन्दी के पूर्णतया खिलाफ थे, आलोक जी। उनकी मान्यता थी जातिगत व्यवस्था हर-हाल में टूट जानी चाहिए, यह ऐसा मुद्दा था जो उनके लिए परेशानी का कारण था खालिस्तान की मांग करने वालों की खिलाफत का परिणाम तो उन्हें भोगना ही पड़ गया था। दो बार हमले झेलने पड़ गये थे, महीनों गुजरना पड़ा था अस्पताल में, इसी तरह कश्मीरी उग्रवादियों का विरोध करने पर भी घटा था, कार्यालय से तमाम आवश्यक किताबें निकाल कर लोग ले गये थे जो बची थीं कार्यालय के साथ राख बन गई थीं। आलोक जी के अनुसार द्वितीय विश्वयुद्ध पर संग्रहित तमाम सामग्री भी जल गयी थी उस घटना में। बहुत कुछ झेलते रहे थे आलोक जी। समयानुकूल अंकों का संयोजन मुद्रण, प्रकाशन फिर वितरण किया,करवाया करते थे आलोक जी। अर्थ संकट का आना-जाना समान रूप से चलता रहा। घर की आवश्यक जिम्मेदारियों से पूर्णतया अलग थे, इस अलगाव को गंभीरता से महसूस करने की कृपा घर वालों ने भी की थी-‘‘ कोई उलाहना नहीं‘‘ बहुत था आलोक जी के लिए।
दिल्ली के साहित्यकारों के लोक प्रिय आचरण से उन्हें कभी भी कोई शिकायत नहीं थी कि उनमें सरकारी विभागों से मेल-जोल बढ़ा पाने की क्षमता क्यों है और उनमें क्यों नहीं है ? आलोक जी को एक दो बार प्रधानमंत्रियों जी के साथ विदेशी यात्रा के लिए भी आमंत्रित किया गया था। खुशी से झूम गये थे उनके शुभचिंतक, ‘‘चलो देर ही से सही सरकार के मोतियाबिन्द का आपरेशन तो हुआ, कुछ ने सुझाया भी था आलोक जी को ‘‘वहां पूरा मेडिकल चेकअप भी करा लीजिएगा। जाने क्यों सदैव खांसा-खूंसा करते हैं। लम्बे समय का प्रोग्राम है समय तो मिलेगा ही।‘‘ असंभव को संभव बनाने और संभव को असंभव बनाने की कला में माहिर थे , आलोक जी। रूसी सरकार के नियंत्रण को ठुकराकर जिस तरह वह चर्चा के केन्द्र में आ गये थे उसी तरह लम्बे समय के बाद प्रधानमंत्री सचिवालय के आमंत्रण को भी ठुकरा कर उन्होंने बहुतों के चेहरों को बेनकाब कर दिया था जो दिल्ली में इसी गुणा-भाग के लिए ही बसा करते हैं और सुविधापूर्ण अवसरों का व्याकरण लिखा करते हैं,,
कभी विदेश जाकर ,कभी अध्यक्षता हासिल कर,कभी किसी पार्टी का घोषणापत्र लिखकर। यह कइयों के लिए आश्चर्यजनक था सो उन लोगों ने आलोक जी को ‘विक्षिप्त सांस्कृतिक पुरूष‘ तक कह डाला जो होता तो महान है पर महान बनने के रास्तों को समाप्त करता हुआ। विदेश यात्रा का आमंत्रण ठुकराना, रास्ता समाप्त करना ही तो था, पूरे देश का अपमान ही तो करना था। यह असंभव सा कार्य था जिसे संभव कर दिया था आलोक जी ने ‘‘ भला कोई अपना पैर काटता है ? इसी तरह के कई और ऐसे कार्य थे जो आलोक जी से आलोचनात्मक ढंग से जुडे़ थे।
रूस की साम्यवादी सरकार के पतन के बाद अचानक खामोश हो गये थे आलोक जी। अस्वस्थता का बहाना बनाकर गोष्ठियों तक में जाना स्थगित कर दिया था , फिर भी ‘प्रति छाया‘ नियमित रूप से निकलती रही। रूस की ‘‘साम्यवादी सरकार गिरी थी न कि साम्यवादी विचारधारा‘‘ इस तरह के सारतत्वों से भरा-पूरा ‘प्रति छाया का एक अंक भी निकला था।
अंक के माध्यम से उन अछूते शासन पद्धतियों की भी चर्चाएं की गई थीं जो जघन्यतम् क्रूरताएं समेटे रहा करती हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल स्वचछन्दता से भिन्न हुआ करता है।
पूंजीवादी उदारतावाद कई-कई किस्म के प्रलोभनों के सहारे संपूर्ण मानवीय चिन्तन को बहिष्कृत करता चलता है फलस्वरूप राष्ट्र मुख्य धारा से कट कर व्यक्तिवादी आकांक्षाओं के दल-दल में फस जाया करता है। राष्ट्र का हित गौड़ हो जाया करता है , यही संक्रमित सोच पूजीवाद का प्रमुख आकर्षण रही है और आज भी कहीं न कहीं है ही। विश्व स्तर पर भी साम्यवाद के अन्त की घोषणाएं प्रमुखता से की जाने लगी थीं। जैसे एक तरफ गरीबों और दूसरी तरफ कुछ सुविधा प्राप्त अमीरों का रहना कोई प्राकृतिक विवशता हो। कर्म और बुद्धि का योगफल हालांकि आलोक जी के पक्ष में लगभग बराबरी के स्तर पर था फिर भी कर्म और बुद्धि से हासिल हो सकने वाली उपलब्धि उल्लेखनीय नहीं थी। एक तरफ आन्दोलन होता दूसरी तरफ आन्दोलन के सारे स्पष्ट और अस्पष्ट चिन्ह समाप्त होते चलते। बाबरी मस्जिद गिराए जाने वाला मामला भी कुछ इसी प्रकार का था, इस मामले को बहुत गंभीरता से लिया था आलोक जी ने । घूम-धूम कर सांप्रदायिकता के खिलाफ जागृति अभियान भी चलाया था पर क्या हासिल हुआ था।.....यही न कि उनके कट्टर समर्थक तथा सहयोगियों ने भी उन्हीं क्षेत्रोें से चुनाव लड़ना मुनासिब समझा था जहां उनके जाति धर्म वालों की संख्या अधिक थी। आलोक जी के लिए यह एक जटिल परिस्थिति थी, कहा क्या जा रहा है और किया क्या जा रहा है इतना बड़ा फर्क कथनी और करनी में। कैसे मिटेगा संप्रदायवाद , जातिवाद ? कब आदमी को सिर्फ आदमी समझा जायेगा ? बहुत सारे सवालांे का हल तो था पर उन हलों पर कितनों को यकीन था? एक तरफ बुद्धि का इतना विशाल पक्ष तो दूसरी तरफ कर्म की इतनी छोटी भूमिका? चिन्तन की पवित्रता को लांछित करती हुई। आलोक जी जानते थे कि इस तरह की कुप्रवृतियॉ अप्राकृतिक हैं, सारा दोष सामाजिक वानिकी का है फिर भी लोग आखिर क्यों अन्हराए हुए हैं? आलोक जी का अतीत गलत था या कि उनका वर्तमान, जो अतीत बन जाने के लिए छटपटा रहा था। उनके वर्तमान में तमाम ऐसे प्रसंग थे जो उन्हें मुंह चिढ़ाते हुए जान पड़ रहे थे और उनसे पूछ रहे थे कि आलोक जी क्या किया अब तक आपने? परिवर्तनकामी चेतनाओं का क्या हुआ? कहीं ऐसा तो नहीं कि थकते जा रहे हैं आप। विचारों की दुनिया विचारों से कितनी दूर होती जा रही है। कुछ समझ रहे हैं आप। सभी अपने-अपने घरौदे बनाने में मगन हैं। कहीं आपका भी कोई घरौंदा है क्या?
प्रति छाया का दफ्तर ही हो शायद आपका घरौंदा। आलोक जी अजीब तरह का चरित्र बनते जा रहे थे अपने किसिम किसिम के अर्थपूर्ण अंकों के कारण, अजीब किस्म के संपादक तो थे ही। इस लिखा-पढ़ी की दुनिया में उनकी कुछ किताबों ने तहलका भी मचाया था किसी जमाने में। उन्हें इस बात का मलाल आखिर तक रहा था कि उनकी किताबें प्रतिबन्धित किताबों की श्रेणी में क्यों नहीं आ सकीं। संभवतः सरकारों ने उन पर ध्यान देना अनावश्यक न समझा होगा। यहां तक आलोक जी के जीवन की कहानी समकालीन किसी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका के संपादक जी को प्रभावित कर रही थी। उन्होंने बहस के दौरान अपने सहायक संपादक से कहा भी था-
‘यार‘ कहानीकार भी अजीब होते हैं , कहां-कहां से ढ़ूंढ ले आते हैं पात्र , अब देखो आलोक जी को ही, अजीब हैं कि नहीं, प्रति छाया का सम्पादन, किसिम- किसिम के महत्वपूर्ण अंकों का प्रकाशन ,घर गृहस्थी से दूर , हमेशा सुविधाओं को लतियाते हुए। सामाजिक ,राजनीतिक परिवर्तनों पर गिद्धदृष्टि और उनका यथार्थ परक विेवेचन। बहुत ही जटिल व्यक्तित्व है आलोक जी का। सहायक संपादक भी सहमत थे संपादक! जी से। सहायक संपादक तो इस कहानी से इतना प्रभावित थे कि उनका वश चलता तो वे अगले अंक में ही इस अर्थपूर्ण कहानी को प्रकाशित कर देते और टिप्पणी में कहानी के अन्तर्विरोधों का जिक्र भी कर देते पर यह संभव नहीं था । अन्ततः संपादक का निर्णय ही प्रभावी होता । संपादक जी को आलोक जी की कहानी दो हिस्सों में विभक्त जान पड़ती थी। पहले हिस्से से संपादक जी प्रभावित थे परन्तु उन्हें कहानी का दूसर हिस्सा नाटकीय लग रहा था जिसे कहानीकार ने संवेदनशील अन्त के रूप में प्रस्तुत कर दिया था। समकालीन कहानियों के सन्दर्भ में यह बात अनावश्यक थी, इसे संपादक जी गंभीरता से लेते थे और कहानियों की छटनी के समय इसका ख्याल भी रखा करते थे, कि कहानियों का अन्त भावकुतापूर्ण व नाटकीय न हो। संपादक जी को लगा कि आलोक जी की कहानी काल्पनिक है, सच या यथार्थ नहीं-ऐसा होता नहीं, और वे बाद के दिनों में मानसिक रोगी होने लगे थे, जिसका इलाज संभव था पर वे तैयार नहीं होते थे। सामान्य से सामान्य घटनाएं भी उन्हें डराने लगी थीं मृत्यु का भय उनके भीतर इतना छितरा गया था कि हर पल उनके साथ किसी न किसी का होना आवश्यक था। शुरू के दिनों में प्रतिछाया की टीम उनके साथ रहा करती थी पर बाद में धीरे-धीरे सरकने लगी थी। हारी-बिमारी की खबर सुनकर उनके घर के लोग आ गये थे जिनसे उनका संपर्क टूट चुका था।यहां के बाद से कहानीकार भाववाद का शिकार हो जाता है। नाते-रिश्तांे के माध्यम से वर्गीय संस्कारों में फंस जाता है और घर वालों के त्याग तथा समर्पण को चित्रित करने लग जाता है। यहां तक लिख जाता है कि जब डाक्टरों ने गुर्दा खराब होने की बात कही, जिसे बदला जाना आवश्यक था तब आलोक के छोटे भाई ने अपना गुर्दा देना कबूल कर लिया था। बात सिर्फ कहा-कुही तक नहीं थी वस्तुतः आलोक के छोटे भाई ने गुर्दा दे भी दिया था। यह बात अलग थी कि गुर्दा बदल जाने के बाद भी आलोक जी को बचाया न जा सका था। आलोक जी की अन्त-कथा चौंकाने वाली लगी थी संपादक जी को , उन्हें ताज्जुब लगा था कि जो इतना बड़ा संपादक रहा हो , जिसकी कई-कई किताबें चर्चित रही हों उस का इतना निर्मम अन्त। उसके अगल-बगल कहीं भी साहित्यिक लोग नहीं , घर के लोग ही सामने आये थे उसी घर के लोग जिन्हें आलोक जी अपनी जिदो के चलते भूल चुके थे। ‘‘लगता है कहानीकार अपने अन्तर्विरोधों के कारण इस कहानी में भटकाव का शिकार हो गया है। वस्तुतः किसी जिन्दा चरित्र पर कहानी लिखना बहुत कठिन हुआ करता है। संपादक जी ने अपनी असहमतिओं की चर्चा करते हुए सहायक संपादक को निर्देशित कर दिया था कि यदि इस कहानी के साथ वापसी लिफाफा आया हो तो भी , नहीं तो अपनी तरफ से इस कहानी को वापस भेज दीजिए , हां पत्र के साथ मेरी असहमतियों की चर्चा भी अवश्य कर दीजियेगा। सहायक संपादक ने पत्र में संपादक जी की असहमतियों का उल्लेख अक्षरशः कर दिया था पर जाने क्या हुआ कि सहायक संपादक को लगा कि यह इस कहानी के साथ न्यायपूर्ण निर्णय नहीं है और तब उन्होंने पत्र के अन्त में लिखा-
‘‘हमें क्षमा करेगें भाई। प्रभावशाली कहानी होने के बाद भी पत्रिका के अनुरूप नहीं है, आपसे एक जरूरी कहानी की मांग सदैव बनी रहेगी।‘‘ कौन बता सकता है कि लिफाफा कब तक कहानीकार के पास पहुचेगा और कहानीकार लिफाफे में रखी अपनी कहानी देखकर कैसा महसूस करेगा , अपना खुरदरा चेहरा और खुरदरा कर लेगा या आलोक जी का पूर्वार्द्ध भी खुरच डालेगा किसी पगलाए बन्दर की तरह।
वसुधा अंक 42
मैं उगती नहीं पार्टनर
उस दिन कौन सी तारीख थी याद नहीं ,पर थी कोई तारीख। बीती तारीखों की शक्ल सूरत वाली, थी थोड़ी चटकदार और खूबसूरत ,सभी आकर्षित थे इस पर, अखबार , रेडियो , दूरदर्शन , विज्ञापन वगैरह भी।
ऐसी सूरत वाली तारीख के मुंह से उस दिन बोल फूटने वाले थे। इसी मादक बोल की प्रतीक्षा में पूरा देश पड़ा था। जागरूकों, समीक्षकों, राजनीतिज्ञों वगैरह के कान खुले थे, उनमें अप्रत्याशित लहरें थीं और जनता ! उसको पता ही नहीं था कि कान सुनते हैं,आंखें देखती हैं। जनता का सोचना है करते चलो देखते चलो?
प्रतिबद्ध लोगों को जय-पराजय का तूफान बन्दी बनाए था और संसदीय चुनाव परिणाम तारीख के पेट में। स्वतंत्रता , गणतंत्र, दशहरा, दिवाली सभी तो तारीख के जाये।
कहते हैं कोख भली तो औलाद भली। अब तारीखों की अंग्रेजी नस्लों का बोल बाला है। शुदी, संवत का कहीं अता-पता नहीं। कहीं हो भी तो राम जाने।
उस दिन मैं, कस्बे के मुख्य चौराहे पर पान की दूकान के सामने खड़ा था। दूकान के शीशे में अपना खड़ा होना मैंने देखा। शीशे ने भी मुझे देखा होगा। मैं ही हूं कोई आश्वस्ति छूकर निकल गई। पूरी तरह बचा हुआ अकेले। अकेलापन शीशे पर नहीं उतरा था। उसमें भीड़ उतराई हुई थी। बची हुई जगह थी ही नहीं। शीशे वाली जगह खाली करनी थी दूकानदार को , सो उसने चट-पट पान का एक जोड़ा मुझे थमा दिया।फिर तो वहां से हटना ही था।
पान को मुंह में मैने यथा-स्थान स्थापित किया जो धीरे-धीरे लारों में परिवर्तित होने लगा। तम्बाकू के तीखे रस के साथ। अदभुत स्वाद ने दिमाग में ताजगी जमा दी। पान की दूकान पर मैं ही नहीं दूसरे लोग भी खड़े थे। उनमें भीड़ थी अदृश्य। दिखती जरूरत पड़ने पर। नारा लगाती , हल्ला बोलती, पोस्टर उखाड़ती-चिपकाती। मन्दिर मस्जिद गिराती-बनाती। अब शायद लोगों में भीड़ का पाया जाना अचरज नहीं। अचरज है भीड़ में लोगों का पाया जाना। विमर्श के जरिए भीड़ के पाठ को कई तरीकों से पढ़ा जा सकता है मसलन प्रायोजित या स्वतः स्फूर्त अािद। जानता हूं शहर में तन्हा रह कर बाजार सूघंते रहने का कार्य किया जा सकता है। कपड़े़ , गहने , परचून ,जनरल स्टोर ,वगैरह की गन्ध में डूबा रहता है बाजार। बाजार में क्रयहीन बनकर रहना अश्लीलता है। मैं था कि कुछ खरीद नहीं सकता था, औकात ही न बनी।
सुबह की चाय की तलब न होती तो चौराहे की भूमिका कुछ सिकुड़ी और ठोस होती सुबह सात-आठ बजे तक का समय बाजारों के सोने का होता है। चौराहे का बाजार सो रहा था जब कि सूरज जमीन पर लटकने की कोशिश में था। बदरियों के रंग फटने लगे थे तथा वे मेरे कस्बे के आकाश से दूर चली गई थीं।
मोटर पार्टस की दूकानें चौराहे पर काबिज थीं। कुछ के सामने ड्राइबर , खलासी अपनी गाड़ियां खड़ी कर खटर-पटर कर रहे थे। इन निद्राग्रस्त कुछ दूकानों के बाहर कुर्सियों, चबूतरों, मेजांे पर टीवियां, बैंठी थीं। उनके मुंहों से चुनाव परिणाम निकलने वाले थे। इस बाबत सूचनाएं लगातार थीं। जब परिणाम बाहर आने लगे तब लोगों के चेहरे भिन्न-भिन्न होने लगे किसी के खिझियाए, गुसियाए तो किसी के मुस्कुराहट एवं गरिमा पिये हुए।
उनके संग मैं विद्रूप जैसा, अमंगल माफिक। पत्नी की उलाहनों में कैंद- ‘‘कन्वेसिंग ही करते तो सौ पचास रोज मिलते चलो पोस्टर चिपकाते, पर्चा बांटते न बांटते।‘‘ जाने कैसे बिना कुछ किए रोटी ओल्हाती है।‘‘
चौराहे पर जमे रहने की गरज यह थी कि गये-गुजरों को भी चुनाव परिणामों की जानकारी व समझ होनी ही चाहिए। आखिर कब तक ? दूसरा पान का बधा जोड़ा मुट्ठी में था और बाबू चाय की दूकान आंख में थी।
पान की दूकान से ज्यों ही बाई ओर मुड़ा तभी किसी की लरजती आवाज एवं आत्मीय संबोधन ने मुझे खींच लिया।पुरानी पहचानी खनक महसूस कर मै आवाज की ओर मुड़ा। उधर मेरा ‘तुम‘ था यानि नरेन्दर। ये
‘नरेन्दर तुम‘ मेरी तरफ से।
‘पहचान लिया‘ तुम की ओर से।
उसका तुम ,मेरा मैं कभी समरूप थे। एक में खिल्त-मिल्त योगिक की तरह। हमारे अतीत निर्वस्त्र हो गलेे-मिले। गूं गां किए ,उलाहे कोसे तो चूमा-चाटी भी किए। फिर अचानक हंसने लगे। अतीत की दीवारें हंसते हुए कांपी और रोई। उनसे मुस्कुराहटें छिन गई थीं। छिनाल चिन्ताएं अलमस्त थीं। अतीत वन विभाग के पथरीले चौड़े हिस्सों की तरह पड़ा रहा बीस साल। घासें तक न उग पाईं। मिलन के इस जमीन पर खडे़ हम दोनों सोचने लगे,
‘यार ! गुजर गए बीस साल।
‘इधर कैसे आना हुआ ?‘ मेरे मैं ने जानना चाहा
‘बस यूं ही, एम.पी.साहब से मिलना था‘ उसके तुम ने बताया।
‘एम. पी. साहब से !‘ अब वे एम.पी. नहीं रहे ।
‘नहीं रहे तो क्या ? उनके रहने की तारीखें तो हैं।
‘वे बीता कल हो चुकी हैं।‘
‘बीता कल भी तो वर्तमान था,उसी वर्तमान से मेरा काम है,फिर जीतेंगे भी वही।
‘हां सो तो है, क्या आज वे मिल सकेंगे ?
‘उन्हीं के यहां ही ठहरा हूं। कहते हुए नरेन्दर के होठ हिले। उन पर हॅसी तारी हुई। मैने हॅसी को तैरते हुए देखा। संभवतः उसने भी देखा होगा, मैंने सोचा।
‘आजकल यहीं हो या गॉव पर , क्या हो रहा है ?‘ उसने पूछा।
‘कुछ नहीं मैंने कहा।
‘कुछ नहीं, उसने दुहराया जैसे सुना ही न हो। ‘हां कुछ नहीं‘ मैंने कहा.........‘फिर उसने पूछा।
‘फिर‘........... जानना हो तो घर चलो। यह फिर घर.......गृहस्थी से जुड़ा है।‘
मजबूरी बताते हुए नरेन्दर मुझसे विदा हुआ। उसकी जीप मेरी आंखों मंे उतराई। स्टार्ट हुई। फिर दौड़ी। देखते-देखते इतनी दूर चली गई कि ऑखों का देखना स्थगित हो गया। सुबह मिट रही थी। हवा में धूप घुलने लगी, अनुमान किया ....आठ बज गए होंगे। अभी तक अखबार न देख पाया था। बाबू चाय की दूकान खुल गई होगी। चाय के साथ अखबार का स्वाद !
अद्भुत! स्वाद आगे-आगे मै पीछे-पीछे। सड़क की लम्बाई कम होने लगी, पैर बढ़ने लगे। पैरों का बांया-दाया बढ़ना कब रूक गया पता न चला। सामने बाबू चाय की दूकान थी। बाबू सामने खड़ा दिखा। चाय का भगौना भट्ठी पर चढ़ा था।
‘बाबू चाय पिलाना पूरी‘।
बाबू जानता है पूरी माने ‘दो कप‘ एक ही साथ ।
बाबू के यहां चाय भले ही थोड़ी खराब मिले पर किसी से दूकान छोड़ने के लिए नहीं कहता बाबू । बैठे रहो दूकान बन्द होने तक। बाबू के यहां चाय पीना अलग अनुभव है, चाय पीते हुए अखबार पढ़ना अलग। दोनों अनुभवों को जोड़ देने पर विश्वास हो जाता है कि यह कस्बा शहर हो रहा है।
बाबू की दूकान दो पुश्तों से अपनी यथा-स्थिति बचाए हुए है जबकि कस्बे ने कई-कई रंग बदले। पहले तो टाउन एरिया के खपरैल वगैरह मिटे। फिर माटी की दीवारें गायब र्हुइं। कंकरीटें आईं पूरे कस्बे में पसर कर जम गईं। इस कस्बे की देह पर ख्ूब सूरती ऐसी जगमगाई कि सड़कें रोने लगीं। नालियों के दम टूट गये। आजकल कस्बे पर लाल-लाल पोस्टर चिपके हैं जिन पर जिला मुख्यालय के रूप में कस्बे को बदल डालने की मांगे जमी हैं। जाने कब सरकारी घोषणा आए और पोस्टरों को मुग्ध कर दे। इसी तरह जाने कितनी तारीखें आईं उछलीं-कूदीं, हाय-तोबा किया, चल दीं। मौसम भी आते-जाते रहे। छाछठ और एकहत्तर में अकाल भी आए। भुखमरी ने पूरे जिले को निगला। कस्बा ऊपरी कस्बाइयत बचाए खड़ा रहा। हाल में ईटें आईं। पुजहाई करर्वाइं, किसिम किसिम के रथ आए, पद यात्राएं आईं। सब सूंघ कर चली गई। दुबारा कुशल क्षेम पूछने तक न आईं। ऐसा नहीं कि इस कस्बे में मात्र वैयक्तिक कार-बार ही आए। मानव संसाधन मंत्रालय भी आया। जैसे कि विश्व बैंक तम्बू लगाकर डेरा जमाए हुए है। कस्बे की देह लगातार खंगलाती रही। पोखरन का विस्फोट तो कस्बे में करिश्माई ‘हिन्दुस्थान’ ही खड़ा कर गया। कस्बे की छातियां फैलीं, बाहों में मछलियां उगीं , पर बाबू की दूकान..........राम , राम , बनी रही।
वैसी की वैसी, बाप के जमाने वाली। फिर भी पूरा कस्बा उगा रहता है उसमें। कस्बे का बन्द होना खुलना , बाबू की दूकान पर। हड़ताल , बन्द , घेराव , पर्चा भराई , अभिनन्दन क्या-क्या नहीं उगे बाबू की दूकान में। खुफिया विभाग वाला भी नया न हुआ तो बाबू की दूकान में ही आएगा, दूकान सूंघ कर रिपोर्ट लिखेगा कहीं अकेले बैठ कर कोने में।
बाबू की दूकान मेरी कमजोरी है। घर की तरह, दोनों के बीच कोई खाली जगह नहीं, अलग होना मुश्किल। उस दिन बाबू की दूकान मे भीड़ कम थी। भीड़ चौराहे पर टीवियों के पास थी। टी0वी0 बाबू के पास भी थी जिसे चैनल बदल प्रेमियों ने खराब कर डाला था। फिर बाबू ने बनवाया नहीं। अखबार पढ़ो, चाहे फाड़ो, जलेबियां तो बध जाएंगी उन टुकड़ों में। मेरी चाय
मेज पर मेरे सामने। मैं कुर्सी पर ....थका-थका कुछ ऊंघता, ऊंघ में रात की शेष नींदें, घर की यादें, तन्हाइयों वगैरह।
सामने की मेज पर सलीके से अखबार फड़-फड़ाता हुआ किन्हीं दो विशिष्ट आखों की निगरानी में। वह कोई अनजान चेहरा। चेहरे पर पढ़ाई-लिखाई की समझदार लकीरें चश्में से थेड़ी ढंकी हुई। चाय की भाप लकीरों को स्पर्श कर ऊपर उड़ती हुई।
‘बाबू! हिन्दुस्तान आया कि नहीं, मैने पूछा।‘
चाय की चुश्कियों की संगत बैठती है हेड़िगों से, संपादकीय का सिगरेट के धुओं से। पान जमे रहने पर तो किसी भी तरह के लेख गन्धाते नहीं, मजा आता है।
‘हिन्दुस्तान‘ आ रहा होगा, बाबू ने आश्वस्त किया। चाय की पहली चुश्की बुरी लगी। बेस्वाद थी। चुश्की की मौज सामने अखबार के संग। अखबार पढ़ने वाले उस अनजान ने मेरी मौज छीन ली थी। चाय की घटोत्तरी के साथ अखबार विरह सक्रिय हुआ। फिर तो विरह झेलना मुश्किल हो गया।
‘भाई जी! अखबार का एक पन्ना इधर भी‘।
भाई जी की आखें मेरी ओर लपकीं, कुछ सन्देश छोड़कर लौटीं.....फिर अखबार लेकर वापस हुई। मैं तटस्थ बना रहा। जाने क्या ? भाई जी की आखें मुझमें खोजती रहीं।
अखबार का वह पहला पृष्ठ था। अखबार में राष्ट्रीय मिजाज की खबरें थीं। सत्ता पार्टी में विभाजन की संभावना वाली खबर ,अखबार के एकान्त में थी जब कि विश्व बैंक से बतौर कर्ज रूपया मिलने की खबर के पास चहल-पहल थी। चौराहे की तरह। विदेशी कंपनियां अपनी शर्तों पर उद्योग लगाने की इच्छुक। विज्ञापन की तरह यह खबर अखबार से चिपकी हुई थी। संसदीय चुनाव परिणामों के रूझान भी यत्र-तत्र पड़े थे। मुश्किल से एक मिनट गुजरा होगा। अखबार के साथ कि आखों में थकान उभरी फिर तो दूसरे पन्ने की तलब ही छू-मन्तर हो गई। वैसे अखबार के उस पन्ने को भाई जी की ओर बढ़ाते हुए जाने किस इच्छा से मैंने दूसरा पन्ना भी मांगा। दर असल दो कुर्सियों और मेजों का फासला था हम दोनों के बीच और भाई जी काफी दूर बैठे जान पड़ रहे थे। दूकान खाली थी। भीड़ थी की बाबू की दूकान झांकने तक न आई। टी0वी0 होती फिर तो जगह कम हो जाती।
बाबू की दूकान में हम दोनों बने रहे तब तक जब तक, सड़क पर शोर और भीड़ का दबाव कम बना रहा।हम लोगों को दुकान का खालीपन डस रहा था। भाई जी भी दूर थे जाने क्या हुआ कि भाई जी मेरी ओर सरक और सामने की कुर्सी पर जम गए मेरी चाय शेष थी शेष को मैंने तुरंत समाप्त किया।
भाई जी ने सिगरेट मेरी और बढ़ाया लीजिए पीते हैं ना।
सिगरेट के साथ भाई जी की औपचारिकता भी मेरे मुंह तक पहुंची माचिस उन्होंने ही जलाई सिगरेटो ने सामूहिक धुआं उगला, धुआं ऊपर उठा छटपटाते हुए दुकान के धुआं के संग मिल गया । भाई जी के चेहरे पर कौतुक जैसी वस्तु मुझे दिखी आखिर ये है कौन उनकी अप्रत्याशित औपचारिकता मुझे चौकाये थी।
हम दोनों की दूरियां कम होती चली गई कुछ मिनटों ने उन्हें बदल डाला हम एक जैसे होने लग गए। एक दूसरे के सुखो दुखों के साझेदार। वैसे हम दोनों का परिचय अब भी छत से लटका हुआ था। छत के नीचे घूम रहे पंखों की पत्तियों की चोटों से बचते हुए। फिर अचानक हम लोग परिचित हुए। परिचय के पूर्व ही भाई जी ने चाय के लिए बाबू को हकाया, बाबू भी शायद प्रतीक्षा में था पोता ही शायद कुछ ऐसा ही है दुकान खाली थी।
जाने क्यों मैंने महसूसा कि भाई जी उल्टी कर रहे हैं जिसके छीटें मुझ पर भी पड़ेगें वैसे ही काफी समय निकल गया। मैं यदि सोचूं भी कि देश की चिकनी पर्तों पर ही तो सब आकर टिके, अंग्रेज मुगल आदि। आजाद होकर ही इस देश की दरारें कहां भर पाईं ? भूख तो बेचारी कल भी भूखी थी ,आज भी है। गरीबी शाश्वत और आश्वस्त है। जिन्होंने आसमान को लटका हुआ देखा और भूगोल को आज्ञाकारी पाया उन्होंने जमने, उगने का सुरक्षित बन्दोबस्त कर लिया धरती पर। उनके पेट की पर्तों ने उनसे किताबें लिखर्वाइं , कानून बनवाए नारंे गढ़वााये दिमाग जानता है पेट सहलाना। दिमाग सबका बराबर तो होता नहीं खून की तरह। इच्छा हुई कि संवेदनार्थी शब्दों की कोई चेन भाई जी के सामने रखूं......
‘आखिर कुतुबमीनारों से जमीन नापना किस लिए?आइए चलें और उतरें जमीन की गहराइयों में,दरारों में...वहां तक जहॉ ज्वाला मुखियों के उदगम हैं। मेरी इच्छा आंत में घुसकर दब गई।
भाई जी.....एकालाप को जारी रखते हुए कुछ कहना चाह ही रहे थे कि दूकान में कुछ आवाजें घुस आईं। धक्का-मुक्की के कारण वे स्पष्ट न हो
सकीं। कुछ आवाजें शायद हमारे भेद लेकर लौट र्गइं। कुछ दोबारा व्युटी पार्लर से सजकर लौटीं आवाजें दूकान र्में आइं...सजी-धजी। दूकान की हवा ने सुना ‘जिन्दाबाद‘ ‘जिन्दाबाद‘ हमारे कानों ने भी सुना। जिन्दाबाद का लगातार सुनना, डराने जैसा था।
भाई जी तटस्थ दिखे ,वे न डरते हों शायद।जिन्दाबाद में भूतपूर्व का नाम था। इस नाम की धुनों को कई बार सुन चुका था। अब उसके साथ भूतपूर्व की दूसरी लय थी। जिन्दाबाद की लय के साथ नारों का कोरस था। कोरस में लोक राग कहां ठहरती सो वह बाहर रही होगी कहीं।
हम लोग ‘जिन्दाबाद‘ की धुनों के पीछे होकर दूकान से बाहर निकल आए। भूतपूर्व के वर्तमान की लय में अलापना चाहे पर भूतपूर्व का वर्तमान फूलों से दबा भीड़ के अन्तः कक्ष में था। अन्तः कक्ष तक पहुंचना मुश्किल हुआ करता है। यही मुश्किल लिए हम लोग दूकान के सामने को दबाए रहे।
कहीं भीड़ यहां से बेदखल न कर दे। भीड़ रामनामियों की गिरफ्त में थी। भीड़ का अपना वर्तमान न था। वहां अतीत का दखल था। मालाएं वगैरह भीड़ को कब्जियाएं थीं। भीड़ में तो उस दिन की तारीख भी थी जो विज्ञापन बनने के लिए काफी परेशान थी। कभी किसी के तो कभी किसी की गोंद में जा बैठती। उसे पता न था कि उसके चेहरे पर दूसरी तारीखों की सूरतें चढ़ाया जाना बाकी है। दूसरी तारीखें जब चढ़ जाएंगी तब जो पोस्टर बनेगा उसमें वह भी होगी फिल वक्त तो भीड़ उसका नृत्य देख रही है। तारीखों का लोक सत्तात्मक नृत्य तो सरकार बनने के दिन होगा जिसे सारी दुनिया देखेगी और मस्त होकर भूल जाएगी दुनिया अतीत की सत्ताधारी तारीखें।
मैंने सोचा ! अब तारीख नाचेगी....... मंच सज चुका है। भाई जी तारीख का कौतुक देख रहे थे। - मैंने उनके खडे़ होने को सुझाया........
‘चलिए बैठते हैं‘।
हम लोग यथा स्थान बैठे। बैठते ही भीड़ का टुकड़ा दूकान में घुसा। जलेबी का आर्डर दिया और कचौड़ी न बनाने की उलाहना। हम दोनों दूकान के एकान्त पर बतियाते हुए काबिज रहे। बतियाने का जनतंत्र हमें नियंत्रित करता, हम सहमते, फिर बतियाते,बतियाते रहे बैठने तक।
बतियाने में हम इतना परिचित हो गए कि फिर मिलने का वादा कर एक दूसरे से विदा हुए। विदा होते-होते मैंने पूछा ... ‘ भाई जी आपने तारीखों का नृत्य देखा है ? इस जिले की तारीखें बेलें कत्थक नहीं ‘करमा‘ नाचती हैं ‘ करम देवता ‘ की लकड़ी के साथ मानर बजाते हुए।
किसी अचरज ने उन्हें चौंकाया। वे चौंके फिर पूछे ‘तारीखों का नृत्य!‘
मैंने कहा....‘हां....हां..... ‘तारीखों का नृत्य‘
फिर हम दोनों ने विदा होने की दिशाएं पकड़ ली।
परिचय अंक 2 , 2001
साले! वन्द कर किस्सा-कहानी
जाने क्या है कि हुकूमत जैसी निराकार सत्ता पर मैं कभी रीझ नहीं पाया जब कि कुछ अपने लोग भी सत्ता के शीर्ष पदों पर लम्बे सत्ता-संघर्षों के बाद विराजमान हैं ,सत्ता एवं समाज के बीच जिस खाईं की अनुभूति मुझे होती है, उससे तो सिर्फ आत्म-हीन ही हुआ जा सकता है या ऐसे कठिन प्रत्ययों को अपनाकर आत्म-मुग्ध हुआ जा सकता है जिसे समाज नहीं स्वीकारता, बहर-हाल समाज की व्यापकता को अपनी निजी चाहनाओं से मोड़ना-तोड़ना ठीक नहीं हुआ करता वैसे मेरी स्थिति भी अनुकूल नहीं, अपनी घर- गृहस्थी, पीठ पर लादे हुए, सत्ता एवं समाज के पारलौकिक रिश्तों के बारे में बनाई जाने वाली धारणाएं बहस की मांग कर सकती हैं, यह अलग बात है कि उन्हें बहस के योग्य समझा या न समझा जाए, लोकतांत्रिक समाज के रिश्तों में कम से कम इतनी छूट तो होनी ही चाहिए कि लोग-बाग अपनी बातें सार्वजनिक कर सकें, सत्ता एवं समाज के सरोकारों के बारे में कुछ बोल सकें (वैसे बोलने वाले हैं ही कहां ?) थोड़ी कल्पना कीजिए कि आप किसी गोष्ठी में अपनी राय जाहिर कर रहे हैं, यह समझ कर कि आप जो बोल रहे हैं वह समाजोनुकूल है फिर भी आपको गालियां दी जा रही हों ,विरोध के जघन्य तरीकों का प्रयोग आप पर किया जा रहा हो मसलन, चप्पलों-जूतों आदि के बौंछार ऐसे में जाने आप क्या करें क्या सोचें?पर ऐसी स्थिति में मैं तो पिता की स्मृतियों में पूरी तरह विलीन हो जाता हूं ,समय-समय पर उनके द्वारा कही गई लघु कथाएं मुझे आज के विषम दौर में भी याद आ जाती हैं-हालांकि पिता जी का समय कुछ और था, गुुलामी वाला, आज तो काफी कुछ बदल गया है, पक्की सड़कें, पक्के मकान, पेस्ट, टी0वी0 सिन्थेटिक कपड़े, गैस चूल्हे, सौन्दर्य प्रसाधन, अपने में समाए खोए व्यस्त लोग अब अलाव कहां, कहां पंचायत, कहां हल-बैल? टेªक्टर, पम्पिंग सेट, घूंघट-पर्दा , पनघट सब कुछ मिट चुका है या बदल रहा है, इस बदलाहट की बदली गन्ध तब और अब की सोचों में भी हो सकती है।
पिताजी के ज़माने में गांवों में कुर्सियां आमतौर से नहीं पाई जाती थीं , यह वही दौर था जब मैं बनारस पढ़ रहा था , आज के सोनभद्र में मात्र एक हाई स्कूल कम इन्टर कालेज था जो इस मामले में मशहूर था कि साइन्स की पढ़ाई इसमें ठीक से नहीं होती सो मुझे बनारस जाना पड़ा इन्टर मंे साइन्स पढ़ने के लिए, बनारस में मैंने लोहे के पाइप की फोल्डिग कुर्सियां देखीं , मन ललच गया, कामना किया ‘काश मैं इस तरह की लकड़ी की कुर्सियां बनवा लेता’।
‘फोल्डिग कुर्सियों का माडल मेरे दिल-दिमाग में छाया रहता और मैं सोचता कि दशहरे की लम्बी छुट्टी के अवसर पर जब घर जाना होगा तब गांव के मिस्त्री भोला भाई के सहयोग से लकड़ी की फोल्ंिडग कुर्सियां अवश्य बनाऊंगा, दशहरे की छुट्टी होनी ही थी, हुई और मैं गांव चला आया, घर पर साखू की चिराव की हुई लकड़ियॉ थीं, यह मुझे मालूम था, भाई साहब ने उन लकड़ियों को छिपा कर भूसे वाले घर में रखा हुआ था ताकि जंगल और पुलिस वालों को उसकी गन्ध न मिल सके।
घर आने के दूसरे दिन ही भोला भाई के साथ कुर्सी बनवाने के काम में मैं तल्लीन हो गया, यह एक मौजू प्रसंग है उसका उल्लेख यहां कुछ अनावश्यक हो जाएगा। पिताजी हम दोनों को तीन-दिन तक लगातार तजबीजते रहे उन्हें हम लोगों का काम गैर-जरूरी एवं वाहियात लग रहा था, उन्हें भोला भाई के हुनर पर ही नहीं मुझ पर भी काफ़ी शक था, उनका मानना था कि शहर में मुझे जो कुछ अच्छा लग जाता है वह मैं करने लगता हूं, कई बार उन्होंने मां से इशारा भी किया था-‘देहात में शीशे की गिलासों में चाय पीना हर सूरत में ठीक है यहां ये चमकीले कप नहीं चल पाएंगे, किसी भी नकार या स्वीकार को सीधे न कहने की उनकी आदत थी, हम दोनों को ठुक-ठुक करते देखकर उन्होंने सलाह दिया कि पहले लोहे की पाइप वाली कुर्सी ही खरीद कर ले आओ फिर उसकी नकल करो, हो सकता है तुम लोग नकल करने में सफल हो जाओ, ऐसे तो महीनांे बनाते रहो कुछ होने वाला नहीं‘,
उसी वक्त अपने समर्थन में पिता जी ने एक चालाक बन्दर की कहानी सुनाई, कथा कुछ इस प्रकार है-
किसी जंगलमें एक चालाक बन्दर रहा करता था जो मूर्खताओं के बाबत जानकारी रखता था, जिस जंगल में वह रहता था वह आदमियों की बस्ती से काफी दूर था, आम तौर पर जंगल के निवासियों में जंगल से बाहर निकलकर मैदान की तरफ जाने आने का चलन नहीं था। एक दिन वह चालाक बन्दर अपने जंगल की सीमा जानने की गरज से सीधे पश्चिम की तरफ़ निकला, कई तरह की परेशानियों का सामना उसे पूरी यात्रा में करना पड़ा, कहीं उसे भयंकर नदी पार करनी पड़ी तो कहीं ऊंची-ऊंची पहाड़ियां भी चढ़नी पड़ी , कहीं उसका सामना दल-दल से हुआ तो कहीं बालू के मैदानों पर कूदना-फांदना पड़ा, वह एक बहादुर तथा हिम्मत न हारने वाला बन्दर था, इस रहस्यमय यात्रा के दौरान वह एक ऐसी जगह पहुंचा, जहां उसे दिशा-भ्रम होने लगा, उसने सूरज को देखने की कोशिश की, आसमान में सूरज का कहीं पता न था फिर भी वातावरण में अंधेरा न था , वह दिशा भ्रम की स्थिति में भी चलता रहा हालांकि उसे शक था कि कहीं वह जंगल में ही तो नहीं घूम रहा जिसके हर रास्ते एक दूसरे से मिलकर कहीं वृत्त तो कहीं आयत बनाया करते हैं, कहते हैं संकल्प पूरे होते हैं, वह जंगल से बाहर मति भ्रम की स्थिति में ही निकला खुद से सवाल पूछते हुए कि ‘क्या जंगल खत्म हो गया?
जंगल से अलग जो दूसरी दुनिया थी उसके बारे में उसे कोई जानकारी न थी, मसलन जब उसने धान व ईख की फसलों को देखा तो उसे घास जैसी मालूम हुईं, मकानों को देखकर उसने किसी सुरक्षित गुफा के बारे में सोचा, किसी खपरैलिया मकान के सामने उसने एक छतनार पेड़ देखा जो हूबहू जंगल के पेड़ों की तरह उसे लगा, जंगल और मैदान के रिश्तों के बारे में वह सोचने ही वाला था कि उसे कुछ भिन्न-भिन्न सूरतों वाले जीव दिखे , जो पशुओं से पूरी तरह भिन्न थे, वे सिर्फ दो पैरों पर खडे़ हो सकते थे और शेष दो पैरों का मन-माफिक उपयोग भी कर सकते थे, वह कुछ देर तक उन जीवों के कौतुकों को देखता रहा ,उन कौतुकों को जो पूरी तरह दैहिक थे विश्लेषित करने में उसे असमर्थता महसूस हुई, उसने खुद से कहा- ‘दुनिया बहुत बड़ी है और दुनिया को समझ लेने का दावा बकवास है‘,
इस एहसास के बाद ही वह दिमागी कसरत से बरी हो पाया फिर तो उसने मान लिया कि वह जंगल से बाहर वाली दुनिया का फिल-वक्त हिस्सा बन गया है, खपरैलिया मकान के सामने एक खटिया पड़ी हुई दिखी जिस पर भिन्न-भिन्न सूरतों वाले जीव बैठे हुए थे, एक दूसरी खटिया जो घर से कुछ दूरी पर थी उस पर एक जीव सोया हुआ था, बन्दर को खटिया अच्छी लगी उसने सोचा इस पर बैठा-सोया जा सकता है यानि ‘यह एक आराम देह चीज है‘, इसी तरह की खटिया का मालिक और आविष्कारक बनने की उसने कल्पना की, कल्पना थोड़ी आगे खिसकी होगी, जो प्रेमिका तक गई होगी- क्यों कि उसके लिए वह कुछ भी कर सकता था, मालिक और आविष्कारक बन जाने के बाद प्रेमिका के अलावा कोई दूसरा तो नहीं जो आवेशित धन्यवाद या बधाई दे सके,वह गंभीरता से खटिया देखने लगा, उसने उसमें लगी लकड़ियों का हिसाब लगाया, उसके आकार-प्रकार पर विचार किया उसे महसूस हुआ कि वह खटिया के बारे में पूरी तरह वाकिफ हो गया है, उसका निर्माण वह कर सकता है,
वह मैदान से सीधे जंगल की तरफ भागते हुए लौटा अब उसे जल्दी थी, वह फौरन खटिया के आविष्कार में लग जाना चाहता था, देर रात तक वह जंगल लौट सका, सुबह होते ही उसने खटिया बनाना शुरू कर दिया, सबसे पहले उसने पाटी की तरह ही कुछ लकड़िया तलाश कीं, फिर गोड़ों की तलाश की सबसे अन्त में उसने ‘सिरई‘ की तलाश की , अब वह-‘गोड़ो‘ को जमीन पर खड़ा करने लगा, वे गिर-गिर जाते, खटिया में पाए जाने वाले गोड़ों की स्थिति का उसने सीधे तने वाले किसी पेड़ से मिलान किया फिर उन्हें जमीेन में धंसाने के बारे में सोचा, खटिया निर्माण के बाबत वह पहले कुछ सोचता, फिर उसे प्रायोगिक रूप से सफल बनाने का प्रयास करता, इस तरह वह तीन दिनों तक परेशान रहा, एक दिन तो उसे दुबारा मैदान की तरफ जाकर खटिया के निर्माण कला को देखना पड़ा, कई-कई मनौतियां भी करनी पड़ी, अन्त में जब उसे महसूस हो गया कि उसने खटिया बना ली है उसकी खोज सफल हो गई तब प्रेमिका को बुला ले आया, प्रेमिका भी कम चुलबुली न थी, वह खुश हुई, बन्दर ने उसे खटिया के बाबत सुखों एवं सुविधाओं को विस्तार से बताया, प्रेमिका सहज प्राप्य सुखों में ऐसी डूबी कि आविष्कृत खटिया पर सोने के लिए छलांग लगा दी, खटिया भर-भरा गई- उसकी हर लकड़ी इधर-उधर छितरा गई, बन्दर को गुस्सा आ गया, उसने प्रेमिका को डांटा ‘इस तरह से खटिया पर बैठा जाता है क्या? रहने ,सोने, बैठने, उठने के कुछ नियम होते हैं और तूं मूर्ख की मूर्ख‘, आज भी सोचता हूं क्या इस कहानी को ‘संविधान समीक्षा वाली गोष्ठी के दिन नहीं सुनाना चाहिए था ? संविधान के माडल को खटिया के मॉडल से नहीं जोड़ना चाहिए था, कहां गोड़ा, पाटी, सिरई, कहां मूलाधिकार, नीति-निर्देशक तत्व, पंचायती राज व्यवस्था आदि, फिर बन्दर और खटिया, कहां आदमी और संविधान , यह हकीकत है कि सफल वक्ताओं की तरह मैं कभी नहीं बोल सकता, जो, किसी भी किस्म की भीड़ का दिल-दिमाग छीन लिया करते हैं, भीड़ जब कभी स्थिर मन से सुने भाषण पर विचार करती है तब उसे मालूम होता है ‘वह भाषण था ही नहीं मात्र कुछ रहस्यात्मक सूचना-सन्दर्भों का संयोजन था‘,
वस्तुतः मैं चाहता था कि संविधान और समाज की मौजूदा प्रवृत्ति पर विचार किया जाय, आर्थिक उदारवाद की धुरी पर संविधान समीक्षा का क्या प्रयोजन हो सकता है ? देश के आर्थिक सरोकारों का निजीकरण और मानवाधिकार, दोनों परस्पर विरोधी बाते हैं, गोष्ठी के अधिकांश वक्ता संविधान-समीक्षा किए जाने की अनिवार्यता के पक्ष में थे , स्वभावतः वे होते भी दल के निर्देशों का
अनुपालन उन्हें करना ही है, कुछ दूसरे किस्म के लोगों में मुझे भी बुला लिया गया था बतौर ‘शाकाहारी वक्ता‘, गोष्ठी में पहुंचते ही मैंने तय कर लिया था कि कम बोलना है, ऐसा करता भी, पिता जी की कहानी सुनाकर माइक छोड़ देता और श्रोताओं में शामिल हो जाता, कहानी का पूर्वार्ध श्रोताओं ने तल्लीनता से सुना, यह देखकर मैं मुग्ध हो गया और भावुकता में वह सब कह गया जिसे शायद नहीं कहना चाहिए था,‘ दुनिया के संविधानों की नकल है हमारा संविधान इसमें हमारा क्या? इसकी समीक्षा क्या इसे तो.......‘
पिताजी मुझे बार-बार नकलची कह कर संवोधित किया करते थे-उस वक्त मुझे बहुत गुस्सा आता था उन पर, आज मेरे पास कितनी नकल है, कितना मौलिक, नहीं कह सकता,
गोष्ठी के श्रोता कब बिदक गए, वे किस बात पर, या कहानी के किस हिस्से पर नाराज होकर मुझे अपमानित करने लगे, मुझे कुछ भी याद नहीं, मुश्किल से दस-पॉच दिन की बात मैं सब भूल गया, आज तो बस भीड़ की ओर से आने वाली आवाज ही याद है.......‘गोष्ठी संविधान समीक्षा पर है और साला किस्सा सुना रहा है, आदमी को बन्दर बता रहा है, साले बन्द कर क़िस्सा-कहानी,‘काश! पिता जी जीवित होते तो कोई न कोई चिन्ता-हरण कहानी सुनाते जिससे मुझे मद्द मिलती और मैं इस अमानुषिक वाक़ये को भूल जाता, आर्थिक उदारवाद के चलते लोग गुलाम हों या गिर-मिटया मुझसे क्या मतलब ? मुझे तो पता ही नहीं , सरकार और संविधान जैसी कोई चीज हुआ करती है दुनिया में , बम , बारूद और बन्दूक के आशंकित ज़माने में मां की लोरियों और बाप की कहानियों को भूलने की सिर्फ कोशिश की जा सकती है, और वस्तुतः जीवन जीने की अनिवार्यता है भूलना और मैं भूल चुका हूं उस वाकये को - कि लोगों ने कभी कहा था ‘साले बन्द कर किस्सा कहानी।
शेष वर्ष 03
स्मृति-दंश
चारो ओर जंगल ही जंगल था, बीच में बहुत बड़ा पुल था रेलवे का, उस पर से ट्रेन गुजरा करती थी और पुल के एक साइड से आदमियों के आने-जाने का पतला और काफी संकरा रास्ता बना हुआ था। पुल के नीचे बांध का एक बहुत बड़ा हिस्सा था जिसमें पानी हमेशा भरा रहता था बांध की अथाह गहराई में पुल पर से गुजरते हुए हादसे की आशंका बनी रहती थी... कहीं ट्रेन भी न गुजरने लगे, विशेष रूप से रात में, यही वह पुल था और पुल के बगल का रास्ता जो कामतानाथ की जिन्दगी का हिस्सा बन चुका था।
बहुत पहले वह पुल नहीं था, सिर्फ वहा बांध का पानी से लबालब भरा हिस्सा ही था, जब रेलवे लाइन बिछनी शुरू हुई तब उसका निर्माण हुआ। कामतानाथ उस पुल के निर्माण के आवश्यक भाग थे, गोया पुल के ठीकेदार ने उसकी जिम्मेदारी कामतानाथ पर ही दे रखी थी और कामतानाथ पुल के निर्माण को बहुत जल्दी निपटा लेना चाहते थे, जिससे कि ठीकेदार द्वारा दिये गये एक दूसरे काम को भी,इसी सीजन में निपटया जा सके। पुल का निर्माण हालांकि बहुत आसान नहीं हुआ करता, बहुत दिक्कतें आती हैं, मौसम मजदूर और माल तीनों की सन्तुलित व्यवस्था ही उसके निर्माण मंे सहायक हुआ करती है।
कामतानाथ ने पुल का निर्माण शुरू कर दिया था। बिहार के किसी भाग से आये मजदूरों की संख्या पर्याप्त न थी। ठीकेदार और मजदूरों को काम पर लगाने का दबाव बार-बार दे रहा था। जहॉं पुल बना है उसके दूसरे भाग, पश्चिम की तरफ हालांकि जंगल ही जंगल था किन्तु उस जंगल में बस्तियां भी थीं, छोटी-छोटी लेकिन आकर्षक.... उन बस्तियों में सूरज का अस्त होना या निकलना कोई मायने नही रखता था, हमेशा चहल-पहल बनी रहती थी। उन्हीं बस्तियों में काम करने वाले मजदूर रहा करते थे और रेजा (मजूरिन) भी। मजूरों के लिए बस्तियों में जाना कामतानाथ के लिए आवश्यक हो गया। कामतानाथ का हंसमुख चेहरा मजूरों को राजी कर लेने में काफी सहायक हुआ करता था, खास कर जब वे विशेष किस्म के सम्बोधनों का भी प्रयोग कर लिया करते थे, जो भाई-बहन से न शुरू होकर मामा-मामी तक ही सिमटा रहता था। मामा-मामी के रिश्ते को मजाक के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है- बस्तियों के मजूरों और रेजाओं को बढ़ी मजूरी दर पर काम करने के लिए कामतानाथ ने राजी कर लिया। मजूर आने लगे, और काम बढ़ने लगा। दिन भर की खटनी कामतानाथ की थी-
‘का हो मामी-
‘का हो मामा‘ का सम्बोधन कामतानाथ का ऐसा मन्त्र था जो मजूरों को काफी प्रोत्साहित किया करता था, काम समाप्त होते ही.......कामतानाथ मजूरों एवं रेजाओं से घिर जाया करते थे-
‘आजु भइया! गांजा नाहीं, आजु दारू-’
कामता का उदार दिल उदार हो कर रूपयों के हिसाब किताब को भुला दिया करता था और दारू ! महुआ वाली या सरकारी पैकेट वाली आ जाया करती थी...फिर शुरू हो जाया करता था दारू का दौर..... रात बारह-बारह बजे तक, समस्या सिर्फ खाने तक की होती थी। राम आसरे जो थोड़ा व्यावहारिक किस्म का और परिश्रमी मजदूर था, वह कामतानाथ से काफी घुल-मिल गया था। राम आसरे कोशिश करता कि भइया ‘यहां खाना क्या खायेगें , हमीं लोगों के साथ चलें वहीं नमक रोटी खाया जायेगा ‘
कामतानाथ पहले तो नहीं जाया करते थे, किन्तु बाद के दिनों में मजूरों की बस्ती में आने-जाने लगे, रामभरोसे के साथ , अब हालत यह हो गई है कि बिना बस्ती की तरफ गये लगता है कामतानाथ का कुछ क्या बहुत कुछ खो गया है। अब कामतानाथ की मजबूरी हो गयी है निर्माण स्थल से लगभग दो-तीन किलोमीटर दूर जंगली बस्तियों की ओर जाना।
निर्माण स्थल इतने बीहड़ और निर्जन इलाके में था। जहां ट्रक वगैरह से किसी प्रकार माल पहुंचाया जाता था और ठीकेदार भी अजीब किस्म का था...वह कभी-कभी ही वहां आता था, नहीं तो ट्रक ड्राइबरों से ही रूपया पैसा भिजवा दिया करता था। पुल का निर्माण तेजी से होने लगा, कुछ समय बाद कामतानाथ की तबियत कुछ खराब हुई, जड़ी बूटियों का इस्तेमाल राम आसरे ने किया पर कोई खास आराम न होते हुए भी कामतानाथ ने निगरानी का काम नहीं छोड़ा, दिन भर की खटनी वहीं लेटे-लेटे करते रहे, एक ट्रक का ड्राइबर विस्सू ने कामतानाथ को शहर चलने के लिए कहा भी.... पर कामतानाथ टस्स से मस्स न हुए..... का होगा शहर जाकर ?
कामतानाथ स्मृति दंश के शिकार थे जो सर्प दंश से भी खतरनाक हुआ करता है। कामतानाथ के पास क्या खोया क्या पाया का हिसाब तो नहीं था, फिर भी जो कुछ धूल-धाल थी, वह काफी थी। बालिग होते ही जब उनके बाप ने दूसरी शादी की और शादी के एक साल बाद ही कामतानाथ को घर से निकाल दिया तब कामतानाथ की मौसी ने बहुत ही अच्छा समझा था....
चलऽ मंुह फुकना गयल तऽ‘
यह वही मौसी थी जो कामतानाथ के बाप की ब्याहता बनी थी, कामतानाथ की मां का देहान्त या उनकी हत्या कर दी गयी थी, यह बात न तो गांव वाले और न ही कामतानाथ जानते थे, किन्तु कामतानाथ के बाप को तो पता होगा ही। कामतानाथ को क्या पता था कि उसकी मौसी जो महीनों-महीनों उनके घर में रह जाया करती थी और उन्हंे खाने-पीने के लिए रूपया-पैसा भी दिया करती थी, मां के न रहने के बाद भी। वह सब जो उनका प्यार था, शादी के बाद फुर्र हो जायेगा- कामतानाथ को यह भी पता नहीं था कि जब मौसी की शादी हो चुकी है तब वे अपनी ससुराल क्यों नही चली जातीं- दूसरे-तीसरे महीने यहीं चली आती हैं। कामतानाथ की मां आखिर मौसी की दुखभरी कहानी सुनकर क्यों यही रहने के लिए कहा करती थी।
‘क्या बताऊं बहन! जब वे शराब पीकर आते हैं अपने दोस्तों के साथ , तो मुझे दोस्तों के साथ सोने के लिए कहते हैं अउर कहते हैं ‘का भया, देह खिया जायेगी क्या ? कभी-कभी तो मुझे दोस्तों के सामने नंगा करके मारने-पीटने लगते हैं, और दोस्त भी इतने हरामी के....‘
एक बार तो ऐसे ही में एक ने मेरी छाती ही पकड ली और मुझे सटा लिया ...मैं चिल्ला पड़ी, चिल्लाहट सुनकर मेरे जेठ चले आये सबको गरिया कर उन्होंने भगाया और उनको बांध कर खूब मारा-पीटा भी। ‘ मत पूछो बहन ..... दूसरी रात क्या हुआ ? मुझे फिर उस पापी ने नंगा कर दिया ...और .....देखो यह निशान...है न कटा हुआ और जला हुआ....
कामतानाथ की मां ने मना कर दिया, ‘मैं सब समझ रही हूं तुम्हें सबूत देने की जरूरत नहीं है, ये मरद तो ऐसे ही होते हैं ‘इनका क्या कब क्या कहें‘ और कब क्या करें- किसी दूसरे मरद से बात करो तब भी मार और इनके कहे पर अपनी देह न नुचवाओ तब भी मार। हम जनाना लोगों के लिए यही कुछ है, आखिर हम ही तो इन्हें जनते हैं न ? भस्मासुर शंकर पर हमला नहीं बोला था का।‘ यह सब हमारे देह की माया है, हमें मार खानी ही है हर बात पर , कभी प्रेमिका बनकर और कभी पत्नी बनकर। हमारे जितने भी रूप हैं उसे कहीं न कहीं यह आवारा और बदजात पुरूष विकृत कर ही रहा है.... खैर छोड़ो।
कामतानाथ की मौसी का चक्कर उनके बाप से था, इसे मौसी के पति ने तब ताड़ लिया था जब उसके बाप मौसी के गांव गये थे.... बड़ा साढ़ू मान कर उनका खूब आदर सत्कार हुआ था। कामतानाथ के बाप भी साड़ी, व्लाउज, पेटीकोट और बहुत ढ़ेर सी मिठाइंया लेकर गये थे। दोनों साढ़ू देर रात तक बतियाते भी रहे थे, फिर खाना पीना खाया गया था। मौसी का पति अपने बड़े साढ़ू को दरवाजे पर सुलाकर, अपने कमरे में चला गया और पत्नी से उनकी खूब तारीफ भी की। इतना ही नहीं पत्नी के साथ.... स्त्री-पुरूष के समयोचित व्यवहार का भी लाभ लिया दोनों ने। रात काफी गुजर गयी... वह सो गया उसे नींद आ गयी.... अचानक आधी रात के बाद जब उसके पेट में दर्द उठा, तो पत्नी को टोने लगा। अन्धेरे में उसके बगल में पत्नी नहीं थी। दर्द से वह परेशान था...उठा आवाज लगाया... फिर भी पत्नी का कहीं पता नहीं, धीरे-धीरे वह दरवाजे के पास चला आया... उसे फुसफुसाहट सुनाई पड़ी। किसी तरह दर्द पर दबाव बनाये हुए बाहरी दरवाजा धीरे से खोला। वहां अजीब मामला था.......
उसकी पत्नी अपने जीजा के साथ हम बिस्तर थी... ऐसे कि तमाम खजुराहों की मूर्तियां भी शरमा जांय.... वह क्या करे- इज्जत की बात.....
एक चीख निकलना चाह रही थीं... उसे रोका ...फिर भी वह न रोक पाया झटके से दोनों एक दूसरे से अलग हुए और .... वह बेचारा अपने सगे साढ़ू, तथा पत्नी के चेहरों में बिलीन हो गया..... अब उसका अपना क्या था-क्या करता-क्या मार-पीट...कत्ल...फिर और क्या ? इज्जत भी तो बालू की दीवार है- भर-भरा कर गिर नहीं जायेगी क्या... मुंह दिखाना मुश्किल हो जायेगा...इसे ही तो समाज बचाना चाहता है न ऽ।
वह पेट दबाये ... दर्द का बोझ लिए अपने कमरे में आ कर धम्म से गिर जाता है.....टूटता हुआ भी जुड़ा रहना चाहता है.... स्त्री पुरूष के बीच यह रिश्ता ही प्रमुख और आवश्यक रिश्ता है- अन्य रिश्तों में कोई दम नहीं.... वह गिर जाता है। मजबूर हो कर वह शराब पीना शुरू कर देता है और बदला लेने के लिए ही वह कहता है- ‘देह खिया थोड़ी जायेगी‘ हालांकि यह उसकी नियति नहीं सिर्फ प्रतिक्रिया है... और मौसी जी हैं कि बार-बार कामतानाथ के घर पर ही... कामतानाथ के मौसी और मौसा में रिश्तों का संकोच समाप्त हो गया तो मौसा जी ने जहर खा कर अपने को ही छिपा लिया.... फिर क्या था मौसी जी कामतानाथ के बाप के साथ.....
कामतानाथ को घर से निकाल दिया गया था। इस हादसे को गुजरे हालांकि कई साल हो गये हैं, फिर भी कामतानाथ के दिल-दिमाग में ... वह सब कुछ है जो जैसे- जैसे घटा था। कामतानाथ का मन पढ़ने में इसीलिए नहीं लगता था क्योंकि कामतानाथ कुछ याद नहीं कर पाते थे। याद जो रहता था वह भी भूल जाया करते थे। आज सब कुछ भूल जाना चााहते हैं, मां को बाप को , मौसी तथा उस काले-कारनामे वाले घर को भी, पर नहीं भूल पा रहे हैं....कामतानाथ जितना भूलना चाहते है उतना ही याद आ रहा है-
कामतानाथ मानते हैं पढ़ाई के लिए याद करना जरूरी है और जिन्दगी चलाने के लिए भूलना... पर कहां हो पा रहा है ऐसा? कुछ चिन्ता, कुछ बीमारी तथा अकेले होने के दर्द ने कामतानाथ को काफी कमजोर बना दिया, बीमारी का जोर बढ़ता चला गया, कामतानाथ को उठने बैठने में भी काफी दिक्कत होने लगी... रामआसरे कामतानाथ को डोली पर बिठाकर अपनी बस्ती में ले जाता है... पुल का काम भी कुछ ही दिनों में रूक जाने वाला था, बरसात शुरू हो चुकी थी रामआसरे ने कामतानाथ को विश्वास दिलाया था, ‘भइया इहां कुछू नहीं होगा हम अगोरई करते रहेंगें नऽ।’
कामतानाथ, राम आसरे के घर में रहने लगे, वहां दवा दारू से लेकर ओझइती तक सब कुछ होने लगा। रामआसरे का चाचा किसुन उस इलाके का अच्छा ओझा था, उसने साफ-साफ बताया कि इन्हें बन्धे का भूत लग गया है, काम शुरू कराने से पहले ही पूजा-पाठ कराना चाहिए था, कम से कम एक मुर्गा और तपावन तो देना ही चाहिए था, नहीं दिया इसलिए भोग रहे हैं। रामआसरे के बार-बार गिड़गड़ाने पर किसुन आ गये जो राम आसरे के घर से थोड़ी दूर पर रहा करते थे। राम आसरे ने ओझा की बताई हुई बातों के आधार पर तपावन मंगा लिया था और फुलेशरी से कह भी दिया था कि, ‘आज किसी को भी दारू मत बेचना, सब हमें चाहिए।‘ फुलेशरी कहां बेचने वाली थी, वह तो कब कामतानाथ के ठीक हो जाने की मनौती, डीहवार बाबा, औघड़ बाबा , फलवारी माई , गंवसरनी माता तथा काली माई और दुर्गा माई से कर चुकी थी। फुलेशरी राम आसरे के मामा की लड़की थी हालांकि उसकी उम्र 17-18 साल की ही थी फिर भी महॅंुआ की दारू बनाने में उसका कोई जोड़ नही था, महुआ में खमीर आने की पहचान अच्छे ढंग से वह कर लेती थी।
किसुन ओझा रात में रामआसरे के यहां आये ,तपावन लेकर फुलेशरी भी आ गयी....और कुछ खास किस्म के लोग....आझइती की बात थी-पता नहीं कौन क्या जादू टोना कर दे। सावधानी बरतनी थी। आग जल गयी, मुर्गा की गरदन धड़ाक से काट दी गयी और कटी गरदन पर राम आसरे तपावन चुवाने लगा... और किसुन ओझा... अपना मंत्र, हबुआ-हबुआ कर बोलने लगे... ऐसी हबुआई भी क्या कि कोई स्वस्थ आदमी देखकर हबुआने लगे...
लगभग आधे घन्टे बाद कामतानाथ मुर्गे के पास धड़ाम से गिर गये। ओझा ने उन्हें झटके से उठाया...‘बोल-बोल कौन है तू, काहे अइले, कहां से अइले, बोल,बोल,बोल,बोल.... लगभग पन्द्रह मिनट बाद कामतानाथ एक झटके से बोले- बहुत तेज, ‘बरम्’ का बोल्ले...फिर से बोल.... कामतानाथ का पूरा शरीर ठन्ड़ा पड़ चुका था, वे कापने लगे थे- किसुन ओझा बार-बार चिल्ला कर पूछते, कामतानाथ ने हड़बडाते हुए कहा...‘बरम्‘ ‘बरम हए नऽ’ किसुन ओझा का चेहरा इस रहस्य को खोल लेने के उत्साह से खिल उठा ‘हमहूं कहीं के आखिर हवय का’।
ओझइती का मामला था, इतना आसानी से समाप्त हो जाय यह कहां सम्भव था। वहां उपस्थित दर्शक पूरा तमाशा काफी गम्भीरता से देख रहे थे, फुलेशरी कामतानाथ के बगल में ही बैठी थी और रामआसरे कामतानाथ को सम्हाले हुए था। कामतानाथ का बुखार कम नहीं हो रहा था, हालांकि वे मुर्छित नहीं थे, फिर भी कुछ बोलना नहीं चाह रहे थे। उन्हें तकलीफ महसूस हो रही थी । किसुन ओझा ने सब समझ कर एक और मुर्गा की बलि देने के लिए कहा, राम आसरे के यहां मुर्गा नहीं था, फुलेशरी अपने घर से मुर्गा ले आई। फिर वही क्रिया... मुर्गा काटा गया, तपावन गिराया गया, और कामतानाथ से बार-बार पूछा जाने लगा, ‘कहां कऽ बरम्‘ कैसे अइला, तोहें का चाही, इनकर देह काहे पकड़ले हवऽ ... आदि, कामतानाथ बार-बार पूछने पर भी कुछ नहीं बता पा रहे थे... बार-बार ‘बरम्‘ बरम् ही कह दिया करते थे। किसनु ओझा घबरा गये... देखलऽ ई चुप्पा बरम हवंऽ अइसे न बतइहंऽ , एन्हय... धोती, कुर्ता, जनेऊ अउर मिठाई कऽ पूजा देवय के पड़ी अउर जोगिनी माई के बकरा, तब जाके सब ठीक होई।
फुलेशरी घबरा रही थी, उसे यह सब ऊट-पटांग लग रहा था। उसने पहले ही कहा था, इन्हें अस्पताल ले चलना चाहिए ये ओझा-फोझा का करेंगे..... लेकिन राम आसरे तैयार न था उधर पुल पर का काम समाप्त हो चुका था, ठीकेदार या ठीकेदार का कोई आदमी पता तक लगाने नहीं आया कि कामतानाथ कहां हैं? क्या कर रहे हैं, मजूरी वगैरह पहले ही ठीकेदार ने भिजवा दिया था। यह सब तमाशा देखकर फुलेशरी ने फिर कहना चाहा अस्पताल चलने की बात.... पर रूक गयी। तब तक काफी रात हो चुकी थी। सब लोग जा चुके थे, केवल रामआसरे के घरवाले और फुलेशरी रह गये थे। फुलेशरी ने अस्पताल चलने की बात कही फिर निश्चित हो गया कि कामतानाथ को अस्पताल ले चलना ही ठीक होगा..ओझइती से तो....पता नहीं क्या हो....और दूसरे दिन कामतानाथ अस्पताल में थे।
कामतानाथ को अस्पताल से बाहर आने में लगभग दो महीने लग गये... फुलेशरी घर-बार छोडकर कामतानाथ की सेवा में अस्पताल ही रूक गयी थी, राम आसरे ठीकेदार के यहां से हो आया था, ठीकेदार ने दवा-दारू का रूपया पैसा दे दिया था और कहीं जाते समय एकाधबार देख भी लिया था।
रामआसरे ने कामतानाथ से पूछा...घर पर खबर करने के लिए, कामतानाथ ने मना कर दिया था, नहीं घर खबर मत करो वहां है ही क्या? कामतानाथ काफी टूटे हुए थे। उन्हें लगभग घृणा सी थी पूरे समाज से.... कुछ नहीं सब बेकार, ‘यहां तक कि उन्होंने अकेले ही रहने का फैसला कर लिया था लेकिन अस्पताल से आने के बाद.... धीरे-धीरे वह फैसला टूटने लगा था, नदी, किनारों से टकरा-टकरा कर रास्ता बनाने लगी थी फुलेशरी की ओर से वैसे कोई इशारा नहीं था....जैसा हो जाया करता है, ‘फिर वह है ही क्यों अस्पताल में’... सिर्फ आदमियत की चिन्ता में, ठीकेदार और ठीकेदार के दूसरे मुन्शी जो कामतानाथ के संग काम कर चुके हैं, ये आदमी नहीं हैं क्या? रामआसरे जानता था कि फुलेशरी कामतानाथ को भीतर से चाहने लगी है-उसने उसे समझाया भी था। देखो ये दूसरी जाति के लोग हैं। इनसे जब हमार खान-पान नहीं हो सकता, ये हमारा छुआ खा भी नहीं सकते फिर प्रेम-मुहब्बत की बात किस लिए... ये तो बस...।फुलेशरी र्तोइं समझते नाहीं अभी लरिका हए, तोसे का-का कहीं... अइसहीं होला...ई बाभन, चाहे जवन इनके संघे तू कर, लेकिन बिआह.... नाहीं। फुलेशरी पर रामआसरे की बात का प्रभाव नहीं पड़ा, अपने निश्चिय पर वह दृढ़ थी और कामतानाथ...भी धीरे-धीरे फुलेशरी के प्रति आकर्षित होने लगे थे। अस्पताल के लम्बे प्रवास से बड़ा परिवर्तन आया, अस्पताल में ही कामतानाथ ने फुलेशरी को अपने बगल में बिठाकर इसकी सूचना दे भी दी, अब बात एक तरफा नहीं रह गयी थी। लेकिन एक दिन फुलेशरी ने कामतानाथ को साफ-साफ बता दिया अस्पताल में ही ‘ई सब नाहीं, सब पाप हऽ बिना बिआह के नाहीं‘ इधर कामतानाथ ...जब काफी कुछ ठीक-ठाक हो गये...एक दिन उन्हें मौका मिल गया, रात का वक्त था, अस्पताल के कमरे में सन्नाटा था.... और जब कामतानाथ ने फुलेशरी को छेड़ा‘ तब फुलेशरी उनसे अलग हो छिटक गयी...‘नाहीं-नाहीं‘ तो इसे कामतानाथ ने स्त्री सुलभ इन्कार में ‘हां‘ ही समझा। फुलेशरी कमजोर तो थी नहीं, उसे विश्वास था अपने प्यार पर, देह की भूख मिटाने के लिए वह कामतानाथ के साथ तो नहीं...उसे आत्मा की भूख थी’ कामतानाथ बिना सोच के थे ऐसा न था... कामतानाथ ने भी मन से फुलेशरी को अपना लिया था। कामतानाथ और फुलेशरी दोनों अपने-अपने विचारों के साथ अलग होते हुए एक साथ चल रहे थे- फिर शादी, बच्चे , मां , मौसी...और बाबू जी अजीब किस्म का समीकरण बनने जा रहा है...क्या है जो ‘मैं फुलेशरी को चाहने लगा हूं.. क्या जरूरत थी फुलेशरी को छेड़ने की और उसके शरीर के हिस्सों की नाप लेने की? यही फुलेशरी भी तो कर सकती थी, उसने सेवा की.... अंग-अंग मेरा छुआ होगा... फिर वह क्यों नहीं उत्तेजित हो गयी? हो सकता है हुई भी हो , पर उसने रोक तो लिया ही..‘ कामतानाथ बिफर गये ?
कामतानाथ ने अपने को फुलेशरी से अलग करना चाहा, यहां तक कि अब उस पुल पर या उस बस्ती की ओर नहीं जायेगें, चाहे पुल बने या न बने, उधर जाने का मतलब ही है ‘फुलेशरी‘...फुलेशरी को मन से निकाल पाना बड़ा कठिन है। अस्पताल से जब छुट्टी हो जाएगी तब वे कहीं दूसरी जगह चले जायेगें - लेकिन जाएंगे कहां क्या-क्या छोड़ेगें... एक पुरूष और एक स्त्री के मिथ से बाहर निकल पायेंगे क्या... पैसों वाली औरतों से काम चला लेना होगा‘ कामतानाथ चकरा कर ठन्डे पड़ जाते हैं। अभी थोड़ी कमजोरी भी थी, फुलेशरी वहीं बगल में थोड़ी दूर बैठी थी - कामतानाथ को हल्का बुखार आ जाता है...‘चिन्ता का बुखार‘ फुलेशरी को कामतानाथ का शरीर थोड़ा गरम लगा... वह उन्हें पानी पिलाती है -
पूछती है बुखार के बाबत , कुछ नहीं है कामतानाथ ने बताया था। अस्पताल से छुट्टी होने वाली है... फुलेशरी कामतानाथ से पूंछ लेना चाहती थी कि वे कहां जायेंगे? वह भी साथ छूट जाने की सम्भावना अपने मन मे लिए थी... जाने क्या हो , उसके मन में शक था, इन लोगों का क्या? मरद के त ऽ खाली मन भरय के बा , पेट तऽ मेहरारू क ऽ भरी नऽ , ‘कामतानाथ से फुलेशरी पूछ ही लेती है’-
‘अब तऽ गांए पर चलल जाई नऽ कामउ त बन्द भय गयल बा‘ कामतानाथ इस सवाल पर चिहंुक जाते हैं, उन्हें सिर्फ ‘हां‘ कहना था, सो उन्होंने हां कह दिया, फुलेशरी के बिना अब वे नहीं रह सकते और फुलेशरी बिना शादी के कुछ..........
अस्पताल से छुट्टी हो जाती है, कामतानाथ कहीं और न जा कर फुलेशरी और रामआसरे के साथ उनके गांव चले जाते हैं, अब वह पुल बन चुका है, उसी पुल पर से कामतानाथ के बच्चे आने-जाने लगे हैं, और बांध ठीक उसी तरह से पड़ा है जैसे पहले था... कामतानाथ ने जिन्दगी के बांध पर से आने-जाने के लिए फुलेशरी और बच्चों को मिलाकर एक मजबूत पुल बना लिया है उन्हें विश्वास हो गया है कि यह पुल अब टूटकर नहीं बहेगा।
कथ्य-रूप अंक 22 माार्च
इस शहर में कभी रहते थे हबीब भाई !
गनीमत थी कि फोन मिल गया पिछले दंगे में तो कहीं फोन भी न मिल पा रहा था दूसरी तरफ जगन दादा थे, जगन दादा की कृपा रहती है हबीब भाई पर.... उनकी कृपा के कारण हमेशा हबीब भाई दंगे के दुष्परिणामों से बचते रहे हैं, बाबरी मस्जिद गिराये जाने के बाद से जाने क्या हुआ कि इस शहर होेते कस्बे में कहीं से चिन्गारियां , तो कहीं से आग या फिर डायनामाइट कुछ दूसरे किस्म के बम धड़ा-धड़ फूटने लगे हैं, आग की लपटें उठने लगी हैं। दो साल से तो दंगों का रूप कुछ ऐसा बदल गया है कि कुछ समझ में नहीं आता, दूर दृष्टि वाले बौद्धिक भी नहीं समझ पाते कि झुग्गी-झोपड़ियां आखिर क्यों जला दी जाती हैं, वे बेचारे तो मजूर हैं उनसे जात-पात, धरम-करम से कोई सक्रिय मतलब नहीं....पिछले साल के दो साल पहले जो दंगा हुआ था उसमें अन्य बातों , कामों, षड़यंत्रों के अलावा यह हुआ था कि सेठ राधिका शरण दंगे के तत्काल बाद करोड़पति बन गए थे, दंगा चौथे दिन तब समाप्त हुआ था जब शहर के पूर्वी हिस्से वाली झोपड़-पट्टियां जल कर राख हो गई थीं,आज कोई जाकर उस जगह को देखे तो देखता रह जाय, परी लोक की तरह कई महल वहां उग आए हैं जिनमें परियां, राजकुमारियां ,रानियां, पटरानियां निवास करने लगी हैं, आखिर देखने वाला ऐसा तो होगा नहीं जिसे सुन्दर व सर्वोत्तम से एलर्जी हो, खासतौर से बंगलों, महलों, कॉंटिजांे से.....पिछले तीन साल से दंगे का चौथा दिन भयानक आश्चर्य लेकर आता है, जब्बार मियां का पूरा परिवार घर में हीं फूंक दिया गया था, क्योंकि राधिका शरण उनसे नाराज थे, दंगाइयों ने जो झुग्गी-झोपड़ियां जलाई थीं, उसका विरोध जब्बार मियां ने शासन, प्रशासन सभी स्तर पर किया था, इतना ही नहीं विधानसभा में सवाल भी उठवाया था... सो दो साल पहले वे अपने परिवार के साथ घर में जला दिए गए.....पिछले साल का चौथा दिन थोड़ा जनतांत्रिक था, जनतांत्रिक इसलिए कि हामिद खां की कपडे़ की दूकान के साथ शहर के दूसरे नम्बर के सेठ गोविन्द बाबू की दूकान भी लूटी गई थी तथा उनका आंयल मिल जला दिया गया था, माना यह गया था कि गोविन्द बाबू की इस शहर में हैसियत ही क्या है जो नगर पालिका के चुनाव में राधिका शरण केखिलाफ पर्चा भरते तथा इतना वोट पाते कि राधिका शरण महज एक सौ बीस वोट से चुनाव जीतते, यह सब जो हुआ, सारा हामिद खां के कारण,मुसलमानों का नब्बे फीसदी वोट गोविन्द बाबू को जो मिल गया...आज दंगे का चौथा दिन, तमाम तरह के डरों, भयों, अनहोनियों को पीते हुए। हबीब भाई फोन पर , दूसरी तरफ जगन दादा ... हबीब भाई के सुरक्षा कवच, जो सहूलियतें सरकार न दे पाए वह सब जगन दादा पलक झपकते दिला दें, हामिद खां
के पीछे चलने वालों में हबीब भाई भी इन्होेंने भी चाहा था कि राधिका शरण किसी भी तरह चुनाव न जीतंे, क्योंकि वह लूट-पाट करने , बस्तियां उजाड़ने, जलवाने के अलावा दूसरा कुछ नहीं करता, हल्ला तो यह भी था कि हबीब भाई नेचुनाव में लाखों खर्च किया तथा हामिद खां को सभासद भी चुनवा दिया। पिछले साल के दंगे के तारगेट हबीब भाई थे, लेकिन जगन दादा के चलते वेतारगेट से बाहर हो गए थे, जगन दादा ने साफ कहा था, ‘मैं नहीं रहूंगा तो चाहे जो हो जाए , आप निश्चिन्त रहें हबीब भाई, पचास हजार की गड्डी जेब के हवाले करते हुए वे सकुचाए थे ‘इसकी क्या जरूरत हबीब भाई, अभी दो महीने पहले ही तो ले गया था दस हजार,’ पिछले साल का दंगा मौसम जैसा आया,कई जगह आतंक एवं क्रूरताओं की सघन बारिश हुई, बस्तियां जलीं, बम फूटे , कट्टों, राइफलों से गोलियां निकलीं, कुछ सड़कों , गलियों के काले, फर्श पर खून के चकते उभरे, श्मशानों ,कब्रिस्तानों में रौनक बढ़ी, पोस्टमार्टम घर का सफाई कर्मचारी सुमेरन नाक-मुंह सिकोड़ता रहा, रोज-रोज लाशें, लाशों की तरह खामोश लोग, मातम मनाते, फिर कौन दंगा करता है? सुमेरन खुद से पूछता तथा लोगों के चेहरे पढ़ने लगता... किसी दिन राधिका शरण से पूछा था जब जब्बार मियां के घर की सात लाशें किसी वोटर लिस्ट की तरह पोस्ट-मार्टम घर के सामने पड़ी थीं कि उनका नम्बर आए, फिर वे पोस्टमार्टम घर मंे पहुंचे..‘ले पकड़ पांच सौ रूपया, सात लाशों के लिए कम नहीं हैं, फटा-फट पोस्टमार्टम करवा, तूं का जानेगा दंगा का होता है , क्यों होता है? रहने दीजिए सेठ जी, मैं थूकता हूं इन नोटों पर , दंगे की लाशों का रूपया नहीं लेता, पूछ लीजिए डाक्टर साहब से, वे आपके दोस्त हैं, कहा था सुमेरन ने फिर उसका मुंह थूक से भर गया था... भीतर किसी ने सुझाया था ‘थूक दे
सुमेरन! इन हरामजादों के चेहरों पर‘ पर व्यवहारिक स्तर पर सुमेरन के लिए सभी के चेहरों पर थूकना संभव न था, वह बिना इधर-उधर हुए पोस्टमार्टम करवाने में लग गया था डाक्टर साहब के साथ, ‘फिर सोचा तुम्हें ठिकाने
लगाना ही होगा राधिका शरण,‘हबीब भाई भी पोस्टमार्टम घर पर थे, सुमेरन उनके भीतर उतरता जा रहा था गहरे तक, सुमेरन पांव से लेकर सर तक उन्हें जिन्दा इन्सान लगा था इतना जिन्दा कि हबीब भाई उसके घर भी गए थे एक दिन कि ऐसे आदमी की मद्दद्द करनी चाहिए, सुमेरन की झोपड़-पट्टी को किसी की मद्दद्द की कोई जरूरत न थी, साफ-साफ कहा था
सुमेरन ने , ‘मुझे रूपया नहीं चाहिए हबीब भाई ! काम चाहिए केवल, तथा उस काम की वाजिब मजूरी, लाशों से किए गए वादे को मुझे निभाना ही है लाश बनने तक,‘ फोन पर बाते करते हुए हबीब भाई के हाथ हिल रहे थे तथा पिछला साल उन्हें कंप-कपा रहा था, वे बार-बार जगन दादा को याद दिलाते , ‘ शह्र न छोड़िएगा दादा, मुझे तो डर लग रहा है राधिका शरण से तथा रौशन मियां से, राधिका शरण से तो कम , रौशन से ज्यादा, रौशन धमकियाता घूम रहा है तथा इस समय राधिका शरण के साथ हो गया है,‘
रौशन मियां एवं हबीब भाई के बीच झगड़ा तब उगा जब रौशन को ‘तहबाजारी‘ का ठीका न मिला, वह मिल गया जगन दादा के आदमी को, तब से रौशन मियां ने मान लिया कि हबीब खां को पटखनी देनी है, संभव हो सके तो जब्बार मियां के यहां पहुंचा देना है...
हबीब भाई के पास अदभुत किस्म के साहस की हमेशा कमी रही सो वे जब्बार मियां न तो बनना चाहते है, न ही उनके यहां पहंुचना चाहते हैं। जगन दादा हबीब भाई को आश्वस्त करने में लगातार थे, ‘कुछ नहीं होगा हबीब भाई , मैं हूं शह्र में, एक दो ट्रक पी.ए.सी. भिजवा देता हूं उस तरफ, कोतवाल को भी बोल दिया है कि हबीब भाई का विशेष ख्याल रखा जाय,‘
हबीब भाई फोन पर ‘अच्छा‘, ‘अच्छा‘ बोल ही रहे थे कि उनकी बालिग होती लड़की तथा उससे दो साल छोटा लड़का... दोनों चिल्लाने लगे.... चीख थी एकदम से डरीव आक्रान्त.
दंगाई आ रहे है अब्बा !
दंगाई आ रहे हैं अम्मी !
दंगाई आ रहे हैं अब्बा,
वे नारा लगा रहे हैं,
हबीब भाई बच्चों की चीख को जब तक समझ पाए, जगन दादा का फोन कट चुका था फिर वह कभी नहीं मिला...,फोन में घर-घराहट,तथा अग्रेंजी में कम्प्युटरी लटका-झटका कृपया सही नम्बर डायल करें‘, हबीब भाई
पसीना-पसीना....उन्होंने घड़ी देखी , सुइंया समकोण थीं, रात के नौ या बारह !‘बारह‘ !चौंके हबीब भाई, नहीं नौ ही , यही तो समय था जब जब्बार मियां जला दिए गए थे, दंगे का चौथा दिन तथा रात का नौ ‘इसी समय अनहोनी उतरती है, सज-संवर कर इस शहर में,‘ हबीब भाई कांपने लगे, सामने अवाक् खड़ी थीं बेगम, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मुहम्मद अली की छोटी बिटिया जो मरे सन् नब्बे में, राष्ट्रीय सम्मान के साथ उन्हें दफनाया गया था, प्रदेश के कई मंत्री भी शामिल हुए थे शव-यात्रा में , जब तब हबीब भाई के साथ बेगम देखा करती हैं अब्बा की बीडियो फिल्म स्क्रीन पर, खूब खूब रूलाता है तत्कालीन मुख्यमंत्री का रोता हुआ चेहरा,
‘वही मुख्य मंत्री तो आज-कल केन्द्र में मंत्री हैं, यदि उनके यहां हबीब भाई ने फोन किया होता या चले गए होते तो डर नहीं रहता,‘बेगम ने सोचा कि बच्चे यंू ही चीख रहे ऐसा नहीं है दंगाई उन्हें लूटें, उनके परिवार का
हबीब भाई की तरह कांपने लगीं, अब क्या होगा? पहले उन्होंने लड़के को देखा,
आंखे पैर से लेकर सर तक को नाप र्गइं, बगल में खड़ी थी लड़की, आंखों ने
लड़की को देखने से इन्कार कर दिया, जब्बार मियां की लड़की को भी बेगम न देख
पाई थीं, जितना देखना चाहतीं, उतना अनदेखा रह जाता जब कि लाश में बदल गई
थी लड़की, लाश में क्या देखना? फिर भी सोचा था बेगम ने ‘लड़कियां मुसलमान
या हिन्दू तो होती नहीं‘, अक्सर अम्मा कहती थी, वे हिन्दू थीं तथा
उन्होंने अब्बा से प्रेम विवाह किया था....
मकान के ऊपरी छत पर हबीब भाई रहते थे, नीचे का हिस्सा इलेक्ट्रिानिक
सामानों की दूकान के लिए था, दिल्ली में कोई इलेक्ट्रिानिक सामान आता
हबीब भाई अपनी दूकान में रख छोड़ते,
बिके-न-बिके, टी.बी., वी.सी.पी., सी.डी., कम्प्युटर बगैरह सबसे पहले इस
शहर में हबीब भाई की दूकान में आए, इसी तरह डिस्क, फैक्स व इन्टरनेट भी
सामानों का वाजिब दाम लेने के कारण उनकी दूकान में भीड़ रहती, वे सामानों
के साथ लगे पोछिल्ला ‘वारंटी‘ को धोखा मानते तथा ग्राहकों को साफ-साफ
समझा देते.
दंगाइयों की आवाजें जो नारों, चीखों, हल्लों में तब्दील हो चुकी थीं, वे
इक्ट्ठा होकर जहां-कहीं से भी उन्हें जगह मिलतीं, कमरे में घुस रही थीं,
आवाजें जो पहले अस्पष्ट थीं, धीरे-धीरे साफ होने लगी थीं जिसे हबीब भाई ,
बेगम, लड़का तथा लड़की चारो सुन रहे थे, लड़के पर कुछ एक्शन फिल्मों तथा
कम्प्युटर गेम का प्रभाव था, उसे मालूम था कि अब्बा की राइफल से गोली
निकलती है जो किसी को भी मार सकती है,अब्बा, अब्बा ! राइफल निकालिए...
निकालिए अब्बा,
लड़की भी लड़के के विचार की थी ‘अब्बा डरपोक हैं, कांप रही है उनकी आवाज,
वह किसी जांबाज से निकाह करेगी‘, उसे अब्बा पर घिन आई... डरपोक उसे अच्छा
नहीं लगते....
लड़का भी ‘राइफल‘ ‘राइफल‘ कहते-कहते थक गया, हबीब भाई तटस्थ व खामोश बने
रहे किसी हिन्दू देवता की मूर्ति की तरह, जो न बोलता है, न हंसता है, न
रोता है, हबीब भाई कुर्सी पर से उठे फिर पलंग पर जाकर पसर गए.......
बेगम बच्चों की तरह उन्हें तजबीजती रहीं, उन्हें भी लगा ....कि ‘सच्चा
मुसलमान कमजोर नहीं होता‘ वह मुकाबले में पीठ नहीं दिखाता‘ फिर उन्हें
ख्याल आया किससे मुकाबला? मुसलमानों के बारे में सुनी-सुनाई बातें अचानक
फुर्र हो गईं, ‘अकेली राइफल से कितनी गोलियां निकलेंगी, तथा कितनों को
मारेगी राइफल ? युद्धों,हमलों वगैरह के बारे में पढ़ी हुई विवेचनाएं
फड़फड़ाने लगीं... कि प्रायोजित हमलों का मुकाबला अप्रायोजित ढंग से नहीं
किया जा सकता,‘
बेगम बच्चों की तरफ पलटीं...
‘ये राइफल-राइफल क्या लगा रखा है, चुप करो जाओ सो जाओ...‘
लड़की गुस्से में थी, ‘वे घर में घुस आए तो !‘
बेगम ने सुना कि लड़की का अंग-अंग बोल रहा है, केवल मुंह नहीं...फिर तो घर
की दीवारों खिड़कियों , रोशनदानों ,सबसे चीखें उभरीं...
‘हमें बचा लो‘ ‘हमें बचा लो.....!‘
अचानक बेगम की देह भी चीखने लगी.....‘इसे कैसे अनछुआ रहने दोगी बेगम!
बेगम कांपने लगीं....‘ बुरे काम के लिए इस उम्र में भी तुम बुरी नहीं‘
उन्होंने सुना जैसे कोई कह रहा हो तथा उनकी तरफ बढ़ा आ रहा हो, क्षण भर के
लिए किसी मूर्छा ने उन्हें जकड़ लिया , लड़की वहीं लाश की मानिन्द खड़ी थी,
लड़का भौचक था तथा हबीब भाई किसी जगत नियन्ता से दुआ की भीख मांग रहे थे,
आवाजें इतनी तेज थीं जैसे कान में घोल की तरह डाली जा रही हों, इधर उनके
यहां नहीं फिर किधर जाएंगे दंगाई.... बेगम ने खुद से पूछा....
‘कोई है भी तो नहीं इधर, केवल तीन-चार घर ही तो हैं मुसलमानों के वे भी
पीछे छूट गए‘ आवाजें नजदीक से सुनाई पड़ रही हैं.... बेगम ने दुबारा
बच्चों से कहा सोने के लिए पर बच्चे इतने डरे व सहमे थे कि उन्हें नींद
कैसे आती..... बेगम कुछ सोच कर हबीब भाई की तरफ बढ़ीं पलंग के पास..
‘क्या किया जा सकता है ऐसे में ? दंगाई मेरे घर की तरफ ही आ रहे हैं,
आवाजंे साफ-साफ सुनने में आ रही हैं,
‘वही तो सोच रहा हूं कि किस तरह सोचूं ? मुसलमान की तरह या इन्सान की तरह !‘
‘इस माहौल में इन्सान कहां मिलेगा? माहौल ने खुद ही , कुछ को हिन्दू
तथा कुछ को मुसलमान बना दिया है, आपस में कट मरने वाला‘, वही तो दिक्कत
है बेगम !दंगे भर मैं मुसलमान ही रहंूगा, चाहूं भी तो इन्सान नहीं बन
सकता,
इन्सान बने रहने का सिर्फ एक ही तरीका है , अगर दंगाई छत पर आ गए तो वही
करना पडे़गा,‘
‘क्या तरीका है ?‘ चकराते हुए बेगम ने पूछा,
‘घबराओ नहीं बेगम ,वक्त कभी भी दोगली जुबान नहीं बोलता, इसलिए वक्त को
बोलने दो, देखो ! दंगाई क्या करते हैं? पलंग पर बैठते हुए हबीब भाई ने
बच्चों को पास बुलाया तथा दुलार करते हुए उनसे सोने के लिए कहा....
‘नींद नहीं लगेगी अब्बा‘, बिटिया ने सहम कर बताया....
हबीब भाई के कहने पर सभी लोग एक साथ बैठ गए तथा अल्लाह- ता‘ला से दुआ
करने लगे , बच्चों को पास पाकर हबीब भाई भावुक हो उठे, उनकी आंखें
ओवरफ्लो वाली कविता जैसी छलछला गई, कुछ बूदें अनायास ही जमीन पर गिरीं जो
भाप बनकर ऊपर उठीं... आह व कराह से तपी भाप ने हबीब भाई का चेहरा झुलसा
दिया... उन्हें लगा कि अब उनके पास इन्सान होने का कोई सबूत नहीं,
शायद वह भी सबूत नहीं था उनके पूर्वज रहमत खां का अपनी रियासत की हिफाजत
के लिए दिया गया बलिदान, जब अंग्रेजों ने हर तरफ से चेतसिंह को बनारस के
किले में घेर लिया था तब कौन था उनके साथ , वही मियां रहमान खां, पांचों
वक्त की नमाज पढ़ने वाले अगर रहमान खां न होते, तो क्या वहां से भाग पाते
चेतसिंह ? रहमान खां मारे गये थे, अंग्रेजों से कितना लड़ते ? कब तक लड़ते?
तब वे आदमी थे, आज ‘मुसलमान‘ हो गए थे, हमलावर , आक्रान्ता, चंगेज व
गजनवी की तरह.
इच्छा हुई कि फूट-फूट कर रोयें फिर यह समझ कर कि सभी रोने लगेंगे, हबीब
भाई ने नकली गंभीरता ओढ़ ली , गंभीरता ओढ़ते ही आवाजें कान में घुसने
लगीं... हबीब भाई ने खिड़की , थोड़ा खोल कर गली में झांका... सिर्फ सर ही
सर दिख पडे़, सैकड़ो सरों की चादर जैसा सभी का मुंह कुछ बोलता, हल्ला
करता... आगे-आगे राधिका शरण का छोटा लड़का था अठारह साल का , जवान होता
लड़का...
हबीब भाई ने उसे देखा जो सीधे निशाने पर था , यह सब नहीं करना हबीब भाई
ने खिड़की बन्द कर ली तथा भीतर वाले कमरे में रखी राइफल व कारतूस का झोला
निकाल लाए, उन्होंने राइफल को घूरा... जाने कितने बाघों, शेरों को मारा
है इसने पर बीसियों साल से इसकी नाल से एक भी गोली नहीं निकली... मैग्जीन
निकाल कर हबीब भाई ने साफ किया तथा उसमें कारतूस भर कर राइफल में लगा
दिया, राइफल को पलंग पर रखते समय उन्होंने उसे बोल्ट भी कर लिया तथा सीढ़ी
वाले दजवाजे पर जाकर
देखा कि वह ठीक से बन्द है कि नहीं, वह बन्द था... हबीब भाई पलंग पर जाकर जम गए,
नीचे दूकान मंे लूटपाट चल रही थी... दूकान का शटर तोड़ा जा चुका था, जो
जिस सामान को पाता, उठाता, सीधे घर की तरफ खिसक लेता... राधिका शरण का
लड़का जीप से आया था सो वह सामानों से जीप ठूंसने में था,
देखते-देखते दूकान खाली हो गई जैसे उसमें कुछ रहा ही न हो, रहा भी हो तो
उसके होने का कोई मतलब नहीं, दूकान लूटे जाने के दौरान बेगम ने दो-तीन
बार नीचे ताका-झांका तथा हबीब भाई को बताया भी पर हबीब भाई स्थिति प्रज्ञ
जैसे ‘लूटने दो... यह आज के वक्त की जुबान है,एकदम से एक तरफा हमलावर तथा
खतरनाक’,
हबीब भाई अक्सर कहते है कि वक्त की जुबान तो बंटवारे के बाद ही बदल गई
थी, जैसे नया जन्म हुआ हो नफरत,घृणा का, जवान अब हुई है,
पलंग पर बैठे हुए हबीब भाई , बेगम , लड़का व लड़की चारो के दिमाग पर
कब्रिस्तान का कब्जा था, तमाम मरे हुओं, मारे हुओं के दृश्य स्वतः फड़फड़ा
रहे थे, ‘कोई नहीं बचेगा, सभी मारे जायेंगें,‘ लड़का, लड़की को मरा पाता तो
लड़की लड़के को तड़पता, छटपटाता, देखती, मौत हर तरफ टहलती, मचलती, इठलाती
सभी से जिरह करती,
‘तुझे जीने का हक किस कमीने ने दिया?‘ उत्तर किसी के पास नहीं था चारो
लाश बनने की प्रक्रिया में थे, सो कमरे की तरह जड़, खामोश व संवेदनहीन थे,
हबीब भाई नीचे से आने वाली कर्कश आवाजें सुन कर जब-तब दरवाजे का बन्द
होना देखते, फिर आश्वस्त होकर लौटते, आधे पौने घंटे के भीतर ही नीचे की
आवाजों का दम टूट गया, अब वहां सांय-सांय थी, अलबत्ता अगल-बगल तथा सामने
के मकानों में कानाफूसियां जोरों पर थीं,
पूरा मुहल्ला आतंकवादी खामोशी में था, उसी में पसरा हुआ , नहाता, गोता
लगाता, आवाजें जो कान में सुराख कर रही थीं, वे भी खामोश थीं, हबीब भाई
की इच्छा हुई कि सीढ़ी का दरवाजा खोलें तथा दूकान में जाकर देखें ‘ कुछ
बचा कि नहीं !‘
वे दरवाजे तक गए , दरवाजा खोलना चाहा, बेगम ने रोक दिया, ‘रहने दीजिए मत
खोलिए अब क्या देखना, जो नसीब में नहीं था वह कैसे रहेगा, कोई न कोई ले
ही जायेगा,‘ बिना खाए पिए रात गुजरी, कुछ जागते हुए तथा कुछ नींद को
पकड़ते हुए, पर ऐसे में जागना हो सका न ही सोना, छठवें दिन सरकारी घोषणा
हुई कि दंगे पर नियंत्रण कर लिया गया है, शहर के संबेदनशील मुहल्लों से
कफर््यू हटा दिया गया है, अब शहर सामान्य होकर पूर्ववत् हो गया है,
हबीब भाई दूकान में उतरे, दूकान सिर्फ दूकान थी तथा सामान दूकान में से
गायब था, लूट लिया गया था सारा, हबीब भाई दूकान की हालत देख कर सन्न रह
गए, अब वे हबीब भाई कहां ? जागीरदार रहमत खां के वारिस, देश की मिट्टी के
लिए मरने-मिटने वालों का खानदान, कभी जरूर रहा होगा अतीत के लिए, आज गैर
जरूरी है , कहां जायें फिर सोचते ही हबीब भाई कांपने लगे.. भविष्य के
प्रायोजित, अप्रायोजित डरों में घिर गए...
मार-काट बदला, खून खराबा वगैरह वगैरह... माथे पर छल-छल आए पसीने को पोछा
हबीब भाई ने.... तभी पीछे देखा... बेगम खड़ी थीं सुबह का ठंडा समय था ,
‘ऊपर चलिए, चाय पी लीजिए‘.... बेगम ने अतिरिक्त संवेदनशीलता के साथ हबीब
भाई से आग्रह किया।
‘हां ... चाय तो पीनी ही पडे़गी’ कहते हुए हबीब भाई सीढ़ियां चढ़ने लगे....
पीछे-पीछे बेगम थीं... ऊपर बच्चे नींद में थे- पूरी लम्बाई में पसरे
फैले... बच्चों को देखना भयानक था, किसी लाश को देख रहे हों जैसे, हबीब
भाई,
‘यदि दंगाई ऊपर चढ़ आते तो......! सोये हुए बच्चों की तरफ से सवाल आया,
हबीब भाई को लगा बेगम पूछ रही हैं......जबकि बेगम खामोश थीं, सवालों से
बाहर...दूकान लूटी जा चुकी थी..सारे सवाल भी लूट लिए गए थे... दूकान के
साथ,हबीब भाई ...सवालों से दो-चार हो रहे थे, ‘यदि दंगाई ऊपर चढ़ आते
तो...?वह कोई दूसरा हबीब भाई था, जो कमरा...समय...मौसम...हवा....सबसे
अदृश्य था, पर था कहीं...हबीब भाई के दिल-दिमाग में सेंध लगा कर घुसा
हुआ... एकदम से हबीब भाई की तरह, वही ऊंचाई, वही काठी, वही रंग-रूप , पर
फर्क था, वह साहसी था, इज्जत-आबरू पर मर मिटने वाला.... लड़की तथा औरत मार
देता फिर खुद को गोली मार लेता... चार गोलियां काफी थीं चार जनों के
लिए...
‘आत्महत्याएं भी आत्म-रक्षा का एक प्रकार होती हैं‘, कहता हुआ दूसरा हबीब
भाई कहीं खो गया.... हबीब भाई चाय पी रहे थे कि नीचे से किसी ने आवाज
दी...‘यह कौन आ गया?‘ हबीब भाई ने आवाज की तरंगों को पकड़ना चाहा पर समझ
में कुछ न आया, दंगे के दौरान चाहे किसी साथ जो घट जाये , मातमपुर्सी में
भी कोई कहीं आता-जाता नहीं......हबीब भाई भी तो बच-बचाकर गये थे जब्बार
मियां की लाश देखने... लाशों ने हबीब भाई को धिक्कारा था, ‘कम से कम
पोस्टमार्टम तो करा हबीब वहां राधिकाशरण व रौशन पहले से ही जमे थे...
उन्हें देखकर हबीब भाई की आंखें खून से सुर्ख हो गई थीं...खून की पतली
धार निकली थी आंखों से,‘ मैं सुमेरन हूॅ हबीब भाई, सुमेरन....‘ आवाज साफ
थी, सुमेरन! इस समय यहां किसलिए...कभी आता-जाता नहीं... आश्चर्य में हबीब
भाई डूब गये कुछ क्षण के लिए... फिर उन्होंने दरवाजा खोला, सीढ़ी से
सुमेरन ऊपर आ गया.......
‘कहो ....कैसे ? लो चाय पियो...‘
‘नहीं चाय नहीं हबीब भाई....‘ हबीब भाई ने पहचाना नहीं, पहचानते
तो.....सुमेरन तटस्थ बना रहा,
‘अच्छा तो यह बात है... राधिका शरण मेरी हत्या करवाना चाहता था...‘कहते
हुए हबीब भाई के चेहरे पर जगन दादा का चेहरा उग आया.... जगन दादा के रहते
ही वेे सुरक्षित हैं, आखिर कब तक बचाएंगे जगन दादा? हबीब भाई
सोच में पड़ गए....
‘एक बात बताऊं सेठ जी......जगन दादा अब राधिका शरण को जीवित नहींे
छोडेंगें...कल ही दादा ने सबको बुलाकर कह दिया है कि हबीब भाई की दूकान
का सारा सामान यदि राधिका शरण नहीं वापस करता तो‘...
‘तो क्या ?‘
‘कट-कुट, धांय-धांय‘... सुमेरन ने हंसते हुए बताया,
‘यह सब तुम्हें कैसे मालूम सुमेरन?‘ किसी अबोध जैसा पूछा हबीब भाई ने,
‘हबीब भाई ! आप जगन दादा से मिले है कभी? उन्हें देखा है कहीं ?‘
‘हां केबल एक बार ....वे आए थे मेरे यहां... रात में... ‘ बताया हबीब भाई
ने.... सुमेरन हबीब भाई के सामने किसी मूरत जैसा बैठा था... हबीब भाई ने
सुमेरन का चेहरा गौर से देखा... तथा जगन दादा के चेहरे से मिलान किया...
चौंक गए हबीब भाई,
‘अरे.....दादा आप !‘
‘हां हबीब भाई ! राधिका शरण अब नहीं बचेगा... इस शहर को बचाने का एक ही
उपाय है ...रौशन तो स्वतः ठण्डा हो जाएगा, ‘ कहते हुए दादा सीढ़िया उतरने
लगे.... सीढ़ियों पर पांव धम्म-धम्म बोलते तथा हबीब भाई से कहते ‘पूछ लो
हबीब भाई...कि ‘सुमेरन कौन है दादा ?‘
हबीब भाई ने पूछा...दादा हंसने लगे... हंसते हुए ही उन्होंने बताया....
‘सफाई कर्मचारी...वही ठिकाने लगाएगा राधिका शरण को भी ...‘ फिर दादा
दूकान से निकल लिए...
‘दादा ने अच्छा मजाक किया..... साफ-साफ बता देते,‘ हबीब भाई मन में
बुदबुदाए तथा सीढ़ियां चढ़ने लगे...ऊपर...जाने पर बेगम ने पूछा...‘जगन दादा
थे क्या ?‘ ‘हां‘ फिर चुप हो गए हबीब भाई,
तीन महीने बाद हबीब भाई के घर पर भीड़ थी, भीड़ में किसिम-किसिम के लोग थे,
लोगों के चेहरों पर सवाल थे... ‘शहर क्यों छोड़ रहे हैं हबीब भाई ,
कार पर बिठाते समय हबीब भाई से जगन दादा ने रूआंसा होकर कहा....‘अब
गुजरात पुराना गुजरात नहीं है हबीब भाई, अकेला जगन आपको नहीं बचा सकता,‘
हबीब भाई को गाड़ी कहां ले गई, देश के भीतर कहीं या बाहर ? किसी को मालूम
नहीं... उसी समय ‘समय‘ ने सरकारी कागज पर पर्यवेक्षक की तरह लिखा ‘इस शहर
में कभी रहते थे हबीब भाई !’
शेष अंक अप्रैल-जून-2003
स्मृति-चिन्ह
भोला का क्या पता कि अपनी आत्म-कथा के टूटे हुए हजारों टुकड़ों को उसे ही
ढ़ूढ़-ढ़ूढ़ कर इक्ट्ठा करना होगा, उन्हें शब्द, दृश्य तथा अभिव्यक्ति देनी
होगी, सारा कुछ अप्रायोजित ढंग से हो रहा था, उसका अतीत सूर्योदय की पहली
किरण के साथ उसके जेहन में घुस कर हड़बड़ी तथा उथल-पुथल मचा जाता था, वह
घबड़ा जाता था... वर्तमान को मुक्त रखने का प्रयास करता था, किसी भी
प्रकार से उसके वर्तमान को अतीत का स्पर्श न मिले, उसके अतीत के रोजनामचे
पर लिखा उसका वर्तमान, निश्चित रूप से सामाजिक संरचना की भयानक बीमारी का
परिणाम था, भोला जानता था, जो हुआ था, जो घटा था, मात्र वही उसका भोक्ता
नहीं था, अपने छोटे -छोटे मासूम बच्चों के साथ, एक छोटे से घर में ,
छोटे-मोटे रोजगार के आधार पर, उसकी लड़ाई वर्तमान की भयावहता से लगातार
चलती रही है, बार-बार उसकी समझदार बीबी ने उसे समझाया भी है-क्या करते हो
? कुछ दूसरे किस्म के काम-धाम के बारे में सोचो, इस काम से तो कुछ
होने-जाने वाला नहीं है ? फिर लकड़ियां भी तो रोज महंगी होती जा रही हैं,
फायदा भी कुछ खास नहीं रह गया है, पलंग और कुर्सी बना-बना कर बेचने में,
दस-बारह साल में लड़की शादी करने लायक हो जाएगी....सोचो कुछ सोचो,भोला कतई
विचलित नहीं होता है सुमित्री की बातों से , सुमित्री ने समाज देखा ही
कहां है...उसे क्या पता कि यह दुनिया कितनी अस्थिर है, कितनी
क्रूर है... और वह दुनिया की इस बेरहम संरचना की क्रूरता भोगने की
नैतिकताओं का प्रत्यक्ष अनुभव है , सुबह होते ही पलंग बनाने के काम में
लग जाता है, फर्नीचर बनाने का काम हालांकि उसने कहीं सीखा नहीं था, बचपन
में जंगल जाकर किसिम-किसिम की लकड़ियों के टुकड़ों पर किसिम-किसिम की
आकृतियां बनाया करता था, उसकी मां जंगल में घूम-घूम कर सूखी लकड़ियां
चुनती थी गट्ठर बनाने लायक, इक्ट्ठा करती थी और भोला, निश्चित आकार की
लकड़ियां ढूढ़ने में लगा रहता था, एक बार तो उसकी मां ने काफी मारा-पीटा भी
था उसे, जब उसने किसी लकड़ी के टुकड़े विशेष को ढूढ़ने में, गगरी में रक्खी
शराब गिरा दिया था, बड़ी अच्छी दारू बन गई थी, किसी दूसरे गांव के ठाकुर
साहब ने अपने खास-मेहमानों के लिए आर्डर देकर बनवाया था, उस दिन ही उसे
ले जाने के लिए किसी को भेजने वाले थे ठाकुर साहब ! अब क्या होगा ? दारू
घर में गिरकर फैल गई थी, खूब रोया था भोला, और घर छोड़ कर बाहर भाग जाने
का फैसला भी कर लिया था उसी दिन, ठाकुर साहब का कोई आदमी दारू लेने के
लिए भोला के घर आया था, उसकी मां को बहुत भला बुरा बकने लगा था, फिर जाने
क्या हुआ कि उसकी बड़ी बहन तेतरी के बारे में पूछने लगा था, कहां है वह ?
उसे बखरी पर भेज देना, मालिक ने हुकुम दिया है, भोला की मां ने साफ-साफ
कह दिया था उसी वक्त -
क्यों तेतरी वहां जा कर क्या करेगी ?
बाबू साहब के आदमी ने कहा था -
मैं नहीं जानता, मैं तो यह भी नहीं जानता हूं कि तुम जब बखरी जाया करती
थी तो क्या करती थी, कुछ बताओ तो ... जानंू , कहते हुए कसकर पकड़ लिया था
भोला की मां को उस आदमी ने, और झटके से निकल गया था बाहर, भोला, सब सुन
और देखता रह गया था, गुस्से में उठा था.....हाथ में पत्थर का टुकड़ा लेकर,
पर नहीं मार पाया था मां को, कचाचित मारा होता तो सिर फट गया होता...
भागने का निर्णय कई बार स्थगित करना पड़ा था भोला को , वह कभी भाग नहीं
पाया था घर छोड़ कर , घर में तथा घर के बाहर वह बहुत कुछ देखता रहा, समझ
होने की समझ तक वह समझ चुका था कि उसकी मां न तो विधवा है और न ही सधवा,
तथा बहनें न तो कुंवारी है और न ही ब्याहता, भोला जानता था कि उसकी मां
हर हाल में भोला को पढ़ाना चाहती है, गांव के स्कूल से लेकर बाहर के लगभग
छह किलोमीटर दूर तक के हाई स्कूल तक की पढ़ाई , पढ़ सकने में उसकी मां ने
बहुत कुछ किया है, स्कूल के एक दो अघ्यापक भी अक्सर आने लगे थे भोला के
घर , भोला जानता था कि उसे बाहर जलपान लाने के लिए आखिर क्यों भेज दिया
करती है उसकी मां , पहली बार जब गणित के अध्यापक लाल साहब उसके घर आये थे
तो भोला ने सोचा था चलो पाइथागोरस के प्रमेय के बारे में आज अच्छी तरह से
लाल साहब से पूछ लंेगे , आखिर कर्ण पर बने वर्ग का क्षेत्रफल त्रिभुज की
शेष दो भुजाओं पर बने बर्गों के योग के क्षेत्रफल के बराबर क्यों हो जाता
है ? पर नहीं पूछ पाया था, भोला कभी भी लाल साहब से। हाई स्कूल पास
करते-करते तक वह खुद एक प्रमेय बन गया था, बिना किसी भुजा के, पढ़ाई के
दौरान लकड़ी पर बनाई गई कई मूर्तियों को वह तोड़ चुका था, फिर भी एक
मूर्ति बहुत जतन से संजाकर रखे हुए था जो उसके घर के पास के भगत दादा की
थी, भगत दादा उससे कहा करते थे....
‘बेटा ! यह दुनिया अजीब है और इस दुनिया से भी अजीब हम लोग हैं, हमारी
बिरादरी है, इस दुनिया में जीवित रहने की जरूरी शर्त है, आंखें खुली रखो
पर कुछ देखो मत , मुंह खोलो बन्द-करो पर ध्यान रहे कि न तो चीखो और न
चिल्लाओ, कान केवल सुनने के लिए है सुनो और लगातार सुनते रहो वह सब , जो
तुम सुनना नहीं चाहते हो.....’
भगत दादा आज नहीं हैं, उनकी यादें भोला के पास हैं, भोला चुप हो गया है,
गूंगा हो गया है, अन्धा भी शायद फर्नीचर बनाने के काम में लग गया है।
आस-पास के इलाके में इससे बढ़िया तथा विश्ववसनीय कोई कारीगर नही है
फर्नीचर बनाने का। तिवारी जी भी अपनी बिटिया की शादी में देने के लिए एक
पलंग बनवा रहे थे भोला के यहां, डबल बेड का, ड्रेसिंग टेबुल के साथ,
तिवारी जी का लम्बा कारोबार था....क्षेत्र पंचायत के प्रमुख थे, जंगल
उनके अधीन फलता-फूलता और कटता रहता था, जंगल से साखू और शीशम की लकड़ियॉं
कटवा ली थीं, आरा कसी के बाद भिजवा दिया था भोला के पास। क्षेत्र पंचायत
के कार्यालय से वापस लौटते समय भोला की दूकान पर रूककर पूछना चाहा था
तिवारी जी ने पलंग के बाबत, ‘बनी कि नहीं,’
छोटी सी दूकान, प्लास्टिक से ढ़का हुआ एक कमरा, सड़क पर बिखरी पड़ी लकड़ियां,
दो चार पलंग के तराशे पाए, शिरई और पाटियां तथा कहीं-कहीं प्लाईवुड और
सन्माइका के छितराए टुकड़े दूकान के ठीक सामने, डबल बेड की बनी ताजी पलंग
और डेªसिंग टेबुल के शीशे में उतराई तस्बीर को गम्भीरता से परखने लगतेे
हैंे तिवारी जी-फिर भोला-भोला पूछने लगते हैं-
सुमित्री अपने खुले-बालों में कंघी फॅंसा चुकी थी उस वक्त , पर तिवारी जी
की आवाज सुनते ही अकबका कर खड़ी हो जाती है... आंचल से ढ़क लेती है सिर,
घूंघट के भीतर से बता देती है, ‘बाजार गए हैं सामान खरीदने,’
तिवारी जी पलंग का मुआयना करते हैं , बनी पलंग के बारे में पूछते हैं...
सुमित्री कुछ बता नहीं पाती है..... सब भोला पर टाल देती है, तिवारी जी
अपने बडे़ होने की कथित शिष्ट परम्परानुसार, सुमित्री से बतियाने की सारी
कलाओं से गुजरते हुए...सोचने लगे थे ...वाह ! मैं भी कितना बदकिस्मत हूं,
सोना यहां है और पीतल के लिए कहां-कहां भटक रहा हूं, बहुत कुछ बतिया लेना
चाहते थे तिवारी जी, सुमित्री से। सुमित्री को देख लेने के बाद से लगभग
रोज ही आने लग गए थे तिवारी जी भोला की दूकान पर, हालांकि पलंग उठवा ले
गए थे तिवारी जी और मुंह मांगा मेहनताना दिया था, ऊपर से पचास का एक नोट
भी भोला को,भोला ने रूपया गिन कर अपना मेहनताना निकाल लिया था और लौटा
दिया था पचास के नोट को , कहते हुए-आपने अधिक दे दिया है तिवारी जी,
तिवारी जी ने कहा था, अरे नहीं रख लो यह तुम्हारा इनाम है, कितना बढ़िया
पलंग बनाया है तुमने ?
इनाम-उनाम मैं नही लिया करता तिवारी जी?हमें तो हमारा मेहनताना मिल जाए,
यही काफी है,
कुछ दिन बाद एक ट्राली साखू की चीरी हुई लकड़ी भी अपने टेªक्टर से भिजवा
दी थी तिवारी जी ने और कुछ दूसरे किस्म के फर्नीचर बनाने का आर्डर भी दे
दिया था, फर्नीचर बना कि नहीं, इसकी सूचना लेने के लिए अक्सर आने-जाने
लगे थे तिवारी जी भोला की दूकान पर, इस आशय से कि शायद भोला कहीं गया हो
तब सुमित्री से बात करने का मौका मिल जाएगा ‘क्या है इसमें एक साड़ी और दो
चार सौ रूपया में तो वह पानी-पानी हो जाएगी, सावित्री थोडे़ है जो देह को
दिमाग से बॉंध कर गठियाए रहेगी...सिर्फ भोला की खातिर,’
सुमित्री ताड़ चुकी थी आखिर क्यों आते हैं बार-बार हमारी दूकान पर तिवारी
जी , उनकी घूरती आंखों में देख लिया था सुमित्री ने बेहया दरिन्दे आदमी
को, जो बज-बजाती देह में तलाश रहा है अतीत की सभ्यताओं के स्मृति चिन्ह,
जिस पर आने वाले दिनों में मक्खियां भी भिनभिनाने में शर्म महसूस करेंगी,
आक-थू... बड़ा घिनौना है यह तिवारी...शायद इसीलिए बड़ा है... बहुत धीरज से
बता दिया था तिवारी के बारे में भोला से सुमित्री ने,भोला ने नाटकीय ढ़ग
से समझाना चाहा था सुमित्री को, अरे ! ऐसा भी क्या है ? बस ऐसे ही देख
लिया होगा तिवारी जी ने तुमको... तुम हो भी तो देखने लायक... फिर
देखने-वेखने से क्या हो जाता है ? तुम्हें अपने ऊपर भरोसा रखना
चाहिए,झटके से उसने खींच लिया था सुमित्री को अपने पास फिर सुमित्री को
नींद लग गई थी, उसके खर्राटा भरने पर भोला की नींद गायब हो गई थी... झटके
से कई बर्ष पीछे लौट गया था भोला, पास में सोई सुमित्री की गोद में
बच्चों की तरह घुस कर रोना चाहता था भोला... रो नहीं पाया था, बच्चे पास
ही में सोए थे- सबके सब चक-बका कर जग जाएगें फिर रात भी तो काफी उतर चुकी
है , सोना चाहा था भोला ने... सो नहीं पाया था...
सुबह उसका मन काम पर नहीं लग रहा था, सुमित्री के जबरी करने पर रूखानी और
बसुला उठा लिया था भोला ने, लगा था गोड़ा तराशने और चूर खोदने आज ही इसे
तैयार करके ग्राहक को देना है, पूरा मेहनताना और लकड़ी का दाम पहले ही दे
गया था .... जाने क्या हुआ कि बसुला छिटक गया और रूखानी भोला के दायीं
हथेली में घुस गयी, एक चीख निकली और धम से बैठ वहीं पर ढेंगला गया था
भोला, दौड़ी-दौड़ी आई थी सुमित्री... अगल-बगल के लोग भी चले आए थे, एक
नौजवान लड़के ने साहस करके झटके से निकाल ली थी रूखानी तत्काल ही भोला को
अस्पताल ले जाया गया था... दवा..दारू हो गई थी, घाव सूखने लगा था, फिर भी
हाथ काम करने लायक ठीक नहीं हो पाया था...
सुमित्री ने पूछा था, आखिर कैसे धंस गई थी रूखानी नहीं बता पाया था
भोला... अरे कुछ नहीं बस वैसे ही, सुमित्री भोला को उदास देख कर परेशान
हो जाया करती थी- आखिर क्या है... जो तुम खोए-खोए रहते हो कोई बात हो तो
बताओ... भोला कुछ बता नहीं पाता था सुमित्री को , भीतर-भीतर ही घुटता जा
रहा था, आखिर बताता भी क्या... यही न कि उसकी मां , मां बन सकने की पूरी
क्षमता के साथ आखिर कैसे बदचलनी की हद तक पहुंच गई थी और उसकी बहनें बिना
ब्याह किये भी कैसे ब्याहता की तरह रह रही है ं? और वह मर्दाना जिस्म
रखते हुए कितना जनाना होता जा रहा है प्रति दिन ! उसकी जिन्दगी के हर
गुजरने वाले क्षण एक यातनामय चीख में कैसे तब्दील होते जा रहे हैं,
सुमित्री...भी कम नहीं थी ...भोला की उदासी को चीरकर टुकड़े-टुकडे़ कर
देना चाहती थी, सदैब सहमी सिकुड़ी सी रहने वाली सुमित्री...इतनी खुल गई थी
कि भोला को बरबस ही खींच लिया करती थी अपनी बाहों में ... पर भोला
प्रतिक्रियाहीन जड़ ही बना रह जाना चाहता था , बिवश हो कर सुमित्री ने
बच्चों की तथा अपनी कसम दे डाली थी... भोला के लिए यह संकट पूर्ण था पर
वह भीतर-भीतर आक्रांत था, कहीं ऐसा तो नहीं कि सुमित्री ...सब कुछ जान
सुन लेने के बाद मुझसे नफरत करने लगे, भूल जाए कि इसमें मेरा दोष क्या
था?
अन्ततः भोला कुछ नही बताता है सुमित्री को, और अपने को ही परिवर्तित करना
शुरू कर देता है संवैधानिक परम्पराओं की तरह... और हर चुनाव के बाद बनने
वाली सरकारों की तरह घोषणा करता है -अरे भाई ! कुछ भी ऐसा नहीं है जो
तुमसे छिपा हो...बस सोच रहा था कि यदि मुझे कुछ हो जाता तो यह घर
परिवार...ढक दिया था अपनी हथेली से भोला का मुंह सुमित्री ने फिर दोनों
खो गए थे.. एक दूसरे में, जहां मृत अतीत और जीवित वर्तमान के भविष्य
न्यूनतम कार्यक्रमों पर समझौता कर एक दूसरे का साथ देने की कसमें खाने
लगे थे,सामान्य हो गया था भोला, काम करना आरम्भ कर दिया था, तिवारी जी,
जिन्हें भोला की दूकान पर आना ही था, आए थे जब, तब भोला ने साफ-साफ कह
दिया था,
‘अपनी सारी लकड़ियां उठा ले जाइए, मुझे नहीं करना है आपका काम, आप यहां
काम कराने आते हैं या मेरी पत्नी को फंसाने, शर्म नहीं आती, बाभन बनते
हैं जानते हैं, मैं किस जाति का हूं, मैं भंगी हूं.. और आपके धर्म में
भंगी को छूने तक से पाप लगता है,
अरे महाराज कुछ तो अपने धरम-करम का ख्याल कीजिए, हम चमरई करें तो कोई बात
नहीं पर आप को यह चमरई शोभा नहीे देती, अवाक रह गए थे तिवारी जी.. संयत
होते ही गुसिया गए इतना कि ... मारने दौड़ पडे़ भोला को पर जाने
क्या समझ कर ... जीप में बैठे और चले गए थे,
भोला का मृत अतीत जीवित वर्तमान बनकर उसे भोला नहीं रहने दे रहा था, भोला
परेशान रहा करता है आखिर क्या था कि वह घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शक और
भोक्ता था फिर भी कुछ नहीं कर पाया था,
घटनाओं को घटने देने का मार्ग सदैव प्रशस्त करता रहा था और आज भी ...कहीं
वही घटनाएं लम्बी खामोशी के बाद फिर से घटने का रास्ता उसके माध्यम से
तलाश तो नहीं रही हैं, सुमित्री तो भोली-भाली है- उसे समझा दिया , वह समझ
गई पर क्या यही समझाना चाहिए था मुझे जो समझाया था सुमित्री को , कतई
नहीं पहले भी मैं जीवन जीने के धोखे में था और आज भी धोखे में ही हूं, हर
तरफ तिवारियों, बाबू साहबों, की असली-नकली नस्लें अपने-अपने पाश्विक
रूपों में सक्रिय हैं, निश्चित ही बुद्धि, धन और बाहु बल से इन तत्वों ने
अपने हित का ही सामाजिक सौन्दर्य शास्त्र गढ़ा है और इन अछूतों में से भी
इन्होंने अछूत नहीं समझा है मादा देह को, भोला आस्थिर हो जाता है,,
बसुला, रूखानी, आरी, आदि सरिया कर रख देता है, सुमित्री से एक गिलास पानी
मांग कर पीता है- फिर चाय,
सूरज खोता जा रहा था रात के अंधेरे में , भोला इसी अंधेरे की प्रतीक्षा
में था, मुर्गा काटेगा आज, दारू भी पीएगा.. और कसम खाएगा कि वह अब
वर्तमान को भूत बना कर मात्र उसका गवाह या दर्शक नहीं बना रहेगा, जीवन का
सच जीवन जीने में उतना ही है जितना कि मर्यादा पूर्ण तरीकों से अपने से
जुडे़ क्षणों को अधिकार पूर्वक भोगा जा सके...
तिवारी को खरी-खोटी सुनाने के बाद वह भविष्य के परिणामों के प्रति
आश्वस्त था.... इतना तो होगा ही...... सुमित्री को भोला ने तैयार कर लिया
था, इतना ही नहीं रात वाली गाड़ी से ही उसे मायके भेज देना था, यही गनीमत
थी कि सुमित्री बच्चों के साथ मायके जाने के लिए राजी हो गई थी वरना भोला
को अपनी प्रस्तावित योजना में दिक्कत हो सकती थी, सुमित्री के चले जाने
के बाद भोला ने सारी लकड़ियों को टट्टर नुमा कमरे के भीतर कर लिया था, फिर
निकल गया था - दूकान के बाहर.....
शोर तब मचा, जब आग भभक-भभक कर जलने लगी थी, जगह-जगह फैला हुआ मिट्टी का
तेल अपनी रफ्तार से बिना किसी संकोच के जल रहा था, लोगों ने आग बुझाने का
बार-बार प्रयास किया पर आग थी कि हवा के झोंकों के साथ बढ़ती ही जा रही
थी, थोड़ी ही देर बाद तो वहां रहना मुश्किल हो गया था... चिरठाइन , यह
क्या गन्हा रहा है.... भोला था कि बाहर पड़ी लकड़ियों को आग पर फेकता जाता
था, देखा तिवारी......! क्या होता है आग जलने के बाद ... दिल की आग शरीर
जलाती है, और जमींन की आग दुनिया को राख में तब्दील कर देती है, लोगों ने
महसूसा इस गरीब का सब स्वाहा हो गया है इसीलिए पगला गया है शायद।
वैचारिकी संकलन:ः सितम्बर , 1996:
जागरण
धरतीडीह गांव की दूरी जिला मुख्यालय से कोई सौ, सवा सौ किलोमीटर के
आस-पास होगी। इस साल के पहले यह गांव अपने आप में एक पूर्ण गांव पंचायत
था। नई पंचायती राज व्यवस्था के अनुसार इस गांव से कई और टोले तथा टीले
जोड़ दिये गये थे, और मतदाताओं की संख्या गिनकर एक हजार से ऊपर बढ़ा ली गयी
थी, चूंकि धरतीडीह गांव आबादी के हिसाब से बड़ा गांव था, इसलिए नियमानुसार
गांव पंचायत का नाम भी धरतीडीह ही रखा गया। चुनाव की शब्दावली में इसे
परिसीमन कहा गया। हालांकि वहां रहने वालों के लिए यह कार्य किसी विशेष
योजना के तहत् नहीं समझा गया न ही इसमें कोई चाल महसूसी गयी,पुराने
प्रधान मंगल सिंह ने जरूर इसका विरोध किया था। उनका कहना था ‘जब जिला
छोटा किया जा रहा है अऊर मीरजापुर को बांट कर सोनभद्र बना दिया गया है,
तब हमार गांव काहे खातीर बड़हर किया जा रहा है हम तो एकर जरूर विरोध
करेंगे’। ’उन्होंने इसका विरोध किया भी। ब्लाक से लेकर डी.एम. तक, पर हुआ
कुछ नहीं। इसका फायदा उन्हें यह मिला कि उनके गांव को आरक्षित नहीं किया
गया। वह सामान्य कर दिया गया जिसका मतलब था हर जाति वर्ग,धर्म,गोत्र का
बालिग व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है। पूरे जनपद में इस आरक्षण का बहुत विरोध
हुआ। ‘आखिर ई आरक्षणवा विधान सभा अऊर संसद में काहे नाहीं हो रहा भाई !’
लेकिन सारा विरोध दब-दबा गया। परसीमन के सारे मामले रफा-दफा कर-करा दिए
गये। दो-तीन बार चुनाव स्थगित होते रहने के बाद इस बार अन्ततः घोषणा हो
ही गई। धरतीडीह का माहौल भी अजीब ढंग से बदल कर चुनावी कलर का हो गया।
रात भर जागरण शुरू हो गया। गांव में बिजली तो थी नहीं पर हैसियत के
मुताबिक सभी के दरवाजों पर दिया-ढिबरी और लालटेन चमकनें लगी। लोग-बाग
ग्यारह-ग्यारह बजे रात तक इधर-उधर टहलते-घूमते दिखाई देने लगे। धतीडीह
गांव जाति बिरादरी तथा अन्य कई हिसाब से काफी विभक्त था। ठाकुर टोला,
पंडित टोला, धांगर टोला, हरिजन टोला, यादव टोला तथा चेरो, मांझी खरवार
टोलों में। इस गांव के पंडितों ठाकुरों और अहीरों की लड़ाई मशहूर थी।
हमेशा से आपस में लड़ते रहने वाला यह गांव कभी भी थाने या अदालत की सीमा
से बाहर नहीं निकल पाया। पिछले चुनाव में किसी प्रकार से इधर-उधर की गोटी
बिठाकर, धांगरों, मुसहरों, हरिजनों को रूपया पैसा साड़ी ब्लाउज देकर तथा
दारू पिलाकर मंगल सिंह जीत गये थे। किन्तु हार-जीत का अंतर काफी नहीं था,
सिर्फ बीस वोट ही कम थे परमेशर के। चुनाव जीत जाना धरतीडीह के लिए उतना
महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि चुनाव के बाद के वर्षों में झगड़ों को
संभाल पाना। परमेशर ने भी कम तिकड़म नहीं लगाया था, मंगलसिंह के चचाजात
भाई को पुराना टैªक्टर दिलवाकर अपने साथ कर लिया था। मंगल सिंह आप भी
बताते हैं- ‘अरे हमसे का पूछ रहे हैं साहेब! हमारे दिल से पूछिए, कउन
ससुर पागल होगा, जो चुनाव-फुनाव में खड़ा होगा। का मिलता है एम्मे ?
जवाहिर रोजगार योजना का रूपइया नऽ । अरे साहब ! आधा से भी कम मिलता है,
का सेक्रेटरी अउर बी.डी.ओ. साहब मुह बांध के आए हैं, उनको लड़िका बाला,
मेहरारू नहीं है का, हम तो जानि गए आधा दो तो काम कराओ नहीं तो सेकरटरियय
गांव में कउनो को बहकाकर जांच पड़ताल कराना शुरू करवा देगा। फिर दौड़ो जिला
तक, छोड़ो खेती-बारी , ना भइया भीख मांग लो पर चुनाव न लड़ो’। मंगल सिंह
अपनी मानसिक संरचना को आज की दुनिया से ऊपर मानते हुए पूर्ण तथा दृढ़ थे।
कुछ भी हो चुनाव लड़ना बेकार का काम है- जबकि गांव में कोई वर्ग ऐसा नहीं
था जिसमें से चुनाव लड़ने वालों की कमी रही हो, सभी गांव परधानी के लिए
लालायित, उत्साहित थे।
वभनान टोला के परमेश्वर का क्या कहना। ‘इस बार मंगलवा को थाह लगा दूंगा’
कहते घूम रहे थे। उनके सामने पंचाइती राज व्यवस्था के अन्तर्विरोधों का
मामला नहीं था न ही उस संवैधानिक व्यवस्था का जिसके तहत यह बहु-प्रचारित
चुनाव कराया जाना था। किसी भी तरह से मंगल सिंह को चुनाव जीतने नहीं देना
है, कोई उनकी बपौती नहीं है? क्या पांच साल परधान रह लिए कम है,? ‘अरे
इसे तो सस्पेंड हो जाना चाहिए था। पर अधिकारियो तो भ्रष्ट हैं। यह साला
ठकुरवा खूब खिलाता, पिलाता भी तो है,
जब देखो दारू, मुर्गा बकरा, अरे ! क्या-क्या नहीं करता?’
तमाम तरह की शिकायतों का बाजार मंगल सिंह के खिलाफ गर्म था। शिकायतों की
जांच पड़ताल करने पर पता चला कि पूरे गांव में परमेशर का यही काम है,
घूम-घूम कर मंगल सिंह की शिकायत करना, कभी कूआंे के निर्माण में। परमेशर
शिकायतों के पर्याय बन गए थे। बात-बात पर मंगलसिंह और मंगल सिंह का
विरोध, विरोध की सीमा सारी नैतिकता पार कर गई थी। भाई-चारा , मुहब्बत सब
छूट गया था। रह गई थी सिर्फ मंगल सिंह की शिकायत। हर छोटे बडे़ से,
‘जानते हो, सुमेसरा की बिटिया अपने से थोडे़ भाग गई थी, वह मंगलवा उसे
रक्खे था, थाना-थूनी पर सिपाहियों के हवाले करता रहता था, इतना ही नहीं,
जब काई आता था खड़न्जा और इन्दिरा आवास की जांच में रात में सुमेसरा की
बिटिया को ही मंगलवा उसके हवाले कर दिया करता था अरे उसका क्या नाम था -
रमेशरी । ससुरा मौके पर कुछ ख्याल नहीं आता है। ’’
गांव के लोग परमेशर की शिकायतों का क्या अर्थ निकालते थे अस्पष्ट था।
स्पष्ट था तो सिर्फ यह कि लोगों को मजा आता था। रमेशरी का नाक नख्श,
कद-काठी सब कुछ तो पसन्द था, सिर्फ - उभरते लौन्डों को ही नहीं बल्कि
शादी-शुदा जवानों तथा कुछ पुराने लोगों की भी । रमेशरी की तुलना शक्ल
सूरत से किसी हिरोइन से ही की जाती थी। ‘दीदी तेरा देवर दिवाना, कुड़ियों
का है जमाना’ वाला गाना अक्सर लौन्डे रमेशरी को देखकर गुन-गुना दिया करते
थे। और रमेशरी सुनकर निकल जाया करती थी। उसकी मुस्कुराहट पर कुर्बान होने
वालो की तादात, बाजार से लेकर गांव तक बढ़ने लगी। रमेशरी बिना इसकी परवाह
किए अपनी रफ्तार से चली जा रही थी। गांव भी चल रहा था देश चल रहा था,
जाति बिरादरी गोत्र परगोत्र इन सबका मामला सबके दिल दिमाग में रहते हुए
सामाजिक संरचना का आवश्यक हिस्सा बनता जा रहा था। दिखावे के तौर पर कोई
भी इसे बाहर जाने की कोशिश करता नहीं दिखाई पड़ रहा था। पर भीतर-भीतर सब
कहीं न कहीं जाति से जुड़ा होना आवश्यक महसूस कर रहे थे । पूरे प्रदेश में
यह चुनाव भविष्य की रणनीति का पथ-प्रदर्शक बनता जा रहा था। मलाईदार पर्त
के खिलाफ पिछड़ों और दलितों का एक जुट होना और उनमें भी दलितों का पिछड़ों
से अलग होकर अपने अस्तित्व को बचाए रखना अनिवार्य बनता जा रहा था। चुनावी
माहौल ने अगड़ों पिछड़ों और दलितों की त्रिवेणी के स्थिर जल रंग को
पूर्णतया अलग कर दिया गया था। सभी अपने-अपने वर्ग की जीत और सम्पर्क के
चक्कर में पड़ गए थे। मंगल सिंह की चुनाव न लड़ने की घोषणा को काफी
हास्यास्पद महसूस किया परमेशर ने। इसे मंगल सिंह का पतन और कमजोरी माना
‘वो चुनाव क्या लड़ेगा? कउन नहीं जानता कि अब मंगलवा के यहां बचा ही क्या
है? चुनाव लड़ने के लिए। आखिर क्या हुआ? जब उसके बडे़ लड़के का मामला था,
सोनपुरा का सारा बबुआन आया हुआ था, हमारे यहां भी लोग आये थे।
नाश्ता-पानी करने के बाद मंगलवा के यहां गए थे। वहीं रमेशरी दिखाई पड़ गई
किसी तरह से उन लोगों को रमेशरी से मंगल सिंह के रिस्ते की बात मालूम हो
गई, शायद कुछ पहले से भी मालूम रहा हो, कोई बहुत दूर सोनपुरा थोड़े ही है,
बात-चीत हुई पर वरच्छा वाला कार्यक्रम खत्म हो गया, लोग-बहाना बनाकर चले
गये। शादी नहीं हुई न। ‘ऐसे में भला वह चुनाव क्या लडे़गा? अभी उसके
लड़कवा की शादी तो होने दो, वही इसको मार-मार के कुदा न दिया तो मेरा नाम
भी परमेशर नहीं’ मंगल सिंह को यह सब पता न हो ऐसी बात न थी। मगल सिंह सब
जानते हुए घर गृहस्थी संभालने की चिंता में थे। आखिर कमी क्या है? सब
भगवान ने दिया ही है। चुनाव-फुनाव का झंझट बहुत खराब होता है, गांव में
तरह-तरह का मन-मुटाव हो जाता है। लेकिन परमेशर जैसे कुछ लोग थे, जो उनका
मजाक उड़ाते रहे। यही बात मंगल सिंह को अखर गई , उन्होंने सोचा, परमेशरा
हर-हाल में मेरा पीछा करेगा ही आखिर कब तक भागता रहंूगा। जो होगा होगा
चुनाव लड़ना ही होगा और लड़ूंगा। उन्होंने चुनाव लड़ना स्वीकार कर लिया।
फिर क्या था, पूरे गांव तथा हर टोले में यह बात आग की तरह फैल गई। उनके
समर्थकों को खुशी हुई। अब परमेशर का मुकाबिला हो जाएगा। यह आदमी पंडित है
जरूर लेकिन काफी गिरा हुआ। इसका क्या ? कब किसके साथ क्या करेगा उसे ही
कुछ पता नहीं-कौन होगा जो छिः अपने ही घर में.... कितनी बार उसकी विधवा
भाभी का पेट गिराया गया है कौन नहीं जानता ? मंगल सिंह ने कब परमेशर का
साथ नही दिया , हर बार तो उन्हीं की वजह से बच गया नहीं तो जेल की रोटी
खाता। मंगलसिंह के बाप के जमाने में परमेशर के बाप उनके शीरवाह थे। साल
में उन्हें चालीस मन धान मिला करता था। खाना और कपड़ा ऊपर से। मंगलसिंह और
परमेशर दोनों पढ़ने एक साथ स्कूल जाया करते थे, कभी भी मंगलसिंह के बाप ने
परमेशर और मंगल सिंह में कोई फर्क नहीं किया।
दोनों में पटरी भी रहा करती थी। बाद में चलकर परमेशर ने जंगल से बांस और
लकड़ी कटवा कर बेचने का धन्धा शुरू किया और जायज तथा नाजायज खूब धन कमाया।
थाने वालों को खिलाकर कई लाख की लकड़ियां और बांस परमेशर ने शहरों में
बेचा। कहा जाता है कि आज जंगल में कहीं-कहीं साखू और शीशम दीख पडे़गा।
धरतीडीह गांव ही नहीं यह पूरा क्षेत्र थाने की कृपा पर जीता है। दरोगा और
सिपाही की मर्जी ही यहां चलती है। एक तेज और ईमानदार दरोगा के आने से
परमेशर का धंधा बन्द हो गया। अब उनकी आरा मशीन भी बन्द पड़ी है।
उसी समय तीन ट्रक साखू परमेशर ले जा रहे थे थाने के दरोगा ने उसे पकड़
लिया दो ट्रक चला गया था। किन्तु जिस ट्रक पर परमेशर थे वह थाने में बंद
हो गया। थाने को देने के लिए पचास हजार रूपयों की बात बगल के मिसिर जी ने
चलाई पर उनको दरोगा ने भला-बुरा कहकर थाने से भगा दिया। यह सच था कि अगर
मंगलसिंह दरोगा से कह देते तो शायद परमेशर
छूट जाता, पर मंगल सिंह ने साफ-साफ इन्कार कर दिया ‘जो जैसा करेगा वैसा
भरेगा’। मंगल ंिसंह परमेशर को छुड़ाने का कौन कहे देखने तक नहीं गए। यही
बात परमेशर को अखर गयी थी। अखरती क्यों नहीं? इस परमेशर के पास किस बात
की कमी है। लकड़ी की बेच से रूपया कमा लिया था, जमीन खरीद लिया था, आलीशान
दो बखरी का पक्का मकान बना लिया था, राशन के कोटे की दूकान , आरा मशीन,
खाद की दूकान, क्या नही है परमेशर के पास! मंगल सिंह से केवल जमींन ही तो
कम है। तभी से मंगल सिंह और परमेशर में पटरी नहीं रही। हमेशा परमेशर मंगल
सिंह की खिलाफत किया करते। परमेशर की सारी करनी और करतूत से गांव वाकिफ
था। इसीलिए मंगल सिंह के चुनाव न लड़ने की इच्छा से गांव के लोग परेशान भी
थे। परमेशर जैसे फरेबी और लुच्चा आदमी का मुकाबिला करना सबके बस की बात
तो थी नहीं। मंगल सिंह की शिकायत और रमेशरी के मामले में तथा वरच्छा के
दिन सोनपुरा के बबुआनों के साथ परमेशर की बात-चीत ने मंगल सिंह को काफी
उत्तेजित कर दिया। मंगलसिंह ने चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। रमेशरी ने कई
बार मंगल सिंह से कहा भी था कि ‘ई परमेशरा तोहार घूम-घूम कर शिकायत करता
है’ हमारा नाम ले के कहता है कि ‘मंगलवा रमेशरी को रखे है, ई तो हम जानते
हैं कउन किसको रक्खा है ‘अउर आप कहते है कि चुनाव हमें नहीं लड़ना है फिर
क्या करना है? अरे बबुआ ई गांव का क्या होगा? क्या इस गांव का परधानी अब
परमेशर करेगा...... किसी की बहू बिटिया बचेगी क्या ? आप अच्छा नहीं कर
रहे हैं , बबुआ ! कुछ तो गांव का धियान कीजिए, आज ही मलिकिनी से बोले
हैं, मलिकिनी बबुआ को चुनाव लड़ने से मत रोकिए, ई गांव के खातिर। कउनो ऐसा
आदमी नहीं है, ई गांव में जो परमेशरा को हरा पाये। मलिकिनी ने हमसे कहा
था कि ‘तू’हय समझावो, तोहार बात ऊ थोरे टारेंगे। हम उनका कउनो काम में
रोकते हैं का। रमेशरी मंगल सिंह से बतिया कर घर चली गई थी और गांव भर
मंगल सिंह के चुनाव लड़ने की बात फैल गई थी। ब्लाक पर परधानी का परचा भरा
जाना था। मंगल सिंह ने परचा भर दिया। उधर परमेशर का भी परचा भरा गया अब
दोनों आदमी आमने-सामने हो गए थे। गांव में कनवेसिंग का बाजार चढ़ाई चढ़
गया। तरह तरह की चर्चा होने लगी परमेशर ने इस चुनाव में एक लाख रूपया
खर्च करने की घोषणा कर दी। एक एक आदमी पर कम से कम सौ रूपयों का औसत था।
साड़ी-ब्लाउज धोती दारू अलग से। फिर भी इसका कोई खास असर नहीं पड़ा। छोटे-
बड़े सभी मंगल सिंह के साथ हो गए, सिर्फ इसलिए कि मंगल सिंह के चलते कम से
कम गांव में रोज सिपाही तो नहीं आते। दरोगा किसी का कुछ नुकससान नहीं कर
पाता और न ही मंगलसिंह के रहते किसी का चालान ही काट पाता है। मंगल सिंह
में सभी अच्छाइयां थीं। रमेशरी का मामला कुछ दूसरे किस्म का था। लाख
परमेशर ने मंगल सिंह की शिकायतें किया किन्तु इसका असर नहीं पड़ा। वैसे भी
मंगल सिंह ने गांव के किसी आदमी का प्रत्यक्ष रूप से कुछ नुकसान नहीं
किया था। उनके बाप-दादों का ही बसाया हुआ गांव था।
पहले तो उनकी यहां जमीनदारी थी बाद में सब टूट-टाट गयी।
मंगल सिंह के चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद रमेशरी फिर से जवान हो गई,
उसकी ताकत बढ़ गई। एक दिन परमेशर से उसकी मुलाकात हुई तब उसने ललकारते हुए
कहा ‘ऐ पंड़ित तुम पापी आदमी क्या जानो? प्रेम-मुहब्बत की बात हमारे दिल
से पूछो, हमरे अऊर मंगल सिंह के बीच क्या हुआ? जब हमरा विवाह नहीं हुआ
था, अऊर हम कुंवारी थी, तभी से जाने मेरे भीतर क्या हुआ? जब मैं मंगल
सिंह को देखती थी तो सोचती थी कि हमारा सरदार भी बबुआ की तरह होना चाहिए
पर हमारे नसीब में कहां था? बबुआ माफिक सरदार। शराबी पति मिला जो दारू
पी-पी कर मर गया। मैं इस गांव चली आई। मेरे दिमाग में हमेशा बबुआ का
चेहरा घूमा करता था जबकि बबुआ हमारे ओर ताकते भी नहीं थे। मैं बबुआ का
काम करने लगी, सिर्फ बबुआ की झलक पाने के लिए, धीरे-धीरे बबुआ को फंसाना
शुरू किया अब तुमहीं समझो हम बबुआ को रक्खें हैं कि बबुआ हमको रक्खें
हैं।
उस दिन परमेशर से खूब चिक-चिक हुई। परमेशर को काफी गुस्सा आया, गांव में
खुलेआम कुछ कर पाना उनके वश का नहीं था। रमेशरी ने परमेशर को हराने की
कसम खा ली थी। गांव में घूम-घूम कर परमेशर की शिकायत करने लगी। दूसरी ओर
परमेशर रूपिया पैसा बांटने लगे। लोगों को दारू गांजा पिलाने लगे। मुश्किल
से तीन-चार दिन वोट पड़ने में बाकी थे। परमेशर को लगा कि इतना रूपया पैसा
बांट देने के बाद भी गांव का जीतने लायक वोट उन्हें नहीं मिलेगा। मंगल
सिंह ही जीतेगें। परमेशर ने बड़ा भयानक निर्णय लिया, ब्लाक से लौटते समय
मंगल सिंह को अमवारी के पास ही परमेशर ने दो-तीन आदमियों के साथ घेर
लिया, अपनी बन्दूक से मंगल सिंह को गोली मार दिया। लगातार कई फायर सुनकर
गांव के लोग इकट्ठा हो गए। मंगलसिंह को परमेशर ने गोली मार दिया। हल्ला
हो गया। मंगल सिंह की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गई। रमेशरी का रोना और
मंगल सिंह की लाश पर लोट कर , खुद को नोचना, चोथना पूरे गांव ने आश्चर्य
चकित होकर देखा। कुछ ने कहा भी ‘वाह रे रमेशरी।’ मंगल सिंह की हत्या का
बदला लेने का रमेशरी की कसम भी लोगों ने सुना। रमेशरी बेहोश हो गई थी।
ठकुराइन ने अपनी चूड़ियां फोड़ दी, सिंदूर पोछ दिया। गांव उदास हो गया।
पूरे गांव में‘यह क्या हुआ’ का अनायास बादल छा गया। पुलिस आई, परमेशर के
खिलाफ कतल का मुकद्मा कायम हुआ। रमेशरी को भी गवाह बनाया गया। दो चार लोग
और भी। पुलिस की सक्रियता से परमेशर और उसके दो रिश्तेदार भी पकड़ लिए गए।
गांव परधानी का चुनाव स्थगित हो गया। धरतीडीह अपने जन्म के बाद से लेकर
अब तक इस तरह के पहले हादसे से गुजर रहा था। सब कुछ अनचाहा और
अप्रत्याशित। परमेशर के खिलाफ गवाह टूटने लगे। परमेशर की जमानत हो जाने
और दुबारा चुनाव कराए जाने की घोषणा लगभग एक साथ हुई। केवल रमेशरी ही बची
रह गई
थी, जो परमेशर के खिलाफ गवाही करने के लिए तैयार थी। इतना ही नहीं उसने
ठान लिया था कि यदि परमेशर चुनाव लडे़गा तो वह भी चुनाव लडे़गी। हुआ भी
यही परमेशर के खिलाफ रमेशरी ने परचा भर दिया।
मंगल सिंह की विधवा ठकुराइन पुजारिन किस्म की औरत थीं। पहले से ही काफी
शान्त और स्थिर। मंगल सिंह की हत्या के बाद, जमीन, घर , मकान बेचकर गांव
छोड़ बाहर चले जाने का मन बना लिया था ठकुराइन ने। पर मंगल सिंह का बड़ा
लड़का और मंगल सिंह का साला इस बात पर अड़ गये कि नहीं ‘गांव नहीं छोड़ना
है, परमेशर को जिन्दा नहीं छोड़ना है, जिस महीने मंगलसिंह की हत्या हुई है
, वह अगला महीना परमेशर नहीं देखेगा। रमेशरी मंगलसिंह की हत्या के बाद
उदास रहने लगी थी। और ठकुराइन की सेवा सुश्रवा में अपना समय बिताने लगी
थी। मंगलसिंह के बडे़ लड़के राजू को समझाया- बुझाया करती थी ‘देखो ऐसा
नहीं करना है।’ पर राजू मानने वाला कहां था। उसे बदला लेने का भूत सवार
था। बगल में कट्टा लेकर चलने लगा। मंगल सिंह का साला उमर में राजू से महज
तीन चार साल बड़ा था, उन दोनों में मामा भांजे का नाता कम , दोस्ती का
ज्यादा था। मंगल सिंह के घर का शान्त वातावरण युद्ध भूमि में बदल चुका
था। रमेशरी की चिन्ता बढ़ गई थी। वह अपने लिए परेशान थी, चाहती थी कि अब
मंगल सिंह के बाद उसकी भी जिम्मेदारी होती है। उनकी आत्मा की शान्ति के
लिए। परमेशरा ! इसे जिन्दा ही जला देना चाहिए। चाहे कुछ भी करना पडे़।
चुनाव का परचा भरे जाने के बाद से गांव फिर जगमगा गया। मंगल सिंह की
हत्या के बाद का डरा गांव काफी कुछ बदल सा गया। अब परमेशर निर्दुन्द होकर
अपना प्रचार कर रहे थे। किसी में भी परमेशर के विरोध करने का साहस नहीं
बचा था। एक दिन राजू को घेर कर परमेशर ने धमकियाया ‘तुम्हारा भी वही हाल
होगा जो तुम्हारे बाप का हुआ। मेरे रास्ते में न आओ अपना काम करो।
हालांकि राजू डरा नहीं और न ही मंगल सिंह का साला पर ठकुराइन काफी भयभीत
हो गयीं थीं। अपने बच्चों की परवरिस को लेकर उनका दूसरा लड़का भी था जो
काफी छोटा था, और बेबी महज सात साल की । नैहर से घर बार की देखभाल के लिए
उन्होंने अपने बडे़ भाई को बुला लिया था। बड़ा भाई जब आ गया तब छोटे भाई
को घर भिजवा दिया था। अब राजू को बदला लेने की कसम से अलग करने के लिए
समझाना-बुझाना आसान हो गया। राजू के बडे़ मामा और फूफा जी तक ने समझाया
और बभनान टोला के कुछ लोगों ने भी , जिनके संबंध मंगल सिंह से काफी
घनिष्ठ थे, लोग किसी भी तरह से मंगल सिंह के परिवार को उस झगड़े से
निकालना चाहते थे- परमेशर का क्या? समझाने बुझाने का प्रयास सफल हुआ किसी
तरह राजू मान गया। दूसरी ओर परमेशर पर भी गांव के शान्त प्रिय जनों का
दबाव बढ़ा....। पर रमेशरी ! वह बेचारी दो पाटन में फंसी रह गई। मंगल सिंह
के परिवार वालों के लिए रमेशरी ही परमेशर से झगड़े का मुख्य कारण बन गई।
ठकुराइन ने रमेशरी को बखरी में बुलवाकर काफी भला बुरा कहा।
गाली गलौज ही नहीं बल्की मार कर भगा दिया। ठकुराइन की बात अलग थी किन्तु
राजू की मार से रमेशरी टूट गई, बिखर गई। आखिर मंगल सिंह का बेटा भी तो
उसका ही बेटा था न ऽ।
रमेशरी बिना रोये ही अपनी मड़ई में घुस गयी। टटरा बन्द कर खूब रोई, अकेले
ही, अन्तः पीड़ा, बाहर निकलने लगी। आंखे फूल गईं, देह गरम हो गई, बुखार
चढ़ने लगा, सुबह तक रमेशरी का टटरा नहीं खुला । वह टूट चुकी थी उसका बचा
ही क्या था, ‘सब अपनी जान बचाने की फिराक में लग गए, मंगल सिंह की जान
चली गई, बात खत्म हो गई। क्या परमेशर सुधर जायेगा बबुआ की बलि लेकर कभी
नहीं। धूप चढ़ जाने के बाद भी रमेशरी की मड़ई का टटरा खुला न देखकर किसुनी
ने उसका टटरा खटखटाया। तब जाकर रमेशरी उठी । टटरा खुला। रमेशरी को तेज
बुखार था। बात करने में सांस फूलने लगती थी। किसुनी कहीं से दो तीन
टिकिया दवाई लाकर, उसे खिला देती है, रमेशरी के लिए नाश्ता और खाना के
लिए पूछती है। कुछ देर बाद जब रमेशरी का बुखार कुछ उतरता है तब रमेशरी को
समझाने भी लगती है- देख रमेशरी , गांव में कउन मरद है जो परमेशर को
हराएगा। देखती नहीं पूरा गांव डरकर बीमार हो गया है। सबके मुंह पर ताला
लग गया है। आखिर कौन मरना चाहता है ? तुम अपना परचवा वापस ले लो, तुम
क्या करोगी उस हरामी से लड़ कर , जब ठकुराइन को ही सारी बात भूल गई तब
तुम्हारा क्या? हम लोगों की मिहनत-मजूरी करने वाली जात , हमय चुनाव से का
मतलब? जिस किसी का काम करेंगे, मजूरी मिलेगी ही।’ किसुनी चली जाती है
विचारों का ताराविहीन आकाश छोड़कर। रमेशरी खुद को एक लाइट की तरह
प्रक्षेपित करने लगती है। उसे सब कुछ खाली-खाली दीखता है। वह कांप जाती
हैैं बुदबुदाने लगती है ‘जलना है’ आग खुद नहीं जलती, जलानी पड़ती है।’
रमेशरी अपने भीतर मंगल सिंह को ढूढ़ने लगती है, वही मंगल सिंह किसी उपदेशक
की तरह, उसे समझा रहे हैं ‘जो हुआ,हुआ,रमेशरी तुम हमारे लिए काहे परेशान
हो’ मेरे रहने या न रहने से या किसी के रहने और न रहने से जमाने पर फर्क
नहीं पड़ता, मरना जीना तो चलता ही रहेगा, फिर मौत! इससे कोई बचेगा क्या?
मंगल सिंह केवल मंगल सिंह हो गये हैं राजू और ठकुराइन के बारे में भी कुछ
नहीं पूछ रहे हैं। परिवार और समाज से गायब हो चुके मंगल सिंह , अब मुक्त
हैं, रमेशरी का भीतर खाली हो जाता है पचके डब्बे की तरह और मंगल सिंह
बाहर सौर्यमण्डल में विलुप्त। रमेशरी जान गई कि चुनाव में उसे निश्चित
रूप से हार जाना है, परमेशर के खिलाफ विरोध करने का साहस पूरे गांव से
फुरर्र हो गया है। फिर भी उसे तो लड़ना ही है, चुनाव तो बहाना है, असली
लड़ाई परमेशर से है। परधानी लेकर चाटना है क्या? रमेशरी पूरा गांव घूम आती
है, कम से कम एक बार, सिर्फ बखरी की तरफ नहीं जाती। सबसे दुआ सलाम कर
लेती है। परमेशर पंडित की तरफ भी चली जाती है बभनान टोला में। अपने लिए
वोट मांगते हुए हर बडे़-छोटे के पैरों पर गिर जाती है। कुछ बड़े लोग
रमेशरी के साहस से प्रभावित हैं किन्तु परमेशर का भय, गोली बन्दूक और
हत्या आदि। मतदान की प्रक्रिया काफी कुछ गुप्त है किन्तु गांव स्तर पर यह
गुप्त नहीं रह जाती। लगभग सभी मतदाताओं के पास-विपक्ष में होने की
व्यवस्था का खुलासा हो जाता है। जो मतदाता इस पक्ष-विपक्ष की प्रक्रिया
में मुखर हो जाता है वह प्रत्याशियों की आंख की किरकिरी हो जाता है। शुरू
हो जाती है तब बदला लेने की ऐतिहासिक प्रक्रिया पुश्त-दर-पुश्त वाली।
इसका चरित्र आज राजाओं-महाराजाओं या सम्राटों के हास्यास्पद युद्धों से
होते हुए मतदान युद्ध में बदल चुका है। रमेशरी जानती है- जनता के डरने का
कारण, वह यह भी जानती है कि चुनाव पुराने जमाने के राजाओं की लड़ाइयों का
ही यह बदला हुआ रूप है। उससे भी घिनौना, विकृत। पहले राजाओं की लड़ाई
राजाओं के बीच हुआ करती थी। सेनाएं लड़ा करती थीं उन युद्धों से जनता का
मतलब नहीं हुआ करता था किन्तु आज का मतदान युद्ध तो सबको लडना है। हर
वर्ग को हर जाति को हर धर्म और सम्प्रदाय को। चुनावी राजाओं का राजमत
सुरक्षित है, चुनाव का राजा, सिंहासन तथा संविधान सुरक्षित है सिर्फ जनता
ही असुरक्षित है, तो क्या हुआ? जनता है आखिर किस लिए। रमेशरी अपने गांव
के बहादुरों का साहस देखकर, उबकाई से भर जाती है, घिनौने ढंग से थूकती
है- आक थू। बहादुर अब केवल जवान लड़की देखकर सीटियां ही बजाएगें, चाहे
उनकी जिन्दगी की सीटियां दूसरा भले बजाता रहे। कैसे-कैसे लोग हैं,
भरा-पुरा गांव है फिर भी परमेशर चुनाव जीत जाएगा? कोई सामने नहीं आ रहा,
एक बार फिर खंखारकर थूकती है। राजू भी भूल गया मुझे मारकर सन्तोष कर लिया
और ठकुराइन? क्या शीशा नहीं देखती होंगी? मेरा क्या मेरे लिए तो बबुआ ही
शीशा थे- शराबी पति मिला शराब पी-पी कर मर गया, बहुत चाहा उसे खूब सेवा
की, बबुआ जिन्दगी में बाढ़ की तरह आए, सब कुछ बाढ़ की तरह बहाकर चले गए फिर
भी परमेेशर मेरे जीते जी चुनाव नहीं जीत पाएगा, आक थू-पापी कहीं का , मैं
अकेली सही।
उधर परमेशर भी काफी घबड़ाए हुए हैं जनता का रूख उन्हें भी समझ में नहीं आ
रहा है। शायद मंगल सिंह की हत्या के बाद लोग काफी डर गए हैं, कोई भी
खुलकर सामने नहीं आना चाहता। अन्दर-अन्दर सब विरोध में हो ‘ मेरी तरफ हां
में हां ही और रमेशरी की तरफ वोट। हरिजन टोला का भरोसवा भी तो यही बता
रहा था। और निहोरवा तो कह रहा था जो परमा चौबे का आसामी है कि बभनान और
ठकुरान इन दोनों टोलों का’ वोट नहीं मिलेगा। सब भीतर-भीतर जलते हैं।
परमेशर घबड़ा जाते हैं ‘चुनाव के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ा, पिछले
चुनाव में भी 20-25 हजार का खर्च हुआ इस बार भी और एक कतल ऊपर से अभी
मुकद्मा चल ही रहा है। हे भगवान! क्या होने वाला है? लगता है मेरी किस्मत
में परधानी नहीं। परमेशर घबड़ा कर उठ जाते हैं और बैठे हुओं को घर चले
जाने
के लिए कह देते हैं- अकेला होने पर पैकेट निकालते हैं सुराही से पानी जग
में डाल लेते हैं और एक पैकेट दारू एक बार में ही गटक जाते हैं, मेज पर
रक्खा लाई चना चबाने लगते हैं- खुमारी चढ़ने पर एकालाप करते हुए कहते हैं-
मुझे चुनाव जीतना है, ई रमेशरी हमें का हराएगी ससुरी।’ आज ही उसे चलकर
समझा देते हैं कि तुम्हारा भी हाल मंगलवा की तरह ही होगा। नहीं नहीं एक
और कतल यह नहीं चलेगा, मेरे भी बाल बच्चें हैं। ‘ धन दौलत तो बच्चों के
लिए कमाया जाता है न। रमेशरी को पटा लिया जाय तो कैसा रहेगा? अब मंगलवा
थोडे़ है,......वाह-वाह खूब। यह
बात मेरे जेहन में पहले क्यों नहीं आई। परमेशर मगन हो जाते हैं फिर दारू
पीते हैं, और सुन-सान रास्ते में रमेशरी को पटाने के लिए दारू के नशे में
चल देते हैं - क्या लेगी? रूपिया पैसा और जगह जमीन यही न सब दूंगा, वैसे
भी रमेशरी बुरी है क्या? बुरे काम के लिए बहुत भली है।
रमेशरी भी हर हाल में परमेशर से मंगल सिंह का बदला लेना चाहती है, वह
परमेशर को नारी-माया और स्त्री प्रपंच में फंसाकर बदला लेने की योजना को
भीतर से स्वीकारने लगी थी परमेशर को गांव के बीमार और डरे हुए लोग चुनाव
में नहीं हरा पाएंगे। परमेशर जैसे हमेशा पैदा होते रहते हैं जो मरते ही
नहीं। अमर होती है इनकी संरचना । इसी उथल-पुथल में रमेशरी सो नहीं पाई थी
कि टटरा खटखटाने की आवाज सुनाई पड़ी। चारपाई पर से ही लेटे-लेटे
पूछा-मालूम हुआ परमेशर हैं-कुटिल हंसी हंसते हुए वह उठकर टटरा खोलती है
‘अरे परमेशर! रमेशरी को धीरे-धीरे बोलने का इशारा करते हैं परमेशर रमेशरी
तड़ जाती है और....
‘घबड़ाओ नहीं रमेशरी! झगड़ा नहीं तुमसे भींख मांगने आया हूं... हमारी
दुश्मनी मंगलसिंहवा से थी तुमसे थोडे़ ही है, मैं जानता हूं राजू ने भी
तुम्हें मारा पीटा और ठकुराइन ने अपमानित भी किया.......
रमेशरी इस आकस्मिक संयोग को भगवान की कृपा मान रही थी। अच्छा हुआ मछरी
खुद जाल में ’
रमेशरी अपने को परमेशर के अनुरूप ढ़ाल लेती है, परमेशर इसे अपनी जीत समझते
हुए सब भूल जाते हैं उन्हें सब कुछ भूलना ही था- औरत और दारू जीत की
खुशी-परमेशर बेसुध हो वहीं सो गये, रमेशरी उनका हाथ पैर खटिया से बांध
देती है, फिर एक भयानक फैसला, कुछ ही क्षण में मड़हा धू-धू कर जलने लगता
है, इसके पहले कि के लोग इस आकस्मिक घटना का निरीक्षण करते, रमेशरी विलीन
हो जाती है, दूसरी दुनिया में, जो अजीब खूबसूरत है और विचित्र भी। रमेशरी
जीत और हार की रहस्यमयी दुनिया से आखिर परमेशर को हटाना चाहती थी न...
धरतीडीह गांव पंचायत का चुनाव इस बार भी स्थगित हो गया।
कल के लिए वर्श 4. अंक 14 , 1996
आत्म - कथा
जाने कितने वैभवशाली ओहदों को जोतते-कोड़ते, बीनते पछोरते, आर.बी. प्रसाद
को यही कोई चार-पांच साल रिटायर हुए होगा। रिटायर हो जाने के बाद आर.बी.
प्रसाद की कई-कई इच्छाएं भी रिटायर हो गई थीं मसलन राजनीति में जाने का
मामला सबसे पहले अस्त हुआ तथा व्यवसाय करने का वह तो बालू की दीवार की
तरह भर-भरा कर गिर गया। कुल मिलाकर आर.बी. प्रसाद अपने प्यारे शहर की
गलियों की मानिन्द इस छोर से उस छोर तक होते हुए ट्राफिक पोस्ट की तरह हो
गए थे, उनके लिए सहज-असहज जीत हानि-लाभ , यश-अपयश सब का अर्थ बजबजाते
सामाजिक न्याय के पोखरे में सड़ता जान पड़ने लगा फिर भी मन के भीतर गुजरे
सालों की गरमी थी। इतने लम्बे समय में वे लगभग हर महत्वपूर्ण ओहदे पर रहे
थे। कलेक्टरी करने का मौका जब वे चाहते थे हाथिया लिया करते थे, उनके ऊपर
सरकारों के आने-जाने का कोई असर नहीं पड़ा करता था। आर.बी.प्रसाद शुरू से
ही महत्वपूर्ण घटनाओं परिघटनाओं का जिक्र अपनी डायरी में कर लिया करते
थे। उन्हें यकीन था कि यदि यह डायरी प्रकाशित क्या किसी को मालूम भी हो
जाय तब बहुत बड़ा (यद्यपि ऐसा नही होता) बवंडर खड़ा हो सकता है।
आर.बी.प्रसाद इस डायरी के प्रति काफी चौंकस थे। भूल से भी अपने परिजनों
के सामने इस डायरी के पन्नों को नहीं फहराते , नहीं देखते थे, जाने क्या
हो ? कौन सी सूचना पन्ने से बाहर निकल कर ‘‘सतर्कता’’ वालों के पास चली
जाये फिर तो बचना मुश्किल हो जायेगा।
आर.बी. प्रसाद नए सिरे से उसी डायरी को पढ़ना शुरू कर दिए थे तथा खास-खास
अंशों का संपादन भी करने लगे। रिटायर हो जाने के बाद वे सोचने लगे थे कि
‘‘आत्म-कथा’’ की ऐसी पुस्तक तैयार की जाय जिसमें नंगा सच हो आवरण हीन। सच
को परदे के बाहर कर सकना हालांकि कठिन तो होगा पर असंभव नहीं। गांधी तथा
कई अन्यों की आत्मकथाएं वे पढ़ चुके थे पर वे कहीं अश्वस्त नहीं हो पाए
थे, उन्हें लगता था कि आत्म-कथाओं का विस्तार आकाशीय है जिससे जमीन का
मिलना कभी संभव नहीं। कई तरह के अन्तर्विरोध काल की तरह खडे़ रहते हैं।
उनका मुकाबला करना आसान नहीं आर.बी.प्रसाद के सामने अन्त होते जीवन की
तस्वीर थी जिसमें वे साफ-साफ देख रहे थे कि अभी तो हाथ पैर चल रहा है, कल
क्या होगा ? कैसे कहा जा सकता है, पचास साल बीतते ही डायविटीज ने उन्हें
जकड़ लिया था, फिर खांसी, दमा भी हो सकता था, बच गए थे आर.बी. प्रसाद अभी
तक सुरक्षित है। उनका शरीर मजबूत, और कसे हुए हाथ पैर, पंजों से रिवाल्वर
की मूठ छटक नहीं सकती, कलम चला सकते हैं, बहुत कुछ लिख सकते हैं कई
मंत्रियों तक ने उनके ड्राफ्ंिटग की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
आर.बी.प्रसाद आत्म-कथा की पुस्तक लिख लेने के लिए परेशान थे और चिंतित भी
शायद उतना परेशान कोई दूसरा न हो। उन्हें समझ में आता ‘‘ आखिर वही
आर.बी.प्रसाद जो पहले समझते थे कि ‘जो कुछ कर नहीं सकते वे किताबें लिखा
करते हैं काम करने वाला आदमी काम करेगा कि कलम कागज लेकर बैठ जाएगा
शब्दों को सपने की तराजू में तौलने के लिए’ फिर कैसे बदलता जा रहा है?
परेशान है अपनी ‘आत्म-कथा’ के लिए।
वे डायरी के पन्नों पर कई तरह के लाल, काले और हरे निशान लगाते चल रहे
थे। विस्थापन का मामला था, जंगली लोग डट गए थे मोर्चा बनाकर हालांकि शासन
को इतने भयंकर और जानलेवा विरोध की सूचना नहीं थी। कई-कई कर्मचारी मार
डाले गए थे दो सिपाहियों को तो जिन्दा ही जला दिया गया था। ऐसे माहौल में
आ.बी.प्रसाद के सामने दो तरफा चुनौतियां थी। एक तो सवर्ण जिलाधिकारी श्री
चौबे की तरफ से थी दूसरी चुनौती थी खुद आर.बी. प्रसाद की अपनी तरफ से
अनुसूचित होने की। माना यही जा रहा था यह जो कुछ हो रहा है सब श्री
प्रसाद की सह पर हो रहा है। मुंह बोल संवर्ण नेताओं ने तो प्रशासन का
मुंह बन्द कर दिया था यही हाल अखबार वालों का भी था। जिलाधिकारी चौबे एन
वक्त पर श्री प्रसाद को चार्ज सौंप कर राजधानी के टूर पर हो लिया करते थे
ऐसे ही एक मौके पर भयानक किस्म की परीक्षा देनी पड़ गई थी प्रसाद को
अनुसूचित होने के खिलाफ फलस्वरूप जाने कितने लोगों के घर-जला दिए गए थे,
लोग जिन्दा जल गए। गोया जीवन का कृत्रिम विभत्स औद्योगिक विकास के नाम पर
विनाश स्वरूप खड़ा हो गया था और प्रसाद कानून तथा व्यवस्था की सीढ़ी पकड़ कर
उस विभत्स और भयानक हादसे को देखते रह गये थे। घर आकर उन्होंने डायरी में
उन मृतक बन वासियों को याद करते हुए लिखा था, भाइयों मैने जो किया बस वही
कर सकता था। हो सके तो मेरे जघन्य अपराधों को क्षमा करना।
कारखाने का शिलान्यास काफी धूम धाम से सम्पन्न हो गया था। निर्माण
प्रारम्भ हो गया था। इस दौरान उधर कई बार जाना भी पड़ा था प्रसाद को लेकिन
जितनी बार प्रसाद उस तरफ गए, हर बार उनसे एक दूसरा प्रसाद अवश्य मिलता
रहा, चीखता, चिल्लाता, नारा लगाता हुआ, कभी-कभी तो विद्रूप हंसी हंसता
हुआ कि घबरा जाते प्रसाद -यह क्या! कहां से लौटा-चला आ रहा है उनका बचपन
जिसकी कहानियां उन्होंने समाप्त कर डालने की कसमें खायी थीं कहां पैदा
हुए, मां बाप क्या किया करते थे, कैसे पढ़ लिख सके या यह भी कोई कहानी है,
कोई आत्म-कथा है यह सब तो कृष्ण पक्ष है जीवन का, होता रहता है।
अन्धेरे में चलते रहने से कहां तक चला जा सकता है ?जीवन आरम्भ होता है
शुक्ल पक्ष से। प्रशासनिक नौकरी के पूर्व का काल खण्ड, भयानक अन्धेरे का
कालखण्ड था यही मानकर चल रहे थे प्रसाद।
अन्धेरों से निकल कर उजालों की तरफ बढ़ते ही प्रसाद को लोगों ने नए सिरे
से पढ़ना शुरू कर दिया था। औद्योगिक प्रतिष्ठान के शिलान्यास के बाद से ही
एक पठनीय पुस्तक के रूप में बदलते जा रहे थे आर.बी. प्रसाद। बिना किसी
भूमिका के लिखी इस पुस्तक के कई पाठ विशेष रूप से पठनीय बनते जा रहे थे,
उसमें ललित निबन्ध जो प्रशासनिक कार्य-कुशलता और जन सहयोग के बारे में
लिखा हुआ था। उस निबन्ध में उल्लिखित प्रसाद की भूमिका अविस्मरणीय थी खास
तौर से मृतकों का दाह संस्कार, विस्थापितों को बसने के लिए जमीन का
प्रबन्ध, तथा मुआवजा भुगतान में बरती जाने वाली ईमानदारी साथ ही साथ
जीवित बचे विस्थापितों से निरन्तर प्रसाद का संपर्क वस्तुतः किसी
महत्वपूर्ण पुस्तक में ही इस तरह की सूचनाएं संकलित की जा सकती थीं।
पुस्तक भूमिका हीन इसी लिए थी शायद क्यों कि इसके सभी पाठ , मानवीय
सम्बन्धों की सूक्ष्मतम दरारों को भरते हुए लग रहे थे। आखिर जीवन के बारे
में कितना सोचा जा सकता है? मरने वाले तो मरते रहेगें, हादसे घटते ही
रहेगें, उन्हें बराबर ओढ़ा बिछाया भी तो नहीं जा सकता। पुस्तक में इस
महत्वपूर्ण पाठ के अलावा एक दूसारा पाठ भी कम महत्वपूर्ण नहीं था जो
दुनिया को आश्वस्ति के नए सरोकारों से जोड़ रहा था। नए किस्म का कार्य-भार
सौंप रहा था। वह यह कि कैसे खड़ा रहा जा सकता है अपनी सेना में, सेना के
कार्यभारों से ‘‘निष्काम’’ हो कर , कैसे की जा सकती है सगुण विकास की
परिकल्पना। यह साहस की ही तो बात थी कि प्रसाद ने किसी तरह से सरकारी
कारखाने का शिलान्यास संभव करा दिया था और अपने ऊपर लगे वर्ग पक्षधरता के
आरोपों को झूठा सिद्ध करा दिया था। प्रसाद के इस निष्काम कर्म को
‘‘सगुण’’ विकास के सन्दर्भ में सदैव याद किया जायेगा। अन्त होती शताब्दी
यदि भविष्य में याद की जाएगी तो इस शताब्दी को दो भयंकर विश्व युद्धों का
गूंगा गवाह माना जाएगा फिर भी यह तो कहा ही जाएगा कि इस शताब्दी ने
अन्याय के खिलाफ लड़ने का जो साहस दिखाया है वह अतीत में नही था। किताब
बनते प्रसाद का अतीत चाहे जो भी रहा हो पर वर्तमान बिना किसी सहारे के
बढ़ता जा रहा था और वे इस कथित विकास यात्रा को डायरी में ‘‘ निरीह आदमी
का अपनी निरीहता के खिलाफ युद्ध’ शीर्षक से लिखा करते थे।
पीछे मुड़ने का कहां अवसर था देखने के लिए सो श्री प्रसाद आगे देख रहे थे
कलक्टरी , कमिश्नरी , सचिवालय। सभी कुछ तो जान बूझ लिया था प्रसाद ने।
डायरी पलटते-पलटते वे आगे बढ़ जाते और आत्म-कथा के लिए उपयोगी अंशो पर
रिमार्क भी लगाते जाते थे। उनकी डायरी में तमाम ऐसे अंश थे जिन्हें
आत्मकथा की पुस्तक मंे बिना किसी फेर बदल के मूलरूप में ही दिया जा सकता
था। उन्हें परेशानी तब होती जब कुछ अंश उन्हें कभी बचपन की दुर्दशाओं की
तरफ ले जाते, मां-बाप द्वारा भोगी गई यातनाओं की तरफ, जिसमें उनके कार्य
भार का कुछ भी हिस्सा न रहता न ही उसमें उनकी कोई भूमिका ही सुनिश्चित की
जा सकती थी। इन अंशों पर बिना किसी रिमार्क के आगे बढ़ पाना उनके लिए कठिन
हो जाता। जीवन जीने की कला में शायद बहुत कुछ अव्यक्त, रहा करता है, जिसे
व्यक्त करना चाहिए कि नहीं इसके समाधान के लिए ही वे कई लोगों की
आत्मकथाएं पढ़ते रहे थे। हाल की कुछ नामी-गिरामी आत्म कथाओं की ख्याति
देखकर वे भी अपनी डायरी में लिखे उन अंशों को छांट लेना चाहते थे जिसे
कुशलता पूर्वक अच्छी ड्राफ्ंिटग के सहारे व्यक्त किया जा सके भले ही
उन्होंने उसे अव्यक्त ही रहने दिया हो। सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन
में उनकी भूमिका कैसी थी इस पर उनके पास बहुत सारी सामग्री थी। उन
सामग्रियों का मूल्याकंन करते समय आज की विषम परिस्थतियां डकारने लगतीं
वे घबरा जाते उन्हें समझ में आता कि वे आज्ञाकारी और वफादार बने रह सकने
की ही क्षमता हासिल कर पाए थे पूरे कार्यकाल तक। वे इन अंशों पर प्रतिकूल
नोट लगाकर आगे बढ़ जाते। डायरी का एक खास अंश जो विचित्र किस्म के
रहमयस्मी हुश्न में सरोबार था आर.बी. प्रसाद के लिए बहुत ही आवश्यक हो
गया था। वह अंश उनकी प्रस्तावित आत्म-कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा होता जो
उन्हें तमाम बड़ों के बीच पहाड़ जैसा खड़ा कर देता। उस हिस्से में खोट भी
ऐसी नहीं जिसे भूलाया न जा सके। हुआ यह था कि वह घटना अनायास , हो गई थी
उसमें आर.बी.प्रसाद का कोई योगदान , नहीं था। बगल प्रान्त के
कान्तिकारियों का एक अस्त्रधारी दस्ता उनके जिले में घुस गया था, और उसने
अपने काय्रक्रमों को संचालित करना आरम्भ कर दिया था। बालू ठेकेदारों के
खिलाफ चला उस दस्ते का प्रतिरोध न केवल लोक-प्रिय था वरन सफल भी था, बालू
के ठीकेदार जो लाखों की जायज-नाजायज कमाई कर रहे थे सब बन्द हो गया था।
ठीका जिसके नाम पैसा उसे मिलना चाहिए यही उस दस्ते का नारा था। ठीके की
खासियत यह थी कि वह सब गरीब विपन्न भूमिहीनों के नाम था। पर वे बेचारे उस
लाभ को कहां प्राप्त कर सकते थे, जिसे बालू माफिया हजम करते जा रहे थे,
नामधारी ठीकेदार उन्हें लूट रहे थे कुछ रूपया देकर या दारू दक्कड पिलाकर।
इसी तरह जंगल में चलने वाले तमाम कानूनों की व्याख्या जिसे आर.बी.प्रसाद
कभी भी सही ढंग से नहीं कर पाते, न ही उन्हें प्रशासनिक सहयोग ही मिल
पाता उसे वह अस्त्र धारी दस्ता बहुत ही सामान्य ढंग से हल करता-चल रहा
था। यहां तक तो बात आर.बी.प्रसाद के पक्ष में जाती थी पर इसके आगे जाने
पर स्वयं आर.बी.प्रसाद को महसूस हुआ कि इस माहौल में कलक्टरी करना
मुनासिब नहीं लगता। सो सचिवालय या किसी आयोग के लिए प्रयास करना चाहिए।
उनका प्रयास सफल हुआ और एक विशेष आयोग में चेयरमैन बन कर वे चले भी गए
थे। यहां रहने पर खतरा उनकी पीठ पर रेंग सकता था, पेट से सरकते हुए मुंह
तक जा सकता था। इल्जाम लग सकता था कि प्रशासन के सहयोग से नक्सलाइट इस
शान्ति प्रिय जनपद को अशान्ति किए दे रहे हैं, इसी तरह और भी कई । इस
घटना को अच्छी आत्म-कथा के अनुकूल पलट सकते थे। आर.बी.प्रसाद रात दिन के
अथक प्रयास से भारी भरकम डायरी बैंक के पास बुक जैसी हो गई थी और उस पर
लिखे नोटस किसी सर्विस बुक की तरह। अचानक आर.बी.प्रसाद को लगा, भले ही
आई. एसों की कोई सर्विस बुक नहीं होती फिर भी यदि कोई आई.ए.एस. अपनी
डायरी लिखे तब उसे उसमें तमाम ऐसे अंश मिल जायेगें जो प्रताड़ना में लिखे
किसी प्रतिकूल प्रविष्ट से कम नहीं होंगे। आर.बी.प्रसाद ने आत्म-कथा की
सारी सामग्री समेट ली थी, स्क्रूटनिंग कर लिया था और विषय सूची भी बना
लिये थे फिर भी आर.बी.प्रसाद सन्तुष्ट नहीं थे, उन्हें महसूस होता कि इस
विषय सूची के आधार पर संकलित आत्म-कथा में तो छेद रह ही जाएगें जो आदमी
की जमात को, सुविधाओं, अवसरों को संचित करने की कूट क्षमता प्रदान करते
हैं। आत्म-कथा को जीवन जीने की कला के छिद्रों को पाटते या समतलियाते
चलना चाहिए। आर.बी.प्रसाद के अनुसार विषय सूची को विचारपूर्वक फिर से
बनाया जाना चाहिए।
आर.बी.प्रसाद जहां कहीं होते अपनी आत्मकथा की पुस्तक ही स्वप्नवत देखा
करते कभी कवर तो कभी उसके भीतरी पृष्ट भी। उनकी प्रतावित आत्मकथा की
पुस्तक पर संभावित आलोचनाओं की झलकियां कभी कभार उनकी आंखों मेें उतराने,
डूबने लगतीं। विषय सूची फाइनल हो जाने के बाद , उसे क्रमवार लिखने लग गए
थे आर.वी.प्रसाद, डायरी के पन्नों का ब्रीफ तो पहले ही बना चुके थे। समय,
तारीख, घटना का सही विवरण उनके सामने था, उसे केवल शब्द देना था, जिसे
बहुत ही सहजता से निपटाए जा रहे थे आर.बी.प्रसाद। लम्बे समय के परिश्रम
के बाद आत्मकथा की प्रस्तावित पुस्तक पाण्डुलिपि तैयार हो पाई, तैयार
करने में आर.वी.प्रसाद के अनुसार काफी समय लग गया था। जिस दिन पुस्तक
तैयार हुई थी , झूम उठे आर.बी. प्रसाद। उनका मन उनके बंगले में नाचने लगा
था, पाप सांग की आवाज पर हू हा करने लगा था, उनकी पत्नी तो घबड़ा ही गयी
थीं-पूछा था क्या हुआ ‘‘नई सरकार ने क्या किसी आयोग को चेयरमैन बना दिया
तुम्हें ?’’
‘‘नहीं भाई। सरकार को इतनी अक्ल कहां, उसे तो अक्ल देनी पड़ती है और क्या
है कि मुझे फुर्सत कहां है कि मैं सरकार को अक्ल देता फिरूं , वैसे चान्स
तो अच्छा है, यह जो हरिजन एक्ट है न, सुनने में आया है, इसके अनुपालन में
काफी अनियमितताएं इुईं हैं, इसकी जांच के लिए एक आयोग गठित करवाया जा
सकता है। बहरहाल छोड़ो इसे।
‘‘यह फाइल देख रही हो न। मैं इधर आत्मकथा लिखने में ही व्यस्त था, आज
तैयार हो गई है, पहले टाइप हो जाय फिर छपे-छपाए’’। और कर भी क्या सकते हो
सिवाय आत्मकथा लिखने के, कभी दूसरों की भी कथा लिखी है दूसरा लड़का
पढ़-लिखकर बेकार बैठा है, कुछ सोचा है उसके बारे में क्या करेगा वह ? यह
उनकी पत्नी की आवाज थी।
झुझलाते हुए निकल गई थी उनकी पत्नी कमरे से बाहर।
आत्मकथा की पाण्डुलिपि किसी टाइपिस्ट को देने के पहले आर.बी.प्रसाद ने
उसे समग्र रूप में एक बार पूरा पढ़ लेना जरूरी समझा साथ ही साथ यदि कोई
इसका वाचन करने वाला मिल जाता तो ठीक था पर दूसरा जो पढ़ता उससे आत्मकथा
की गोपनीयता भंग होती उसकी एकल टेक्नीक विभाजित होती सो उन्होंने अकेल ही
पढ़ने का संकल्प लिया था। उनकी आतुरता अमरबेल की तरह बढ़ती जा रही थी। रात
कितनी बची है चिन्ता किए बगैर वे पढ़ते रहे और जब पाण्डुलिपि समाप्त हो गई
तब उन्होंने उस पाण्डुलिपि के ऊपर अलग से एक कागज लगाकर लाल स्याही से
रिमार्क लगाया। रिमार्क की भाषा सरल थी विवरण जटिल था उलझा हुआ-
‘‘आर.बी.प्रसाद को सदैव एक अज्ञात आर.बी.प्रसाद छलता रहा, डंसता रहा और
वह आर.बी.प्रसाद जो वर्तमान को सरस आशावान समझता रहा सदैव धोखा खाता रहा।
प्रशासनिक कार्यकाल के दौरान जो शुभ और सत्य दिखता था तथा सुन्दर भी
आत्मकथा लिखते समय वह सब कुछ महत्वहीन अनुपयोगी तथा अर्थहीन लगने लगा था।
वर्तमान में जीवन जीने की जिस कला का आर.बी.प्रसाद ने पक्ष लिया था,
रिटायर होने के बाद मालूम होने लगा कि इतिहास में जीने के लिए उस कथित
कला से मुक्त होना जरूरी हुआ करता है। ‘‘आर.बी. प्रसाद की यह पाण्डुलिपि
शायद उस आर.बी.प्रसाद की आत्मकथा की पाण्डुलिपि नहीं है जो अभी तक जीवित
है और इतिहास में जीवित रहने के लिए आत्मकथा लिख रहा है।वह आर¬.बी.प्रसाद
तो कब का मर चुका है।’’आर.बी.प्रसाद आत्मकथा की पाण्डुलिपि दुबारा पढ़ने
का मन बनाकर भी नहीं पढ़ पाए थे सिर्फ एक आह के- ‘‘क्या पढ़ना है दुबारा,
कोई शब्द थोडे़ बदल जाएंगे। उन्होंने उस पाण्डुलिपि को कब नष्ट कर दिया ,
कैसे जला दिया यह भले ही किसी को न मालूम हो पाया हो पर बहुत सारे लोग
जान गए थे कि उन्होंने बंगले के गेट पर लिखा भूतपूर्व आई.ए.एस. मिटवा
दिया है। अब वे कभी भी खतो किताबत में भूतपूर्व नहीं लिखा करते। अब वे
कहते हैं- कथा चाहे जो लिख ले पर आत्मकथा सब नहीं लिख सकते और
आर.बी.प्रसाद तो
कभी नहीं लिख सकता, जो कभी आई.ए.एस. हुआ करता था। कहने के लिए तो
आई.ए.एस. पुल की तरह हुआ करता है जिस पर जनता अपना दुख-दर्द, विरोध लेकर
सरकार तक आ जा सकती है पर ऐसा नहीं हुआ करता, इस आई.ए.एस. रूपी पुल पर से
तो सिर्फ सरकारें गुजरा करती हैं अपने जरूरी, गैर जरूरी कानूनी रथों पर
सवार होकर उन रथों का भार सहन करने वाला आर.बी.प्रसाद मर चुका हैं, अब जो
जीवित आर.बी.प्रसाद बचा है वह अपना भार ढोए, अपने किए का प्रायश्चित करे
कि चले, फिर से सरकारों का अपनी छाती पर फलैंग मार्च कराने। आई.ए.एस. बने
रह सकने के लिए, सामान्य से सामान्य औपचारिकताओं के लिए कितने प्रपंचों
को जीवन के सच की तरह थामना पड़ता है, चाटना-पड़ता है, अब उन जैसे प्रपंचों
के सहारे ‘‘आत्मकथा’’ की पुस्तक लिखना, फिर उसे चाटना-चूमना, स्वयं कोे
प्रायश्चित करने के अवसर से मुक्त करना होगा।’’
अब तो प्रायश्चित के सहारे ही मुक्त हुआ जा सकता है, आत्मकथा लिखकर
छपवाकर नहीं। अचानक उन्होंने डायरी का वह अंश देखा जिसमें बालू माफियाओं
के दमन का जिक्र था-
एक हल्की सी आवाज, ‘‘ अभी तो वे सक्रिय होंगे ’’
कृषक जागृति मार्च 1989
अजीब है दिल्ली
तीन महीना हो गया हरिया अभी तक नही आया, बोला था अगहन चढ़ते ही आ जायेगा
उसकी जनाना भी साथ ही गई है। यहां घर पर ताला चढ़ा हुआ है। अब करमा की
तैयारी शुरू कर देनी चाहिए, बीस जनवरी को साहब ने बुलाया है। बोल रहे थे
टिकिट भी रिजरब कराना होगा। एक दिन कलक्टर साहेब को भी नाच-गाना दिखाना
होगा। अतवारू बतिया रहा था शीतला से। देखो शीतला ! तुम कोयलरी चले जाओ
वहां जाकर पता करो हरिया का, अगर वह दो-तीन दिन में नहीं आया तो समझे !
गांव मंे आठ-दस जनों की करमा वाली मण्डली है, पर पूजइती का काम हरिया
करता ही है। नाचने-गाने वाले बहुत है।
इस साल गांव में काफी चहल-पहल है। गांव वालों को दिल्ली की सरकार ने
बुलाया है करमा गाने और नाचने के वास्ते। दिल्ली जाने वालों में होड़ लगी
है, हम जायेंगे हम जायेंगे, लड़कियां शर्मा रही हैं पर होड़ उनमें भी है।
सुनने में आया है, इसके नाच-गाना का सिनेमा भी बनेगा।
हालांकि बानोडीह गांव अब जंगली सभ्यता से बाहर निकल चुका है फिर भी गांव
में किसी मोटर साइकिल या जीप के घुसते ही सब लोग चौकन्ना हो जाते हैं।
बहुत तेजी से एक मोटर साइकिल गांव में घुसी, गांव के लोग जब
तजबीज कर लिए कि पुलिस के लोग नहीं है तब अपने घरों से बाहर आए कुछ लड़के
अतवारू को बुलाने चले गए।
अतवारू आ गया उसकी मुलाकात नायब तहसीलदार से हुई उन्होंने भी छब्बीस
जनवरी वाले कार्यक्रम के लिए तैयार रहने को कहा और दस जनवरी को कलक्टर
साहब के यहां रिहलसल केे लिए साथ ही साथ हरिया को लेकर मुख्यालय पर आकर
मिलने के लिए भी कहा। इतना सहेज कर नायब साहेब मोटर साइकिल पर बैठे और
चले गए।
हरिया के बाप को मरे तीन-चार साल हुआ होगा। बड़ा नाम था उनका, क्या करमा
क्या लोरिकी कोई जोड़ नहीं था उनका गाने में, लोरिकी तो उन्हें पूरी याद
थी दो-दो तीन-तीन दिन तक गाते रह गए थे जब बनारस के किसी अखबार के आदमी
आए थे। हरिया उनका नाम भूल गया है, उन्हें कोई किताब तैयार करनी थी गा-गा
कर, नाच-नाच कर सुनाया था हरिया के बाप ने। एक-एक घंटे पर दारू पिलाते
जाओ और सुनते जाओ गाना। उन्हें दारू चाहिए ही चाहिए हर हाल में। तीन-चार
दिन तक रूक गये थे अखबार वाले साहब, सब कुछ उन्होंने टेप किया था। अत्तो
काकी का करमा और सोहर दोनों टेप किया था। सात-आठ साल हो गया था। बीच में
कभी नहीं आए थे। इस साल आए हैं, बोल रहे थे आप लोगों को दिल्ली चलना है
इधर कलक्टर साहब के यहां से भी संदेश आया है। अखबार वाले साहब बीच में भी
आने को बोल गए थे। आते होंगे। बाप के मरने के बाद से हरिया ने भी गाना,
बजाना शुरू कर दिया है थोड़ा बहुत सब कुछ गा लेता है हरिया, भजन, हरि
कीर्तन बिरहा, तथा लोरिकी भी। करमा तो गाता ही है।
बानोडीह गांव भी इसी देश में है, होना तो चाहिए इसे भी अन्य गांवो की तरह
पर आजादी के पचास साल बाद भी यह गांव जस के तस है। इस गांव में रहकर
ठीकेदारी करने वाले लोग लखपती तक बन गए पर गांव का क्या, गांव थोडे़
सुधरता है, सुधरता है आदमी। किसी स्वयं सेवी संस्था ने इस गांव में
अनौपचारिक शिक्षा का केन्द्र खोल दिया है, हरिया उसी में पढ़ाता है बहुत
कोशिश करता है कि बच्चे पढ़ें पर कोई नहीं आता पढ़ने के लिए, हरिया को किसी
तरह सौ रूपया महीना मिल जाता है। सौ रूपया से किसी का पेट पोसाएगा सो चला
गया है बाहर कमाने। सौ डेढ़ सौ घरों का यह गांव है। गांव से सटा हुआ ही
जंगल पड़ता है। गांव के अगल-बगल की नीचीं जमीन पर धान की खेती होती है,
ऊपर वाली जमींन पर मक्का, तीली और रवि में, गेहूं तथा सब्जी की भी। गांव
में किसी की आमदनी पांच हजार रूपया साल से अधिक नहीं। गल्ला की पैदावार
इतनी भी नहीं कि साल भर रोटी दाना चल सके। लगभग पूरा गांव ही चला जाता है
बाहर कमाने , दिहाड़ी करने। गांव में शायद ही कोई हो जो शाकाहारी हो तथा
दारू न पीता हो। कुछ लोग तो दारू बनाकर बेचते भी हैं, थाना-थूनी को
मिलाकर। वैसे तो दारू हर घर में चुआंई जाती है। खास कर तीज त्योहारों पर।
हरिया गांव का सबसे अधिक पढ़ा-लिखा नौजवान है। इसके चलते गांव के झगडे़ भी
बहुत कम हो गए हैं नहीं तो अक्सर गांव में किच-किच होता रहता था। दो-तीन
साल पहले इस गांव में मद्य निषेध कार्यक्रम चलाने वालों की पूरी भरी गाड़ी
आई थी। शराब पीने से क्या-क्या नुकसानी होती है, पूरी फिल्म दिखाई गई थी
और भाषण भी हुआ था पर उसका कोई असर इस गांव पर नहीं पडा। हां शराब के
ठीकेदार का असर जरूर पड़ता है,वह छापा डलवाता रहता है, साल में दो-बार।
लोगों का पुलिस चालान भी करती रहती है।
हरिया जब नहीं आया तब शीतला गया था उसे बुलाने। हरिया अब आ गया है। गांव
में देर-रात तक बजने लगी है ढ़ोलक, और होने लगी है करमा की नाच। दर्जी भी
आया है। किसम-किसम का रंग-विरंग कपड़ा सिलाएगा सबका। दर्जी सबका नाप ले
लेता है, अखबार वाले साहब ने बताया है कि अच्छे किस्म का घाघरा बनेगा
औरतों के लिए और मर्दानों के लिए धोती, रंगीन कुर्ता और पगड़ी होगी। सरकार
नहीं चाहती कि ये लोग मैले-कुचैले और गंदे वहां जायें। देश-विदेश सभी जगह
के लोग वहां आयेंगे, गन्दगी अच्छी लगेगी क्या ? अखबार वाले साहब ने भी,
काफी दौड़-धूप किया है इस बाबत, तब जाकर ऊपर से आदेश आया है, नहीं तो कौन
पूछता है, इन लोगों को, पूरा देश गाना-बजाना करने वालों से भरा नहीं है
क्या? स्त्री-पुरूष मिलाकर, कुल पन्द्रह लोगों के शरीर का नाप लिया गया
है। अखबार वाले साहब ने रात में रिहल्सल देखा भी। ‘‘ क्या गाता है ,
हरिया’’ उनके मुंह से अनायास ही निकल गया था। रिहल्सल देख लेने के बाद
अखबार वाले साहब डूब गये थे कल्पना लोक में। इस बार निश्चित ही
राष्ट्रपति द्वारा इस कार्यक्रम के संयोजन के लिए उन्हें पुरस्कार
मिलेगा। आखिर उत्तर मध्य सांस्कृतिक क्षेत्र से कोई दूसरा कार्यक्रम
प्रस्तुत भी तो नहीं किया जा रहा। लोक-नृत्यों में अन्य की तुलना में
करमा नृत्य का प्रस्तुतीकरण सामान्यतया आकर्षक होता है। पूर्ण रूप से यह
एक नया और आकर्षक कार्यक्रम होगा। ‘रिहल्सल वाले कार्यक्रम का भी फोटो
खींचा था अखबार वाले साहब ने। सुबह होते ही चले गये थे अखबार वाले साहब
हरिया को समझा कर और दस जनवरी को कलक्टर साहब के यहां रिहल्सल करने के
लिए भी बोले थे। कोई न कोई गाड़ी सुबह आ जाएगी, सबको लेकर चली जाएगी। फिर
वहां से दिल्ली चलने वाला प्रोग्राम तय होगा।
हरिया भी धुन का पक्का है। अतवारू और शीतला के साथ मिल कर वह भी अपनी
योजना बना रहा है। हरिया को महसूस होने लगा है कि - ‘बाबू मर गए पर कभी
भी दिल्ली नही जा सके। हमारे गांव का कोई भी दिल्ली नहीं जा सका’ और हम
लोग दिल्ली जायेंगे।’ खूब रियाज करना है, इनाम हमी लोगों को मिलना चाहिए।
अतवारू भी मगन है, कौन पूछता है यहां, ‘ करमा।
करमा’ पहले राजा साहब के यहां होता था हम लोग आते-जाते थे, पर अब नही ?
जमाना गुजर गया। थाने पर बिरहा और कव्वाली होती ही है। कहां होता है
करमा। गाना-बजाना के नाम पर बीडियो चला आया, हो गया पूरा काम।
इधर आठ-दस दिन खूब रियाज किया गया है। रियाज के दौरान ही हरिया ने डांट
दिया था, फेंकनी को जब देखो तब खो-खो करती रहती है, थोड़ा सा रंग क्या साफ
पा गई , उसी में गरूवाई रहती है, फेंकनी गुस्सा गई थी और छोड़ दिया था
रिहल्सल। हरिया किसी तरह मना कर लाया है उसे। चरितरी और फुलवसिया का
करेजा इस लिए धक-धक कर रहा है कि कैसे पहनेंगी वे सब चुनरी और घाघरा ,
बड़ा उटपटांग लगेगा- क्यों रे चरितरी पहनेगी न, घाघरा तुम्हारा मरद देखेगा
तब लोट-पोट हो जायेगा। सब एक दूसरे का मजाक ले रही हैं पर खुशियाली बहुत
अधिक है, सबके अन्दर उमंग है उत्साह है और अच्छा करने की लालसा है।
आखिर दस जनवरी आ ही गई। गांव में एक मिनीबस लेकर आ गए थे, अखबार वाले
साहेब और उस दिन के रिहल्सल वाला फोटो भी। हरिया, अतवारू और शीतला सब देख
रहे हैं अपनी-अपनी फोटो। फेंकनी,चरितरी और फुलवसिया भी। फोटो में सबका
रंग चढ़ गया है, बड़ा अच्छा लग रहा है सबको। गाड़ी में धड़ा-धड़ बैठने लगे हैं
सब नाचने-गाने वालों के अलावा भी कुछ लड़के तथा लड़कियां बैठ रहे हैं गाड़ी
में। बडे़-वुजुर्ग आश्चर्य चकित निगाहों से सब देख रहे हैं। थोड़ी देर में
गाड़ी चल देगी। अखबार वाले साहब ‘जल्दी-जल्दी’ लगाए हुए हैं।
गाड़ी चल पड़ती है। सब बैठ जाते हैं गाड़ी में। अखबार वाले साहब हरिया को
लेकर ड्राइबर के साथ बैठ जाते हैं आगे। हरिया को लगता है कि अखबार वाले
साहब बहुत अधिक मेहनत करते हैं- ‘हरिया पूछता है साहब आपको क्या मिलता
है, तनखाह मिलती होगी न आपको।’ अखबार वाले साहब बताते हैं कि -नहीं भाई,
तनखाह नहीं मिलती, मैं बस ऐसे ही यह सब करता रहता हूं , तुम लोगों का शौक
है नाचना-गाना, बजाना, वैसे ही हमारा भी यह शौक है तुम लोगों के बारे में
लिखना - पढ़ना । गांव के लोगों के बारे में जितना मैने लिखा है- आज तक
किसी ने नहीं लिखा है बस यही समझ लो। यह कोई धन्धा नहीं है बस हमारा शौक
है। अखबार वाले साहब ने बताया था हरिया को, हरिया उनका मुंह ही ताकता रह
गया था ‘ऐसे भी लोग हैं जो हम लोगों की चिन्ता करते हैं।’
बहुत ही अच्छे ढंग से रिहल्सल समाप्त हो गया था, दूसरे दिन उसी मिनीबस से
हरिया की मण्डली को गांव पहुंचा दिया गया था। रिहल्सल के दिन ही दर्जी
सारा कपड़ा सिल कर ले आया था, सबने पहन लिया था। पहनने के बाद सब लगे थे
पहचााने एक दूसरे को, हरिया ने फेंकनी को छेड़ा भी था- भाग खड़ी हुई थी
फेंकनी ‘ हमें का कहते हो अपना देखो’ तुम भी तो काफी बदल गये हो। रिहल्सल
समाप्त होते ही कपड़ा उतरवा लिया गया था, धुलाने के लिए धोबी के यहां जो
देना था। कपड़ा पहनते ही बदल गये थे सब भीतर ही भीतर महसूस करने लगे थे कि
‘आदमी कितना बदल जाता है कपड़ों में, जाति वही रहती है, धर्म वही रहता है
, आदमी वही रहता है पर बदल जाता है सब कुछ।’ हरिया सोचने लगता है कि जिस
कलक्टर के आफिस में घुसना तक मोहाल नहीं वही कलक्टर कैसे छू-छू कर हम
लोगों का कपड़ा देख रहा था और दर्जी को समझा रहा था। शीतला के कपड़े को
लेकर हद कर दिया कलक्टर ने, ‘अरे कुछ तो फर्क होना चाहिए बैगा के कपडे़
से और दूसरों के कपडे़ से। करमा में बैगा का कपड़ा एकदम-सधुक्कड़ी का होना
चाहिए, चिमटा और त्रिशूल भी नए ढंग का होना चाहिए। हो सके तो स्टील का।
यहां जो कलश रक्खा गया है उसे सुनहरे रंग का होना चाहिए और करमा की डार’
इसे किसी फ्रीज में रखवा दो: दिल्ली में यह नहीं मिलेगा, इसकी पत्तियां
सूखनी नहीं चाहिए। वहां स्टेज बनाने के लिए किसी नाटक कंपनी वाले को ठेका
दे दो और लाइट के लिए किसी बढ़िया आर्केस्ट्रा वाले को बोलो। हां मेक अप
करने के लिए ‘ दूरदर्शन केन्द्र’ से किसी अच्छे मेकअप वाले को बुलवा लो।
भले ही लाख-दो लाख खर्च हो जांय, पर कार्यक्रम अच्छा होना चाहिए। कितना
बढ़िया ये लड़कियां गा रही हैं, पर इनके बाल देखो, इनके मुंह देखो, अरे
इनके चेहरों पर लाइट पड़ते ही , चेहरा चम-चमा जाना चाहिए, बगल में खडे़
ए.डी.एम. साहब और अखबार वाले साहब हां हां करते जा रहे थे।
अखबार वाले साहेब को संबोधित करते हुए कलक्टर साहब ने कहा ‘ अरे भाई
अग्निहोत्री जी’ थोड़ा आप भी दिमाग लगाइए, यह सब ऐसे ही होगा। आपको तो
सोचना चाहिए कुछ कागज पर थोड़ा बहुत लिख दिया, अखबार में छप गया काम खतम।
अरे वह दिल्ली है वहां पर ऐसे नहीं चलता, जो भी यहां है उसे बदल डालिए,
’यही समाज को बदलना है।’ हमारे लोक नर्तक, भूखे और भिखमंगे नहीं हैं, हों
भले ही, पर हमें उन्हें बदल कर ही ले जाना होगा वहां। विघायक और एम.पी.भी
तो गांवों के ही होते है न, सब बदल जाते हैं कि नहीं।’ समझे आप।
नेचुरलिटी के चक्कर में न पड़िए, यही कानून और व्यवस्था की नेचुरलिटी है।
जाने वहां कहां-कहां के लोग हों, इनका चेहरा देखकर उनके ऊपर बुरा असर
नहीं पड़ेगा क्या ? अग्निहोत्री साहब ने, कहा कि ‘सब ठीक हो जाएगा सर आप
चिन्ता न करिए।’
बीस जनवरी को ही मुख्यालय से करमा मण्डली को गाड़ी पकड़नी थी। अग्निहोत्री
जी को मंडली का मैनेजर बनाया गया था और उनके साथ नायब तहसीलदार शर्मा को
उप प्रबन्धक बनाया गया था। लाइटमैन, स्टेज निर्देशक और मेकअप मैन को भी
मुख्यालय पर ही बुला लिया गया था। बीस जनवरी आने में देर थी, इस बीच कई
चक्कर लगा आए थे , अग्निहोत्री जी और नायब तहसीलदार शर्मा जी। रिहल्सल
पूरे शबाब पर था। हरिया की रिहल्सल की तैयारी के लिए पांच सौ रूपया भी दे
दिया था शर्मा ने। दारू, गांजा और भांग बूंटी के लिए।
गांव में धान की कटाई पहले ही समाप्त हो गई थी, खलियान भी खतम हो चुका
था। कहीं-कहीं आलू गोभी की सिंचाई का काम चल रहा था।
अगल-बगल के गांवों के लोग भी जानते थे कि हरिया की मंडली छब्बीस जनवरी पर
दिल्ली जा रही है। नायब तहसीलदार शर्मा जी को यह कार्यक्रम अब अच्छा लगने
लगा है। पहले तो उन्हें लगा था कि कहां फंसा दिया कलक्टर साहब ने, इसमें
क्या मिलना-जुलना है, लेकिन अब उन्हें सीठी में भी रस चूसने का आभास होने
लगा है। हजार रूपया दिया जाना था हरिया को उन्होंने पांच सौ ही दिया। इसी
तरह गाड़ी-घोड़ा और तमाम खर्चों में से बहुत सारी कटौतियां की जा सकती हैं।
अग्निहोत्री जी का क्या उन्हें भी कुछ दे दूंगा। दौरान रिहल्सल और गांव
में बार-बार आने से गांव की लड़कियां भी
अब काफी मुखर हो गई हैं उनसे। फेंकनी ने तो उन्हें एक दिन तमाशा ही बना
दिया था। रात में बेचारे सोए थे फेंकनी ने उनके माथे पर सिन्दूर का टीका
और टिकुली साट दिया था और आंखों में मोटी धारी का गाढ़ा काजल लगा दिया था।
सुबह उन्हें देख-देख बच्चे हंसने लगे थे, हरिया ने उन्हें नहलावाया था और
फेंकनी को डांटा भी था। फंेकनी भाग गई थी शरमा कर। शरमा जी काफी घुल-मिल
गए हैं अब गांव वालों से खांस कर हरिया से- हरिया उन्हें मनोरंजक और
बहादुर किस्म का आदमी लगने लगा था।
बीस जनवरी को दिल्ली वाली गाड़ी से मण्डली चल पड़ती है। मण्डली के साथ
अग्निहोत्री जी, शर्मा जी और लाइट मैन, स्टेज मैन तथा मेकअप मैन भी हैं।
कल रात तक ये पहंुच जायेंगे दिल्ली। गाड़ी में ही खाने-पीने का पूरा
इन्तजाम कर लिया गया है। हरिया, अतवारू और शीतला के दिमाग में रह-रह कर
उभरती रहती है दिल्ली की चमक। लड़कियां और औरतें गुमशुम पड़ी हैं या सो रही
हैं, गाड़ी अपनी रफ्तार से भगी जा रही है, डिब्बे में बैठे लोग इन मंडली
वालों को कुछ इस तरह से देख परख रहे है जैसे ये अजायब घर से लाये गए हों।
गाड़ी दिल्ली पहुंच जाती है। नियत स्थान पर उन्हें ठहराया जाता है। खूब
स्वागत सत्कार किया जाता है। छब्बीस जनवरी के दिन इनका प्रर्दशन होता है,
प्रदर्शन बहुत ही अच्छा होता है, इन्हें प्रथम पुरस्कार मिलता है। पूरी
मण्डली खुश है हरिया विशेष रूप से । आज खूब दारू पिया जायेगा सोचता है
हरिया। अतवारू और शीतला भी मगन हैं-शर्मा जी से कह कर अंग्रेजी मगांई
जाएगी। तरह-तरह का विचार उपज रहा है सबके मन में , कार्यक्रम समाप्त होते
ही पूरी मंडली नियत स्थान पर चली जाती है। खूब, खाना-पीना होता है सब
दारू पीकर मस्त हो जाते हैं अग्निहोत्री जी का कलेजा फूल गया है उन्हें
इस कार्यक्रम के लिए पहला स्थान प्राप्त होता है। कल सुबह सारे अखबारों
में उनकी फोटो छपेगी और भी बहुत कुछ तथा किस तरह उन्होंने पहाड़ी और पिछड़े
इलाके के गरीब भूखे आदिवासी लोगों की प्राचीनतम कला को नवीनतम रूप में
प्रस्तुत कराया, उन लोगों के सामने जो पहाड़ों में जा नहीं सकते, हां
उन्हें खरीद जरूर सकते हैं।’ अग्निहोत्री जी काफी मगन हैं और शर्मा जी
भी, चलो
तहसीलदार बनने का मौका अब अवश्य मिल जाएगा। पहला इनाम पाने की खुशियाली
में आज सब बेसुध हैं। किसी को कोई खबर नहीं, क्या हो रहा है यहां और क्या
हो रहा है वहां।
काफी रात हो जाती है, कुछ अज्ञात लोग आते हैं, और लड़कियों के कमरे में
घुस जाते हैं। हरिया, अतवारू और शीतला सब दूसरे कमरे में थे अग्निहोत्री
और शर्मा के साथ। भीतर से दरवाजा बंद कर लेते हैं और लड़कियों के साथ
छेड़खनी करने लगते हैं, लड़कियां भी खूब थीं, सब भिड़ जाती हैं, काट खाती
हैं, किसी का हाथ किसी की ऊंगली और बहुत कुछ, शोर मच जाता है, जाग जाते
हैं, हरिया, अतवारू और शीतला भी, दो-तीन और - लोग भी। शर्मा जी तथा
अग्निहोत्री जी को भी जगाता है हरिया-सब चकरा जातेहैं ‘यह क्या हो रहा
है।
’हरिया बाहर से दरवाजा तोड़ना चाहता है और तोड़ भी डालता है पर वे सब गायब
हैं- लड़कियां हांफ रही है, लगती हैं सब बताने, पहचान नहीं पाईं थीं किसी
को, आखिर वे किसे पहचानती, ऊपरी हिस्से पर इन्हें टिकाया गया था
शर्मा और अग्निहोत्री भी नहीं समझ पा रहे थे कि क्या किया जाय- थाने में
चलकर रपट लिखई जाय, इस पर लोग सहम जाते हैं। अग्निहोत्री जी का
साहित्यकार मन उलझ जाता हैं अपने भीतर ही ‘वाह रे लोग! हम काफी तरक्की कर
रहे हैं- यही कहा जा सकता हैं। फेंकनी और अतवरिया को कुछ चोटें भी आ गई
थीं। फेंकनी कांप रही थी। सबों ने इसे ही पकड़ा था, पर पकड़ते ही इसकी नींद
खुल गई थी और लड़ने लगी थी फेंकनी, तब तक और जग गई थीं। वे सिर्फ दो थे-
कर भी क्या लेते- कहने लगी चरितरी। नहीं था ‘कड़ा’ हाथ में नहीं तो आज तुम
हरामियों का माथा ही फोड़ देती’। और भी बहुत कुछ वह बड़-बड़ाती रही थी।
हरिया को जितनी प्रसन्नता थी वह सब फुर्र हो गई-वाह रे दिल्ली, इसीलिए
कोई नहीं आया हमारे गांव से यहां, हम नाचते-बजाते हैं तो क्या हमारी
बहनें ...... हैं, यही समझ लिया था दिल्ली वालों ने। इसीलिए बुलाया
भी था शायद। इनाम ओकराम देकर फुसलाना चाहा था। अग्निहोत्री जी यही सब
होता है का आपके अखबार में। यह भी छपवा दीजिएगा कि हमारी बहनों के साथ
क्या हुआ और क्या किया हमरी बहनों ने। बोलिए छपवाइएगा न। कल इनाम मिलना
है। सबके सामने ही यह सब कहेंगें हम लोग। जब आप किसी की इज्जत की सुरक्षा
नहीं कर सकते तो बुलाते क्यों हैं।’ अग्निहोत्री और शर्मा जी इस घटना से
काफी दुखी थे। पुरस्कार वितरण के बाद ही लोग चले आये थे अपने मुख्यालय।
दोनों ने हरिया से माफी मांगा था, अग्निहोत्री जी तो इतने भावुक हो गये
थे कि रोने तक लग गए थे। वाह भाई खूब,दिल्ली भी अजीब है, सब कुछ लूट लेना
जानती है दिल्ली। फिर कभी दिल्ली न जाने की कसम खा कर लौट आए हैं
अग्निहोत्री जी- देखिए आगे क्या होता है। हरिया, शीतला और अतवारू,
फेंकनी, चरितरी तथा फुलवसिया तो अब कभी भी नहीं जाएंगी दिल्ली। उनके लिए
बानोडीह, दिल्ली, मथुरा और काशी हैA
युद्धरत आम आदमी अंक अपै्रल सितम्बर 1996
आखिर क्या है निशा का पक्ष ?
अचानक चौंक पडे़ थे दरोगा जी, सरकारी क्वार्टर से बाहर निकल आए थे, बहुत
तेज चिल्लाए ‘पहरा-पहरा’, पहरे पर तैनात सिपाही भागा हुआ दरोगा जी के पास
आया। हंऽसरकार !
‘क्या मामला है, इतनी भीड़ कहां से आ गई, कौन हैं ये लोग ? लगातार एक पर एक कई सवाल’
‘बलात्कार हो गया है सरकार, परस पनवां के हैं ये लोग’ परस पनवां कहां
पड़ता है ? जंगल के किनारे दक्षिण तरफ कोई दस किलोमीटर दूर’ बताया सिपाही
ने, इतना होते ही दीवान जी तथा थाने के और अहलकारान तथा गांव वाले सब के
सब इकट्ठा हो गए... गांव वालांेे ने बताना शुरू किया।
यह लड़की खेत में काम करने के लिए जंगल की तरफ जा रही थी कि चौधरी हरख
सिंह का बड़ा लड़का जो कालेज में पढ़ता है उसने इसे पकड़ लिया , उसके दो साथी
और थे, बचऊ चौधरी और पुनवासी चौधरी के लड़के, सबने इसके साथ......। वहां
यह बेहोश पाई गई, हम लोग डोली पर सुताकर ले आए हैं इसे, कुछ कीजिए दरोगा
जी। बड़ा नाम है आपका, बचऊ चौधरी और पुनवासी चौधरीके लड़के, ये चौधरी लोग
बहुत सरहंग हैं।’
लड़की बनवारी धांगर की , बनवारी बाहर क्रशर पर काम करता है, रोपाई का सीजन
है इसलिए आ गया है, रोपाई खत्म होते ही चला जाएगा।
बनवारी भी दरोगा जी के सामने सुबुक-सुबुक कर रोने लगा हमारी लड़की को बचा
लीजिए साहब...उन लोगों को पकड़ लीजिए इसी तरह बहुत कुछ....’
दरोगा जी ने लड़की देखा... यही कोई 16-17 साल की, गठा शरीर, सांवला पर
आकर्षक, बेहोशी के बाद भी चेहरे पर जवानी की छलकती उत्तेजना,
आभायुक्त.... ‘इसे पहले अस्पताल ले जाओ’ दो सिपाही भेजो, इलाज कराओ, इसे
बचना ही चाहिए चाहे जितने रूपए खर्च हों।’
‘बनवारी कौन है ? तुम ! चिन्ता मत करना यह हमारा काम है - देखता हूं,
कैसे रहते हैं वे लोग किसी को नहीं छोडंूगा और ये साले कालेज के लौन्डे़,
फिलिम देख-देख कर गांव को स्टूडियो बना लिए हैं। हर लड़की इन्हें चूमाने,
चाटने के लिए बनी है’ क्या नाम है हरखवा के लड़के का ..’ ‘पीयूष’
सरकार।‘क्या नाम है साले का ‘पीयूष’। इतना बढ़िया नाम और घटिया काम।
लड़की को अस्पताल भेज दिया गया, रपट तीनों लौन्डों के खिलाफ लिख ली गई....
खबर हर तरफ आग की तरह फैल गई... लौन्डे घर छोड-छाड़कर भाग गए थे, दरोगा जी
कई बार दविश दे चुके थे, पर वे क्यों मिलते ? कहां मिलते ?
लड़की ठीक-ठाक हो गई, उसने भी उन्हीं तीनों का नाम बताया और कैसे क्या
हुआ? किसने हाथ पकड़ा, किसने जांघें, और किसने मुंह में रूमाल ठूंसा.सब
कुछ। कैसे अपने पुरूषार्थ की आजमाया ,यह भी। लड़की को पता था,
उसके साथ क्या हो रहा है। उसे यह भी पता था कि उसके साथ ऐसा नहीं होना
चाहिए था, भात-माड़ की विरादरी है। उसके बाप की पूरी विरादरी को भोज-भात
देना पडे़गा, कहां से आएगा यह सब आखिर इसके लिए भी तो जाना ही पडे़गा
हरखू चौधरी के यहां ही, उसके बाप को’ वह भूल नहीं पाती है दुख। अपने
नुचे-चुथे शरीर पर उसे घृणा हो जाती है, क्यों उसे भगवान ने जवान बना
दिया, छोटी बच्ची ही क्यों नहीं रहने दिया उसे, यह वही शरीर है न,जब पूरा
खुला रहता था, ये वही लड़के हैं न, जो मेरे साथ नंग-धड़ंग घूमा करते थे, ‘
हम लोग पोखरे में आखिर कैसे नहाया करते थे, कहां था परदा। जब परदा हुआ तो
इस तरह से मेरे साथ खेलने कूदने वाले ही... लगे नोचने-चोथने। टूट पड़े
तीन-तीन... मैं कर भी क्या सकती थी...? जवान देह से निकलने वाली गन्ध
संूघकर वे पगला गए थे शायद! तभी तो उन्हें नहीं दीख पड़ा था आखिर गन्दगी
कितनी है? छिः गन्दे लोग हैं।’ वह कसमसा जाती है, झटके से, मुुंह छिपा
लेती है आंचल में, रोने लगती है-दरोगा बयान दर्ज कर लेता है, गवाहों से
भी पूछ-पूछ कर लिख लेता है। गांव के लोग थाने से घर चले जाते..हैं।
दरोगा परेशान ! माथे पर पसीनें की बूंदे, आंखे लाल, चेहरा तमतमाया... फिर
बलात्कार ’ !
वह चीखना चाहता है, कहना चाहता है, पकड़ो-पकड़ो सालों को, कोई भागने न पाए,
गोली मार दो, जला दो पूरा गांव , खानदान-दर खानदान साफ कर दो’ ये
बलात्कारी किसी के नहीं हो सकते , इनके सामने कोई भी सिर्फ एक मादा देह
है इसके अलावा, इनके लिए और कोई रिश्ता नहीं हो सकता विपरीत लिंगियों से।
ये लिंग-भेद की रूप रेखा पर टिके बीमार लोग हैं, इन्हें इस समाज में जीने
का हक नहीं, जिसमें, मां बहनें, पत्नी बेटियां सब मिल कर एक साथ रहती
हों।
थाना और थाने का अनुशासन। वे चीख नहीं पाते चुप-चाप अपने कमरे की ओर चल
देते हैं... कुर्सी पर धम्म से बैठ जाते हैं आंखों में तैरने लगती है वे
बातें, जब वे दरोगा नहीं थे, पढ़ रहे थे, कैसे घेर लिया था ठाकुरों ने
उनका घर , और उनके बाप को कतल कर दिया था, उन्हें चारपाई से बांध दिया था
तथा उनकी छोटी बहन के साथ..., उनकी मां के सामने ही । वे चीख पड़े थे, कुछ
नहीं कर पाए थे ठाकुरों का , मां ने गांव ही छोड़ दिया था, बहन ने
आत्महत्या कर ली थी, आज उनमें से कोई जीवित नहीं पर क्या वह सब भी खतम
हो गया जिसे उन्होंने अपने सामने ही घटते देखा था। अतीत का वह आक्रामक और
घृणित काल खण्ड उनके जीवन का बहुत बड़ा दर्द है। पर करें क्या ? किसके
खिलाफ... ठाकुरों का वह गांव आज भी है, उनमें से कुछ तो आज भी उसी तरह
अपनी मूंछें ऐंठ रहे हैं... समय भाग रहा है- ठाकुरों के साथ पुलिस थी,
उनका कुछ नहीं हुआ ?
उनके थाना क्षेत्र में घटी इस घटना का रिश्ता, उनके साथ घटी घटना से कुछ
जोड़ा जा सकता है क्या ...बलात्कार वहां भी हुआ था, यहां भी हो गया,
अपराधी पुलिस की वजह से बच गए और यहां ... दरोगा जी उत्पीड़ित नहीं बल्कि
उत्पीड़ितों के रक्षक हैं.... दरोगा जी रात भर सो नहीं पाते। कब कितनी
दारू पी गए रात में , और कब कहां-कहां छापा मार आए...सब कुछ धुन्ध-धुन्ध
सा ही रहा, मुल्जिम नहीं मिल पा रहे थे।
मजबूरन दरोगा जी ने कुर्की का आदेश प्राप्त कर लिया था, और कुर्की करने
की योजना भी बना ली गई थी। विधायक जी तथा भूतपूर्व मंत्री जी जो आज केवल
एम.पी. हैं उन लोगों के दबाव दरोगा जी पर बार-बार पड़ते रहे, यहां तक कि
डी.वाई.एस.पी.साहब ने भी झटके से कहा था ‘आग से नहीं खेलते मि0
शिवचरन....बाल बच्चें है नौकरी करो... चलते बनो। ’
शिवचरन के लिए मुुश्किल यह थी कि क्या करें रह-रह के उन्हें अपनी बहन और
मां का ख्याल आता। पिताजी का कतल और ओफ-ओ कितना भयानक था वहसब....बहुत
कुछ झेला है उन्होंने बनवारी को भी झेलना होगा उसी तरह।
शिवचरन का परिवार बहुत ही सीमित था, सिर्फ एक छोटा बच्चा और खूब सूरत सी
पढ़ी लिखी जवान बीबी... कुछ-कुछ नए दिल दिमाग की। चौधरी रामहरख कोई
राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, किन्तु जात-पात की राजनीति में उनका भी
महत्वपूर्ण नाम था। चौधरी ने जोगाड़ बनाकर लगभग दस हजार रूपया शिवचरन
दरोगा की बीबी के यहां, किसी सिपाही की औरत के माध्यम से भिजवा दिया था
और निश्चिन्त हो गये थे।
चौधरी राम हरख जानते थे कि इन मुकद्मों में गिरफ्तारी....मार-पीट , न हो
यातना न दिया जाय, फिर मुकद्में में क्या है आखिर बच्चे हीे तो हैं।
भूल-चूक, गलती सही तो हो ही जाया करती है, उमर ही साली गदह पचीसी की है
नऽ। थोड़ा सोचना चाहिए और दरोगा जी हैं कि मारने पीटने और बरबाद करने पर
तैयार... आखिर हमारी भी इज्जत है, हम लड़कों को बरबाद थोडे़ होने देगें।
हम भी देख लेगे दरोगा को, इधर दरोगा जी का ताक्खाना और उधर नेताओं का
दबाव पड़ना दरोगा पर लगभग साथ ही हुआ यह सब। दरोगा की बीबी को पटाने का
काम सिपाही सुमेर चौधरी की बीबी ने किया.... मामला लगभग समाप्त ही हो
गया। दरोगा की बीबी ने आश्वासन भी दे दिया।
मौका मिलते ही दरोगाइन ने दरोगाजी को समझाया था यूं कहिए तिरिया चिरित्तर
में उलझाना शुरू किया‘ आखिर क्या मिलेगा आपको, एक आदमी के पीछे पूरी ताकत
लगा दिए हैं, अब बलात्कार नहीं होगा क्या। रोक देगें सब आप... अरे यह
समाज है इसमें यह सब झेलना ही पडे़गा... आप अपना देखिए.... सब तो खिलाफ
हो गए हैं आपके, विधायक से लेकर एम.पी. तक,
डी.वाई.एस.पी.साहब खुश हांेगेंक्या आपसे,विधायक जी से उनके बहुत अच्छे
संबंध हैं , शिवचरन खाना छोड़कर उठ जाते हैं, लगते हैं दारू पीने,नहीं
खाना है मुझे, कृपया अपना भाषण बन्द कीजिए, यह मेरा काम है, इससे आप को
अलग ही रहना चाहिए।’
गटा-गट दारू पी जाते हैं, पत्नी ने कभी इतना अपमानित नहीं किया था।
शिवचरन की जुमा-जुमा तीन चार साल की शादी थी.... सब हंसते-खेलते गुजर रहा
था। पत्नी को यह सब अच्छा नहीं लगा ‘ आखिर क्या हो गया है आपको, खाना ने
क्या बिगाड़ा है आपका, इसी नमक रोटी की लड़ाई लड़ रहे थे न आप, मुझे नहीं
मालूम है क्या ? कैसे-कैसे दरोगा हो गए। क्या-क्या नहीं किया है आपने, इस
दरोगाई के खातिर, रूपया पैसा सब कुछ, खाना खा लीजिए, छोड़िए पीना पाना।
ठंडा होकर सोचिए यह घर है आपके थाने का हवालात नहीं, आपको समझना चाहिए कि
पहले आप घर गृहस्थी वाले हैं , फिर दरोगा।’
दारू की गिलास वह छीन लेती है, खाने की प्लेट उनकी ओर सरका देती है खाने
लगते हैं, दरोगा जी,’ घर गृहस्थी वाला हूं, मेरा भी परिवार था, तभी तो
सोच रहा हूं- बनवारी की लड़की के बाबत। तुम्हें क्या मालूम.... शायद सुना
हो, कभी किसी के मुंह से, मेरी भी बहन थी, उसके साथ भी तो यही हुआ था, वह
भी मेरे घर में, मेरी आंखों के सामने...हम मजबूर थे कुछ नहीं कर पाए उन
दरिन्दों का, तो क्या आज भी जब कि मैं कानून का रक्षक हूं, मुझे सब कुछ
भूल जाना चाहिए और परिवार के संक्रमित दल-दल में धंस जाना चाहिए‘यही
चाहती हो न तुम।’
नहीं मैं यह नहीं चाहती हूं जो कानून कहता है वही करें आप , कानून के
बाहर आप न जांय, आपको मालूम है न कानून क्या कहता है, मुल्जिम पकड़ो, न
पकड़ में आए तो कुर्की करो, मुकद्मा तय करेगा अपराध और अपराधी , आप तय मत
करो ?
‘वही तो कर रहा हूं।’
नहीं ! आप अपनी सीमा से बाहर जा रहे हैं, व्यक्तिगत आग्रह है आपका इस केस
में , बनवारी बन रहे हैं आप , जबकि आप बनवारी नहीं हैं सिर्फ दरोगा हैं’
और दरोगा बने रहने की शर्तों का ही निर्वाह करना आप का काम है। बनवारी को
बनवारी की तरह सोचने दीजिए। राम हरख को राम हरख की तरह यही आपका काम है,
इसके अलावा जो भी करेेंगे आप सब कानून के बाहर होगा।
तुम्हारा दिमाग फिर गया है निशा ? मैं कोई मशीन नहीं हूं, मेरे दिल में
भी एक इंसान का दिल है, और वह धधक रहा है, सुलग रहा है, राम हरख के
लोन्डे ने गलत नहीं किया क्या,उसे दण्ड़ नहीं मिलना चाहिए क्या ?नहीं,
थाना दण्ड देने के लिए नहीं बना है और न ही कानून को विश्वास है कि थाना
दण्ड देने में सक्षम हो सकता है.... यह काम बनवारी ही कर सकता है,
और मेरे ख्याल से बनवारी को करना भी चाहिए।
राम हरख की कुर्की हो जाती है और अन्य मुल्जिमानों की भी। कुर्की का सारा
सामान विधायक जी के सुपुर्दगी में दे दिया जाता है, विधायक को अपने
नेतृत्व क्षमता पर संतोष हुआ। चौधरी राम हरख को भी दिए गए दस हजार रूपयों
का असर समझ में आ गया। कुछ दिनों बाद सभी मुल्जिमान हाजिर अदालत भी हो
गए, पैरवी ऊंची थी, जमानतें भी हो गईं और बनवारी-बनवारी ही रह गया।
कुछ पत्रकारों तथा क्षेत्र के लोगों ने दरोगा पर इस केस के बाबत इल्जाम
भी लगाया पर हुआ कुछ नहीं।
समय सब दबा देता है, दब गया यह मामला, बस्तुतः दब ही गया था। कुछ ही
महीनों बाद थाना क्षेत्र में हल्ला फैला कि चौधरी रामहरख का इकलौता बेटा
पीयूष , कहीं मार दिया गया जंगल में। पुलिस सक्रिय हुई, जांच की गई, लाश
पहचान लिया पीयूष के बाप चौधरी राम हरख ने, उनकी पत्नी ने भी। मुकद्मा
दर्ज हुआ बनवारी संदिग्ध मुल्जिम बनाया गया, उसकी
गिरफ्तारी हुई, उसने थाने पर साफ-साफ इनकार कर दिया, अपराध उसने नहीं
किया है, प्रत्यक्ष दर्शी गवाह भी नहीं थे। किन्तु गढ़ लिया चौधरी राम हरख
ने...... इतना ही नहीं दरोगा शिवचरन को स्थानान्तरित भी कर दिया गया
जिला बाहर, शिवचरन दरोगा अभी किसी थाने पर तैनात नहीं किए गए हैं बनवारी
जेल में है,बनवारी का पूरा परिवार गांव छोड़कर किसी अज्ञात ठिकाने पर चला
गया है।
शिवचरन दरोगा एकाधबार छद्म नाम से मिल भी आए हैं बनवारी से, बनवारी की
आंखें शिवचरन को देखते ही डब-डबा जाती हैं ‘मेरे कारण सरकार आपको बहुत’
कष्ट उठाना पड़ा, कुछ नहीं है सरकार मेरे पास जान है, हाजिर रहूंगा।
शिवचरन लौट आए थे लाइन में,-लाइन में हाजिरी’ लगाने के बाद अपने कमरे की
तरफ चले गए थे। निशा चिढ़ी हुई थी ‘कहां गए थे बनवारी के यहां न।’ ‘हां
बनवारी के यहां ही।’ ‘शिवचरन’ को अजीब किस्म का लगने लगा है यह घर, जेल
से भी बदतर, यहां के कायदे-कानून अलिखित होते हुए भी कितने खतरनाक हैं,
कदम-कदम पर।
बिना सेना-पुलिस के भी कितनी चुस्त है यहां की व्यवस्था, थोड़ी सी
अनुशासनहीनता से भी उखड़ सकती हैं रिश्तों की दीवारें। निशा सोने दो, नींद
लग रही है, सूरज उगने के पहले मत जगाना, अच्छा है अन्धेरों में आंखें मूद
लेना, शिवचरन सो जाते हैं, कब उठेगें या सूरज उगने के बाद जगाएगी उनकी
पत्नी निशा, क्या मालूम। आखिर क्या है निशा का पक्ष, औरत के हक में, या
परिवार के। शिवचरन सो जाते हैं...... अगली सुबह तक।
स्वाती अंक 6, वार्षिकांक
दोस्त की चन्द्रकान्ता
लड़कियां सर्र से गुजरीं , थोड़ा ठमकीं, ठमक कर आगे बढ़ गईं। उतना आगे जितना
वे पीछे छूट गए थे। लड़कियों की गन्ध भी पीछे छूट गई थी जिसे वे संूघ रहे
थे खुश गवार सुबह में वे उबड़-खाबड़ रास्ते पर धूल बचाते हुए चल रहे थे।
धूल चारों ओर अटी पड़ी थी। पैर की धापों के साथ उड़ा भी करती थी। गायों,
भैंसों, बैलों को धूल उड़ने की चिन्ता न थी वे या तो पत्ते चबाने में लगे
थे, या पगुराने में मस्त थे लेकिन वे चिन्तित थे कि धूल कपड़ों का रंग बदल
रही है तथा चेहरा कुरकुरा हो रहा है पर कोई विकल्प न था, उन्हें तो
रास्ता तय करना ही था।
दोस्त के साथ चलते हुए देवनाथ ने सोचा कि दोस्त लड़कियों की गन्ध के बारे
में सोच रहा होगा तथा कोई नतीजा निकल रहा होगा कि वे कैसी हैं ? यदि ऐसा
नहीं तो शहर की लड़कियों से मिलान कर रहा होगा तथा स्पष्ट अन्तरों के बारे
में गुन रहा होगा लेकिन नहीं दोस्त इन जंगली लड़कियों के बारे में न सोच
रहा होगा। केवल वह खुद सोच रहा है क्योंकि उसका जंगल-पहाड़ तथा इस आबो-हवा
से पीढ़ियों का रिश्ता है।
दोस्त का रिश्ता इस इलाके से कुछ भी नहीं। वह तो चन्द्रकान्ता टी.वी.
सीरियल देखकर आया है कि विजयगढ़ किला देखा जाय जिसके आस-पास मेरा मित्र
रहता है।
दोस्त विजयगढ़ किला देखने आया है खास तौर से वह निवास जिसमें चन्द्रकान्ता
अप्रतिम शैली में अपनी रातों को गुजारा करती थी। दोस्त की सोच है कि
चन्द्रकान्ता की अद्भुत जीवन शैली की, खंडहर हुई खूब सूरती शायद वहां कुछ
बची हो। ईटों, पत्थरों, ढ़ोकों, दीवारों ने चन्द्रकान्ता की संगमरमरी देह
की गन्ध, जो उस जमाने में संूघा होगा, पिया होगा वहां कुछ भी तो बचा
होगा।
देवनाथ ने बाएं मुड़कर दोस्त का चेहरा देखा जिस पर रास्ता चलने की थकान
थी, वहां चन्द्रकान्ता की कल्पनाओं की गन्ध न थीं। धूप से दोस्त का चेहरा
कुंभलाने लगा था कुछ देर पहले दोस्त ने जो पान खाया था उसका कत्थईं रंग
होठों पर जमकर एक भद्दी पर्त जैसा हो गया था। दोस्त का चेहरा देखकर समझना
मुश्किल था कि वह क्या सोच रहा होगा ?
दोस्त से अलग होकर देवनाथ ने नजरों को उस तरफ फोकस किया जिधर वे दोनों
लड़कियां गड्ड-मड्ड हुई एक चौडे़ विशाल चट्टान पर पूरी तरह निश्चिन्त बैठी
थीं। वह लड़कियों का तात्कालिक यथार्थ था जो अभिव्यक्त हो रहा था कि वे
गड्ड़-मड्ड बैठी हुई थीं जो दूर से किसी अश्लील जुडवा आकृति की तरह दीख
रहीं थीं।’’
ः 89:
लड़कियों की यह अश्लील जुड़वा आकृति दोस्त को निश्चित रूप से अपनी ओर खींच
रही होगी तथा दोस्त अभिनय कर रहा होगा कि वह लड़कियों के प्रति अनासक्त है
- उसने सोचा तथा दोस्त को तजबीजने लगा -
दोस्त फिर भी तटस्थ बना रहा कुछ ऐसा कि उसे कुछ भी नहीं आकर्षित कर रहा-
पेड़, पौधे, झाड़ियां, छोटे-बडे़ चट्टान, घुमावदार, ऊबड़-खाबड़ रास्ते- सामने
के ऊंचे-ऊंचे काले-काले से दीखने वाले पहाड़, अगल-बगल की खाइयां आदि लेकिन
नहीं, प्रकृति इतनी समर्थ होती है कि किसी को भी प्रभावित कर लेती है।
दोस्त आधुनिक जीवन शैली का बुद्धिजीवी है तथा अनुभूतियों को पर्दे में
छुपाकर रखने में माहिर। वह बहुत कुछ छिपाकर भीतर रख सकता है जिसकी
प्रतिक्रियाएं कभी भी चेहरे पर न दिखेंगी। वह माहिर नही होता तो उसके
भीतर बैठा हूकूमत कर रहा तानाशाह हमेशा बाएं-दाएं क्रिया करता रहता ,
प्रतिक्रिया हीन नहीं रह पाता ।
निश्चित रूप से सर्र से गुजरने वाली लड़कियों ने दोस्त को प्रतिक्रियाओं
से बांधा होगा, तथा दोस्त ने प्रतिक्रियाओं को दमित किया होगा। हो सकता
है कि दोस्त ने प्रतिक्रियाओं को कोई कोड भाषा दी हो जिसका सीधाअर्थ हो -
‘‘मादक, उत्तेजक, बेधक, खूबसूरत’’ होती हैं लड़कियां जिन पर शहर या जंगल
के प्रभाव नहीं पड़ा करते , पर कोड भाषा समझना सबके वश का नहीं।
देवनाथ को दोस्त के चेहरे की कोड भाषा समझ में न आई। उसने लड़कियों की तरफ
देखा जो चौडे़ चट्टान से उठ गयी थीं तथा किले वाले रास्ते पर सीधे पश्चिम
की ओर चल रहीं थीं। वह रास्ता किले वाली मुख्य पहाड़ी के ठीक नीचे था जो
एक खतरनाक घुमावदार मोड़ से जुड़ा था। मोड़ से ही किले से कुछ दूर तक सीधी
चढ़ाई थीं, लड़कियां घुमावदार मोड़ से पहले थीं, नहीं तो न दिखतीं।
लड़कियां अलसाई चाल से चलती हुई दीख रही थीं जैसे वे अपना चलना महसूस
कराना चाह रही हों कि उन्हें पीछे चलने वाले महसूसें तथा किसी आकर्षक
कल्पना में डूब जाएं।
लड़कियों के यथार्थ एवं कल्पना के द्वन्द में दोस्त कहीं न था उसने सोचा
तथा सोच को विश्लेषित करने लगा तो उसे महसूस हुआ कि लड़कियां अपने यथार्थो
के साथ उसके लिए कल्पनाएं बन गयी हैं। कल्पनाएं जीवन की कविता होती हैं,
जिससे व्यक्ति जीवन को गतिशील बनाए रखता है।
दोस्त सफल कवि है, इसलिए गतिशील होगा ही, देवनाथ ने सोचा तथा दोस्त को
कुरेदा ‘‘दोस्त! हम खामोश क्यों हैं ? कहीं पैदल यात्रा की कष्टकर थकान
ने हमारे वार्तालापों को छीन तो नहीं लिया ? वैसे शायद हमें
भीतर डूबने की
कला नहीं आती’’ दोस्त के पपड़ियाए होठ हिले जिससे गंभीर मुस्कुराहट निकली
तथा चबा-चबा कर कहा गया प्रति उत्तर भी।
‘‘नहीं साथी! यदि मुझे भीतर डूबने की कला आती तब भी क्या है ऐसा, जिसे
डुबाता, भीतर तो पहले से ही तूफान हैं जो काबिज हैं। तुम जानते हो उनसे
निपटना मेरे वश का नहीं। मैं कुछ कर नहीं सकता सिर्फ सोच सकता हूं। कैसी
भी बारीक सोच हो रोटी नहीं होती साथी।
‘‘ रोटी भी तो एक सोच है दोस्त! ’’ देवनाथ ने कहा
दोस्त थोड़ा रूका फिर गंभीर होकर बोला-
रोटी भी एक सोच होती है उसके लिए जो रोटियां , खाकर ,फेंक कर सोचते हैं
लेकिन वे जिन्हें रोटियां उपलब्ध नहीं, अभाव, गरीबी, अस्मर्थता के कारण
उसके लिए रोटी ही सोच होती है, दर्शन होती है, पूरी दुनिया भी शायद।’’
दोस्त की गंभीरता उसे बे वक्त लगी। उसने दोस्त को टोका
‘‘दोस्त ! गंभीरता हर वक्त ओढ़ने-बिछाने की चीज नहीं, न ही कोई तकिया
कलाम, हम खुद को बहलाना नहीं जानते शायद। हमें खुद को बहलाना चाहिए कि
नहीं ’’
दोस्त को टोकते हुए देवनाथ ने दोस्त को देखा, कि दोस्त गंभीरता छोड़कर
बहलना चाहता है कि नहीं। दोस्त ने तभी किसी गंभीर कविता का मुखड़ा कहा,
भले ही वह कोई कविता पंक्ति न रही हो पर उसे यही महसूस हुआ-
‘साथी! चीजों को समझने व महसूसने तद्नुसार अर्थ निकालने का फर्क होता है,
एक तरह से देखो तो गंभीरताएं भी बहलाने का ही काम करती हैं। एक गंभीर
चिन्तक दूसरे गंभीर चिन्तनों को उत्पादित करता है। आलोचना के जरिए या
रचना के।
देवनाथ ने महसूसा कि दोस्त से घुमावदार बातें, नहीं करनी चाहिए। दोस्त
बातों के घुमावदार मोंडों पर न केवल रेंग सकता है वरन् सरपट दौड़ भी सकता
है इसलिए उसने दोस्त को बातों के घुमावदार मोड़ों से हटाने की चेष्टा से
कहा-
‘‘दोस्त ! अभी कुछ देर पहले सर्र से गुजरी जंगली लड़कियों को , क्या तुमने
नहीं देखा?’’ ‘‘ देखा था। ’’ दोस्त ने सहजता से कहा । कुछ देर बाद जब
दोस्त ने उसे चुप एवं गंभीर देखा तब कहा-
‘‘साथी । जानते हो उन्हें देखा ही नहीं वरन् अब भी देख रहा हूं कि वे
कितनी निश्छल हैं- पूरी तरह प्राकृतिक , जंगलों, पहाड़ों की तरह उगी
हुई’’।
दोस्त आखिर सूक्तियां बोलकर क्या समझाना चाहता है? एक वैचारिक चिन्ता ने
उसे उलझा दिया फिर भी देवनाथ ने कहा-
हां दोस्त ! वे अवश्य ही निश्छल हैं, यकीन मानो मैं उन्हें पवित्र निश्छलता
से ही देख रहा हूं, क्या तुम डिग रहे हो, इनमंे तुम चन्द्रकान्ता तो नही
तलाश रहे हो?’’
‘‘हां साथी मै ही नहीं तुम भी डिग चुके हो ये चन्द्रकान्ता से कमतर नहीं
दोस्त ने कहा तथा तेज-तेज चलने लगा- देवनाथ को दोस्त रहस्यों से भरा लगा,
जिसे सूक्तियों का निर्माता भी कहा जा सकता है लेकिन व्यापारी नहीं
क्यों कि दोस्त व्यापार कर ही नहीं सकता था, नहीं तो उसकी सूक्तियां जो
मंत्र जैसी हुआ करती हैं, बिक रही होतीं तथा दोस्त माला-माल हुआ होता।
दोस्त सूक्तियों का अन्तर्राष्ट्रीय बिक्रेता व निर्माता होता तथा मौजूदा
राजनीतिक उठा-पटक में दोस्त की निर्णायक एवं प्रभावकारी भूमिका होती।
देवनाथ को लगा कि दोस्त लड़कियों के प्रति उसका डिगना समझ चुका है किसी
ज्योतिषी की तरह तथा अपनी समझ को पुष्ट करने के लिए , खुद को डिग जाना
स्वीकार रहा है। दोस्त किसी तरह खुद पर ओढ़े गये पर्दे से बाहर हो उसने
विश्वास पूर्वक कहा-
‘‘नहीं दोस्त ! तुम डिग नहीं सकते’’
दोस्त चुप रहा, फिर अचानक हंसने लगा जैसे वह सिर्फ हंसने के लिए बना हो
तथा यह भी कि वह हंसने का कुशल रियाजी हो। देवनाथ को लगा कि दोस्त के साथ
उसे भी हंसना चाहिए, सही मैं जाने कहां से हंसी आई कि वह दोस्त की तरह
हंसने लगा बल्कि उससे बढ़-चढ़कर, जैसे दोस्त की हंसी दबाना उसके लिए जरूरी
हो।
दोस्त की हंसी रूकते ही उसकी हंसी थम गई। दोनों ने एक दूसरे को देखा वहां
हंसियां न थीं। उसने अपनी आंखे झुका लीं। यह मानकर कि दोस्त उसकी कमियां
पकड़ लेगा जब कि दोस्त अपनी कमियों को बताना चाह रहा था इसलिए उसकी ओर देख
रहा था-
‘‘साथी! वैसे मैं लड़कियों के प्रति कुछ एक बार ही डिगा हूं, गिरा हूं पर
जाने क्या है कि सदैव डिगा हुआ ही महसूसता हूं तथा कोशिश करता हूं कि
मेरी इस बिमारी को कोई दूसरा न जान ले। दोस्त ने अपने बारे में बताया तथा
दुबारा हंसने लगा। -
दोस्त की स्वीकारोक्ति उसे अच्छी लगी। वैसे भी व्यक्ति की स्पष्टवादिताएं
उसे प्रभावित करती हैं।देवनाथ ने दोस्त को संबोधित किया दोस्त। उधर देखो
लड़कियां घुमावदार मोड़ की तरफ जा रही हैं। लगता है उन्हें भी किले पर ही
जाना है। वही एक मात्र रास्ता है जो किले तक पहुंचता है वैसे रास्ता तो
खिड़की की तरफ से भी है लेकिन वह चढ़ने में खतरनाक तथा भयावह है। घुमावदार
मोड़ के बाएं दाएं दो पगडंडियां थीं। दाएं वाली पहाड़ी पहाड़ के किसी गांव
तक जाती थी। इस दो राहे के पास, ठीक बाईं तरफ एक भयानक खाईं थी तथा उसके
बगल में दो तीन बड़ी चट्टाने आपस में ऐसी
गुत्थम गुत्था थीं जो किसी गुफा का आभास करा रहीं थीं। ऐसी गुुफा जिसमें
आदिमानव रहा करते थे तथा उनका जीवन शिकारी था। वे घुमन्तू थे तथा
आवास बनाने एवं अपने लिए खाद्य सामाग्री उपजाने की कला से अज्ञान। वे
इक्कीसवीं शताब्दी के लिए मनुष्यों के रूप में जंगली पशु थे जो पशुओं से
की जाने वाली तुलनाओं को समाप्त होने की कामना रखते थे। दो राहे पर की
खाईं तथा वे चौडे़-चौडे़ विशाल पत्थर जो गुफा की आकृति निर्मित कर रहे
थे, उनका स्थानीय दन्त कथाओं में काफी महत्व था।
उक्त खाईं तथा पत्थर पूज्यनीय थे, फलस्वरूप वहां अषाढ़ के तीसरे दिन
स्थानीय मेला लगता था सुरहिया मेला के नाम से। सुरहिया नाम की कोई जवान
अविवाहित लड़की थी जो पास के ही गांवों की रहने वाली थी। सुरहिया वस्तुतः
किस गांव की थी यह किसी को नहीं मालूम। इधर के सभी गांव वाले सुरहिया को
अपने गांव का ही मानते हैं और मेले में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, बिना
विचार किए कि सुरहिया आर्य थी या द्रविण। उस गुफा तथा खांई तक पहंुच कर
देवनाथ ने दोस्त को सुझाया कि दोस्त बाईं तरफ वाली खाईं तथा गुफा देखे-
‘‘दोस्त ! इस खाईं को देखो तथा कल्पना करो कि मृत्यु इस खाईं में ढकेल दी
जाए तो किस तरह से तड़प-तड़प कर मरेगी- इस गुफा को भी देखो ! आओ देखते हैं-
दोस्त उसकी ओर मुड़ा और गुफा की तरफ चला। गुफा नजदीक थी। वे दोनों गुफा
में घुसे तथा गुफा की भीतरी दीवारंें देखने लगे। दीवार के एक तरफ आड़ी
तिरछी लाल-लाल रेखाएं थी जो जानवर की आकृति जैसी लग रही थीं उस चित्रित
जानवर के ठीक पीछे रेखाओं के सहारे ही एक मनुष्य को रचा गया था जिसके हाथ
में भाला था। प्रथम द्रष्टया वह चित्र आखेट के दृश्य जैसा लगता था दोस्त
को यह चित्र अद्भुत लगा उसने कहा भी-
‘‘साथी!अदृभुत है यह तो।अभी रेखाओं के रंग चटख एवं ताजे हैं आखिर किस चीज
से गुफा मानवों ने इसे बनाया होगा ?क्या उन्हें रंग बनाने की समझ थी ?
दोस्त ने थोड़ा रूक कर कहा-
‘‘इसका मतलब है कि गुफा मानवों में कलात्मक अनुभूतियां थीं। निश्चित ही
वे सार्थक कल्पनाओं वाले यथार्थ मनुष्य रहे होंगे।
देवनाथ ने दोस्त का कहा सुना, पर कुछ गंूगा नहीं किया क्योंकि वह उस समय
उस गुफा चित्र को देखने में तल्लीन था। चित्र में आखेटक, मनुष्य के पीछे
कुछ और लोग थे। जो काफी पीछे थे और दूरी की अनुभूति कराने के लिए
उत्कृष्ट कला के अनुरूप उन्हें छोटा, छोटा चित्रित भी किया गया था।
यह उसे आश्चर्यजनक लगा उसने तुरन्त दोस्त से कहा-‘‘दोस्त !इन्हें देखो!
उस जमाने में कितनी सामूहिकता थी। आखेट ही प्रमुख क्या एक मात्र उद्यम था
जिसके निमित्त स्त्री, बच्चे, पुरूष सभी एक साथ उद्यत होते थे और आज’’
‘‘आज तो कुछ भी नहीं है साथी।’’ दोस्त ने गंभीर चिन्ता व्यक्त की, गुफा
से बाहर निकल कर अगल-बगल छितराए सामानों को देखते हुए दोस्त ने पूछा ‘‘
इस पहाड़ पर नारियल के छिलके , गुफा के द्वार पर लागए गये सिन्दूर या रोरी
के टीके यह सब किस लिए साथी’’
दोस्त के सवालों के उत्तर वह दन्त कथा है, है तो जाने किस काल की पर आज
भी वर्तमान है। सुरहिया एक नगरवासी बाला थी। तब से सभी पहाडी गांव नगर की
तरह हुआ करते थे, गांवों के निवासी किले के शुभचिन्तक , रक्षक कर्मचारी
या अधिकारी हुआ करते थे। उस जमाने में किले ही सामाजिक, राजनीतिक,
आर्थिक, सांस्कृतिक या औद्योगिक केन्द्र हुआ करते थे
गांवों के लोग किलों के शासकों के जाति के होते थे। लोग कहते हैं कि
सुरहिया के श्राप से ही किले का शासक किसी युद्ध में मारा गया था।
सेनापति जो शासक का सगा छोटा भाई था उसे तो ‘‘ वन देवता’’ ने उसी दिन मार
दिया था जिस दिन उसने सुरहिया का शील भंग करना चाहा था तथा उसे इसी गुफा
में दबोच लिया था। सुरहिया के पिता किले का मुख्य द्वारपाल थे। वह अपने
पिता से मिलने किले पर गयी थी। जब वापस लौटने लगी तब सेनापति ने उसे
रास्ता उतरते कहीं देख लिया था। सेनापति ने जब सुरहिया को देखा जो एक
सुगठित देह वाली खूबसूरत व जवान लड़की थी तथा अविवाहित भी- फिर तो सुरहिया
के शीलभंग की सेनापति द्वारा की जाने वाली पूरी कोशिश किसी चलताऊ सिनेमा
की तरह हो गई।
बहुत ही नाटकीय ढंग से ‘‘ वन देवता ! प्रकट हुए ! कथा कहती है कि सुरहिया
की चीखें ही शक्तिशाली , वन देवता बन गयीं। वन देवता नामक उस आघ्यात्मिक,
रहस्यमयी शक्तिशाली ने सेनापति का बध किया था तथा उसे इस खाईं में फेंक
दिया था। खाईं में से स्वतः आग के बादल उठे थे जिसमें सेनापति जलकर भस्म
हो गया था। सुरहिया सेनापति से लड़ते-लड़ते इसी गुफा में बेहोश पड़ी थी।
वन देवता ने सारे देवी-देवता, पशु-पक्षी, जड़-चेतन, पेड़-पौधों को साक्षी
मानकर इसी गुफा में सुरहिया से विवाह किया था तथा सुरहिया को तमाम दैवी
वरदानों से ओत-प्रोत किया था फिर तो सुरहिया किसी देवी सदृश्य हो गयी थी,
दैवी शक्तियों से लैश !
देवनाथ ने देखा कि दोस्त के चेहरे पर दन्तकथा का आश्चर्य सिकुड़ा पड़ा है
तथा दोस्त कुछ कहना चाहता है। वैसे दोस्त ने कुछ कहा नहीं -पूछा....
‘‘ तुम्हें दन्त कथाएं प्रभावित करती हैं क्या ?
‘‘ नहीं ! दोस्त ने आश्चर्य प्रकट किया तथा सवाल किया-
‘‘ और इतिहास।’’
‘‘वे तो विल्कुल ही नहीं, जो सिर्फ शासकों के किस्से बताते हैं तथा प्रजा
के बारे में खामोश रहते हैं।’’
दोस्त की नजरें देवनाथ पर एकटक थीं जैसे दोस्त ने कुछ सुना ही न हो या
सुना भी हो तो फिर कोई उलझा हुआ सवाल पूछना चाह रहा हो। हुआ भी यही।
दोस्त ने अविराम पूछा-‘‘ फिर हम विजयगढ़ किला देखने क्यों जा रहे हैं,
क्या तुम मेरा साथ भर दे रहे हो या तुम्हारा भी कोई साझा लक्ष्य है? हां
लक्ष्य तो है ही क्योंकि मैं समझना चाहता हूं कि किलों से जनता के रिश्ते
किस तरह के थे तथा अतीत के आदमी के पास दूसरे आदमी को मूर्ख बनाने तथा
लूटने की कैसी कला थी, आज की तरह या इससे भी धारदार एवं अजीब।कहते हुए
उसने लड़कियों की तरफ इशारा किया जो चढ़ाई वाले रास्ते पर कुछ दूर जाकर धूप
से बचने के लिए किसी छतराए सघन पेड़ के नीचे
बैठी हुई थीं। दोस्त ने लड़कियों को देखकर अनुमान किया-
‘‘कहीं वे किसी की प्रतीक्षा तो नहीं कर रहीं ?
हमारी ही तो नहीं! साश्चर्य देवनाथ ने कहा तथा रास्ते पर चलने लगा- दोस्त
बगल में था। दोनों जल्दी-जल्दी रास्ता नापने लगे जिससे पूरी चढ़ाई धूप के
परछाई हीन होने के पहले ही चढ़ी जा सके। अभी आदमी की सामान्य लम्बाई से
छोटी हुई परछाई जमीन पर पड़ रही थी। बारह बजने में दो घंटे बाकी थे। तथा
ठीक बारह बजे कड़ी से कड़ी धूप भी किसी की परछाई नहीं बना पाती। परछाई की
तरह तो वे लड़कियां थी जो बैठी हुई थीं इसलिए वे पास होती जा रही थीं। यदि
वे बैठी न होतीं चल रही होतीं तो उनका पास होना चल रहा होता फिर वह भाप
जो छनकर आ रही थी वह न आती सीधे आसमान पकड़ लेती। जमीन से निकलने वाली उस
भाप की तरह जो गर्मी के बाद पहली बारिस के कारण उपजती है। लड़कियां चढ़ाई
वाले रास्ते पर उन दोनों के लिए सवाल बन कर बैठी हुई थीं जिसका हल वे
अपने-अपने व्यक्तिगत अनुभवों से निकलने में लगे थे इस संभावना के साथ कि
शायद कोई हल ठीक-ठीक निकल जाय। पर हल निकलने के पहले ही वे स्वतः हल हुई
जा रही थीं’’
क्योंकि वे चुप-चाप बैठी हुई थी कुछ इस तरह कि वे किसी की प्रतीक्षा में
नहीं हैं। वह एक संकरा रास्ता था जिसके अगल-बगल छोटी-छोटी कटीली झाड़ियां
थीं, वहां से एक पंक्ति में दो आदमियों के साथ चलने पर फीट दो फीट की भी
जगह न बचती। इसी रास्ते पर बैठी हुई थी लड़कियां। वह छतनार, छायादार पेड़
लडकियों से तीन-चार फीट दूर था जो पहले उनके पास ही दिख रहा था। पहले तो
लड़कियां भी लाल-लाल कपड़ों से ढके हुए धोख की तरह दीख रही थीं पर समीप
होने पर उनका दिखना पूरी तरह साफ-साफ था , इतना साफ कि उनका पहनावा उनकी
उम्र, उनकी देह की अभिव्यक्ति इसी तरह कुछ दूसरी बारीक बातें भी साफ हो
चुकी थीं जो औरतों के प्रति पुरूषों के मन में पायी जाती हैं।
जैसे अब यह स्पष्ट दीख रहा था कि उनमें से एक लड़की किसी अंग्रेजिन की तरह
जैसे-तैसे साड़ी लपेटे हुई थी जो कम उम्र होने के साथ-साथ अबोध एवं मासूम
सी दीख रही थी निश्चित रूप से वह अविवाहित लड़की थी क्यों कि उसके माथे पर
सिन्दूर की लाइन या कि हाथों, गालों आदि पर गोदना न गुदे थे। उसके कान भी
खाली थे उनमें सींक की खपाचियां थी तथा नाक में चांदी पीतल या सोने की
कील की जगह कोई ठोस सी दिखने वाली कड़ी चीज थी, जो मैल जम जाने के कारण
गन्दी दीख रही थी। उस का रंग गाढ़ा सांवला था तथा चेहरे पर उदास चमक थी।
दूसरी वाली जो पहले लड़की सी दीख रही थी दूरी के प्रभाव के कारण पास होने
पर उसका दिखना स्वतः गलत हो गया अब वह वैसा नही दिख रही थी जैसा पहले दीख
रही थी। हलांकि दूर से भी उन्हें देखना कम आकर्षक या उत्तेजक न था पर एक
भ्रम की स्थिति थी कि वस्तुतः उनमें पुरूष मन को प्रभावित कर सकने वाली
क्षमता है कि
नहीं। सारे अनुमान गलत साबित हुए। दूसरी वाली भरी-पुरी, सुगन्धित देह
वाली जवान औरत थी- उसके छितराये बालों को विभाजित करने वाली सिन्दूर की
एक गाढ़ी लाइन थी। आंखें गहरे काजल के रंगों से ढकीं थीं जिनसे छनकर
पुतलियों का गाढ़ा काला हिस्सा चमक रहा था। होठों पर रात के थकान की
पपड़ियां जमीं थीं, जो न नहाने के कारण जस के तस थीं। बाहों पर गाढ़े गोदना
गुदे हुए थे जिनमें चमक थी पर भद्दे दीख रहे थे। हालांकि जंगली औरतों की
उम्र का अनुमान ठीक-ठीक नहीं हो पाता फिर भी वह औरत बीस साल से तो कम न
रही होगी। देखने में वह किकुड़ियायी सी तथा शर्म के मारे छुई-मुई सी दीख
रही थी कुछ ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर रही थी जिससे साबित हो कि वह अभिनय कर
रही है पर ऐसा न था। वह स्वतः अपने भीतर गुजरने वाली औरत थी हालांकि इस
तरह की औरतें अपवाद ही हुआ करती हैं।
अपवाद तो वहां मुंह बाए जंगल की हर सांस में थे कि आओ, हमें देखो, छुओ,
टटोलो, और एक ऐसी दुनिया की कल्पाना करो जो हमारे पुरखों की थी पर नहीं
तुम तो चन्द्रकान्ता की गन्ध पीने आये हो।
दोस्त लडकियों के बारे में सोच रहा था और देवनाथ अपने पुरखों के अतीत के
बारे में तथा यह भी कि ये लड़कियां अगर जंगल की न होतीं तो......
तभी दोस्त ने देवनाथ को संबोधित किया.....
साथी ! उधर दखो ! कितनी फुर्ती से दोनों लड़कियां किले पर चढ़ रही हैं
यही फुर्ती चन्द्रकान्ता में भी रही होगी न।
देवनाथ लड़कियों को देखने लगा जो किले के बुर्ज की तरह खड़हर हो चुकी थीं
संभावना हीन, न पढ़ाई न स्वास्थ्य, न रहन-सहन फिर उसने देखा कि लड़कियां उस
तरफ मुंड गयीं जिसे यहां का खतरनाक परिक्षेत्र माना जाता है।
देवनाथ ने मुड़कर दोस्त का चेहरा देखा-चेहरे पर चन्द्रकान्ता की तलाश की
उद्विग्नता थी। ’’
तलछट उपन्यास का अंश
प्रतिमा
जगह-जमीन धन, संपत्ति, की तरह वह गांव भी जाति, उपजाति तथा गोत्रों में
बंटा हुआ था। इसी गांव के रहने वाले थे राम प्रसाद मिश्र। राम प्रसाद
मिश्र थे तो जाति के ब्राह्मण पर जजमानी का काम नहीं किया करते थे यद्यपि
कि पूजा पाठ व्यक्तिगत स्तर पर खूब किया करते थे। कभी-कभार मिलने वालों
को काफी इन्तजार करना पड़ जाता था जब वे पूजा पर बैठ जाया करते थे।
प्रतीक्षा में बैठा आदमी घबराने की सीमा लांघ जाता, पर मिलना आवश्यक होता
तो बैठना ही पड़ता।
ऐसे ही उस दिन पूजा पर बैठ गए थे राम प्रसाद जी, गांव के लोग उनके दरवाजे
पर बैठे-बैठे परेशान, घर के भीतर सन्देशा दर सन्देशा, पर काहे को राम
प्रसाद जी की पूजा खतम हो और वे बाहर निकलें। गांव में अम्बेडकर प्रतिमा
स्थापित कराने के लिए स्थल सफाई का काम हरिजन युवकों ने आरम्भ कर दिया था
अपनी बस्ती के पास पड़ी खाली भूमि पर। जाने कब से वह भूमि खाली पड़ी थी,
चकबन्दी आई, गुजर भी गई पर उस जमीन पर व्यक्तिगत मालिकाना में कोई घास तक
न उगी इतना अवश्य था कि सभी लोग माटी की दीवारों की पुताई खातिर मिट्टी
खोद कर अवश्य ले जाते थे। वहां की मिट्टी का रंग गाढ़ा पीला था असली रंग
माफिक, इसीलिए एक लम्बी चौड़ी पोखर बन गई थी वहां। लगभग दो तीन बिस्वा
जमीन इसी पोखर के किनारे खाली थी जिसे हरिजन युवक साफ कर रहे थे कि खबर
गांव के अन्य जातियों उप-जातियों को हो गई फिर क्या था, उनके युवक भी उसी
स्थल पर पहुंच गए बात बनाने के लिए, अपने-अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए
वहां पर उल्टा हो गया, हरिजन युवकों ने गैर हरिजन युवकों को मौके पर जम
कर मार-पीट दिया गनीमत थी कि लाठी डंडा नहीं चला, नहीं तो स्थिति माथा
फुटौवल या मृत्यु में बदल सकती थीं।
पूजा समाप्त होते ही राम प्रसाद बाहर आकर भीड़ में खो गए। सारा बृतान्त
उन्हें सुनाया गया। प्रतिमा स्थापना खेल से पराजित, चोट खाए युवक भी वहीं
थे।
आगे क्या किया जाय ? यह सवाल उछल कर राम प्रसाद मिश्र के सिर पर गिरा
इसके पहले कि वे सवाल से चोटिल हिस्से को हाथ से सहलाते कि लोगों ने
चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया।
कैसे मार दिया हरा........ ने कैसे लड़ गए सा........... इतनी
हिम्मत..............?
सरकार उनकी है इसलिए कि मुख्यमंत्री उनकी जाति का है....‘‘इसी तरह का
प्रलाप हवा में छितराता रहा, भयंकर हादसे की सूचना देता रहा और राम
प्रसाद एकाग्र सब सुनते रहे, सबको शान्त कराते रहे। पर वहां मानने वाले
लोग कहां थे, वह तो राम प्रसाद मिश्र का व्यक्तित्व था जो सबको चुप कराए
हुए था। ‘मार का बदला मार’ एक आदिम निर्णय लोगों के कुल बुलाते जेहान से
निकल कर बरामदे में उपस्थित हुआ, बरामदा आकस्मिक उत्तेजनाओं से भर गया।
उत्तेजनाएं जो हजारों हजार साल से लोगों को जड़ बनाए हुए थीं, इस घटना से
मानों तेज धार मिल गई थी। दलितों को दलित की तरह रहना चाहिए उनकी हैसियत
हो गयी मार करने की! ठीक है वह बंजर जमीन थी, इसका अर्थ यह तो नहीं कि
बंजर जमीन सिर्फ दलितों की है। जमीन भी हड़पो ऊपर से मार करो। एक तरफ
विशेष अवसर दूसरी तरफ जोर-जबरदस्ती’’
राम प्रसाद पूजा करने के बाद सीधे भोजन पर बैठ जाया करते थे, पर इस विशेष
परिस्थिति में कहां संभव था ? गांव के सवर्ण कहलाए जाने वाले लोग तथा वे
लोग भी जो पिछड़ी जातियों के थे लेकिन दलितों के मुद्दे पर सवर्णों के साथ
थे, इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि ‘‘मार का बदला मार’’ ही न्यायोचित तथा
वक्ती जरूरत है। राम प्रसाद मिश्र के सामने दोहरा संकट था, पहला यह कि
मार का बदला मार तमाम अतीत के प्रयोगों से स्पष्ट हो चुका है कि गलत तथा
अव्यवहारिक होता है, दूसरा संकट था कि इन उत्तेजित लोगों को कैसे शान्त
कराया जाय और ये लोग इस शान्ति प्रक्रिया को दलितों की पक्षधरता न मान
लें। इसी उधेड़-बुन में राम प्रसाद लगे ही थे कि ब्रजनन्दन पाड़े गरमा
गए.....
‘‘का हो मिसिर कुछ, कुछ बोलेंगे भी, नहीं तो हम लोग चलते हैं, आज किसी भी
तरह से फूंक देना है सालों को’’
ब्रजनन्दन पाडे़ के मुखर होते ही अन्य लोग भी पाडे़ की ही राग में बोलने
लगे। राम प्रसाद मिश्र की आंख के सामने थाना नाचने लगा, वहां बैठा दरोगा
हनुमान चालीसा की तरह हरिजन एक्ट का पाठ करता हुआ। राम प्रसाद मिश्र ने
धीरे-धीरे लोगों को समझाना शुरू किया और पूछना भी-
‘‘वे लोग थाने पर तो नहीं गए’’ इस प्रश्न पर भीड़ चुप हो गई, पीछे बैठे
किसी....कुशवाहा ने बताया कि आठ-दस लोग थाने की तरफ गए हैं, अब थाने गए
कि नाहीं ई का पता।’’ बाजार भी जा सकते हैं-
‘‘किसी स्कूटर वाले को थाने की तरफ भेज कर पता करना चाहिए कि वहां क्या
गुल खिल रहा है? एक अज्ञात स्वर भीड़ पर उछला इसी स्वर के साथ एक सुझाव
भी.... कि पत्रकार फलां..... को भी सहेज देना चाहिए कि वे थाने के संपर्क
में रहें, किसी अनहोनी की सूचना तत्काल भेजें।’’
‘‘अरे नहीं भाई ! दरोगा थोड़य दलित है, वह काहे लगाएगा हरिजन एक्ट , मारे
तो हरिजन ही है किसी स्वर्ण ने तो मारा नही उल्टा मार खाकर बहादुरी
से लौट आए हैं सरकारी मंशा के अनुरूप , सवर्ण मार भी किसे सकते हैं सिवाय
भाई, बाप रिश्तेदारों के। यह खर-खराती आवाज थी, थी तो तर्क संगत पर इसका
उत्तर जो भीड़ में कहीं छिपा था जब बाहर निकला गरजते हुए तब एक बार फिर
दरवाजे पर मातम छा गया...‘‘ भले दलित मारे हों वे कह सकते हैं कि हमें
मारा पीटा गया , गालियां दी र्गइं, अपमानित किया गया पर सवर्ण मार खाने
के बाद भी अपनी पराजय नहीं स्वीकारता मार सकता नहीं, मारता भी नहीं पर
गरजता है कि मारा है।’’
राम प्रसाद मिश्र पराजय को बहुत बड़ी जीत माना करते थे और चाहते थे कि इस
आकस्मिक विवाद को इसी आत्म स्वीकृति से ही हल कर लिया जाय। क्यों कि
भविष्य में इस तरह के जघन्यतम विवादों का होना संयोग नहीं-जरूरत होगा।
राम प्रसाद मिश्र इस निश्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि गांव का एक छोटा सा
मामला कितनी सहजता से बजबजाने के लिए थाने तक पहंुच जाएगा। गांव का भाई
चारा आपसदारी, सुख-दुख की सहभागिता रौदते हुए कुचलते हुए। कौन नहीं जानता
कि थाने द्वारा कोई भी विवाद कम से कम सुलझाया तो नहीं जा सकता। हां
उलझाया जा सकता है धागों की तरह।
रामप्रसाद सोचने लगे पहले रपट अपनी तरफ से लिखाना ठीक होगा कि नहीं ?
राम प्रसाद के भीतर सवालों का ज्वार भाटा आता और स्वतः स्थिर भी हो जाता।
माहौल तथा राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार थाने पर लड़कों को भेजना शेर
की मांद में भेजना हो जाता वहां से लौटना मुश्किल होता। इस प्रकार से इस
विशेष राजनीतिक वातावरण के बगीचे में घुस कर फूल सूंघना या मन ललच जाने
पर कोई फल तोड़कर खा लेना अपराधी होने को प्रमाणित करना होगा।
‘‘विशंेष अवसर’’ हथिया लेने की सामन्ती प्रवृत्तियां दबे कुचलों में आ
जाना सहज सा जान पड़ता है। सामन्ती संस्कारों के देश में जाने कब से
लूटपाट मार और अत्याचार की ही तो खेती की जाती रही है। ‘विशेष अवसर’ मिल
जाने पर दबे,कुचले, गुप-चुप लजाते सकुचाते सामन्ती अवशेष फुदक कर हरिया
जाते हैं। वे हरिया ही तो रहे हैं।
लड़कों को थाने पर जाकर घटना की सूचना देना हर-हाल में गलत होगा, दरोगा,
उतना ही करेगा जितना प्रशासन, शासन चाहता है, उसे भी नौकरी
करनी है, तरक्की करनी है.... बढ़ते-बढ़ते कोतवाल एस.पी.आदि होना है। यह
रिश्क नहीं लिया जाना चाहिए इतना तो कानून में ही लिखा पढ़ा रहता है, वहां
भी बहुत कुछ बायां-दायां चल सकता है। मन के भीतर चल रहे द्वन्द को तो दबा
लिया था राम प्रसाद मिश्र ने और आश्वस्त हो गए थे किन्तु सोच रहे थे कि
बानरी सेना की तरह ‘पत्थर उछाल कर लम्बे समय तक के लिए थाना पुलिस या
किसिम-किसिम के नेता-परनेताओं को
मनोरंजन के लिए गांव में आते-रहने का निमंत्रण देना होगा। मुश्किल थी
गांव वालों को समझा सकने की। लोग-बाग कुछ करने-कराने के लिए निर्णायक
कार्यवाही चाह रहे थे।
अभी किसी निश्कर्ष पर भीड़ पहुंच भी नहीं पाई थी कि स्कूटर की घर-घराहट
सुनाई पड़ी। स्कूटर वाला आ गया , साथ में एक पत्रकार महोदय भी थे। उनके
अनुसार थाने पर कोई सूचना नहीं थी, हां सरकारी पार्टी का एक नेता मिला था
उसने बताया कि दलितों को रोक दिया गया है और उन्हें समझा दिया गया है कि
मार-पीट नहीं करनी चाहिए इससे हल नहीं निकल सकता। वह वर्ग प्रतीक्षा
करेगा सवर्णों की कार्यवाही का। संभवतः इस कारण थाने पर वे न जा रहे हों।
वहां दरोगा भी अनुसूचित जाति का नहीं है। एक स्वभाविक अविश्वास हो सकता
है दरोगा से।
कुल मिलाकर राम प्रसाद मिश्र इस नतीजे पर पहुंच रहे थे कि हरिजन लड़के अब
शायद थाने न जाएं लेकिन उनके समझने से काम कहां चलने वाला था फिर भी
लोगों के सामने अपना कोई न कोई पक्ष तो राम प्रसाद मिश्र को रखना ही था।
राम प्रसाद ने लोगों को समझाया कि बादल की तरफ ताकते रहने से पानी नहीं
बरसता उसे जब बरसना होगा बरसेगा ही, यह सोच लेना कि मार का बदला मार कह
देने से मार हो जाएगी, और सारे हरिजन मार गिरा दिए जाएंगे उतना ही
मुश्किल है जितना कि मार करते समय केवल मारना ही संभव होगा, मार खाना
नहीं, संभावना मारने की जगह मार खाने की तरफ भी रेंग सकती है जैसा कि
रंेग गई और बच्चे चोट खा गए। जमीन अपनी जगह पर बिना किसी खरोंच के पड़ी
हुई है। मार-झगडें़ से कुछ नहीं होगा उपाय करना होगा। उपाय समय के साथ चल
कर ही किया जा सकेगा।
‘‘ अभी आप लोग प्रतीक्षा कीजिए, गुस्से से मुक्त हो लीजिए फिर निर्णय
लिया जायेगा कि क्या करना है, करना तो होगा ही कुछ।’’
समझदार किस्म में लोगों के अलावा बहुत सारे लोगों को राम प्रसाद मिश्र का
सुझाव सिखण्डी नुमा लगा पर लोगों के सामने दिक्कत थी, राम प्रसाद मिश्र
को छोड़कर कुछ भी निर्णय नहीं लिया जा सकता था, उनका वांछित निर्णय से
सहमत होना आवश्यक था। नवयुवकों ने चाहा था कि रामप्रसाद मिश्र को ही
किनारे लगा देना चाहिए, जब तक इस तरह के लोग रहेंगे, दलितों का मन बढ़ता
रहेगा।
राम प्रसाद काठ के पुतले तो थे नहीं, जगह-जमीन तथा सामाजिक हैसियत से ठीक
आदमी थे,गांव क्या पूरे क्षेत्र में राम प्रसाद मिश्र को सुलझा हुआ माना
जाता था। सो मुश्किल हो गया था गांव वालों के लिए उन्हें छोड़कर कोई कार्य
करना। ले देकर सारी प्रतिक्रया लोगों के जेहन में धंसी रह गई। दलितों की
तरफ से भी कोई कानूनी या राजनीतिक प्रयास नहीं किया गया। बावजूद इसके
खुशियां मनाने की खबरें सवर्णों के घरों तक अवश्य पहंुची,
जिसे राम प्रसाद मिश्र के कारण गंभीरता से नहीं लिया गया।
लगभग महीना भर गुजर गया होगा। दोनों पक्ष शान्त रहे। हलचल तब शुरू हुई जब
सवर्ण लोग संगमरमर की अम्बेडकर प्रतिमा ले आये और उसके शिलान्यास के लिए
मंत्री जी को भी आमंत्रित कर , उनके आने की स्वीकृति प्राप्त कर लिए। इस
दौरान एक राजनीतिक पार्टी जो दलित समर्थक मानी जाती थी उसके जिलाध्यक्ष
का भी दो-चार बार स्थल निरीक्षण हेतु दौरा हो चुका था।
शिलान्यास होना था, हुआ और उसी स्थल पर जिस स्थल पर विवाद हुआ था।
शिलान्यास के बाद, जो सभा हुई थी उसमें सवर्णों की भूरि-भूरि प्रशंसा की
गई मंत्री जी द्वारा-
‘‘सामाजिक समरसता का जो उदाहरण इस गांव ने प्रस्तुत किया , इसे देश स्तर
पर किया जाना चाहिए।’’
इसी तरह की अन्यान्य वाह-वाहियां। सभा में सबसे महत्वपूर्ण बात जो
चिन्हित करने लायक थी वह यह थी कि अम्बेडकर प्रतिमा शिलन्यास हो रहा हो
जिस गांव में , उस गांव का एक भी दलित , उस कार्यक्रम में न उपस्थित हो।
इसे बहुत ही गंभीरता , से राम प्रसाद मिश्र ने महसूसा था, जबकि सारे
दलितों से व्यक्तिगत रूप से राम प्रसाद मिश्र ने घर-घर जाकर आग्रह भी
किया था।
शिलान्यास के बाद, एक भव्य चबूतरा भी बनवाया गया तथा प्रतिमा के ऊपर एक
छतरी भी। जमीन के चारो तरफ कटीला तार लगा दिया गया तथा एक गेट भी बनवा
दिया गया।
राम प्रसाद मिश्र क्या कर रहे थे, क्या करना चाह रहे थे, पूरे क्षेत्र
में उनके पागलपन की चर्चा थी , खास तौर से सवर्णों में। अन्दाजा लगाया जा
रहा था कि बुढ़ौती में हो सकता है-
‘‘ बूढ़ा दलित समर्थक पार्टी से चुनाव लड़ना चाहता हो एम.एल.ए. का, या लड़का
बेकार बैठा है, हो सकता है, उसे कहीं लगा देने का जोगाड़ हो। क्योंकि कोई
इतना रूपया पैसा बिना मलतब के काहे खर्च करेगा।’’
दूसरी तरफ दलित लोगों में यह था कि कौन होते हैं राम प्रसाद मिश्र, बाबा
साहब की प्रतिमा स्थापित कराने वाले, सदैव लूट पाट धोखा देने वाली जाति
दलितों का भला कब चाहेगी ?
गांव के दलितों का तर्क था, ‘‘ वहां जब हम लोग- उस स्थल की सफाई
कर रहे थे तब तो लड़कों को भेज दिया मार-पीट करने के लिए, वो तो सब के सब
पीटे गए नहीं तो जो होता क्या वह अच्छा होता ? उस दिन बाबा साहब के प्रति
उनका दुलार कहां था ? शिलान्यास के बाद से ही तमाम तरह की बातें हवा में
उधराने लगी थीं। गांव के दलितों ने इसे सवर्णों का षड्यंत्र माना।यह बात
अलग थी कि षड़यंत्र का संभावित परिणाम अबूझ पहेली जान पड़ रहा था। गांव की
सामाजिक समरसता दिन और रात
के साथ लगातार छीजती जा रही थी।छेद जो पहले नामालूम जैसे थे उनसे रिसते
मतभेदों को साफ-साफ देखा जा सकता था। दलितों का समूह एक अलग इकाई में
गठता हुआ, मजदूरी से विरत रहने के प्रयास में लग गया था। पहले तो गांव की
मजदूरी बन्द कर दी गई बाद में स्थितिहड़पड़ी तक पहुंचगई थी।गांव के सवर्णों
की खेतीगृहस्थी का कार्य बाधित होने लगा था ।
दलितों द्वारा लिया गया यह प्रतिक्रियात्मक फैसला, राम प्रसाद मिश्र के
लिए सरदर्द बनता जा रहा था। गांव में मार-पीट या अन्यान्य किस्म के
उपद्रव की संभावना बढ़ती जा रही थी। राम प्रसाद मिश्र नहीं चाहते थे कि
किसी भी प्रकार से गांव में अशान्ति फैले, भाई-चारा टूटे। इसे रोकने के
लिए ही उन्होंने बाबा साहब की प्रतिमा की स्थापना बहुत धूम-धाम से कराई
थी पर इसका असर उलट गया सांप की तरह जैसे कि काटकर तुरन्त उलट जाया
करते हैं।
राम प्रसाद मिश्र के लिए दलितों को समझा-बुझा पाना कठिन हो रहा था। वे
दोनों तरफ से विवादास्पद बनते जा रहे थे। सवर्णों का मोर्चा ब्रजनन्दन
पाडे़ ने संभाल लिया था, वैसे वे पहले से ही मोर्चा बनाए हुए थे। चुनाव
सामने था। ‘का करेगा राम प्रसदवा मिमियाने वाला, वह दलितों का तलवा चाटे,
चला था बाबा साहब की प्रतिमा स्थापित करवाने। ‘प्रतिमा तो स्थापित हो गई
फिर काहे बवाल मचा हुआ है।’
मुझे मूर्ख और झगड़ालू समझता है। भला कौन नहीं जानता इन बेजान मूर्तियों
के बाबत। मूर्तियां काहे स्थापित की और कराई जाती हैं ? सब बूझते है। राम
प्रसदवा समझता है कि वही जानकार है, सब अकल उसके पास गिरवी है। स्थापित
मूर्तियां पहले भी कुछ न कुछ राजनीति करती थीं और आज भी कर रही हैं।
दुनिया जब तैयार ही नहीं है कुछ समझने के लिए कि पहले की स्थापित
मूर्तियों पर कुत्ते टट्टी-पेशाब क्यों कर रहे हैं ? दलितों ने समझ लिया
है कि सवर्णों की इसमें भी कोई राजनीति है। स्थिति कितनी बिगड़ गई है जिसे
राम प्रसदवा नहीं समझना चाहता। मूर्ति-फूर्ति तो झगड़ा का बहाना है , सो
झगड़ा होगा ही।
ब्रजनन्दन पाडे उस गुस्सैल गिरोह की मुखियायी करने लगे थे, जो पूर्णतया
दलितों के विपरीत था। दलितों की हर अगली कार्यवाही की सूचना प्राप्त करना
तद्नुसार अपने पक्ष का कार्य करना, यह उस गिरोह का प्रमुख कार्यक्रम बन
गया था। गिरोह के मुताबिक उन्हें सूचना मिल गई थी कि दलितों के लड़के किसी
न किसी दिन बाबा साहब की प्रतिमा तोड़ डालेगें और चबूतरा नष्ट कर देगें।
यद्यपि कि यह उल्टी सूचना थी, पर सूचना थी। ब्रजनन्दन पाडे़ के लिए यह एक
ऐसी सूचना थी जिसमें उन्हें षड्यंत्र जान पड़ता था, सो इस सूचना पर अगली
कार्यवाही क्या की जानी चाहिए, यह उनकी मोटी बुद्धि के वश का नहीं रह गया
था। राम प्रसाद मिश्र को उन्होंने
सूचना के बाबत बता दिया था। गनीमत थी, दलित पार्टी के जिला मंत्री की
प्रतीक्षा की जा रही थी, वे खार खाए बैठे थे अपने जिलाध्यक्ष से, उन्हें
नहीं बुलाया गया था शिलान्यास के अवसर पर।राम प्रसाद मिश्र सूचना सुनते
ही अवाक् रह गये थे-
‘‘गोया प्रतिमा तोड़ो और सवर्णों को फंसा दो।’’ आनन फानन में उन्होंने
दलित पार्टी के जिलाध्यक्ष से संपर्क किया और उन्हें इस बाबत बताया तथा
गांव में चलकर शांति व्यवस्था के लिए प्रयास करने हेतु निवेदन भी किया।
जिलाध्यक्ष स्थिति की गंभीरता समझते हुए राम प्रसाद मिश्र के साथ ही
उनके गांव पर चले आए थे। इन लोगों को गांव आने में काफी रात हो गई थी।
गांव के एक हिस्से से शोर शराबा सुनाई पड़ा। पूरा गांव उस तरफ दोड़ रहा था
जिधर प्रतिमा स्थापित की गई थी। वहां दोनों पक्ष मौजूद थे। ब्रजनन्दन
पाडे सवर्णों का नेतृत्व करते हुए गरज रहे थे।
‘‘दम हो तो तोड़ो प्रतिमा, एक-एक से निपट लूंगा ?’’
दूसरी तरफ दलित युवक कह रहे थे-
‘‘ तुम पंडितों ने बाबा साहब को अपवित्र कर दिया, तुम लोगों द्वारा
स्थापित बाबा साहब की प्रतिमा हमारी नही हो सकती।’’ इसी तरह बहुत कुछ,
दलितों की तरफ से मौके पर ही जिला मंत्री जी देखे गए। शोर शराबा सुनकर
राम प्रसाद मिश्र और जिलाध्यक्ष भी मौके पर पहुंच गये थे। जिलाध्यक्ष और
जिला मंत्री जी दोनों के प्रयास से प्रतिमा विखंडन कार्यक्रम फिलहाल तो
स्थगित हो गया है। अब आप बताएं कि आगे क्या हो सकता है, क्योंकि वह गांव
तो रहेगा ही, वहां सवर्ण भी रहेंगे और दलित और पिछड़ी जाति के लोग भी, यदि
आप कोई उत्तर नहीं देना चाहते, इस तरह की समस्याएं आपकी कार्यसूची में
नहीं है कि कोई ब्राह्मण बाबा साहब की प्रतिमा स्थापित कराए, इस तरह का
व्यक्तित्व नहीं हो सकता, लेकिन यदि आप मुड़ियाए हुए हैं और चाहते हैं
उत्तर देना यह मानकर कि ब्राह्मण भी बाबा साहब की प्रतिमा स्थापित करा
सकते हैं तब क्या आप कह सकते हैं कि प्रतिमा स्थापना का राजनीतिक प्रयोजन
प्रतिमा विखंडन का राजनीतिक कारण बनेगा ही। प्रतिमाएं हर काल मे स्थापित
तथा विखंडित होती रहीं और आगे भी होती रहेंगी इसी तरह। तौल लीजिएगा सच और
झूठ के बीच कांपते, चीखते यथार्थ का वजन। ऐसे लोग जो प्रतिमा स्थापनाओं
के विरोध में होते हैं, प्रतिमाएं चाहे भगवान की हों या किसी महामानव की
, यदि आप उनमें से हैं फिर तो हो सकता है कि आप इस परेशान हाल गांव के
लिए कोई समयोचित सुझा सकें ताकि एक ही पिटारी में सांप, नेवला, मगरमच्छ,
छिपकली, मछलियां ,और भी तमाम छोटे बडे़ जीव-जन्तु समाजिक समरसता के साथ
अपने प्राकृतिक गुणों के आधार पर जीवन का निर्वाह कर सकें।
वैसे उस गांव में उछलते, डांकते , कूदते मुद्दे बाहर निकल कर ब्लाक तहसील
और जिला तक की यात्रा करते हुए जिलाध्यक्ष और जिला मंत्री के कार्य -
व्यापारों की भी समीक्षा कर सकते हैं क्योंकि जिलाध्यक्ष प्रतिमा स्थापना
के सभी प्रयोजनों पर सहर्ष उपस्थित थे और जिला मंत्री दलितों के साथ
प्रतिमा विखंडन के दिन थे ही, भले विखंडन का कार्य स्थितियों,
परिस्थितियों के दबाव के कारण रूक गया हो पर कैसे कहा जा सकता है कि
स्थगित हो गया है सदा के लिए,
‘‘बाबा साहब की प्रतिमा’’ की स्थापना का कौन समाज, कौन व्यक्ति पात्र है,
इसका उत्तर भी उसी गांव में कहीं फंसा पड़ा है। इस फंसे हुए उत्तर पर तर्क
और विचारधारा की काई भी जमी हो सकती है। सोचना होगा कि वास्तविक उत्तर
क्या हो सकता है यदि यह मान लिया गया हो कि प्रतिमा स्थापना एक अनिवार्य
तथा पवित्र कार्य है। इसे हर युग हर काल में और हर समाज द्वारा किया जाना
चाहिए। इस गांव की समस्या का कुछ भी हल यदि आप के पास है तब सबसे जरूरी
और उपयोगी होगा कि उसे आप सार्वजनिक कर दें। इतना साहस तो आप के पास
आजादी के पचास साल के भीतर जुट ही गया होगा कि आप अपने निष्पक्ष उत्तरों
के साथ इस विवादास्पद गांव की यात्रा कर सकें। वहां तनाव ग्रस्त लोगों को
अपने प्रयासों से आश्वस्त कर सकंे।
वहां पहुच कर सबसे पहले किस वर्ग से मिलना चाहिए आपको जिस पर कोई विवाद
खड़ा न हो। गांव में पहुंचते ही पहले की स्थापित किसी प्रतिमा के पास खड़े
होकर सिक्का उछाल लीजिएगा, यह एक अन्तरराष्ट्रीय लोक प्रिय निर्णय
प्रक्रिया है। अब आप बिना किसी सन्देह के दोनों वर्गों से मिल सकते हैं
और जांच सकते है कि प्रतिमा स्थापना से लेकर प्रतिमा विखंडन योजना तक इस
गांव का तापमान किन सामाजिक, आर्थिक , राजनीतिक, धार्मिक बीमारियों के
कारण घटता, बढ़ता रहा, उतरने का नाम ही नहीं। आपके द्वारा किया गया निदान
भले ही वहां वर्ग-समाजों द्वारा ग्राहय न हो, फिर भी कुछ असर तो पडे़गा
ही। दोनों पक्ष आमने-सामने बैठकर कम से कम बातचीत तो करेगें ही और सुलझाव
की तरफ न बढ़ने की स्थिति में कोई दूसरी बैठक की तारीख तो निश्चित हो ही
जायेगी।
आपके पहुंचते ही गांव के सूखते मुर्झाते चेहरों पर कुछ रौनक आएगी। वे
सुबह की ताजगी महसूस करेंगे, पर यह अलग बात होगी कि वे अपना पक्ष क्या
चुनना चाहेंगे, क्या वे मूर्ति विखण्डित करके समरसता की, विश्राम कक्षा
में पहुंच जाएंगे या वहां केवल प्रतिमा विखंडन या स्थापना का ही मामला
शेष रह गया है। सामाजिक संघर्षों के दूसरे आधारों का सफाया हो चुका है।
स्वार्थी राजनीति के नारों का अन्त हो चुका है। इन सब चीखती बातों को
चाहें तो आप किसी बोरे में भरकर राजधानी ले जा सकते हैं। वहां इनकी
प्रदर्शनी लगाकर सबकी राय भी हासिल कर सकते हैं। तद्नुसार मीडिया के
विभिन्न मुलायम अंगों पर इनका लेप भी चढ़ा सकते हैं। यह सब निर्भर करेगा
आपकी सामर्थ्य पर, आपके पास अधिगृहीत अवसरों एवं सुविधाओं पर,
गांव से निकलते समय राम प्रसाद मिश्र से अवश्य मिल लीजिएगा और उन्हें
समझाने का प्रयास कीजिएगा।
‘‘अरे भाई ! राम प्रसाद जी बाबा साहब की प्रतिमा स्थापित कराने की जगह आप
चुप ही रह गए होते दलित लोग तो इसके लिए प्रयास कर ही रहे थे।
क्या आप नहीं जानते विश्वनाथ मंदिर में हरिजन प्रवेश कराने के लिए
राजनारायण और लोहिया को कितनी गालियां दी गईं थीं, पुलिस ने उन्हें चोटिल
भी किया था।
यह सब सवर्णों ने ही तो किया था। अब यदि दलित अपने देबी देवताओं का चुनाव
करने में लगे है, तब आप क्यों दखल दे रहे हैं। रामप्रसाद जी जब आप मजबूत
थे, तब आपने उन्हें अस्पृष्य बना दिया था। वे अब आपको अस्पृष्य बना ही
देगें, क्योंकि वे मजबूत हो रहे हैं, सरकार उनके साथ है। पहले सरकार आपके
साथ हुआ करती थी। यह सब अतीत की पागल क्रियाओं की सुप्त प्रतिक्रियाएं है
राम प्रसाद जी , गांव में रहना आप लोगों को है। यहां आप पर लिखने के लिए
कविता, कहानी, उपन्यास या किताब कोई नहीं आएगा, देखिए सारा कच्चा माल
दिल्ली ले जा रहा हूं। अब इससे लुभावने उत्पाद वहां बनाए जाएंगें, आपको
तथा आपके गांव को समझने के लिए पुलिस सक्षम है, वह सदा समझती रहेगी आपको,
अब चाहे जो कुछ घटे , आप को कान मे तेल डालकर , आंखें और मुंह बन्द कर
सतत जीते रहने के अभ्यास में लग जाना चाहिए।’’
क्षमा कीजिएगा, ग्लोब के एक छोटे से गांव की चर्चा में इतना समय जो लगा
आपका। गांवों में तो कहानियां , उपन्यास रोज ही जनमा करते हैं। रोज ही
कोई न कोई रामायण या महाभारत होता रहता है। कभी देरिदा यहां आंखें फाडे़
घूरता है, तो कभी फूकूयामा, कभी-कभी सिमोरन द बउआ आकर अजीबों गरीब हलचल
पैदा कर जाती हैं। गांव से छटक कर तमाम ओहदे तमाम पुरस्कार उसी तरह निकल
भागते हैं, जिस तरह खलिहानों से अनाज बोरों में घुसकर गोदामों में
उपस्थिति दर्ज कराते हैं। यहां बहुत कुछ होता रहता है। इस होने और न होने
के बीच शासन व्यवस्था भी अपने अनुरूप पाला छूती रहती है।
इस परेशान हाल गांव में शान्ति व्यवस्था स्थापित हो सके, लोग मिलकर
अपने-अपने स्थान पर शान्ति और मैत्री सभा का आयोजन करें। सदभावना और भाई
चारा का सैद्धान्तिक वार्तालाप कर सकें। दोनों पक्षों में समझदारी विकसित
हो जाय और लोग समझने लगें एक दूसरे को। समाज में व्याप्त
प्रतिमा स्थापनाओं की अवधारणाओं को नई और विकसित आधुनिक अवधारणाओं से
संस्कारें और बताएं, प्रतिमा हर हाल में प्रतिमा ही रहेगी। इस विवाद में
नहीं पड़़ना चाहिए। हां अन्त होती क्रूर शताब्दी के बहाने क्या नहीं रह
गया है जिसे किसी न किसी प्रतिमा के सहारे न किया गया हो। राम प्रसाद
मिश्र भी एक जीवित प्रतिमा ही तो हैं जो मृत बाबा की प्रतिमा स्थापित करा
गए और वे दलत भी तो प्रतिमा ही हैं जो समझना चाहते हैं, आखिर राम प्रसाद
ने बाबा साहब की प्रतिमा क्यों स्थापित कराई और इन लोगों के साथ हम सभी
लोग भी जो खडे़ हैं दर्शक, श्रोता , रिपोर्टर, कवि, कहानीकार,
राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता की तरह क्या हैं ? इसका उत्तर किसे देना
चाहिए, पुलिस को, विधान सभा को , न्याय पालिका को या किसी और को ?
इस विवादास्पद गांव के आकाश में कब चांद तारे उग सकेगें ? कब उनकी रोशनी
में यह गांव नहा सकेगा, कहना मुश्किल होगा।
लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि इस गांव के सिकुड़ते आकाशीय छोरों को
सीधा करने के लिए दलित चेतना और सवर्ण महत्वाकांक्षा के बीच फुदकती
राजनीतिक व्यवस्था को सबसे पहलेआइना दिखाने की जरूरत है।
आइना कहीं से भी लाया जा सकता है, किताबों से, जलती आगों से, सीमा पर
तैनात सैनिकों के दिलों से, भूगोल की सीमाओं या कि नागरिकताओं की कूट
संरचनाओं से। इस गांव में आग तो लग गई बिना धंुआ के ,जल भी रही है, वही
आग जो हूकुमत की कुरीतियों से निकलती रहती है।
आग राम प्रसाद मिश्र की बाबा साहब की प्रतिमा स्थापना योजना से पूर्व भी
चिपक सकती थी, पर नहीं चिपकी, वहां सन्नाटा था, खालीपन था, अभाव था,
व्यवस्था की आग धधकती हुई गांव की तरफ बढ़ी, और जलने लगी। यदि राम प्रसाद
मिश्र प्रतिमा स्थापना न कराते तब क्या होता ? यदि दलितों के लड़के , उस
बंजर भूमि की सफाई न करते, सफाई के दौरान सवर्ण लड़कों से झगड़ा न होता, तब
क्या होता ? इन सब सवालों का इस बीसवीं शताब्दी से कोई वास्ता सरोकार है
भी या नहीं, यह भी देख लेना चाहिए। हम अभी तक जो हो चुका है, उसी को
किनारे लगाने में लगे हैं। गुलामी को किनारे लगाने का हमने अथक् प्रयास
किया। थोडे़ बहुत हानि-लाभ के साथ हमने समझौतों में इसका वक्ती हल ढ़ूंढ़ा।
गोया जो कुछ घट जाता है, उसी घटे पर ढ़ोल बांध कर हम पहले उसे बजाने का
अभ्यास करते हैं, फिर उस आवाज में शान्ति, स्थिरता, सौहार्द, भाईचारा का
संगीत भरते हैं। इस गांव में, सवर्ण चेतना के लोगों ने दलित चेतना के
मसीहा की प्रतिमा स्थापित कराकर ब्राह्मा, विष्णु, महेश, मनु महाराज
जैसों को ही पूजित करना, माला फूल चढ़ाना चाहा है, ताकि व्राह्मणी
परम्पराएं चालू रहंे।
गांव के अभिशप्त दिन और रात, अभिशप्त मौसम, बसंत शरद, ग्रीष्म सब सूखे
पत्तों की तरह झर रहे हैं या झर ही चुके हैं। मनुवादी परंपराओं की खोल
में घुस कर जीवन को सुरक्षित ढंग से जीने की कामना लिए हुए गांव पहले भी
अभिशप्त पड़ा था और आज भी। परंपराओं की खोल अभी भी वैसे ही मजबूत और सिली
हुई है, उसी खोल में पूरा गांव कसमसा रहा है। बावजूद उस खोल को काट
फेंकने , नष्ट कर देने की, भसम होते गांव को मुक्त करने की, दूसरे किस्म
के प्रायोजित खोल में, उस गांव को बन्द करने की दुबारा योजना बन चुकी है।
अंक 11 शिखर वार्ता जनवरी 1999
स्मृति-चिन्ह
भोला का क्या पता कि अपनी आत्म-कथा के टूटे हुए हजारों टुकड़ों को उसे ही
ढ़ूढ़-ढ़ूढ़ कर इक्ट्ठा करना होगा, उन्हें शब्द, दृश्य तथा अभिव्यक्ति देनी
होगी, सारा कुछ अप्रायोजित ढंग से हो रहा था, उसका अतीत सूर्योदय की पहली
किरण के साथ उसके जेहन में घुस कर हड़बड़ी तथा उथल-पुथल मचा जाता था, वह
घबड़ा जाता था... वर्तमान को मुक्त रखने का प्रयास करता था, किसी भी
प्रकार से उसके वर्तमान को अतीत का स्पर्श न मिले, उसके अतीत के रोजनामचे
पर लिखा उसका वर्तमान, निश्चित रूप से सामाजिक संरचना की भयानक बीमारी का
परिणाम था, भोला जानता था, जो हुआ था, जो घटा था, मात्र वही उसका भोक्ता
नहीं था, अपने छोटे -छोटे मासूम बच्चों के साथ, एक छोटे से घर में ,
छोटे-मोटे रोजगार के आधार पर, उसकी लड़ाई वर्तमान की भयावहता से लगातार
चलती रही है, बार-बार उसकी समझदार बीबी ने उसे समझाया भी है-क्या करते हो
? कुछ दूसरे किस्म के काम-धाम के बारे में सोचो, इस काम से तो कुछ
होने-जाने वाला नहीं है ? फिर लकड़ियां भी तो रोज महंगी होती जा रही हैं,
फायदा भी कुछ खास नहीं रह गया है, पलंग और कुर्सी बना-बना कर बेचने में,
दस-बारह साल में लड़की शादी करने लायक हो जाएगी....सोचो कुछ सोचो,भोला कतई
विचलित नहीं होता है सुमित्री की बातों से , सुमित्री ने समाज देखा ही
कहां है...उसे क्या पता कि यह दुनिया कितनी अस्थिर है, कितनी
क्रूर है... और वह दुनिया की इस बेरहम संरचना की क्रूरता भोगने की
नैतिकताओं का प्रत्यक्ष अनुभव है , सुबह होते ही पलंग बनाने के काम में
लग जाता है, फर्नीचर बनाने का काम हालांकि उसने कहीं सीखा नहीं था, बचपन
में जंगल जाकर किसिम-किसिम की लकड़ियों के टुकड़ों पर किसिम-किसिम की
आकृतियां बनाया करता था, उसकी मां जंगल में घूम-घूम कर सूखी लकड़ियां
चुनती थी गट्ठर बनाने लायक, इक्ट्ठा करती थी और भोला, निश्चित आकार की
लकड़ियां ढूढ़ने में लगा रहता था, एक बार तो उसकी मां ने काफी मारा-पीटा भी
था उसे, जब उसने किसी लकड़ी के टुकड़े विशेष को ढूढ़ने में, गगरी में रक्खी
शराब गिरा दिया था, बड़ी अच्छी दारू बन गई थी, किसी दूसरे गांव के ठाकुर
साहब ने अपने खास-मेहमानों के लिए आर्डर देकर बनवाया था, उस दिन ही उसे
ले जाने के लिए किसी को भेजने वाले थे ठाकुर साहब ! अब क्या होगा ? दारू
घर में गिरकर फैल गई थी, खूब रोया था भोला, और घर छोड़ कर बाहर भाग जाने
का फैसला भी कर लिया था उसी दिन, ठाकुर साहब का कोई आदमी दारू लेने के
लिए भोला के घर आया था, उसकी मां को बहुत भला बुरा बकने लगा था, फिर जाने
क्या हुआ कि उसकी बड़ी बहन तेतरी के बारे में पूछने लगा था, कहां है वह ?
उसे बखरी पर भेज देना, मालिक ने हुकुम दिया है, भोला की मां ने साफ-साफ
कह दिया था उसी वक्त -
क्यों तेतरी वहां जा कर क्या करेगी ?
बाबू साहब के आदमी ने कहा था -
मैं नहीं जानता, मैं तो यह भी नहीं जानता हूं कि तुम जब बखरी जाया करती
थी तो क्या करती थी, कुछ बताओ तो ... जानंू , कहते हुए कसकर पकड़ लिया था
भोला की मां को उस आदमी ने, और झटके से निकल गया था बाहर, भोला, सब सुन
और देखता रह गया था, गुस्से में उठा था.....हाथ में पत्थर का टुकड़ा लेकर,
पर नहीं मार पाया था मां को, कचाचित मारा होता तो सिर फट गया होता...
भागने का निर्णय कई बार स्थगित करना पड़ा था भोला को , वह कभी भाग नहीं
पाया था घर छोड़ कर , घर में तथा घर के बाहर वह बहुत कुछ देखता रहा, समझ
होने की समझ तक वह समझ चुका था कि उसकी मां न तो विधवा है और न ही सधवा,
तथा बहनें न तो कुंवारी है और न ही ब्याहता, भोला जानता था कि उसकी मां
हर हाल में भोला को पढ़ाना चाहती है, गांव के स्कूल से लेकर बाहर के लगभग
छह किलोमीटर दूर तक के हाई स्कूल तक की पढ़ाई , पढ़ सकने में उसकी मां ने
बहुत कुछ किया है, स्कूल के एक दो अघ्यापक भी अक्सर आने लगे थे भोला के
घर , भोला जानता था कि उसे बाहर जलपान लाने के लिए आखिर क्यों भेज दिया
करती है उसकी मां , पहली बार जब गणित के अध्यापक लाल साहब उसके घर आये थे
तो भोला ने सोचा था चलो पाइथागोरस के प्रमेय के बारे में आज अच्छी तरह से
लाल साहब से पूछ लंेगे , आखिर कर्ण पर बने वर्ग का क्षेत्रफल त्रिभुज की
शेष दो भुजाओं पर बने बर्गों के योग के क्षेत्रफल के बराबर क्यों हो जाता
है ? पर नहीं पूछ पाया था, भोला कभी भी लाल साहब से। हाई स्कूल पास
करते-करते तक वह खुद एक प्रमेय बन गया था, बिना किसी भुजा के, पढ़ाई के
दौरान लकड़ी पर बनाई गई कई मूर्तियों को वह तोड़ चुका था, फिर भी एक
मूर्ति बहुत जतन से संजाकर रखे हुए था जो उसके घर के पास के भगत दादा की
थी, भगत दादा उससे कहा करते थे....
‘बेटा ! यह दुनिया अजीब है और इस दुनिया से भी अजीब हम लोग हैं, हमारी
बिरादरी है, इस दुनिया में जीवित रहने की जरूरी शर्त है, आंखें खुली रखो
पर कुछ देखो मत , मुंह खोलो बन्द-करो पर ध्यान रहे कि न तो चीखो और न
चिल्लाओ, कान केवल सुनने के लिए है सुनो और लगातार सुनते रहो वह सब , जो
तुम सुनना नहीं चाहते हो.....’
भगत दादा आज नहीं हैं, उनकी यादें भोला के पास हैं, भोला चुप हो गया है,
गूंगा हो गया है, अन्धा भी शायद फर्नीचर बनाने के काम में लग गया है।
आस-पास के इलाके में इससे बढ़िया तथा विश्ववसनीय कोई कारीगर नही है
फर्नीचर बनाने का। तिवारी जी भी अपनी बिटिया की शादी में देने के लिए एक
पलंग बनवा रहे थे भोला के यहां, डबल बेड का, ड्रेसिंग टेबुल के साथ,
तिवारी जी का लम्बा कारोबार था....क्षेत्र पंचायत के प्रमुख थे, जंगल
उनके अधीन फलता-फूलता और कटता रहता था, जंगल से साखू और शीशम की लकड़ियॉं
कटवा ली थीं, आरा कसी के बाद भिजवा दिया था भोला के पास। क्षेत्र पंचायत
के कार्यालय से वापस लौटते समय भोला की दूकान पर रूककर पूछना चाहा था
तिवारी जी ने पलंग के बाबत, ‘बनी कि नहीं,’
छोटी सी दूकान, प्लास्टिक से ढ़का हुआ एक कमरा, सड़क पर बिखरी पड़ी लकड़ियां,
दो चार पलंग के तराशे पाए, शिरई और पाटियां तथा कहीं-कहीं प्लाईवुड और
सन्माइका के छितराए टुकड़े दूकान के ठीक सामने, डबल बेड की बनी ताजी पलंग
और डेªसिंग टेबुल के शीशे में उतराई तस्बीर को गम्भीरता से परखने लगतेे
हैंे तिवारी जी-फिर भोला-भोला पूछने लगते हैं-
सुमित्री अपने खुले-बालों में कंघी फॅंसा चुकी थी उस वक्त , पर तिवारी जी
की आवाज सुनते ही अकबका कर खड़ी हो जाती है... आंचल से ढ़क लेती है सिर,
घूंघट के भीतर से बता देती है, ‘बाजार गए हैं सामान खरीदने,’
तिवारी जी पलंग का मुआयना करते हैं , बनी पलंग के बारे में पूछते हैं...
सुमित्री कुछ बता नहीं पाती है..... सब भोला पर टाल देती है, तिवारी जी
अपने बडे़ होने की कथित शिष्ट परम्परानुसार, सुमित्री से बतियाने की सारी
कलाओं से गुजरते हुए...सोचने लगे थे ...वाह ! मैं भी कितना बदकिस्मत हूं,
सोना यहां है और पीतल के लिए कहां-कहां भटक रहा हूं, बहुत कुछ बतिया लेना
चाहते थे तिवारी जी, सुमित्री से। सुमित्री को देख लेने के बाद से लगभग
रोज ही आने लग गए थे तिवारी जी भोला की दूकान पर, हालांकि पलंग उठवा ले
गए थे तिवारी जी और मुंह मांगा मेहनताना दिया था, ऊपर से पचास का एक नोट
भी भोला को,भोला ने रूपया गिन कर अपना मेहनताना निकाल लिया था और लौटा
दिया था पचास के नोट को , कहते हुए-आपने अधिक दे दिया है तिवारी जी,
तिवारी जी ने कहा था, अरे नहीं रख लो यह तुम्हारा इनाम है, कितना बढ़िया
पलंग बनाया है तुमने ?
इनाम-उनाम मैं नही लिया करता तिवारी जी?हमें तो हमारा मेहनताना मिल जाए,
यही काफी है,
कुछ दिन बाद एक ट्राली साखू की चीरी हुई लकड़ी भी अपने टेªक्टर से भिजवा
दी थी तिवारी जी ने और कुछ दूसरे किस्म के फर्नीचर बनाने का आर्डर भी दे
दिया था, फर्नीचर बना कि नहीं, इसकी सूचना लेने के लिए अक्सर आने-जाने
लगे थे तिवारी जी भोला की दूकान पर, इस आशय से कि शायद भोला कहीं गया हो
तब सुमित्री से बात करने का मौका मिल जाएगा ‘क्या है इसमें एक साड़ी और दो
चार सौ रूपया में तो वह पानी-पानी हो जाएगी, सावित्री थोडे़ है जो देह को
दिमाग से बॉंध कर गठियाए रहेगी...सिर्फ भोला की खातिर,’
सुमित्री ताड़ चुकी थी आखिर क्यों आते हैं बार-बार हमारी दूकान पर तिवारी
जी , उनकी घूरती आंखों में देख लिया था सुमित्री ने बेहया दरिन्दे आदमी
को, जो बज-बजाती देह में तलाश रहा है अतीत की सभ्यताओं के स्मृति चिन्ह,
जिस पर आने वाले दिनों में मक्खियां भी भिनभिनाने में शर्म महसूस करेंगी,
आक-थू... बड़ा घिनौना है यह तिवारी...शायद इसीलिए बड़ा है... बहुत धीरज से
बता दिया था तिवारी के बारे में भोला से सुमित्री ने,भोला ने नाटकीय ढ़ग
से समझाना चाहा था सुमित्री को, अरे ! ऐसा भी क्या है ? बस ऐसे ही देख
लिया होगा तिवारी जी ने तुमको... तुम हो भी तो देखने लायक... फिर
देखने-वेखने से क्या हो जाता है ? तुम्हें अपने ऊपर भरोसा रखना
चाहिए,झटके से उसने खींच लिया था सुमित्री को अपने पास फिर सुमित्री को
नींद लग गई थी, उसके खर्राटा भरने पर भोला की नींद गायब हो गई थी... झटके
से कई बर्ष पीछे लौट गया था भोला, पास में सोई सुमित्री की गोद में
बच्चों की तरह घुस कर रोना चाहता था भोला... रो नहीं पाया था, बच्चे पास
ही में सोए थे- सबके सब चक-बका कर जग जाएगें फिर रात भी तो काफी उतर चुकी
है , सोना चाहा था भोला ने... सो नहीं पाया था...
सुबह उसका मन काम पर नहीं लग रहा था, सुमित्री के जबरी करने पर रूखानी और
बसुला उठा लिया था भोला ने, लगा था गोड़ा तराशने और चूर खोदने आज ही इसे
तैयार करके ग्राहक को देना है, पूरा मेहनताना और लकड़ी का दाम पहले ही दे
गया था .... जाने क्या हुआ कि बसुला छिटक गया और रूखानी भोला के दायीं
हथेली में घुस गयी, एक चीख निकली और धम से बैठ वहीं पर ढेंगला गया था
भोला, दौड़ी-दौड़ी आई थी सुमित्री... अगल-बगल के लोग भी चले आए थे, एक
नौजवान लड़के ने साहस करके झटके से निकाल ली थी रूखानी तत्काल ही भोला को
अस्पताल ले जाया गया था... दवा..दारू हो गई थी, घाव सूखने लगा था, फिर भी
हाथ काम करने लायक ठीक नहीं हो पाया था...
सुमित्री ने पूछा था, आखिर कैसे धंस गई थी रूखानी नहीं बता पाया था
भोला... अरे कुछ नहीं बस वैसे ही, सुमित्री भोला को उदास देख कर परेशान
हो जाया करती थी- आखिर क्या है... जो तुम खोए-खोए रहते हो कोई बात हो तो
बताओ... भोला कुछ बता नहीं पाता था सुमित्री को , भीतर-भीतर ही घुटता जा
रहा था, आखिर बताता भी क्या... यही न कि उसकी मां , मां बन सकने की पूरी
क्षमता के साथ आखिर कैसे बदचलनी की हद तक पहुंच गई थी और उसकी बहनें बिना
ब्याह किये भी कैसे ब्याहता की तरह रह रही है ं? और वह मर्दाना जिस्म
रखते हुए कितना जनाना होता जा रहा है प्रति दिन ! उसकी जिन्दगी के हर
गुजरने वाले क्षण एक यातनामय चीख में कैसे तब्दील होते जा रहे हैं,
सुमित्री...भी कम नहीं थी ...भोला की उदासी को चीरकर टुकड़े-टुकडे़ कर
देना चाहती थी, सदैब सहमी सिकुड़ी सी रहने वाली सुमित्री...इतनी खुल गई थी
कि भोला को बरबस ही खींच लिया करती थी अपनी बाहों में ... पर भोला
प्रतिक्रियाहीन जड़ ही बना रह जाना चाहता था , बिवश हो कर सुमित्री ने
बच्चों की तथा अपनी कसम दे डाली थी... भोला के लिए यह संकट पूर्ण था पर
वह भीतर-भीतर आक्रांत था, कहीं ऐसा तो नहीं कि सुमित्री ...सब कुछ जान
सुन लेने के बाद मुझसे नफरत करने लगे, भूल जाए कि इसमें मेरा दोष क्या
था?
अन्ततः भोला कुछ नही बताता है सुमित्री को, और अपने को ही परिवर्तित करना
शुरू कर देता है संवैधानिक परम्पराओं की तरह... और हर चुनाव के बाद बनने
वाली सरकारों की तरह घोषणा करता है -अरे भाई ! कुछ भी ऐसा नहीं है जो
तुमसे छिपा हो...बस सोच रहा था कि यदि मुझे कुछ हो जाता तो यह घर
परिवार...ढक दिया था अपनी हथेली से भोला का मुंह सुमित्री ने फिर दोनों
खो गए थे.. एक दूसरे में, जहां मृत अतीत और जीवित वर्तमान के भविष्य
न्यूनतम कार्यक्रमों पर समझौता कर एक दूसरे का साथ देने की कसमें खाने
लगे थे,सामान्य हो गया था भोला, काम करना आरम्भ कर दिया था, तिवारी जी,
जिन्हें भोला की दूकान पर आना ही था, आए थे जब, तब भोला ने साफ-साफ कह
दिया था,
‘अपनी सारी लकड़ियां उठा ले जाइए, मुझे नहीं करना है आपका काम, आप यहां
काम कराने आते हैं या मेरी पत्नी को फंसाने, शर्म नहीं आती, बाभन बनते
हैं जानते हैं, मैं किस जाति का हूं, मैं भंगी हूं.. और आपके धर्म में
भंगी को छूने तक से पाप लगता है,
अरे महाराज कुछ तो अपने धरम-करम का ख्याल कीजिए, हम चमरई करें तो कोई बात
नहीं पर आप को यह चमरई शोभा नहीे देती, अवाक रह गए थे तिवारी जी.. संयत
होते ही गुसिया गए इतना कि ... मारने दौड़ पडे़ भोला को पर जाने
क्या समझ कर ... जीप में बैठे और चले गए थे,
भोला का मृत अतीत जीवित वर्तमान बनकर उसे भोला नहीं रहने दे रहा था, भोला
परेशान रहा करता है आखिर क्या था कि वह घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शक और
भोक्ता था फिर भी कुछ नहीं कर पाया था,
घटनाओं को घटने देने का मार्ग सदैव प्रशस्त करता रहा था और आज भी ...कहीं
वही घटनाएं लम्बी खामोशी के बाद फिर से घटने का रास्ता उसके माध्यम से
तलाश तो नहीं रही हैं, सुमित्री तो भोली-भाली है- उसे समझा दिया , वह समझ
गई पर क्या यही समझाना चाहिए था मुझे जो समझाया था सुमित्री को , कतई
नहीं पहले भी मैं जीवन जीने के धोखे में था और आज भी धोखे में ही हूं, हर
तरफ तिवारियों, बाबू साहबों, की असली-नकली नस्लें अपने-अपने पाश्विक
रूपों में सक्रिय हैं, निश्चित ही बुद्धि, धन और बाहु बल से इन तत्वों ने
अपने हित का ही सामाजिक सौन्दर्य शास्त्र गढ़ा है और इन अछूतों में से भी
इन्होंने अछूत नहीं समझा है मादा देह को, भोला आस्थिर हो जाता है,,
बसुला, रूखानी, आरी, आदि सरिया कर रख देता है, सुमित्री से एक गिलास पानी
मांग कर पीता है- फिर चाय,
सूरज खोता जा रहा था रात के अंधेरे में , भोला इसी अंधेरे की प्रतीक्षा
में था, मुर्गा काटेगा आज, दारू भी पीएगा.. और कसम खाएगा कि वह अब
वर्तमान को भूत बना कर मात्र उसका गवाह या दर्शक नहीं बना रहेगा, जीवन का
सच जीवन जीने में उतना ही है जितना कि मर्यादा पूर्ण तरीकों से अपने से
जुडे़ क्षणों को अधिकार पूर्वक भोगा जा सके...
तिवारी को खरी-खोटी सुनाने के बाद वह भविष्य के परिणामों के प्रति
आश्वस्त था.... इतना तो होगा ही...... सुमित्री को भोला ने तैयार कर लिया
था, इतना ही नहीं रात वाली गाड़ी से ही उसे मायके भेज देना था, यही गनीमत
थी कि सुमित्री बच्चों के साथ मायके जाने के लिए राजी हो गई थी वरना भोला
को अपनी प्रस्तावित योजना में दिक्कत हो सकती थी, सुमित्री के चले जाने
के बाद भोला ने सारी लकड़ियों को टट्टर नुमा कमरे के भीतर कर लिया था, फिर
निकल गया था - दूकान के बाहर.....
शोर तब मचा, जब आग भभक-भभक कर जलने लगी थी, जगह-जगह फैला हुआ मिट्टी का
तेल अपनी रफ्तार से बिना किसी संकोच के जल रहा था, लोगों ने आग बुझाने का
बार-बार प्रयास किया पर आग थी कि हवा के झोंकों के साथ बढ़ती ही जा रही
थी, थोड़ी ही देर बाद तो वहां रहना मुश्किल हो गया था... चिरठाइन , यह
क्या गन्हा रहा है.... भोला था कि बाहर पड़ी लकड़ियों को आग पर फेकता जाता
था, देखा तिवारी......! क्या होता है आग जलने के बाद ... दिल की आग शरीर
जलाती है, और जमींन की आग दुनिया को राख में तब्दील कर देती है, लोगों ने
महसूसा इस गरीब का सब स्वाहा हो गया है इसीलिए पगला गया है शायद।
वैचारिकी संकलन:ः सितम्बर , 1996:
जागरण
धरतीडीह गांव की दूरी जिला मुख्यालय से कोई सौ, सवा सौ किलोमीटर के
आस-पास होगी। इस साल के पहले यह गांव अपने आप में एक पूर्ण गांव पंचायत
था। नई पंचायती राज व्यवस्था के अनुसार इस गांव से कई और टोले तथा टीले
जोड़ दिये गये थे, और मतदाताओं की संख्या गिनकर एक हजार से ऊपर बढ़ा ली गयी
थी, चूंकि धरतीडीह गांव आबादी के हिसाब से बड़ा गांव था, इसलिए नियमानुसार
गांव पंचायत का नाम भी धरतीडीह ही रखा गया। चुनाव की शब्दावली में इसे
परिसीमन कहा गया। हालांकि वहां रहने वालों के लिए यह कार्य किसी विशेष
योजना के तहत् नहीं समझा गया न ही इसमें कोई चाल महसूसी गयी,पुराने
प्रधान मंगल सिंह ने जरूर इसका विरोध किया था। उनका कहना था ‘जब जिला
छोटा किया जा रहा है अऊर मीरजापुर को बांट कर सोनभद्र बना दिया गया है,
तब हमार गांव काहे खातीर बड़हर किया जा रहा है हम तो एकर जरूर विरोध
करेंगे’। ’उन्होंने इसका विरोध किया भी। ब्लाक से लेकर डी.एम. तक, पर हुआ
कुछ नहीं। इसका फायदा उन्हें यह मिला कि उनके गांव को आरक्षित नहीं किया
गया। वह सामान्य कर दिया गया जिसका मतलब था हर जाति वर्ग,धर्म,गोत्र का
बालिग व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है। पूरे जनपद में इस आरक्षण का बहुत विरोध
हुआ। ‘आखिर ई आरक्षणवा विधान सभा अऊर संसद में काहे नाहीं हो रहा भाई !’
लेकिन सारा विरोध दब-दबा गया। परसीमन के सारे मामले रफा-दफा कर-करा दिए
गये। दो-तीन बार चुनाव स्थगित होते रहने के बाद इस बार अन्ततः घोषणा हो
ही गई। धरतीडीह का माहौल भी अजीब ढंग से बदल कर चुनावी कलर का हो गया।
रात भर जागरण शुरू हो गया। गांव में बिजली तो थी नहीं पर हैसियत के
मुताबिक सभी के दरवाजों पर दिया-ढिबरी और लालटेन चमकनें लगी। लोग-बाग
ग्यारह-ग्यारह बजे रात तक इधर-उधर टहलते-घूमते दिखाई देने लगे। धतीडीह
गांव जाति बिरादरी तथा अन्य कई हिसाब से काफी विभक्त था। ठाकुर टोला,
पंडित टोला, धांगर टोला, हरिजन टोला, यादव टोला तथा चेरो, मांझी खरवार
टोलों में। इस गांव के पंडितों ठाकुरों और अहीरों की लड़ाई मशहूर थी।
हमेशा से आपस में लड़ते रहने वाला यह गांव कभी भी थाने या अदालत की सीमा
से बाहर नहीं निकल पाया। पिछले चुनाव में किसी प्रकार से इधर-उधर की गोटी
बिठाकर, धांगरों, मुसहरों, हरिजनों को रूपया पैसा साड़ी ब्लाउज देकर तथा
दारू पिलाकर मंगल सिंह जीत गये थे। किन्तु हार-जीत का अंतर काफी नहीं था,
सिर्फ बीस वोट ही कम थे परमेशर के। चुनाव जीत जाना धरतीडीह के लिए उतना
महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि चुनाव के बाद के वर्षों में झगड़ों को
संभाल पाना। परमेशर ने भी कम तिकड़म नहीं लगाया था, मंगलसिंह के चचाजात
भाई को पुराना टैªक्टर दिलवाकर अपने साथ कर लिया था। मंगल सिंह आप भी
बताते हैं- ‘अरे हमसे का पूछ रहे हैं साहेब! हमारे दिल से पूछिए, कउन
ससुर पागल होगा, जो चुनाव-फुनाव में खड़ा होगा। का मिलता है एम्मे ?
जवाहिर रोजगार योजना का रूपइया नऽ । अरे साहब ! आधा से भी कम मिलता है,
का सेक्रेटरी अउर बी.डी.ओ. साहब मुह बांध के आए हैं, उनको लड़िका बाला,
मेहरारू नहीं है का, हम तो जानि गए आधा दो तो काम कराओ नहीं तो सेकरटरियय
गांव में कउनो को बहकाकर जांच पड़ताल कराना शुरू करवा देगा। फिर दौड़ो जिला
तक, छोड़ो खेती-बारी , ना भइया भीख मांग लो पर चुनाव न लड़ो’। मंगल सिंह
अपनी मानसिक संरचना को आज की दुनिया से ऊपर मानते हुए पूर्ण तथा दृढ़ थे।
कुछ भी हो चुनाव लड़ना बेकार का काम है- जबकि गांव में कोई वर्ग ऐसा नहीं
था जिसमें से चुनाव लड़ने वालों की कमी रही हो, सभी गांव परधानी के लिए
लालायित, उत्साहित थे।
वभनान टोला के परमेश्वर का क्या कहना। ‘इस बार मंगलवा को थाह लगा दूंगा’
कहते घूम रहे थे। उनके सामने पंचाइती राज व्यवस्था के अन्तर्विरोधों का
मामला नहीं था न ही उस संवैधानिक व्यवस्था का जिसके तहत यह बहु-प्रचारित
चुनाव कराया जाना था। किसी भी तरह से मंगल सिंह को चुनाव जीतने नहीं देना
है, कोई उनकी बपौती नहीं है? क्या पांच साल परधान रह लिए कम है,? ‘अरे
इसे तो सस्पेंड हो जाना चाहिए था। पर अधिकारियो तो भ्रष्ट हैं। यह साला
ठकुरवा खूब खिलाता, पिलाता भी तो है,
जब देखो दारू, मुर्गा बकरा, अरे ! क्या-क्या नहीं करता?’
तमाम तरह की शिकायतों का बाजार मंगल सिंह के खिलाफ गर्म था। शिकायतों की
जांच पड़ताल करने पर पता चला कि पूरे गांव में परमेशर का यही काम है,
घूम-घूम कर मंगल सिंह की शिकायत करना, कभी कूआंे के निर्माण में। परमेशर
शिकायतों के पर्याय बन गए थे। बात-बात पर मंगलसिंह और मंगल सिंह का
विरोध, विरोध की सीमा सारी नैतिकता पार कर गई थी। भाई-चारा , मुहब्बत सब
छूट गया था। रह गई थी सिर्फ मंगल सिंह की शिकायत। हर छोटे बडे़ से,
‘जानते हो, सुमेसरा की बिटिया अपने से थोडे़ भाग गई थी, वह मंगलवा उसे
रक्खे था, थाना-थूनी पर सिपाहियों के हवाले करता रहता था, इतना ही नहीं,
जब काई आता था खड़न्जा और इन्दिरा आवास की जांच में रात में सुमेसरा की
बिटिया को ही मंगलवा उसके हवाले कर दिया करता था अरे उसका क्या नाम था -
रमेशरी । ससुरा मौके पर कुछ ख्याल नहीं आता है। ’’
गांव के लोग परमेशर की शिकायतों का क्या अर्थ निकालते थे अस्पष्ट था।
स्पष्ट था तो सिर्फ यह कि लोगों को मजा आता था। रमेशरी का नाक नख्श,
कद-काठी सब कुछ तो पसन्द था, सिर्फ - उभरते लौन्डों को ही नहीं बल्कि
शादी-शुदा जवानों तथा कुछ पुराने लोगों की भी । रमेशरी की तुलना शक्ल
सूरत से किसी हिरोइन से ही की जाती थी। ‘दीदी तेरा देवर दिवाना, कुड़ियों
का है जमाना’ वाला गाना अक्सर लौन्डे रमेशरी को देखकर गुन-गुना दिया करते
थे। और रमेशरी सुनकर निकल जाया करती थी। उसकी मुस्कुराहट पर कुर्बान होने
वालो की तादात, बाजार से लेकर गांव तक बढ़ने लगी। रमेशरी बिना इसकी परवाह
किए अपनी रफ्तार से चली जा रही थी। गांव भी चल रहा था देश चल रहा था,
जाति बिरादरी गोत्र परगोत्र इन सबका मामला सबके दिल दिमाग में रहते हुए
सामाजिक संरचना का आवश्यक हिस्सा बनता जा रहा था। दिखावे के तौर पर कोई
भी इसे बाहर जाने की कोशिश करता नहीं दिखाई पड़ रहा था। पर भीतर-भीतर सब
कहीं न कहीं जाति से जुड़ा होना आवश्यक महसूस कर रहे थे । पूरे प्रदेश में
यह चुनाव भविष्य की रणनीति का पथ-प्रदर्शक बनता जा रहा था। मलाईदार पर्त
के खिलाफ पिछड़ों और दलितों का एक जुट होना और उनमें भी दलितों का पिछड़ों
से अलग होकर अपने अस्तित्व को बचाए रखना अनिवार्य बनता जा रहा था। चुनावी
माहौल ने अगड़ों पिछड़ों और दलितों की त्रिवेणी के स्थिर जल रंग को
पूर्णतया अलग कर दिया गया था। सभी अपने-अपने वर्ग की जीत और सम्पर्क के
चक्कर में पड़ गए थे। मंगल सिंह की चुनाव न लड़ने की घोषणा को काफी
हास्यास्पद महसूस किया परमेशर ने। इसे मंगल सिंह का पतन और कमजोरी माना
‘वो चुनाव क्या लड़ेगा? कउन नहीं जानता कि अब मंगलवा के यहां बचा ही क्या
है? चुनाव लड़ने के लिए। आखिर क्या हुआ? जब उसके बडे़ लड़के का मामला था,
सोनपुरा का सारा बबुआन आया हुआ था, हमारे यहां भी लोग आये थे।
नाश्ता-पानी करने के बाद मंगलवा के यहां गए थे। वहीं रमेशरी दिखाई पड़ गई
किसी तरह से उन लोगों को रमेशरी से मंगल सिंह के रिस्ते की बात मालूम हो
गई, शायद कुछ पहले से भी मालूम रहा हो, कोई बहुत दूर सोनपुरा थोड़े ही है,
बात-चीत हुई पर वरच्छा वाला कार्यक्रम खत्म हो गया, लोग-बहाना बनाकर चले
गये। शादी नहीं हुई न। ‘ऐसे में भला वह चुनाव क्या लडे़गा? अभी उसके
लड़कवा की शादी तो होने दो, वही इसको मार-मार के कुदा न दिया तो मेरा नाम
भी परमेशर नहीं’ मंगल सिंह को यह सब पता न हो ऐसी बात न थी। मगल सिंह सब
जानते हुए घर गृहस्थी संभालने की चिंता में थे। आखिर कमी क्या है? सब
भगवान ने दिया ही है। चुनाव-फुनाव का झंझट बहुत खराब होता है, गांव में
तरह-तरह का मन-मुटाव हो जाता है। लेकिन परमेशर जैसे कुछ लोग थे, जो उनका
मजाक उड़ाते रहे। यही बात मंगल सिंह को अखर गई , उन्होंने सोचा, परमेशरा
हर-हाल में मेरा पीछा करेगा ही आखिर कब तक भागता रहंूगा। जो होगा होगा
चुनाव लड़ना ही होगा और लड़ूंगा। उन्होंने चुनाव लड़ना स्वीकार कर लिया।
फिर क्या था, पूरे गांव तथा हर टोले में यह बात आग की तरह फैल गई। उनके
समर्थकों को खुशी हुई। अब परमेशर का मुकाबिला हो जाएगा। यह आदमी पंडित है
जरूर लेकिन काफी गिरा हुआ। इसका क्या ? कब किसके साथ क्या करेगा उसे ही
कुछ पता नहीं-कौन होगा जो छिः अपने ही घर में.... कितनी बार उसकी विधवा
भाभी का पेट गिराया गया है कौन नहीं जानता ? मंगल सिंह ने कब परमेशर का
साथ नही दिया , हर बार तो उन्हीं की वजह से बच गया नहीं तो जेल की रोटी
खाता। मंगलसिंह के बाप के जमाने में परमेशर के बाप उनके शीरवाह थे। साल
में उन्हें चालीस मन धान मिला करता था। खाना और कपड़ा ऊपर से। मंगलसिंह और
परमेशर दोनों पढ़ने एक साथ स्कूल जाया करते थे, कभी भी मंगलसिंह के बाप ने
परमेशर और मंगल सिंह में कोई फर्क नहीं किया।
दोनों में पटरी भी रहा करती थी। बाद में चलकर परमेशर ने जंगल से बांस और
लकड़ी कटवा कर बेचने का धन्धा शुरू किया और जायज तथा नाजायज खूब धन कमाया।
थाने वालों को खिलाकर कई लाख की लकड़ियां और बांस परमेशर ने शहरों में
बेचा। कहा जाता है कि आज जंगल में कहीं-कहीं साखू और शीशम दीख पडे़गा।
धरतीडीह गांव ही नहीं यह पूरा क्षेत्र थाने की कृपा पर जीता है। दरोगा और
सिपाही की मर्जी ही यहां चलती है। एक तेज और ईमानदार दरोगा के आने से
परमेशर का धंधा बन्द हो गया। अब उनकी आरा मशीन भी बन्द पड़ी है।
उसी समय तीन ट्रक साखू परमेशर ले जा रहे थे थाने के दरोगा ने उसे पकड़
लिया दो ट्रक चला गया था। किन्तु जिस ट्रक पर परमेशर थे वह थाने में बंद
हो गया। थाने को देने के लिए पचास हजार रूपयों की बात बगल के मिसिर जी ने
चलाई पर उनको दरोगा ने भला-बुरा कहकर थाने से भगा दिया। यह सच था कि अगर
मंगलसिंह दरोगा से कह देते तो शायद परमेशर
छूट जाता, पर मंगल सिंह ने साफ-साफ इन्कार कर दिया ‘जो जैसा करेगा वैसा
भरेगा’। मंगल ंिसंह परमेशर को छुड़ाने का कौन कहे देखने तक नहीं गए। यही
बात परमेशर को अखर गयी थी। अखरती क्यों नहीं? इस परमेशर के पास किस बात
की कमी है। लकड़ी की बेच से रूपया कमा लिया था, जमीन खरीद लिया था, आलीशान
दो बखरी का पक्का मकान बना लिया था, राशन के कोटे की दूकान , आरा मशीन,
खाद की दूकान, क्या नही है परमेशर के पास! मंगल सिंह से केवल जमींन ही तो
कम है। तभी से मंगल सिंह और परमेशर में पटरी नहीं रही। हमेशा परमेशर मंगल
सिंह की खिलाफत किया करते। परमेशर की सारी करनी और करतूत से गांव वाकिफ
था। इसीलिए मंगल सिंह के चुनाव न लड़ने की इच्छा से गांव के लोग परेशान भी
थे। परमेशर जैसे फरेबी और लुच्चा आदमी का मुकाबिला करना सबके बस की बात
तो थी नहीं। मंगल सिंह की शिकायत और रमेशरी के मामले में तथा वरच्छा के
दिन सोनपुरा के बबुआनों के साथ परमेशर की बात-चीत ने मंगल सिंह को काफी
उत्तेजित कर दिया। मंगलसिंह ने चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। रमेशरी ने कई
बार मंगल सिंह से कहा भी था कि ‘ई परमेशरा तोहार घूम-घूम कर शिकायत करता
है’ हमारा नाम ले के कहता है कि ‘मंगलवा रमेशरी को रखे है, ई तो हम जानते
हैं कउन किसको रक्खा है ‘अउर आप कहते है कि चुनाव हमें नहीं लड़ना है फिर
क्या करना है? अरे बबुआ ई गांव का क्या होगा? क्या इस गांव का परधानी अब
परमेशर करेगा...... किसी की बहू बिटिया बचेगी क्या ? आप अच्छा नहीं कर
रहे हैं , बबुआ ! कुछ तो गांव का धियान कीजिए, आज ही मलिकिनी से बोले
हैं, मलिकिनी बबुआ को चुनाव लड़ने से मत रोकिए, ई गांव के खातिर। कउनो ऐसा
आदमी नहीं है, ई गांव में जो परमेशरा को हरा पाये। मलिकिनी ने हमसे कहा
था कि ‘तू’हय समझावो, तोहार बात ऊ थोरे टारेंगे। हम उनका कउनो काम में
रोकते हैं का। रमेशरी मंगल सिंह से बतिया कर घर चली गई थी और गांव भर
मंगल सिंह के चुनाव लड़ने की बात फैल गई थी। ब्लाक पर परधानी का परचा भरा
जाना था। मंगल सिंह ने परचा भर दिया। उधर परमेशर का भी परचा भरा गया अब
दोनों आदमी आमने-सामने हो गए थे। गांव में कनवेसिंग का बाजार चढ़ाई चढ़
गया। तरह तरह की चर्चा होने लगी परमेशर ने इस चुनाव में एक लाख रूपया
खर्च करने की घोषणा कर दी। एक एक आदमी पर कम से कम सौ रूपयों का औसत था।
साड़ी-ब्लाउज धोती दारू अलग से। फिर भी इसका कोई खास असर नहीं पड़ा। छोटे-
बड़े सभी मंगल सिंह के साथ हो गए, सिर्फ इसलिए कि मंगल सिंह के चलते कम से
कम गांव में रोज सिपाही तो नहीं आते। दरोगा किसी का कुछ नुकससान नहीं कर
पाता और न ही मंगलसिंह के रहते किसी का चालान ही काट पाता है। मंगल सिंह
में सभी अच्छाइयां थीं। रमेशरी का मामला कुछ दूसरे किस्म का था। लाख
परमेशर ने मंगल सिंह की शिकायतें किया किन्तु इसका असर नहीं पड़ा। वैसे भी
मंगल सिंह ने गांव के किसी आदमी का प्रत्यक्ष रूप से कुछ नुकसान नहीं
किया था। उनके बाप-दादों का ही बसाया हुआ गांव था।
पहले तो उनकी यहां जमीनदारी थी बाद में सब टूट-टाट गयी।
मंगल सिंह के चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद रमेशरी फिर से जवान हो गई,
उसकी ताकत बढ़ गई। एक दिन परमेशर से उसकी मुलाकात हुई तब उसने ललकारते हुए
कहा ‘ऐ पंड़ित तुम पापी आदमी क्या जानो? प्रेम-मुहब्बत की बात हमारे दिल
से पूछो, हमरे अऊर मंगल सिंह के बीच क्या हुआ? जब हमरा विवाह नहीं हुआ
था, अऊर हम कुंवारी थी, तभी से जाने मेरे भीतर क्या हुआ? जब मैं मंगल
सिंह को देखती थी तो सोचती थी कि हमारा सरदार भी बबुआ की तरह होना चाहिए
पर हमारे नसीब में कहां था? बबुआ माफिक सरदार। शराबी पति मिला जो दारू
पी-पी कर मर गया। मैं इस गांव चली आई। मेरे दिमाग में हमेशा बबुआ का
चेहरा घूमा करता था जबकि बबुआ हमारे ओर ताकते भी नहीं थे। मैं बबुआ का
काम करने लगी, सिर्फ बबुआ की झलक पाने के लिए, धीरे-धीरे बबुआ को फंसाना
शुरू किया अब तुमहीं समझो हम बबुआ को रक्खें हैं कि बबुआ हमको रक्खें
हैं।
उस दिन परमेशर से खूब चिक-चिक हुई। परमेशर को काफी गुस्सा आया, गांव में
खुलेआम कुछ कर पाना उनके वश का नहीं था। रमेशरी ने परमेशर को हराने की
कसम खा ली थी। गांव में घूम-घूम कर परमेशर की शिकायत करने लगी। दूसरी ओर
परमेशर रूपिया पैसा बांटने लगे। लोगों को दारू गांजा पिलाने लगे। मुश्किल
से तीन-चार दिन वोट पड़ने में बाकी थे। परमेशर को लगा कि इतना रूपया पैसा
बांट देने के बाद भी गांव का जीतने लायक वोट उन्हें नहीं मिलेगा। मंगल
सिंह ही जीतेगें। परमेशर ने बड़ा भयानक निर्णय लिया, ब्लाक से लौटते समय
मंगल सिंह को अमवारी के पास ही परमेशर ने दो-तीन आदमियों के साथ घेर
लिया, अपनी बन्दूक से मंगल सिंह को गोली मार दिया। लगातार कई फायर सुनकर
गांव के लोग इकट्ठा हो गए। मंगलसिंह को परमेशर ने गोली मार दिया। हल्ला
हो गया। मंगल सिंह की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गई। रमेशरी का रोना और
मंगल सिंह की लाश पर लोट कर , खुद को नोचना, चोथना पूरे गांव ने आश्चर्य
चकित होकर देखा। कुछ ने कहा भी ‘वाह रे रमेशरी।’ मंगल सिंह की हत्या का
बदला लेने का रमेशरी की कसम भी लोगों ने सुना। रमेशरी बेहोश हो गई थी।
ठकुराइन ने अपनी चूड़ियां फोड़ दी, सिंदूर पोछ दिया। गांव उदास हो गया।
पूरे गांव में‘यह क्या हुआ’ का अनायास बादल छा गया। पुलिस आई, परमेशर के
खिलाफ कतल का मुकद्मा कायम हुआ। रमेशरी को भी गवाह बनाया गया। दो चार लोग
और भी। पुलिस की सक्रियता से परमेशर और उसके दो रिश्तेदार भी पकड़ लिए गए।
गांव परधानी का चुनाव स्थगित हो गया। धरतीडीह अपने जन्म के बाद से लेकर
अब तक इस तरह के पहले हादसे से गुजर रहा था। सब कुछ अनचाहा और
अप्रत्याशित। परमेशर के खिलाफ गवाह टूटने लगे। परमेशर की जमानत हो जाने
और दुबारा चुनाव कराए जाने की घोषणा लगभग एक साथ हुई। केवल रमेशरी ही बची
रह गई
थी, जो परमेशर के खिलाफ गवाही करने के लिए तैयार थी। इतना ही नहीं उसने
ठान लिया था कि यदि परमेशर चुनाव लडे़गा तो वह भी चुनाव लडे़गी। हुआ भी
यही परमेशर के खिलाफ रमेशरी ने परचा भर दिया।
मंगल सिंह की विधवा ठकुराइन पुजारिन किस्म की औरत थीं। पहले से ही काफी
शान्त और स्थिर। मंगल सिंह की हत्या के बाद, जमीन, घर , मकान बेचकर गांव
छोड़ बाहर चले जाने का मन बना लिया था ठकुराइन ने। पर मंगल सिंह का बड़ा
लड़का और मंगल सिंह का साला इस बात पर अड़ गये कि नहीं ‘गांव नहीं छोड़ना
है, परमेशर को जिन्दा नहीं छोड़ना है, जिस महीने मंगलसिंह की हत्या हुई है
, वह अगला महीना परमेशर नहीं देखेगा। रमेशरी मंगलसिंह की हत्या के बाद
उदास रहने लगी थी। और ठकुराइन की सेवा सुश्रवा में अपना समय बिताने लगी
थी। मंगलसिंह के बडे़ लड़के राजू को समझाया- बुझाया करती थी ‘देखो ऐसा
नहीं करना है।’ पर राजू मानने वाला कहां था। उसे बदला लेने का भूत सवार
था। बगल में कट्टा लेकर चलने लगा। मंगल सिंह का साला उमर में राजू से महज
तीन चार साल बड़ा था, उन दोनों में मामा भांजे का नाता कम , दोस्ती का
ज्यादा था। मंगल सिंह के घर का शान्त वातावरण युद्ध भूमि में बदल चुका
था। रमेशरी की चिन्ता बढ़ गई थी। वह अपने लिए परेशान थी, चाहती थी कि अब
मंगल सिंह के बाद उसकी भी जिम्मेदारी होती है। उनकी आत्मा की शान्ति के
लिए। परमेशरा ! इसे जिन्दा ही जला देना चाहिए। चाहे कुछ भी करना पडे़।
चुनाव का परचा भरे जाने के बाद से गांव फिर जगमगा गया। मंगल सिंह की
हत्या के बाद का डरा गांव काफी कुछ बदल सा गया। अब परमेशर निर्दुन्द होकर
अपना प्रचार कर रहे थे। किसी में भी परमेशर के विरोध करने का साहस नहीं
बचा था। एक दिन राजू को घेर कर परमेशर ने धमकियाया ‘तुम्हारा भी वही हाल
होगा जो तुम्हारे बाप का हुआ। मेरे रास्ते में न आओ अपना काम करो।
हालांकि राजू डरा नहीं और न ही मंगल सिंह का साला पर ठकुराइन काफी भयभीत
हो गयीं थीं। अपने बच्चों की परवरिस को लेकर उनका दूसरा लड़का भी था जो
काफी छोटा था, और बेबी महज सात साल की । नैहर से घर बार की देखभाल के लिए
उन्होंने अपने बडे़ भाई को बुला लिया था। बड़ा भाई जब आ गया तब छोटे भाई
को घर भिजवा दिया था। अब राजू को बदला लेने की कसम से अलग करने के लिए
समझाना-बुझाना आसान हो गया। राजू के बडे़ मामा और फूफा जी तक ने समझाया
और बभनान टोला के कुछ लोगों ने भी , जिनके संबंध मंगल सिंह से काफी
घनिष्ठ थे, लोग किसी भी तरह से मंगल सिंह के परिवार को उस झगड़े से
निकालना चाहते थे- परमेशर का क्या? समझाने बुझाने का प्रयास सफल हुआ किसी
तरह राजू मान गया। दूसरी ओर परमेशर पर भी गांव के शान्त प्रिय जनों का
दबाव बढ़ा....। पर रमेशरी ! वह बेचारी दो पाटन में फंसी रह गई। मंगल सिंह
के परिवार वालों के लिए रमेशरी ही परमेशर से झगड़े का मुख्य कारण बन गई।
ठकुराइन ने रमेशरी को बखरी में बुलवाकर काफी भला बुरा कहा।
गाली गलौज ही नहीं बल्की मार कर भगा दिया। ठकुराइन की बात अलग थी किन्तु
राजू की मार से रमेशरी टूट गई, बिखर गई। आखिर मंगल सिंह का बेटा भी तो
उसका ही बेटा था न ऽ।
रमेशरी बिना रोये ही अपनी मड़ई में घुस गयी। टटरा बन्द कर खूब रोई, अकेले
ही, अन्तः पीड़ा, बाहर निकलने लगी। आंखे फूल गईं, देह गरम हो गई, बुखार
चढ़ने लगा, सुबह तक रमेशरी का टटरा नहीं खुला । वह टूट चुकी थी उसका बचा
ही क्या था, ‘सब अपनी जान बचाने की फिराक में लग गए, मंगल सिंह की जान
चली गई, बात खत्म हो गई। क्या परमेशर सुधर जायेगा बबुआ की बलि लेकर कभी
नहीं। धूप चढ़ जाने के बाद भी रमेशरी की मड़ई का टटरा खुला न देखकर किसुनी
ने उसका टटरा खटखटाया। तब जाकर रमेशरी उठी । टटरा खुला। रमेशरी को तेज
बुखार था। बात करने में सांस फूलने लगती थी। किसुनी कहीं से दो तीन
टिकिया दवाई लाकर, उसे खिला देती है, रमेशरी के लिए नाश्ता और खाना के
लिए पूछती है। कुछ देर बाद जब रमेशरी का बुखार कुछ उतरता है तब रमेशरी को
समझाने भी लगती है- देख रमेशरी , गांव में कउन मरद है जो परमेशर को
हराएगा। देखती नहीं पूरा गांव डरकर बीमार हो गया है। सबके मुंह पर ताला
लग गया है। आखिर कौन मरना चाहता है ? तुम अपना परचवा वापस ले लो, तुम
क्या करोगी उस हरामी से लड़ कर , जब ठकुराइन को ही सारी बात भूल गई तब
तुम्हारा क्या? हम लोगों की मिहनत-मजूरी करने वाली जात , हमय चुनाव से का
मतलब? जिस किसी का काम करेंगे, मजूरी मिलेगी ही।’ किसुनी चली जाती है
विचारों का ताराविहीन आकाश छोड़कर। रमेशरी खुद को एक लाइट की तरह
प्रक्षेपित करने लगती है। उसे सब कुछ खाली-खाली दीखता है। वह कांप जाती
हैैं बुदबुदाने लगती है ‘जलना है’ आग खुद नहीं जलती, जलानी पड़ती है।’
रमेशरी अपने भीतर मंगल सिंह को ढूढ़ने लगती है, वही मंगल सिंह किसी उपदेशक
की तरह, उसे समझा रहे हैं ‘जो हुआ,हुआ,रमेशरी तुम हमारे लिए काहे परेशान
हो’ मेरे रहने या न रहने से या किसी के रहने और न रहने से जमाने पर फर्क
नहीं पड़ता, मरना जीना तो चलता ही रहेगा, फिर मौत! इससे कोई बचेगा क्या?
मंगल सिंह केवल मंगल सिंह हो गये हैं राजू और ठकुराइन के बारे में भी कुछ
नहीं पूछ रहे हैं। परिवार और समाज से गायब हो चुके मंगल सिंह , अब मुक्त
हैं, रमेशरी का भीतर खाली हो जाता है पचके डब्बे की तरह और मंगल सिंह
बाहर सौर्यमण्डल में विलुप्त। रमेशरी जान गई कि चुनाव में उसे निश्चित
रूप से हार जाना है, परमेशर के खिलाफ विरोध करने का साहस पूरे गांव से
फुरर्र हो गया है। फिर भी उसे तो लड़ना ही है, चुनाव तो बहाना है, असली
लड़ाई परमेशर से है। परधानी लेकर चाटना है क्या? रमेशरी पूरा गांव घूम आती
है, कम से कम एक बार, सिर्फ बखरी की तरफ नहीं जाती। सबसे दुआ सलाम कर
लेती है। परमेशर पंडित की तरफ भी चली जाती है बभनान टोला में। अपने लिए
वोट मांगते हुए हर बडे़-छोटे के पैरों पर गिर जाती है। कुछ बड़े लोग
रमेशरी के साहस से प्रभावित हैं किन्तु परमेशर का भय, गोली बन्दूक और
हत्या आदि। मतदान की प्रक्रिया काफी कुछ गुप्त है किन्तु गांव स्तर पर यह
गुप्त नहीं रह जाती। लगभग सभी मतदाताओं के पास-विपक्ष में होने की
व्यवस्था का खुलासा हो जाता है। जो मतदाता इस पक्ष-विपक्ष की प्रक्रिया
में मुखर हो जाता है वह प्रत्याशियों की आंख की किरकिरी हो जाता है। शुरू
हो जाती है तब बदला लेने की ऐतिहासिक प्रक्रिया पुश्त-दर-पुश्त वाली।
इसका चरित्र आज राजाओं-महाराजाओं या सम्राटों के हास्यास्पद युद्धों से
होते हुए मतदान युद्ध में बदल चुका है। रमेशरी जानती है- जनता के डरने का
कारण, वह यह भी जानती है कि चुनाव पुराने जमाने के राजाओं की लड़ाइयों का
ही यह बदला हुआ रूप है। उससे भी घिनौना, विकृत। पहले राजाओं की लड़ाई
राजाओं के बीच हुआ करती थी। सेनाएं लड़ा करती थीं उन युद्धों से जनता का
मतलब नहीं हुआ करता था किन्तु आज का मतदान युद्ध तो सबको लडना है। हर
वर्ग को हर जाति को हर धर्म और सम्प्रदाय को। चुनावी राजाओं का राजमत
सुरक्षित है, चुनाव का राजा, सिंहासन तथा संविधान सुरक्षित है सिर्फ जनता
ही असुरक्षित है, तो क्या हुआ? जनता है आखिर किस लिए। रमेशरी अपने गांव
के बहादुरों का साहस देखकर, उबकाई से भर जाती है, घिनौने ढंग से थूकती
है- आक थू। बहादुर अब केवल जवान लड़की देखकर सीटियां ही बजाएगें, चाहे
उनकी जिन्दगी की सीटियां दूसरा भले बजाता रहे। कैसे-कैसे लोग हैं,
भरा-पुरा गांव है फिर भी परमेशर चुनाव जीत जाएगा? कोई सामने नहीं आ रहा,
एक बार फिर खंखारकर थूकती है। राजू भी भूल गया मुझे मारकर सन्तोष कर लिया
और ठकुराइन? क्या शीशा नहीं देखती होंगी? मेरा क्या मेरे लिए तो बबुआ ही
शीशा थे- शराबी पति मिला शराब पी-पी कर मर गया, बहुत चाहा उसे खूब सेवा
की, बबुआ जिन्दगी में बाढ़ की तरह आए, सब कुछ बाढ़ की तरह बहाकर चले गए फिर
भी परमेेशर मेरे जीते जी चुनाव नहीं जीत पाएगा, आक थू-पापी कहीं का , मैं
अकेली सही।
उधर परमेशर भी काफी घबड़ाए हुए हैं जनता का रूख उन्हें भी समझ में नहीं आ
रहा है। शायद मंगल सिंह की हत्या के बाद लोग काफी डर गए हैं, कोई भी
खुलकर सामने नहीं आना चाहता। अन्दर-अन्दर सब विरोध में हो ‘ मेरी तरफ हां
में हां ही और रमेशरी की तरफ वोट। हरिजन टोला का भरोसवा भी तो यही बता
रहा था। और निहोरवा तो कह रहा था जो परमा चौबे का आसामी है कि बभनान और
ठकुरान इन दोनों टोलों का’ वोट नहीं मिलेगा। सब भीतर-भीतर जलते हैं।
परमेशर घबड़ा जाते हैं ‘चुनाव के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ा, पिछले
चुनाव में भी 20-25 हजार का खर्च हुआ इस बार भी और एक कतल ऊपर से अभी
मुकद्मा चल ही रहा है। हे भगवान! क्या होने वाला है? लगता है मेरी किस्मत
में परधानी नहीं। परमेशर घबड़ा कर उठ जाते हैं और बैठे हुओं को घर चले
जाने
के लिए कह देते हैं- अकेला होने पर पैकेट निकालते हैं सुराही से पानी जग
में डाल लेते हैं और एक पैकेट दारू एक बार में ही गटक जाते हैं, मेज पर
रक्खा लाई चना चबाने लगते हैं- खुमारी चढ़ने पर एकालाप करते हुए कहते हैं-
मुझे चुनाव जीतना है, ई रमेशरी हमें का हराएगी ससुरी।’ आज ही उसे चलकर
समझा देते हैं कि तुम्हारा भी हाल मंगलवा की तरह ही होगा। नहीं नहीं एक
और कतल यह नहीं चलेगा, मेरे भी बाल बच्चें हैं। ‘ धन दौलत तो बच्चों के
लिए कमाया जाता है न। रमेशरी को पटा लिया जाय तो कैसा रहेगा? अब मंगलवा
थोडे़ है,......वाह-वाह खूब। यह
बात मेरे जेहन में पहले क्यों नहीं आई। परमेशर मगन हो जाते हैं फिर दारू
पीते हैं, और सुन-सान रास्ते में रमेशरी को पटाने के लिए दारू के नशे में
चल देते हैं - क्या लेगी? रूपिया पैसा और जगह जमीन यही न सब दूंगा, वैसे
भी रमेशरी बुरी है क्या? बुरे काम के लिए बहुत भली है।
रमेशरी भी हर हाल में परमेशर से मंगल सिंह का बदला लेना चाहती है, वह
परमेशर को नारी-माया और स्त्री प्रपंच में फंसाकर बदला लेने की योजना को
भीतर से स्वीकारने लगी थी परमेशर को गांव के बीमार और डरे हुए लोग चुनाव
में नहीं हरा पाएंगे। परमेशर जैसे हमेशा पैदा होते रहते हैं जो मरते ही
नहीं। अमर होती है इनकी संरचना । इसी उथल-पुथल में रमेशरी सो नहीं पाई थी
कि टटरा खटखटाने की आवाज सुनाई पड़ी। चारपाई पर से ही लेटे-लेटे
पूछा-मालूम हुआ परमेशर हैं-कुटिल हंसी हंसते हुए वह उठकर टटरा खोलती है
‘अरे परमेशर! रमेशरी को धीरे-धीरे बोलने का इशारा करते हैं परमेशर रमेशरी
तड़ जाती है और....
‘घबड़ाओ नहीं रमेशरी! झगड़ा नहीं तुमसे भींख मांगने आया हूं... हमारी
दुश्मनी मंगलसिंहवा से थी तुमसे थोडे़ ही है, मैं जानता हूं राजू ने भी
तुम्हें मारा पीटा और ठकुराइन ने अपमानित भी किया.......
रमेशरी इस आकस्मिक संयोग को भगवान की कृपा मान रही थी। अच्छा हुआ मछरी
खुद जाल में ’
रमेशरी अपने को परमेशर के अनुरूप ढ़ाल लेती है, परमेशर इसे अपनी जीत समझते
हुए सब भूल जाते हैं उन्हें सब कुछ भूलना ही था- औरत और दारू जीत की
खुशी-परमेशर बेसुध हो वहीं सो गये, रमेशरी उनका हाथ पैर खटिया से बांध
देती है, फिर एक भयानक फैसला, कुछ ही क्षण में मड़हा धू-धू कर जलने लगता
है, इसके पहले कि के लोग इस आकस्मिक घटना का निरीक्षण करते, रमेशरी विलीन
हो जाती है, दूसरी दुनिया में, जो अजीब खूबसूरत है और विचित्र भी। रमेशरी
जीत और हार की रहस्यमयी दुनिया से आखिर परमेशर को हटाना चाहती थी न...
धरतीडीह गांव पंचायत का चुनाव इस बार भी स्थगित हो गया।
कल के लिए वर्श 4. अंक 14 , 1996
आत्म - कथा
जाने कितने वैभवशाली ओहदों को जोतते-कोड़ते, बीनते पछोरते, आर.बी. प्रसाद
को यही कोई चार-पांच साल रिटायर हुए होगा। रिटायर हो जाने के बाद आर.बी.
प्रसाद की कई-कई इच्छाएं भी रिटायर हो गई थीं मसलन राजनीति में जाने का
मामला सबसे पहले अस्त हुआ तथा व्यवसाय करने का वह तो बालू की दीवार की
तरह भर-भरा कर गिर गया। कुल मिलाकर आर.बी. प्रसाद अपने प्यारे शहर की
गलियों की मानिन्द इस छोर से उस छोर तक होते हुए ट्राफिक पोस्ट की तरह हो
गए थे, उनके लिए सहज-असहज जीत हानि-लाभ , यश-अपयश सब का अर्थ बजबजाते
सामाजिक न्याय के पोखरे में सड़ता जान पड़ने लगा फिर भी मन के भीतर गुजरे
सालों की गरमी थी। इतने लम्बे समय में वे लगभग हर महत्वपूर्ण ओहदे पर रहे
थे। कलेक्टरी करने का मौका जब वे चाहते थे हाथिया लिया करते थे, उनके ऊपर
सरकारों के आने-जाने का कोई असर नहीं पड़ा करता था। आर.बी.प्रसाद शुरू से
ही महत्वपूर्ण घटनाओं परिघटनाओं का जिक्र अपनी डायरी में कर लिया करते
थे। उन्हें यकीन था कि यदि यह डायरी प्रकाशित क्या किसी को मालूम भी हो
जाय तब बहुत बड़ा (यद्यपि ऐसा नही होता) बवंडर खड़ा हो सकता है।
आर.बी.प्रसाद इस डायरी के प्रति काफी चौंकस थे। भूल से भी अपने परिजनों
के सामने इस डायरी के पन्नों को नहीं फहराते , नहीं देखते थे, जाने क्या
हो ? कौन सी सूचना पन्ने से बाहर निकल कर ‘‘सतर्कता’’ वालों के पास चली
जाये फिर तो बचना मुश्किल हो जायेगा।
आर.बी. प्रसाद नए सिरे से उसी डायरी को पढ़ना शुरू कर दिए थे तथा खास-खास
अंशों का संपादन भी करने लगे। रिटायर हो जाने के बाद वे सोचने लगे थे कि
‘‘आत्म-कथा’’ की ऐसी पुस्तक तैयार की जाय जिसमें नंगा सच हो आवरण हीन। सच
को परदे के बाहर कर सकना हालांकि कठिन तो होगा पर असंभव नहीं। गांधी तथा
कई अन्यों की आत्मकथाएं वे पढ़ चुके थे पर वे कहीं अश्वस्त नहीं हो पाए
थे, उन्हें लगता था कि आत्म-कथाओं का विस्तार आकाशीय है जिससे जमीन का
मिलना कभी संभव नहीं। कई तरह के अन्तर्विरोध काल की तरह खडे़ रहते हैं।
उनका मुकाबला करना आसान नहीं आर.बी.प्रसाद के सामने अन्त होते जीवन की
तस्वीर थी जिसमें वे साफ-साफ देख रहे थे कि अभी तो हाथ पैर चल रहा है, कल
क्या होगा ? कैसे कहा जा सकता है, पचास साल बीतते ही डायविटीज ने उन्हें
जकड़ लिया था, फिर खांसी, दमा भी हो सकता था, बच गए थे आर.बी. प्रसाद अभी
तक सुरक्षित है। उनका शरीर मजबूत, और कसे हुए हाथ पैर, पंजों से रिवाल्वर
की मूठ छटक नहीं सकती, कलम चला सकते हैं, बहुत कुछ लिख सकते हैं कई
मंत्रियों तक ने उनके ड्राफ्ंिटग की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।
आर.बी.प्रसाद आत्म-कथा की पुस्तक लिख लेने के लिए परेशान थे और चिंतित भी
शायद उतना परेशान कोई दूसरा न हो। उन्हें समझ में आता ‘‘ आखिर वही
आर.बी.प्रसाद जो पहले समझते थे कि ‘जो कुछ कर नहीं सकते वे किताबें लिखा
करते हैं काम करने वाला आदमी काम करेगा कि कलम कागज लेकर बैठ जाएगा
शब्दों को सपने की तराजू में तौलने के लिए’ फिर कैसे बदलता जा रहा है?
परेशान है अपनी ‘आत्म-कथा’ के लिए।
वे डायरी के पन्नों पर कई तरह के लाल, काले और हरे निशान लगाते चल रहे
थे। विस्थापन का मामला था, जंगली लोग डट गए थे मोर्चा बनाकर हालांकि शासन
को इतने भयंकर और जानलेवा विरोध की सूचना नहीं थी। कई-कई कर्मचारी मार
डाले गए थे दो सिपाहियों को तो जिन्दा ही जला दिया गया था। ऐसे माहौल में
आ.बी.प्रसाद के सामने दो तरफा चुनौतियां थी। एक तो सवर्ण जिलाधिकारी श्री
चौबे की तरफ से थी दूसरी चुनौती थी खुद आर.बी. प्रसाद की अपनी तरफ से
अनुसूचित होने की। माना यही जा रहा था यह जो कुछ हो रहा है सब श्री
प्रसाद की सह पर हो रहा है। मुंह बोल संवर्ण नेताओं ने तो प्रशासन का
मुंह बन्द कर दिया था यही हाल अखबार वालों का भी था। जिलाधिकारी चौबे एन
वक्त पर श्री प्रसाद को चार्ज सौंप कर राजधानी के टूर पर हो लिया करते थे
ऐसे ही एक मौके पर भयानक किस्म की परीक्षा देनी पड़ गई थी प्रसाद को
अनुसूचित होने के खिलाफ फलस्वरूप जाने कितने लोगों के घर-जला दिए गए थे,
लोग जिन्दा जल गए। गोया जीवन का कृत्रिम विभत्स औद्योगिक विकास के नाम पर
विनाश स्वरूप खड़ा हो गया था और प्रसाद कानून तथा व्यवस्था की सीढ़ी पकड़ कर
उस विभत्स और भयानक हादसे को देखते रह गये थे। घर आकर उन्होंने डायरी में
उन मृतक बन वासियों को याद करते हुए लिखा था, भाइयों मैने जो किया बस वही
कर सकता था। हो सके तो मेरे जघन्य अपराधों को क्षमा करना।
कारखाने का शिलान्यास काफी धूम धाम से सम्पन्न हो गया था। निर्माण
प्रारम्भ हो गया था। इस दौरान उधर कई बार जाना भी पड़ा था प्रसाद को लेकिन
जितनी बार प्रसाद उस तरफ गए, हर बार उनसे एक दूसरा प्रसाद अवश्य मिलता
रहा, चीखता, चिल्लाता, नारा लगाता हुआ, कभी-कभी तो विद्रूप हंसी हंसता
हुआ कि घबरा जाते प्रसाद -यह क्या! कहां से लौटा-चला आ रहा है उनका बचपन
जिसकी कहानियां उन्होंने समाप्त कर डालने की कसमें खायी थीं कहां पैदा
हुए, मां बाप क्या किया करते थे, कैसे पढ़ लिख सके या यह भी कोई कहानी है,
कोई आत्म-कथा है यह सब तो कृष्ण पक्ष है जीवन का, होता रहता है।
अन्धेरे में चलते रहने से कहां तक चला जा सकता है ?जीवन आरम्भ होता है
शुक्ल पक्ष से। प्रशासनिक नौकरी के पूर्व का काल खण्ड, भयानक अन्धेरे का
कालखण्ड था यही मानकर चल रहे थे प्रसाद।
अन्धेरों से निकल कर उजालों की तरफ बढ़ते ही प्रसाद को लोगों ने नए सिरे
से पढ़ना शुरू कर दिया था। औद्योगिक प्रतिष्ठान के शिलान्यास के बाद से ही
एक पठनीय पुस्तक के रूप में बदलते जा रहे थे आर.बी. प्रसाद। बिना किसी
भूमिका के लिखी इस पुस्तक के कई पाठ विशेष रूप से पठनीय बनते जा रहे थे,
उसमें ललित निबन्ध जो प्रशासनिक कार्य-कुशलता और जन सहयोग के बारे में
लिखा हुआ था। उस निबन्ध में उल्लिखित प्रसाद की भूमिका अविस्मरणीय थी खास
तौर से मृतकों का दाह संस्कार, विस्थापितों को बसने के लिए जमीन का
प्रबन्ध, तथा मुआवजा भुगतान में बरती जाने वाली ईमानदारी साथ ही साथ
जीवित बचे विस्थापितों से निरन्तर प्रसाद का संपर्क वस्तुतः किसी
महत्वपूर्ण पुस्तक में ही इस तरह की सूचनाएं संकलित की जा सकती थीं।
पुस्तक भूमिका हीन इसी लिए थी शायद क्यों कि इसके सभी पाठ , मानवीय
सम्बन्धों की सूक्ष्मतम दरारों को भरते हुए लग रहे थे। आखिर जीवन के बारे
में कितना सोचा जा सकता है? मरने वाले तो मरते रहेगें, हादसे घटते ही
रहेगें, उन्हें बराबर ओढ़ा बिछाया भी तो नहीं जा सकता। पुस्तक में इस
महत्वपूर्ण पाठ के अलावा एक दूसारा पाठ भी कम महत्वपूर्ण नहीं था जो
दुनिया को आश्वस्ति के नए सरोकारों से जोड़ रहा था। नए किस्म का कार्य-भार
सौंप रहा था। वह यह कि कैसे खड़ा रहा जा सकता है अपनी सेना में, सेना के
कार्यभारों से ‘‘निष्काम’’ हो कर , कैसे की जा सकती है सगुण विकास की
परिकल्पना। यह साहस की ही तो बात थी कि प्रसाद ने किसी तरह से सरकारी
कारखाने का शिलान्यास संभव करा दिया था और अपने ऊपर लगे वर्ग पक्षधरता के
आरोपों को झूठा सिद्ध करा दिया था। प्रसाद के इस निष्काम कर्म को
‘‘सगुण’’ विकास के सन्दर्भ में सदैव याद किया जायेगा। अन्त होती शताब्दी
यदि भविष्य में याद की जाएगी तो इस शताब्दी को दो भयंकर विश्व युद्धों का
गूंगा गवाह माना जाएगा फिर भी यह तो कहा ही जाएगा कि इस शताब्दी ने
अन्याय के खिलाफ लड़ने का जो साहस दिखाया है वह अतीत में नही था। किताब
बनते प्रसाद का अतीत चाहे जो भी रहा हो पर वर्तमान बिना किसी सहारे के
बढ़ता जा रहा था और वे इस कथित विकास यात्रा को डायरी में ‘‘ निरीह आदमी
का अपनी निरीहता के खिलाफ युद्ध’ शीर्षक से लिखा करते थे।
पीछे मुड़ने का कहां अवसर था देखने के लिए सो श्री प्रसाद आगे देख रहे थे
कलक्टरी , कमिश्नरी , सचिवालय। सभी कुछ तो जान बूझ लिया था प्रसाद ने।
डायरी पलटते-पलटते वे आगे बढ़ जाते और आत्म-कथा के लिए उपयोगी अंशो पर
रिमार्क भी लगाते जाते थे। उनकी डायरी में तमाम ऐसे अंश थे जिन्हें
आत्मकथा की पुस्तक मंे बिना किसी फेर बदल के मूलरूप में ही दिया जा सकता
था। उन्हें परेशानी तब होती जब कुछ अंश उन्हें कभी बचपन की दुर्दशाओं की
तरफ ले जाते, मां-बाप द्वारा भोगी गई यातनाओं की तरफ, जिसमें उनके कार्य
भार का कुछ भी हिस्सा न रहता न ही उसमें उनकी कोई भूमिका ही सुनिश्चित की
जा सकती थी। इन अंशों पर बिना किसी रिमार्क के आगे बढ़ पाना उनके लिए कठिन
हो जाता। जीवन जीने की कला में शायद बहुत कुछ अव्यक्त, रहा करता है, जिसे
व्यक्त करना चाहिए कि नहीं इसके समाधान के लिए ही वे कई लोगों की
आत्मकथाएं पढ़ते रहे थे। हाल की कुछ नामी-गिरामी आत्म कथाओं की ख्याति
देखकर वे भी अपनी डायरी में लिखे उन अंशों को छांट लेना चाहते थे जिसे
कुशलता पूर्वक अच्छी ड्राफ्ंिटग के सहारे व्यक्त किया जा सके भले ही
उन्होंने उसे अव्यक्त ही रहने दिया हो। सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन
में उनकी भूमिका कैसी थी इस पर उनके पास बहुत सारी सामग्री थी। उन
सामग्रियों का मूल्याकंन करते समय आज की विषम परिस्थतियां डकारने लगतीं
वे घबरा जाते उन्हें समझ में आता कि वे आज्ञाकारी और वफादार बने रह सकने
की ही क्षमता हासिल कर पाए थे पूरे कार्यकाल तक। वे इन अंशों पर प्रतिकूल
नोट लगाकर आगे बढ़ जाते। डायरी का एक खास अंश जो विचित्र किस्म के
रहमयस्मी हुश्न में सरोबार था आर.बी. प्रसाद के लिए बहुत ही आवश्यक हो
गया था। वह अंश उनकी प्रस्तावित आत्म-कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा होता जो
उन्हें तमाम बड़ों के बीच पहाड़ जैसा खड़ा कर देता। उस हिस्से में खोट भी
ऐसी नहीं जिसे भूलाया न जा सके। हुआ यह था कि वह घटना अनायास , हो गई थी
उसमें आर.बी.प्रसाद का कोई योगदान , नहीं था। बगल प्रान्त के
कान्तिकारियों का एक अस्त्रधारी दस्ता उनके जिले में घुस गया था, और उसने
अपने काय्रक्रमों को संचालित करना आरम्भ कर दिया था। बालू ठेकेदारों के
खिलाफ चला उस दस्ते का प्रतिरोध न केवल लोक-प्रिय था वरन सफल भी था, बालू
के ठीकेदार जो लाखों की जायज-नाजायज कमाई कर रहे थे सब बन्द हो गया था।
ठीका जिसके नाम पैसा उसे मिलना चाहिए यही उस दस्ते का नारा था। ठीके की
खासियत यह थी कि वह सब गरीब विपन्न भूमिहीनों के नाम था। पर वे बेचारे उस
लाभ को कहां प्राप्त कर सकते थे, जिसे बालू माफिया हजम करते जा रहे थे,
नामधारी ठीकेदार उन्हें लूट रहे थे कुछ रूपया देकर या दारू दक्कड पिलाकर।
इसी तरह जंगल में चलने वाले तमाम कानूनों की व्याख्या जिसे आर.बी.प्रसाद
कभी भी सही ढंग से नहीं कर पाते, न ही उन्हें प्रशासनिक सहयोग ही मिल
पाता उसे वह अस्त्र धारी दस्ता बहुत ही सामान्य ढंग से हल करता-चल रहा
था। यहां तक तो बात आर.बी.प्रसाद के पक्ष में जाती थी पर इसके आगे जाने
पर स्वयं आर.बी.प्रसाद को महसूस हुआ कि इस माहौल में कलक्टरी करना
मुनासिब नहीं लगता। सो सचिवालय या किसी आयोग के लिए प्रयास करना चाहिए।
उनका प्रयास सफल हुआ और एक विशेष आयोग में चेयरमैन बन कर वे चले भी गए
थे। यहां रहने पर खतरा उनकी पीठ पर रेंग सकता था, पेट से सरकते हुए मुंह
तक जा सकता था। इल्जाम लग सकता था कि प्रशासन के सहयोग से नक्सलाइट इस
शान्ति प्रिय जनपद को अशान्ति किए दे रहे हैं, इसी तरह और भी कई । इस
घटना को अच्छी आत्म-कथा के अनुकूल पलट सकते थे। आर.बी.प्रसाद रात दिन के
अथक प्रयास से भारी भरकम डायरी बैंक के पास बुक जैसी हो गई थी और उस पर
लिखे नोटस किसी सर्विस बुक की तरह। अचानक आर.बी.प्रसाद को लगा, भले ही
आई. एसों की कोई सर्विस बुक नहीं होती फिर भी यदि कोई आई.ए.एस. अपनी
डायरी लिखे तब उसे उसमें तमाम ऐसे अंश मिल जायेगें जो प्रताड़ना में लिखे
किसी प्रतिकूल प्रविष्ट से कम नहीं होंगे। आर.बी.प्रसाद ने आत्म-कथा की
सारी सामग्री समेट ली थी, स्क्रूटनिंग कर लिया था और विषय सूची भी बना
लिये थे फिर भी आर.बी.प्रसाद सन्तुष्ट नहीं थे, उन्हें महसूस होता कि इस
विषय सूची के आधार पर संकलित आत्म-कथा में तो छेद रह ही जाएगें जो आदमी
की जमात को, सुविधाओं, अवसरों को संचित करने की कूट क्षमता प्रदान करते
हैं। आत्म-कथा को जीवन जीने की कला के छिद्रों को पाटते या समतलियाते
चलना चाहिए। आर.बी.प्रसाद के अनुसार विषय सूची को विचारपूर्वक फिर से
बनाया जाना चाहिए।
आर.बी.प्रसाद जहां कहीं होते अपनी आत्मकथा की पुस्तक ही स्वप्नवत देखा
करते कभी कवर तो कभी उसके भीतरी पृष्ट भी। उनकी प्रतावित आत्मकथा की
पुस्तक पर संभावित आलोचनाओं की झलकियां कभी कभार उनकी आंखों मेें उतराने,
डूबने लगतीं। विषय सूची फाइनल हो जाने के बाद , उसे क्रमवार लिखने लग गए
थे आर.वी.प्रसाद, डायरी के पन्नों का ब्रीफ तो पहले ही बना चुके थे। समय,
तारीख, घटना का सही विवरण उनके सामने था, उसे केवल शब्द देना था, जिसे
बहुत ही सहजता से निपटाए जा रहे थे आर.बी.प्रसाद। लम्बे समय के परिश्रम
के बाद आत्मकथा की प्रस्तावित पुस्तक पाण्डुलिपि तैयार हो पाई, तैयार
करने में आर.वी.प्रसाद के अनुसार काफी समय लग गया था। जिस दिन पुस्तक
तैयार हुई थी , झूम उठे आर.बी. प्रसाद। उनका मन उनके बंगले में नाचने लगा
था, पाप सांग की आवाज पर हू हा करने लगा था, उनकी पत्नी तो घबड़ा ही गयी
थीं-पूछा था क्या हुआ ‘‘नई सरकार ने क्या किसी आयोग को चेयरमैन बना दिया
तुम्हें ?’’
‘‘नहीं भाई। सरकार को इतनी अक्ल कहां, उसे तो अक्ल देनी पड़ती है और क्या
है कि मुझे फुर्सत कहां है कि मैं सरकार को अक्ल देता फिरूं , वैसे चान्स
तो अच्छा है, यह जो हरिजन एक्ट है न, सुनने में आया है, इसके अनुपालन में
काफी अनियमितताएं इुईं हैं, इसकी जांच के लिए एक आयोग गठित करवाया जा
सकता है। बहरहाल छोड़ो इसे।
‘‘यह फाइल देख रही हो न। मैं इधर आत्मकथा लिखने में ही व्यस्त था, आज
तैयार हो गई है, पहले टाइप हो जाय फिर छपे-छपाए’’। और कर भी क्या सकते हो
सिवाय आत्मकथा लिखने के, कभी दूसरों की भी कथा लिखी है दूसरा लड़का
पढ़-लिखकर बेकार बैठा है, कुछ सोचा है उसके बारे में क्या करेगा वह ? यह
उनकी पत्नी की आवाज थी।
झुझलाते हुए निकल गई थी उनकी पत्नी कमरे से बाहर।
आत्मकथा की पाण्डुलिपि किसी टाइपिस्ट को देने के पहले आर.बी.प्रसाद ने
उसे समग्र रूप में एक बार पूरा पढ़ लेना जरूरी समझा साथ ही साथ यदि कोई
इसका वाचन करने वाला मिल जाता तो ठीक था पर दूसरा जो पढ़ता उससे आत्मकथा
की गोपनीयता भंग होती उसकी एकल टेक्नीक विभाजित होती सो उन्होंने अकेल ही
पढ़ने का संकल्प लिया था। उनकी आतुरता अमरबेल की तरह बढ़ती जा रही थी। रात
कितनी बची है चिन्ता किए बगैर वे पढ़ते रहे और जब पाण्डुलिपि समाप्त हो गई
तब उन्होंने उस पाण्डुलिपि के ऊपर अलग से एक कागज लगाकर लाल स्याही से
रिमार्क लगाया। रिमार्क की भाषा सरल थी विवरण जटिल था उलझा हुआ-
‘‘आर.बी.प्रसाद को सदैव एक अज्ञात आर.बी.प्रसाद छलता रहा, डंसता रहा और
वह आर.बी.प्रसाद जो वर्तमान को सरस आशावान समझता रहा सदैव धोखा खाता रहा।
प्रशासनिक कार्यकाल के दौरान जो शुभ और सत्य दिखता था तथा सुन्दर भी
आत्मकथा लिखते समय वह सब कुछ महत्वहीन अनुपयोगी तथा अर्थहीन लगने लगा था।
वर्तमान में जीवन जीने की जिस कला का आर.बी.प्रसाद ने पक्ष लिया था,
रिटायर होने के बाद मालूम होने लगा कि इतिहास में जीने के लिए उस कथित
कला से मुक्त होना जरूरी हुआ करता है। ‘‘आर.बी. प्रसाद की यह पाण्डुलिपि
शायद उस आर.बी.प्रसाद की आत्मकथा की पाण्डुलिपि नहीं है जो अभी तक जीवित
है और इतिहास में जीवित रहने के लिए आत्मकथा लिख रहा है।वह आर¬.बी.प्रसाद
तो कब का मर चुका है।’’आर.बी.प्रसाद आत्मकथा की पाण्डुलिपि दुबारा पढ़ने
का मन बनाकर भी नहीं पढ़ पाए थे सिर्फ एक आह के- ‘‘क्या पढ़ना है दुबारा,
कोई शब्द थोडे़ बदल जाएंगे। उन्होंने उस पाण्डुलिपि को कब नष्ट कर दिया ,
कैसे जला दिया यह भले ही किसी को न मालूम हो पाया हो पर बहुत सारे लोग
जान गए थे कि उन्होंने बंगले के गेट पर लिखा भूतपूर्व आई.ए.एस. मिटवा
दिया है। अब वे कभी भी खतो किताबत में भूतपूर्व नहीं लिखा करते। अब वे
कहते हैं- कथा चाहे जो लिख ले पर आत्मकथा सब नहीं लिख सकते और
आर.बी.प्रसाद तो
कभी नहीं लिख सकता, जो कभी आई.ए.एस. हुआ करता था। कहने के लिए तो
आई.ए.एस. पुल की तरह हुआ करता है जिस पर जनता अपना दुख-दर्द, विरोध लेकर
सरकार तक आ जा सकती है पर ऐसा नहीं हुआ करता, इस आई.ए.एस. रूपी पुल पर से
तो सिर्फ सरकारें गुजरा करती हैं अपने जरूरी, गैर जरूरी कानूनी रथों पर
सवार होकर उन रथों का भार सहन करने वाला आर.बी.प्रसाद मर चुका हैं, अब जो
जीवित आर.बी.प्रसाद बचा है वह अपना भार ढोए, अपने किए का प्रायश्चित करे
कि चले, फिर से सरकारों का अपनी छाती पर फलैंग मार्च कराने। आई.ए.एस. बने
रह सकने के लिए, सामान्य से सामान्य औपचारिकताओं के लिए कितने प्रपंचों
को जीवन के सच की तरह थामना पड़ता है, चाटना-पड़ता है, अब उन जैसे प्रपंचों
के सहारे ‘‘आत्मकथा’’ की पुस्तक लिखना, फिर उसे चाटना-चूमना, स्वयं कोे
प्रायश्चित करने के अवसर से मुक्त करना होगा।’’
अब तो प्रायश्चित के सहारे ही मुक्त हुआ जा सकता है, आत्मकथा लिखकर
छपवाकर नहीं। अचानक उन्होंने डायरी का वह अंश देखा जिसमें बालू माफियाओं
के दमन का जिक्र था-
एक हल्की सी आवाज, ‘‘ अभी तो वे सक्रिय होंगे ’’
कृषक जागृति मार्च 1989
अजीब है दिल्ली
तीन महीना हो गया हरिया अभी तक नही आया, बोला था अगहन चढ़ते ही आ जायेगा
उसकी जनाना भी साथ ही गई है। यहां घर पर ताला चढ़ा हुआ है। अब करमा की
तैयारी शुरू कर देनी चाहिए, बीस जनवरी को साहब ने बुलाया है। बोल रहे थे
टिकिट भी रिजरब कराना होगा। एक दिन कलक्टर साहेब को भी नाच-गाना दिखाना
होगा। अतवारू बतिया रहा था शीतला से। देखो शीतला ! तुम कोयलरी चले जाओ
वहां जाकर पता करो हरिया का, अगर वह दो-तीन दिन में नहीं आया तो समझे !
गांव मंे आठ-दस जनों की करमा वाली मण्डली है, पर पूजइती का काम हरिया
करता ही है। नाचने-गाने वाले बहुत है।
इस साल गांव में काफी चहल-पहल है। गांव वालों को दिल्ली की सरकार ने
बुलाया है करमा गाने और नाचने के वास्ते। दिल्ली जाने वालों में होड़ लगी
है, हम जायेंगे हम जायेंगे, लड़कियां शर्मा रही हैं पर होड़ उनमें भी है।
सुनने में आया है, इसके नाच-गाना का सिनेमा भी बनेगा।
हालांकि बानोडीह गांव अब जंगली सभ्यता से बाहर निकल चुका है फिर भी गांव
में किसी मोटर साइकिल या जीप के घुसते ही सब लोग चौकन्ना हो जाते हैं।
बहुत तेजी से एक मोटर साइकिल गांव में घुसी, गांव के लोग जब
तजबीज कर लिए कि पुलिस के लोग नहीं है तब अपने घरों से बाहर आए कुछ लड़के
अतवारू को बुलाने चले गए।
अतवारू आ गया उसकी मुलाकात नायब तहसीलदार से हुई उन्होंने भी छब्बीस
जनवरी वाले कार्यक्रम के लिए तैयार रहने को कहा और दस जनवरी को कलक्टर
साहब के यहां रिहलसल केे लिए साथ ही साथ हरिया को लेकर मुख्यालय पर आकर
मिलने के लिए भी कहा। इतना सहेज कर नायब साहेब मोटर साइकिल पर बैठे और
चले गए।
हरिया के बाप को मरे तीन-चार साल हुआ होगा। बड़ा नाम था उनका, क्या करमा
क्या लोरिकी कोई जोड़ नहीं था उनका गाने में, लोरिकी तो उन्हें पूरी याद
थी दो-दो तीन-तीन दिन तक गाते रह गए थे जब बनारस के किसी अखबार के आदमी
आए थे। हरिया उनका नाम भूल गया है, उन्हें कोई किताब तैयार करनी थी गा-गा
कर, नाच-नाच कर सुनाया था हरिया के बाप ने। एक-एक घंटे पर दारू पिलाते
जाओ और सुनते जाओ गाना। उन्हें दारू चाहिए ही चाहिए हर हाल में। तीन-चार
दिन तक रूक गये थे अखबार वाले साहब, सब कुछ उन्होंने टेप किया था। अत्तो
काकी का करमा और सोहर दोनों टेप किया था। सात-आठ साल हो गया था। बीच में
कभी नहीं आए थे। इस साल आए हैं, बोल रहे थे आप लोगों को दिल्ली चलना है
इधर कलक्टर साहब के यहां से भी संदेश आया है। अखबार वाले साहब बीच में भी
आने को बोल गए थे। आते होंगे। बाप के मरने के बाद से हरिया ने भी गाना,
बजाना शुरू कर दिया है थोड़ा बहुत सब कुछ गा लेता है हरिया, भजन, हरि
कीर्तन बिरहा, तथा लोरिकी भी। करमा तो गाता ही है।
बानोडीह गांव भी इसी देश में है, होना तो चाहिए इसे भी अन्य गांवो की तरह
पर आजादी के पचास साल बाद भी यह गांव जस के तस है। इस गांव में रहकर
ठीकेदारी करने वाले लोग लखपती तक बन गए पर गांव का क्या, गांव थोडे़
सुधरता है, सुधरता है आदमी। किसी स्वयं सेवी संस्था ने इस गांव में
अनौपचारिक शिक्षा का केन्द्र खोल दिया है, हरिया उसी में पढ़ाता है बहुत
कोशिश करता है कि बच्चे पढ़ें पर कोई नहीं आता पढ़ने के लिए, हरिया को किसी
तरह सौ रूपया महीना मिल जाता है। सौ रूपया से किसी का पेट पोसाएगा सो चला
गया है बाहर कमाने। सौ डेढ़ सौ घरों का यह गांव है। गांव से सटा हुआ ही
जंगल पड़ता है। गांव के अगल-बगल की नीचीं जमीन पर धान की खेती होती है,
ऊपर वाली जमींन पर मक्का, तीली और रवि में, गेहूं तथा सब्जी की भी। गांव
में किसी की आमदनी पांच हजार रूपया साल से अधिक नहीं। गल्ला की पैदावार
इतनी भी नहीं कि साल भर रोटी दाना चल सके। लगभग पूरा गांव ही चला जाता है
बाहर कमाने , दिहाड़ी करने। गांव में शायद ही कोई हो जो शाकाहारी हो तथा
दारू न पीता हो। कुछ लोग तो दारू बनाकर बेचते भी हैं, थाना-थूनी को
मिलाकर। वैसे तो दारू हर घर में चुआंई जाती है। खास कर तीज त्योहारों पर।
हरिया गांव का सबसे अधिक पढ़ा-लिखा नौजवान है। इसके चलते गांव के झगडे़ भी
बहुत कम हो गए हैं नहीं तो अक्सर गांव में किच-किच होता रहता था। दो-तीन
साल पहले इस गांव में मद्य निषेध कार्यक्रम चलाने वालों की पूरी भरी गाड़ी
आई थी। शराब पीने से क्या-क्या नुकसानी होती है, पूरी फिल्म दिखाई गई थी
और भाषण भी हुआ था पर उसका कोई असर इस गांव पर नहीं पडा। हां शराब के
ठीकेदार का असर जरूर पड़ता है,वह छापा डलवाता रहता है, साल में दो-बार।
लोगों का पुलिस चालान भी करती रहती है।
हरिया जब नहीं आया तब शीतला गया था उसे बुलाने। हरिया अब आ गया है। गांव
में देर-रात तक बजने लगी है ढ़ोलक, और होने लगी है करमा की नाच। दर्जी भी
आया है। किसम-किसम का रंग-विरंग कपड़ा सिलाएगा सबका। दर्जी सबका नाप ले
लेता है, अखबार वाले साहब ने बताया है कि अच्छे किस्म का घाघरा बनेगा
औरतों के लिए और मर्दानों के लिए धोती, रंगीन कुर्ता और पगड़ी होगी। सरकार
नहीं चाहती कि ये लोग मैले-कुचैले और गंदे वहां जायें। देश-विदेश सभी जगह
के लोग वहां आयेंगे, गन्दगी अच्छी लगेगी क्या ? अखबार वाले साहब ने भी,
काफी दौड़-धूप किया है इस बाबत, तब जाकर ऊपर से आदेश आया है, नहीं तो कौन
पूछता है, इन लोगों को, पूरा देश गाना-बजाना करने वालों से भरा नहीं है
क्या? स्त्री-पुरूष मिलाकर, कुल पन्द्रह लोगों के शरीर का नाप लिया गया
है। अखबार वाले साहब ने रात में रिहल्सल देखा भी। ‘‘ क्या गाता है ,
हरिया’’ उनके मुंह से अनायास ही निकल गया था। रिहल्सल देख लेने के बाद
अखबार वाले साहब डूब गये थे कल्पना लोक में। इस बार निश्चित ही
राष्ट्रपति द्वारा इस कार्यक्रम के संयोजन के लिए उन्हें पुरस्कार
मिलेगा। आखिर उत्तर मध्य सांस्कृतिक क्षेत्र से कोई दूसरा कार्यक्रम
प्रस्तुत भी तो नहीं किया जा रहा। लोक-नृत्यों में अन्य की तुलना में
करमा नृत्य का प्रस्तुतीकरण सामान्यतया आकर्षक होता है। पूर्ण रूप से यह
एक नया और आकर्षक कार्यक्रम होगा। ‘रिहल्सल वाले कार्यक्रम का भी फोटो
खींचा था अखबार वाले साहब ने। सुबह होते ही चले गये थे अखबार वाले साहब
हरिया को समझा कर और दस जनवरी को कलक्टर साहब के यहां रिहल्सल करने के
लिए भी बोले थे। कोई न कोई गाड़ी सुबह आ जाएगी, सबको लेकर चली जाएगी। फिर
वहां से दिल्ली चलने वाला प्रोग्राम तय होगा।
हरिया भी धुन का पक्का है। अतवारू और शीतला के साथ मिल कर वह भी अपनी
योजना बना रहा है। हरिया को महसूस होने लगा है कि - ‘बाबू मर गए पर कभी
भी दिल्ली नही जा सके। हमारे गांव का कोई भी दिल्ली नहीं जा सका’ और हम
लोग दिल्ली जायेंगे।’ खूब रियाज करना है, इनाम हमी लोगों को मिलना चाहिए।
अतवारू भी मगन है, कौन पूछता है यहां, ‘ करमा।
करमा’ पहले राजा साहब के यहां होता था हम लोग आते-जाते थे, पर अब नही ?
जमाना गुजर गया। थाने पर बिरहा और कव्वाली होती ही है। कहां होता है
करमा। गाना-बजाना के नाम पर बीडियो चला आया, हो गया पूरा काम।
इधर आठ-दस दिन खूब रियाज किया गया है। रियाज के दौरान ही हरिया ने डांट
दिया था, फेंकनी को जब देखो तब खो-खो करती रहती है, थोड़ा सा रंग क्या साफ
पा गई , उसी में गरूवाई रहती है, फेंकनी गुस्सा गई थी और छोड़ दिया था
रिहल्सल। हरिया किसी तरह मना कर लाया है उसे। चरितरी और फुलवसिया का
करेजा इस लिए धक-धक कर रहा है कि कैसे पहनेंगी वे सब चुनरी और घाघरा ,
बड़ा उटपटांग लगेगा- क्यों रे चरितरी पहनेगी न, घाघरा तुम्हारा मरद देखेगा
तब लोट-पोट हो जायेगा। सब एक दूसरे का मजाक ले रही हैं पर खुशियाली बहुत
अधिक है, सबके अन्दर उमंग है उत्साह है और अच्छा करने की लालसा है।
आखिर दस जनवरी आ ही गई। गांव में एक मिनीबस लेकर आ गए थे, अखबार वाले
साहेब और उस दिन के रिहल्सल वाला फोटो भी। हरिया, अतवारू और शीतला सब देख
रहे हैं अपनी-अपनी फोटो। फेंकनी,चरितरी और फुलवसिया भी। फोटो में सबका
रंग चढ़ गया है, बड़ा अच्छा लग रहा है सबको। गाड़ी में धड़ा-धड़ बैठने लगे हैं
सब नाचने-गाने वालों के अलावा भी कुछ लड़के तथा लड़कियां बैठ रहे हैं गाड़ी
में। बडे़-वुजुर्ग आश्चर्य चकित निगाहों से सब देख रहे हैं। थोड़ी देर में
गाड़ी चल देगी। अखबार वाले साहब ‘जल्दी-जल्दी’ लगाए हुए हैं।
गाड़ी चल पड़ती है। सब बैठ जाते हैं गाड़ी में। अखबार वाले साहब हरिया को
लेकर ड्राइबर के साथ बैठ जाते हैं आगे। हरिया को लगता है कि अखबार वाले
साहब बहुत अधिक मेहनत करते हैं- ‘हरिया पूछता है साहब आपको क्या मिलता
है, तनखाह मिलती होगी न आपको।’ अखबार वाले साहब बताते हैं कि -नहीं भाई,
तनखाह नहीं मिलती, मैं बस ऐसे ही यह सब करता रहता हूं , तुम लोगों का शौक
है नाचना-गाना, बजाना, वैसे ही हमारा भी यह शौक है तुम लोगों के बारे में
लिखना - पढ़ना । गांव के लोगों के बारे में जितना मैने लिखा है- आज तक
किसी ने नहीं लिखा है बस यही समझ लो। यह कोई धन्धा नहीं है बस हमारा शौक
है। अखबार वाले साहब ने बताया था हरिया को, हरिया उनका मुंह ही ताकता रह
गया था ‘ऐसे भी लोग हैं जो हम लोगों की चिन्ता करते हैं।’
बहुत ही अच्छे ढंग से रिहल्सल समाप्त हो गया था, दूसरे दिन उसी मिनीबस से
हरिया की मण्डली को गांव पहुंचा दिया गया था। रिहल्सल के दिन ही दर्जी
सारा कपड़ा सिल कर ले आया था, सबने पहन लिया था। पहनने के बाद सब लगे थे
पहचााने एक दूसरे को, हरिया ने फेंकनी को छेड़ा भी था- भाग खड़ी हुई थी
फेंकनी ‘ हमें का कहते हो अपना देखो’ तुम भी तो काफी बदल गये हो। रिहल्सल
समाप्त होते ही कपड़ा उतरवा लिया गया था, धुलाने के लिए धोबी के यहां जो
देना था। कपड़ा पहनते ही बदल गये थे सब भीतर ही भीतर महसूस करने लगे थे कि
‘आदमी कितना बदल जाता है कपड़ों में, जाति वही रहती है, धर्म वही रहता है
, आदमी वही रहता है पर बदल जाता है सब कुछ।’ हरिया सोचने लगता है कि जिस
कलक्टर के आफिस में घुसना तक मोहाल नहीं वही कलक्टर कैसे छू-छू कर हम
लोगों का कपड़ा देख रहा था और दर्जी को समझा रहा था। शीतला के कपड़े को
लेकर हद कर दिया कलक्टर ने, ‘अरे कुछ तो फर्क होना चाहिए बैगा के कपडे़
से और दूसरों के कपडे़ से। करमा में बैगा का कपड़ा एकदम-सधुक्कड़ी का होना
चाहिए, चिमटा और त्रिशूल भी नए ढंग का होना चाहिए। हो सके तो स्टील का।
यहां जो कलश रक्खा गया है उसे सुनहरे रंग का होना चाहिए और करमा की डार’
इसे किसी फ्रीज में रखवा दो: दिल्ली में यह नहीं मिलेगा, इसकी पत्तियां
सूखनी नहीं चाहिए। वहां स्टेज बनाने के लिए किसी नाटक कंपनी वाले को ठेका
दे दो और लाइट के लिए किसी बढ़िया आर्केस्ट्रा वाले को बोलो। हां मेक अप
करने के लिए ‘ दूरदर्शन केन्द्र’ से किसी अच्छे मेकअप वाले को बुलवा लो।
भले ही लाख-दो लाख खर्च हो जांय, पर कार्यक्रम अच्छा होना चाहिए। कितना
बढ़िया ये लड़कियां गा रही हैं, पर इनके बाल देखो, इनके मुंह देखो, अरे
इनके चेहरों पर लाइट पड़ते ही , चेहरा चम-चमा जाना चाहिए, बगल में खडे़
ए.डी.एम. साहब और अखबार वाले साहब हां हां करते जा रहे थे।
अखबार वाले साहेब को संबोधित करते हुए कलक्टर साहब ने कहा ‘ अरे भाई
अग्निहोत्री जी’ थोड़ा आप भी दिमाग लगाइए, यह सब ऐसे ही होगा। आपको तो
सोचना चाहिए कुछ कागज पर थोड़ा बहुत लिख दिया, अखबार में छप गया काम खतम।
अरे वह दिल्ली है वहां पर ऐसे नहीं चलता, जो भी यहां है उसे बदल डालिए,
’यही समाज को बदलना है।’ हमारे लोक नर्तक, भूखे और भिखमंगे नहीं हैं, हों
भले ही, पर हमें उन्हें बदल कर ही ले जाना होगा वहां। विघायक और एम.पी.भी
तो गांवों के ही होते है न, सब बदल जाते हैं कि नहीं।’ समझे आप।
नेचुरलिटी के चक्कर में न पड़िए, यही कानून और व्यवस्था की नेचुरलिटी है।
जाने वहां कहां-कहां के लोग हों, इनका चेहरा देखकर उनके ऊपर बुरा असर
नहीं पड़ेगा क्या ? अग्निहोत्री साहब ने, कहा कि ‘सब ठीक हो जाएगा सर आप
चिन्ता न करिए।’
बीस जनवरी को ही मुख्यालय से करमा मण्डली को गाड़ी पकड़नी थी। अग्निहोत्री
जी को मंडली का मैनेजर बनाया गया था और उनके साथ नायब तहसीलदार शर्मा को
उप प्रबन्धक बनाया गया था। लाइटमैन, स्टेज निर्देशक और मेकअप मैन को भी
मुख्यालय पर ही बुला लिया गया था। बीस जनवरी आने में देर थी, इस बीच कई
चक्कर लगा आए थे , अग्निहोत्री जी और नायब तहसीलदार शर्मा जी। रिहल्सल
पूरे शबाब पर था। हरिया की रिहल्सल की तैयारी के लिए पांच सौ रूपया भी दे
दिया था शर्मा ने। दारू, गांजा और भांग बूंटी के लिए।
गांव में धान की कटाई पहले ही समाप्त हो गई थी, खलियान भी खतम हो चुका
था। कहीं-कहीं आलू गोभी की सिंचाई का काम चल रहा था।
अगल-बगल के गांवों के लोग भी जानते थे कि हरिया की मंडली छब्बीस जनवरी पर
दिल्ली जा रही है। नायब तहसीलदार शर्मा जी को यह कार्यक्रम अब अच्छा लगने
लगा है। पहले तो उन्हें लगा था कि कहां फंसा दिया कलक्टर साहब ने, इसमें
क्या मिलना-जुलना है, लेकिन अब उन्हें सीठी में भी रस चूसने का आभास होने
लगा है। हजार रूपया दिया जाना था हरिया को उन्होंने पांच सौ ही दिया। इसी
तरह गाड़ी-घोड़ा और तमाम खर्चों में से बहुत सारी कटौतियां की जा सकती हैं।
अग्निहोत्री जी का क्या उन्हें भी कुछ दे दूंगा। दौरान रिहल्सल और गांव
में बार-बार आने से गांव की लड़कियां भी
अब काफी मुखर हो गई हैं उनसे। फेंकनी ने तो उन्हें एक दिन तमाशा ही बना
दिया था। रात में बेचारे सोए थे फेंकनी ने उनके माथे पर सिन्दूर का टीका
और टिकुली साट दिया था और आंखों में मोटी धारी का गाढ़ा काजल लगा दिया था।
सुबह उन्हें देख-देख बच्चे हंसने लगे थे, हरिया ने उन्हें नहलावाया था और
फेंकनी को डांटा भी था। फंेकनी भाग गई थी शरमा कर। शरमा जी काफी घुल-मिल
गए हैं अब गांव वालों से खांस कर हरिया से- हरिया उन्हें मनोरंजक और
बहादुर किस्म का आदमी लगने लगा था।
बीस जनवरी को दिल्ली वाली गाड़ी से मण्डली चल पड़ती है। मण्डली के साथ
अग्निहोत्री जी, शर्मा जी और लाइट मैन, स्टेज मैन तथा मेकअप मैन भी हैं।
कल रात तक ये पहंुच जायेंगे दिल्ली। गाड़ी में ही खाने-पीने का पूरा
इन्तजाम कर लिया गया है। हरिया, अतवारू और शीतला के दिमाग में रह-रह कर
उभरती रहती है दिल्ली की चमक। लड़कियां और औरतें गुमशुम पड़ी हैं या सो रही
हैं, गाड़ी अपनी रफ्तार से भगी जा रही है, डिब्बे में बैठे लोग इन मंडली
वालों को कुछ इस तरह से देख परख रहे है जैसे ये अजायब घर से लाये गए हों।
गाड़ी दिल्ली पहुंच जाती है। नियत स्थान पर उन्हें ठहराया जाता है। खूब
स्वागत सत्कार किया जाता है। छब्बीस जनवरी के दिन इनका प्रर्दशन होता है,
प्रदर्शन बहुत ही अच्छा होता है, इन्हें प्रथम पुरस्कार मिलता है। पूरी
मण्डली खुश है हरिया विशेष रूप से । आज खूब दारू पिया जायेगा सोचता है
हरिया। अतवारू और शीतला भी मगन हैं-शर्मा जी से कह कर अंग्रेजी मगांई
जाएगी। तरह-तरह का विचार उपज रहा है सबके मन में , कार्यक्रम समाप्त होते
ही पूरी मंडली नियत स्थान पर चली जाती है। खूब, खाना-पीना होता है सब
दारू पीकर मस्त हो जाते हैं अग्निहोत्री जी का कलेजा फूल गया है उन्हें
इस कार्यक्रम के लिए पहला स्थान प्राप्त होता है। कल सुबह सारे अखबारों
में उनकी फोटो छपेगी और भी बहुत कुछ तथा किस तरह उन्होंने पहाड़ी और पिछड़े
इलाके के गरीब भूखे आदिवासी लोगों की प्राचीनतम कला को नवीनतम रूप में
प्रस्तुत कराया, उन लोगों के सामने जो पहाड़ों में जा नहीं सकते, हां
उन्हें खरीद जरूर सकते हैं।’ अग्निहोत्री जी काफी मगन हैं और शर्मा जी
भी, चलो
तहसीलदार बनने का मौका अब अवश्य मिल जाएगा। पहला इनाम पाने की खुशियाली
में आज सब बेसुध हैं। किसी को कोई खबर नहीं, क्या हो रहा है यहां और क्या
हो रहा है वहां।
काफी रात हो जाती है, कुछ अज्ञात लोग आते हैं, और लड़कियों के कमरे में
घुस जाते हैं। हरिया, अतवारू और शीतला सब दूसरे कमरे में थे अग्निहोत्री
और शर्मा के साथ। भीतर से दरवाजा बंद कर लेते हैं और लड़कियों के साथ
छेड़खनी करने लगते हैं, लड़कियां भी खूब थीं, सब भिड़ जाती हैं, काट खाती
हैं, किसी का हाथ किसी की ऊंगली और बहुत कुछ, शोर मच जाता है, जाग जाते
हैं, हरिया, अतवारू और शीतला भी, दो-तीन और - लोग भी। शर्मा जी तथा
अग्निहोत्री जी को भी जगाता है हरिया-सब चकरा जातेहैं ‘यह क्या हो रहा
है।
’हरिया बाहर से दरवाजा तोड़ना चाहता है और तोड़ भी डालता है पर वे सब गायब
हैं- लड़कियां हांफ रही है, लगती हैं सब बताने, पहचान नहीं पाईं थीं किसी
को, आखिर वे किसे पहचानती, ऊपरी हिस्से पर इन्हें टिकाया गया था
शर्मा और अग्निहोत्री भी नहीं समझ पा रहे थे कि क्या किया जाय- थाने में
चलकर रपट लिखई जाय, इस पर लोग सहम जाते हैं। अग्निहोत्री जी का
साहित्यकार मन उलझ जाता हैं अपने भीतर ही ‘वाह रे लोग! हम काफी तरक्की कर
रहे हैं- यही कहा जा सकता हैं। फेंकनी और अतवरिया को कुछ चोटें भी आ गई
थीं। फेंकनी कांप रही थी। सबों ने इसे ही पकड़ा था, पर पकड़ते ही इसकी नींद
खुल गई थी और लड़ने लगी थी फेंकनी, तब तक और जग गई थीं। वे सिर्फ दो थे-
कर भी क्या लेते- कहने लगी चरितरी। नहीं था ‘कड़ा’ हाथ में नहीं तो आज तुम
हरामियों का माथा ही फोड़ देती’। और भी बहुत कुछ वह बड़-बड़ाती रही थी।
हरिया को जितनी प्रसन्नता थी वह सब फुर्र हो गई-वाह रे दिल्ली, इसीलिए
कोई नहीं आया हमारे गांव से यहां, हम नाचते-बजाते हैं तो क्या हमारी
बहनें ...... हैं, यही समझ लिया था दिल्ली वालों ने। इसीलिए बुलाया
भी था शायद। इनाम ओकराम देकर फुसलाना चाहा था। अग्निहोत्री जी यही सब
होता है का आपके अखबार में। यह भी छपवा दीजिएगा कि हमारी बहनों के साथ
क्या हुआ और क्या किया हमरी बहनों ने। बोलिए छपवाइएगा न। कल इनाम मिलना
है। सबके सामने ही यह सब कहेंगें हम लोग। जब आप किसी की इज्जत की सुरक्षा
नहीं कर सकते तो बुलाते क्यों हैं।’ अग्निहोत्री और शर्मा जी इस घटना से
काफी दुखी थे। पुरस्कार वितरण के बाद ही लोग चले आये थे अपने मुख्यालय।
दोनों ने हरिया से माफी मांगा था, अग्निहोत्री जी तो इतने भावुक हो गये
थे कि रोने तक लग गए थे। वाह भाई खूब,दिल्ली भी अजीब है, सब कुछ लूट लेना
जानती है दिल्ली। फिर कभी दिल्ली न जाने की कसम खा कर लौट आए हैं
अग्निहोत्री जी- देखिए आगे क्या होता है। हरिया, शीतला और अतवारू,
फेंकनी, चरितरी तथा फुलवसिया तो अब कभी भी नहीं जाएंगी दिल्ली। उनके लिए
बानोडीह, दिल्ली, मथुरा और काशी हैA
युद्धरत आम आदमी अंक अपै्रल सितम्बर 1996
आखिर क्या है निशा का पक्ष ?
अचानक चौंक पडे़ थे दरोगा जी, सरकारी क्वार्टर से बाहर निकल आए थे, बहुत
तेज चिल्लाए ‘पहरा-पहरा’, पहरे पर तैनात सिपाही भागा हुआ दरोगा जी के पास
आया। हंऽसरकार !
‘क्या मामला है, इतनी भीड़ कहां से आ गई, कौन हैं ये लोग ? लगातार एक पर एक कई सवाल’
‘बलात्कार हो गया है सरकार, परस पनवां के हैं ये लोग’ परस पनवां कहां
पड़ता है ? जंगल के किनारे दक्षिण तरफ कोई दस किलोमीटर दूर’ बताया सिपाही
ने, इतना होते ही दीवान जी तथा थाने के और अहलकारान तथा गांव वाले सब के
सब इकट्ठा हो गए... गांव वालांेे ने बताना शुरू किया।
यह लड़की खेत में काम करने के लिए जंगल की तरफ जा रही थी कि चौधरी हरख
सिंह का बड़ा लड़का जो कालेज में पढ़ता है उसने इसे पकड़ लिया , उसके दो साथी
और थे, बचऊ चौधरी और पुनवासी चौधरी के लड़के, सबने इसके साथ......। वहां
यह बेहोश पाई गई, हम लोग डोली पर सुताकर ले आए हैं इसे, कुछ कीजिए दरोगा
जी। बड़ा नाम है आपका, बचऊ चौधरी और पुनवासी चौधरीके लड़के, ये चौधरी लोग
बहुत सरहंग हैं।’
लड़की बनवारी धांगर की , बनवारी बाहर क्रशर पर काम करता है, रोपाई का सीजन
है इसलिए आ गया है, रोपाई खत्म होते ही चला जाएगा।
बनवारी भी दरोगा जी के सामने सुबुक-सुबुक कर रोने लगा हमारी लड़की को बचा
लीजिए साहब...उन लोगों को पकड़ लीजिए इसी तरह बहुत कुछ....’
दरोगा जी ने लड़की देखा... यही कोई 16-17 साल की, गठा शरीर, सांवला पर
आकर्षक, बेहोशी के बाद भी चेहरे पर जवानी की छलकती उत्तेजना,
आभायुक्त.... ‘इसे पहले अस्पताल ले जाओ’ दो सिपाही भेजो, इलाज कराओ, इसे
बचना ही चाहिए चाहे जितने रूपए खर्च हों।’
‘बनवारी कौन है ? तुम ! चिन्ता मत करना यह हमारा काम है - देखता हूं,
कैसे रहते हैं वे लोग किसी को नहीं छोडंूगा और ये साले कालेज के लौन्डे़,
फिलिम देख-देख कर गांव को स्टूडियो बना लिए हैं। हर लड़की इन्हें चूमाने,
चाटने के लिए बनी है’ क्या नाम है हरखवा के लड़के का ..’ ‘पीयूष’
सरकार।‘क्या नाम है साले का ‘पीयूष’। इतना बढ़िया नाम और घटिया काम।
लड़की को अस्पताल भेज दिया गया, रपट तीनों लौन्डों के खिलाफ लिख ली गई....
खबर हर तरफ आग की तरह फैल गई... लौन्डे घर छोड-छाड़कर भाग गए थे, दरोगा जी
कई बार दविश दे चुके थे, पर वे क्यों मिलते ? कहां मिलते ?
लड़की ठीक-ठाक हो गई, उसने भी उन्हीं तीनों का नाम बताया और कैसे क्या
हुआ? किसने हाथ पकड़ा, किसने जांघें, और किसने मुंह में रूमाल ठूंसा.सब
कुछ। कैसे अपने पुरूषार्थ की आजमाया ,यह भी। लड़की को पता था,
उसके साथ क्या हो रहा है। उसे यह भी पता था कि उसके साथ ऐसा नहीं होना
चाहिए था, भात-माड़ की विरादरी है। उसके बाप की पूरी विरादरी को भोज-भात
देना पडे़गा, कहां से आएगा यह सब आखिर इसके लिए भी तो जाना ही पडे़गा
हरखू चौधरी के यहां ही, उसके बाप को’ वह भूल नहीं पाती है दुख। अपने
नुचे-चुथे शरीर पर उसे घृणा हो जाती है, क्यों उसे भगवान ने जवान बना
दिया, छोटी बच्ची ही क्यों नहीं रहने दिया उसे, यह वही शरीर है न,जब पूरा
खुला रहता था, ये वही लड़के हैं न, जो मेरे साथ नंग-धड़ंग घूमा करते थे, ‘
हम लोग पोखरे में आखिर कैसे नहाया करते थे, कहां था परदा। जब परदा हुआ तो
इस तरह से मेरे साथ खेलने कूदने वाले ही... लगे नोचने-चोथने। टूट पड़े
तीन-तीन... मैं कर भी क्या सकती थी...? जवान देह से निकलने वाली गन्ध
संूघकर वे पगला गए थे शायद! तभी तो उन्हें नहीं दीख पड़ा था आखिर गन्दगी
कितनी है? छिः गन्दे लोग हैं।’ वह कसमसा जाती है, झटके से, मुुंह छिपा
लेती है आंचल में, रोने लगती है-दरोगा बयान दर्ज कर लेता है, गवाहों से
भी पूछ-पूछ कर लिख लेता है। गांव के लोग थाने से घर चले जाते..हैं।
दरोगा परेशान ! माथे पर पसीनें की बूंदे, आंखे लाल, चेहरा तमतमाया... फिर
बलात्कार ’ !
वह चीखना चाहता है, कहना चाहता है, पकड़ो-पकड़ो सालों को, कोई भागने न पाए,
गोली मार दो, जला दो पूरा गांव , खानदान-दर खानदान साफ कर दो’ ये
बलात्कारी किसी के नहीं हो सकते , इनके सामने कोई भी सिर्फ एक मादा देह
है इसके अलावा, इनके लिए और कोई रिश्ता नहीं हो सकता विपरीत लिंगियों से।
ये लिंग-भेद की रूप रेखा पर टिके बीमार लोग हैं, इन्हें इस समाज में जीने
का हक नहीं, जिसमें, मां बहनें, पत्नी बेटियां सब मिल कर एक साथ रहती
हों।
थाना और थाने का अनुशासन। वे चीख नहीं पाते चुप-चाप अपने कमरे की ओर चल
देते हैं... कुर्सी पर धम्म से बैठ जाते हैं आंखों में तैरने लगती है वे
बातें, जब वे दरोगा नहीं थे, पढ़ रहे थे, कैसे घेर लिया था ठाकुरों ने
उनका घर , और उनके बाप को कतल कर दिया था, उन्हें चारपाई से बांध दिया था
तथा उनकी छोटी बहन के साथ..., उनकी मां के सामने ही । वे चीख पड़े थे, कुछ
नहीं कर पाए थे ठाकुरों का , मां ने गांव ही छोड़ दिया था, बहन ने
आत्महत्या कर ली थी, आज उनमें से कोई जीवित नहीं पर क्या वह सब भी खतम
हो गया जिसे उन्होंने अपने सामने ही घटते देखा था। अतीत का वह आक्रामक और
घृणित काल खण्ड उनके जीवन का बहुत बड़ा दर्द है। पर करें क्या ? किसके
खिलाफ... ठाकुरों का वह गांव आज भी है, उनमें से कुछ तो आज भी उसी तरह
अपनी मूंछें ऐंठ रहे हैं... समय भाग रहा है- ठाकुरों के साथ पुलिस थी,
उनका कुछ नहीं हुआ ?
उनके थाना क्षेत्र में घटी इस घटना का रिश्ता, उनके साथ घटी घटना से कुछ
जोड़ा जा सकता है क्या ...बलात्कार वहां भी हुआ था, यहां भी हो गया,
अपराधी पुलिस की वजह से बच गए और यहां ... दरोगा जी उत्पीड़ित नहीं बल्कि
उत्पीड़ितों के रक्षक हैं.... दरोगा जी रात भर सो नहीं पाते। कब कितनी
दारू पी गए रात में , और कब कहां-कहां छापा मार आए...सब कुछ धुन्ध-धुन्ध
सा ही रहा, मुल्जिम नहीं मिल पा रहे थे।
मजबूरन दरोगा जी ने कुर्की का आदेश प्राप्त कर लिया था, और कुर्की करने
की योजना भी बना ली गई थी। विधायक जी तथा भूतपूर्व मंत्री जी जो आज केवल
एम.पी. हैं उन लोगों के दबाव दरोगा जी पर बार-बार पड़ते रहे, यहां तक कि
डी.वाई.एस.पी.साहब ने भी झटके से कहा था ‘आग से नहीं खेलते मि0
शिवचरन....बाल बच्चें है नौकरी करो... चलते बनो। ’
शिवचरन के लिए मुुश्किल यह थी कि क्या करें रह-रह के उन्हें अपनी बहन और
मां का ख्याल आता। पिताजी का कतल और ओफ-ओ कितना भयानक था वहसब....बहुत
कुछ झेला है उन्होंने बनवारी को भी झेलना होगा उसी तरह।
शिवचरन का परिवार बहुत ही सीमित था, सिर्फ एक छोटा बच्चा और खूब सूरत सी
पढ़ी लिखी जवान बीबी... कुछ-कुछ नए दिल दिमाग की। चौधरी रामहरख कोई
राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, किन्तु जात-पात की राजनीति में उनका भी
महत्वपूर्ण नाम था। चौधरी ने जोगाड़ बनाकर लगभग दस हजार रूपया शिवचरन
दरोगा की बीबी के यहां, किसी सिपाही की औरत के माध्यम से भिजवा दिया था
और निश्चिन्त हो गये थे।
चौधरी राम हरख जानते थे कि इन मुकद्मों में गिरफ्तारी....मार-पीट , न हो
यातना न दिया जाय, फिर मुकद्में में क्या है आखिर बच्चे हीे तो हैं।
भूल-चूक, गलती सही तो हो ही जाया करती है, उमर ही साली गदह पचीसी की है
नऽ। थोड़ा सोचना चाहिए और दरोगा जी हैं कि मारने पीटने और बरबाद करने पर
तैयार... आखिर हमारी भी इज्जत है, हम लड़कों को बरबाद थोडे़ होने देगें।
हम भी देख लेगे दरोगा को, इधर दरोगा जी का ताक्खाना और उधर नेताओं का
दबाव पड़ना दरोगा पर लगभग साथ ही हुआ यह सब। दरोगा की बीबी को पटाने का
काम सिपाही सुमेर चौधरी की बीबी ने किया.... मामला लगभग समाप्त ही हो
गया। दरोगा की बीबी ने आश्वासन भी दे दिया।
मौका मिलते ही दरोगाइन ने दरोगाजी को समझाया था यूं कहिए तिरिया चिरित्तर
में उलझाना शुरू किया‘ आखिर क्या मिलेगा आपको, एक आदमी के पीछे पूरी ताकत
लगा दिए हैं, अब बलात्कार नहीं होगा क्या। रोक देगें सब आप... अरे यह
समाज है इसमें यह सब झेलना ही पडे़गा... आप अपना देखिए.... सब तो खिलाफ
हो गए हैं आपके, विधायक से लेकर एम.पी. तक,
डी.वाई.एस.पी.साहब खुश हांेगेंक्या आपसे,विधायक जी से उनके बहुत अच्छे
संबंध हैं , शिवचरन खाना छोड़कर उठ जाते हैं, लगते हैं दारू पीने,नहीं
खाना है मुझे, कृपया अपना भाषण बन्द कीजिए, यह मेरा काम है, इससे आप को
अलग ही रहना चाहिए।’
गटा-गट दारू पी जाते हैं, पत्नी ने कभी इतना अपमानित नहीं किया था।
शिवचरन की जुमा-जुमा तीन चार साल की शादी थी.... सब हंसते-खेलते गुजर रहा
था। पत्नी को यह सब अच्छा नहीं लगा ‘ आखिर क्या हो गया है आपको, खाना ने
क्या बिगाड़ा है आपका, इसी नमक रोटी की लड़ाई लड़ रहे थे न आप, मुझे नहीं
मालूम है क्या ? कैसे-कैसे दरोगा हो गए। क्या-क्या नहीं किया है आपने, इस
दरोगाई के खातिर, रूपया पैसा सब कुछ, खाना खा लीजिए, छोड़िए पीना पाना।
ठंडा होकर सोचिए यह घर है आपके थाने का हवालात नहीं, आपको समझना चाहिए कि
पहले आप घर गृहस्थी वाले हैं , फिर दरोगा।’
दारू की गिलास वह छीन लेती है, खाने की प्लेट उनकी ओर सरका देती है खाने
लगते हैं, दरोगा जी,’ घर गृहस्थी वाला हूं, मेरा भी परिवार था, तभी तो
सोच रहा हूं- बनवारी की लड़की के बाबत। तुम्हें क्या मालूम.... शायद सुना
हो, कभी किसी के मुंह से, मेरी भी बहन थी, उसके साथ भी तो यही हुआ था, वह
भी मेरे घर में, मेरी आंखों के सामने...हम मजबूर थे कुछ नहीं कर पाए उन
दरिन्दों का, तो क्या आज भी जब कि मैं कानून का रक्षक हूं, मुझे सब कुछ
भूल जाना चाहिए और परिवार के संक्रमित दल-दल में धंस जाना चाहिए‘यही
चाहती हो न तुम।’
नहीं मैं यह नहीं चाहती हूं जो कानून कहता है वही करें आप , कानून के
बाहर आप न जांय, आपको मालूम है न कानून क्या कहता है, मुल्जिम पकड़ो, न
पकड़ में आए तो कुर्की करो, मुकद्मा तय करेगा अपराध और अपराधी , आप तय मत
करो ?
‘वही तो कर रहा हूं।’
नहीं ! आप अपनी सीमा से बाहर जा रहे हैं, व्यक्तिगत आग्रह है आपका इस केस
में , बनवारी बन रहे हैं आप , जबकि आप बनवारी नहीं हैं सिर्फ दरोगा हैं’
और दरोगा बने रहने की शर्तों का ही निर्वाह करना आप का काम है। बनवारी को
बनवारी की तरह सोचने दीजिए। राम हरख को राम हरख की तरह यही आपका काम है,
इसके अलावा जो भी करेेंगे आप सब कानून के बाहर होगा।
तुम्हारा दिमाग फिर गया है निशा ? मैं कोई मशीन नहीं हूं, मेरे दिल में
भी एक इंसान का दिल है, और वह धधक रहा है, सुलग रहा है, राम हरख के
लोन्डे ने गलत नहीं किया क्या,उसे दण्ड़ नहीं मिलना चाहिए क्या ?नहीं,
थाना दण्ड देने के लिए नहीं बना है और न ही कानून को विश्वास है कि थाना
दण्ड देने में सक्षम हो सकता है.... यह काम बनवारी ही कर सकता है,
और मेरे ख्याल से बनवारी को करना भी चाहिए।
राम हरख की कुर्की हो जाती है और अन्य मुल्जिमानों की भी। कुर्की का सारा
सामान विधायक जी के सुपुर्दगी में दे दिया जाता है, विधायक को अपने
नेतृत्व क्षमता पर संतोष हुआ। चौधरी राम हरख को भी दिए गए दस हजार रूपयों
का असर समझ में आ गया। कुछ दिनों बाद सभी मुल्जिमान हाजिर अदालत भी हो
गए, पैरवी ऊंची थी, जमानतें भी हो गईं और बनवारी-बनवारी ही रह गया।
कुछ पत्रकारों तथा क्षेत्र के लोगों ने दरोगा पर इस केस के बाबत इल्जाम
भी लगाया पर हुआ कुछ नहीं।
समय सब दबा देता है, दब गया यह मामला, बस्तुतः दब ही गया था। कुछ ही
महीनों बाद थाना क्षेत्र में हल्ला फैला कि चौधरी रामहरख का इकलौता बेटा
पीयूष , कहीं मार दिया गया जंगल में। पुलिस सक्रिय हुई, जांच की गई, लाश
पहचान लिया पीयूष के बाप चौधरी राम हरख ने, उनकी पत्नी ने भी। मुकद्मा
दर्ज हुआ बनवारी संदिग्ध मुल्जिम बनाया गया, उसकी
गिरफ्तारी हुई, उसने थाने पर साफ-साफ इनकार कर दिया, अपराध उसने नहीं
किया है, प्रत्यक्ष दर्शी गवाह भी नहीं थे। किन्तु गढ़ लिया चौधरी राम हरख
ने...... इतना ही नहीं दरोगा शिवचरन को स्थानान्तरित भी कर दिया गया
जिला बाहर, शिवचरन दरोगा अभी किसी थाने पर तैनात नहीं किए गए हैं बनवारी
जेल में है,बनवारी का पूरा परिवार गांव छोड़कर किसी अज्ञात ठिकाने पर चला
गया है।
शिवचरन दरोगा एकाधबार छद्म नाम से मिल भी आए हैं बनवारी से, बनवारी की
आंखें शिवचरन को देखते ही डब-डबा जाती हैं ‘मेरे कारण सरकार आपको बहुत’
कष्ट उठाना पड़ा, कुछ नहीं है सरकार मेरे पास जान है, हाजिर रहूंगा।
शिवचरन लौट आए थे लाइन में,-लाइन में हाजिरी’ लगाने के बाद अपने कमरे की
तरफ चले गए थे। निशा चिढ़ी हुई थी ‘कहां गए थे बनवारी के यहां न।’ ‘हां
बनवारी के यहां ही।’ ‘शिवचरन’ को अजीब किस्म का लगने लगा है यह घर, जेल
से भी बदतर, यहां के कायदे-कानून अलिखित होते हुए भी कितने खतरनाक हैं,
कदम-कदम पर।
बिना सेना-पुलिस के भी कितनी चुस्त है यहां की व्यवस्था, थोड़ी सी
अनुशासनहीनता से भी उखड़ सकती हैं रिश्तों की दीवारें। निशा सोने दो, नींद
लग रही है, सूरज उगने के पहले मत जगाना, अच्छा है अन्धेरों में आंखें मूद
लेना, शिवचरन सो जाते हैं, कब उठेगें या सूरज उगने के बाद जगाएगी उनकी
पत्नी निशा, क्या मालूम। आखिर क्या है निशा का पक्ष, औरत के हक में, या
परिवार के। शिवचरन सो जाते हैं...... अगली सुबह तक।
स्वाती अंक 6, वार्षिकांक
दोस्त की चन्द्रकान्ता
लड़कियां सर्र से गुजरीं , थोड़ा ठमकीं, ठमक कर आगे बढ़ गईं। उतना आगे जितना
वे पीछे छूट गए थे। लड़कियों की गन्ध भी पीछे छूट गई थी जिसे वे संूघ रहे
थे खुश गवार सुबह में वे उबड़-खाबड़ रास्ते पर धूल बचाते हुए चल रहे थे।
धूल चारों ओर अटी पड़ी थी। पैर की धापों के साथ उड़ा भी करती थी। गायों,
भैंसों, बैलों को धूल उड़ने की चिन्ता न थी वे या तो पत्ते चबाने में लगे
थे, या पगुराने में मस्त थे लेकिन वे चिन्तित थे कि धूल कपड़ों का रंग बदल
रही है तथा चेहरा कुरकुरा हो रहा है पर कोई विकल्प न था, उन्हें तो
रास्ता तय करना ही था।
दोस्त के साथ चलते हुए देवनाथ ने सोचा कि दोस्त लड़कियों की गन्ध के बारे
में सोच रहा होगा तथा कोई नतीजा निकल रहा होगा कि वे कैसी हैं ? यदि ऐसा
नहीं तो शहर की लड़कियों से मिलान कर रहा होगा तथा स्पष्ट अन्तरों के बारे
में गुन रहा होगा लेकिन नहीं दोस्त इन जंगली लड़कियों के बारे में न सोच
रहा होगा। केवल वह खुद सोच रहा है क्योंकि उसका जंगल-पहाड़ तथा इस आबो-हवा
से पीढ़ियों का रिश्ता है।
दोस्त का रिश्ता इस इलाके से कुछ भी नहीं। वह तो चन्द्रकान्ता टी.वी.
सीरियल देखकर आया है कि विजयगढ़ किला देखा जाय जिसके आस-पास मेरा मित्र
रहता है।
दोस्त विजयगढ़ किला देखने आया है खास तौर से वह निवास जिसमें चन्द्रकान्ता
अप्रतिम शैली में अपनी रातों को गुजारा करती थी। दोस्त की सोच है कि
चन्द्रकान्ता की अद्भुत जीवन शैली की, खंडहर हुई खूब सूरती शायद वहां कुछ
बची हो। ईटों, पत्थरों, ढ़ोकों, दीवारों ने चन्द्रकान्ता की संगमरमरी देह
की गन्ध, जो उस जमाने में संूघा होगा, पिया होगा वहां कुछ भी तो बचा
होगा।
देवनाथ ने बाएं मुड़कर दोस्त का चेहरा देखा जिस पर रास्ता चलने की थकान
थी, वहां चन्द्रकान्ता की कल्पनाओं की गन्ध न थीं। धूप से दोस्त का चेहरा
कुंभलाने लगा था कुछ देर पहले दोस्त ने जो पान खाया था उसका कत्थईं रंग
होठों पर जमकर एक भद्दी पर्त जैसा हो गया था। दोस्त का चेहरा देखकर समझना
मुश्किल था कि वह क्या सोच रहा होगा ?
दोस्त से अलग होकर देवनाथ ने नजरों को उस तरफ फोकस किया जिधर वे दोनों
लड़कियां गड्ड-मड्ड हुई एक चौडे़ विशाल चट्टान पर पूरी तरह निश्चिन्त बैठी
थीं। वह लड़कियों का तात्कालिक यथार्थ था जो अभिव्यक्त हो रहा था कि वे
गड्ड़-मड्ड बैठी हुई थीं जो दूर से किसी अश्लील जुडवा आकृति की तरह दीख
रहीं थीं।’’
लड़कियों की यह अश्लील जुड़वा आकृति दोस्त को निश्चित रूप से अपनी ओर खींच
रही होगी तथा दोस्त अभिनय कर रहा होगा कि वह लड़कियों के प्रति अनासक्त है
- उसने सोचा तथा दोस्त को तजबीजने लगा -
दोस्त फिर भी तटस्थ बना रहा कुछ ऐसा कि उसे कुछ भी नहीं आकर्षित कर रहा-
पेड़, पौधे, झाड़ियां, छोटे-बडे़ चट्टान, घुमावदार, ऊबड़-खाबड़ रास्ते- सामने
के ऊंचे-ऊंचे काले-काले से दीखने वाले पहाड़, अगल-बगल की खाइयां आदि लेकिन
नहीं, प्रकृति इतनी समर्थ होती है कि किसी को भी प्रभावित कर लेती है।
दोस्त आधुनिक जीवन शैली का बुद्धिजीवी है तथा अनुभूतियों को पर्दे में
छुपाकर रखने में माहिर। वह बहुत कुछ छिपाकर भीतर रख सकता है जिसकी
प्रतिक्रियाएं कभी भी चेहरे पर न दिखेंगी। वह माहिर नही होता तो उसके
भीतर बैठा हूकूमत कर रहा तानाशाह हमेशा बाएं-दाएं क्रिया करता रहता ,
प्रतिक्रिया हीन नहीं रह पाता ।
निश्चित रूप से सर्र से गुजरने वाली लड़कियों ने दोस्त को प्रतिक्रियाओं
से बांधा होगा, तथा दोस्त ने प्रतिक्रियाओं को दमित किया होगा। हो सकता
है कि दोस्त ने प्रतिक्रियाओं को कोई कोड भाषा दी हो जिसका सीधाअर्थ हो -
‘‘मादक, उत्तेजक, बेधक, खूबसूरत’’ होती हैं लड़कियां जिन पर शहर या जंगल
के प्रभाव नहीं पड़ा करते , पर कोड भाषा समझना सबके वश का नहीं।
देवनाथ को दोस्त के चेहरे की कोड भाषा समझ में न आई। उसने लड़कियों की तरफ
देखा जो चौडे़ चट्टान से उठ गयी थीं तथा किले वाले रास्ते पर सीधे पश्चिम
की ओर चल रहीं थीं। वह रास्ता किले वाली मुख्य पहाड़ी के ठीक नीचे था जो
एक खतरनाक घुमावदार मोड़ से जुड़ा था। मोड़ से ही किले से कुछ दूर तक सीधी
चढ़ाई थीं, लड़कियां घुमावदार मोड़ से पहले थीं, नहीं तो न दिखतीं।
लड़कियां अलसाई चाल से चलती हुई दीख रही थीं जैसे वे अपना चलना महसूस
कराना चाह रही हों कि उन्हें पीछे चलने वाले महसूसें तथा किसी आकर्षक
कल्पना में डूब जाएं।
लड़कियों के यथार्थ एवं कल्पना के द्वन्द में दोस्त कहीं न था उसने सोचा
तथा सोच को विश्लेषित करने लगा तो उसे महसूस हुआ कि लड़कियां अपने यथार्थो
के साथ उसके लिए कल्पनाएं बन गयी हैं। कल्पनाएं जीवन की कविता होती हैं,
जिससे व्यक्ति जीवन को गतिशील बनाए रखता है।
दोस्त सफल कवि है, इसलिए गतिशील होगा ही, देवनाथ ने सोचा तथा दोस्त को
कुरेदा ‘‘दोस्त! हम खामोश क्यों हैं ? कहीं पैदल यात्रा की कष्टकर थकान
ने हमारे वार्तालापों को छीन तो नहीं लिया ? वैसे शायद हमें
भीतर डूबने की
कला नहीं आती’’ दोस्त के पपड़ियाए होठ हिले जिससे गंभीर मुस्कुराहट निकली
तथा चबा-चबा कर कहा गया प्रति उत्तर भी।
‘‘नहीं साथी! यदि मुझे भीतर डूबने की कला आती तब भी क्या है ऐसा, जिसे
डुबाता, भीतर तो पहले से ही तूफान हैं जो काबिज हैं। तुम जानते हो उनसे
निपटना मेरे वश का नहीं। मैं कुछ कर नहीं सकता सिर्फ सोच सकता हूं। कैसी
भी बारीक सोच हो रोटी नहीं होती साथी।
‘‘ रोटी भी तो एक सोच है दोस्त! ’’ देवनाथ ने कहा
दोस्त थोड़ा रूका फिर गंभीर होकर बोला-
रोटी भी एक सोच होती है उसके लिए जो रोटियां , खाकर ,फेंक कर सोचते हैं
लेकिन वे जिन्हें रोटियां उपलब्ध नहीं, अभाव, गरीबी, अस्मर्थता के कारण
उसके लिए रोटी ही सोच होती है, दर्शन होती है, पूरी दुनिया भी शायद।’’
दोस्त की गंभीरता उसे बे वक्त लगी। उसने दोस्त को टोका
‘‘दोस्त ! गंभीरता हर वक्त ओढ़ने-बिछाने की चीज नहीं, न ही कोई तकिया
कलाम, हम खुद को बहलाना नहीं जानते शायद। हमें खुद को बहलाना चाहिए कि
नहीं ’’
दोस्त को टोकते हुए देवनाथ ने दोस्त को देखा, कि दोस्त गंभीरता छोड़कर
बहलना चाहता है कि नहीं। दोस्त ने तभी किसी गंभीर कविता का मुखड़ा कहा,
भले ही वह कोई कविता पंक्ति न रही हो पर उसे यही महसूस हुआ-
‘साथी! चीजों को समझने व महसूसने तद्नुसार अर्थ निकालने का फर्क होता है,
एक तरह से देखो तो गंभीरताएं भी बहलाने का ही काम करती हैं। एक गंभीर
चिन्तक दूसरे गंभीर चिन्तनों को उत्पादित करता है। आलोचना के जरिए या
रचना के।
देवनाथ ने महसूसा कि दोस्त से घुमावदार बातें, नहीं करनी चाहिए। दोस्त
बातों के घुमावदार मोंडों पर न केवल रेंग सकता है वरन् सरपट दौड़ भी सकता
है इसलिए उसने दोस्त को बातों के घुमावदार मोड़ों से हटाने की चेष्टा से
कहा-
‘‘दोस्त ! अभी कुछ देर पहले सर्र से गुजरी जंगली लड़कियों को , क्या तुमने
नहीं देखा?’’ ‘‘ देखा था। ’’ दोस्त ने सहजता से कहा । कुछ देर बाद जब
दोस्त ने उसे चुप एवं गंभीर देखा तब कहा-
‘‘साथी । जानते हो उन्हें देखा ही नहीं वरन् अब भी देख रहा हूं कि वे
कितनी निश्छल हैं- पूरी तरह प्राकृतिक , जंगलों, पहाड़ों की तरह उगी
हुई’’।
दोस्त आखिर सूक्तियां बोलकर क्या समझाना चाहता है? एक वैचारिक चिन्ता ने
उसे उलझा दिया फिर भी देवनाथ ने कहा-
हां दोस्त ! वे अवश्य ही निश्छल हैं, यकीन मानो मैं उन्हें पवित्र निश्छलता
से ही देख रहा हूं, क्या तुम डिग रहे हो, इनमंे तुम चन्द्रकान्ता तो नही
तलाश रहे हो?’’
‘‘हां साथी मै ही नहीं तुम भी डिग चुके हो ये चन्द्रकान्ता से कमतर नहीं
दोस्त ने कहा तथा तेज-तेज चलने लगा- देवनाथ को दोस्त रहस्यों से भरा लगा,
जिसे सूक्तियों का निर्माता भी कहा जा सकता है लेकिन व्यापारी नहीं
क्यों कि दोस्त व्यापार कर ही नहीं सकता था, नहीं तो उसकी सूक्तियां जो
मंत्र जैसी हुआ करती हैं, बिक रही होतीं तथा दोस्त माला-माल हुआ होता।
दोस्त सूक्तियों का अन्तर्राष्ट्रीय बिक्रेता व निर्माता होता तथा मौजूदा
राजनीतिक उठा-पटक में दोस्त की निर्णायक एवं प्रभावकारी भूमिका होती।
देवनाथ को लगा कि दोस्त लड़कियों के प्रति उसका डिगना समझ चुका है किसी
ज्योतिषी की तरह तथा अपनी समझ को पुष्ट करने के लिए , खुद को डिग जाना
स्वीकार रहा है। दोस्त किसी तरह खुद पर ओढ़े गये पर्दे से बाहर हो उसने
विश्वास पूर्वक कहा-
‘‘नहीं दोस्त ! तुम डिग नहीं सकते’’
दोस्त चुप रहा, फिर अचानक हंसने लगा जैसे वह सिर्फ हंसने के लिए बना हो
तथा यह भी कि वह हंसने का कुशल रियाजी हो। देवनाथ को लगा कि दोस्त के साथ
उसे भी हंसना चाहिए, सही मैं जाने कहां से हंसी आई कि वह दोस्त की तरह
हंसने लगा बल्कि उससे बढ़-चढ़कर, जैसे दोस्त की हंसी दबाना उसके लिए जरूरी
हो।
दोस्त की हंसी रूकते ही उसकी हंसी थम गई। दोनों ने एक दूसरे को देखा वहां
हंसियां न थीं। उसने अपनी आंखे झुका लीं। यह मानकर कि दोस्त उसकी कमियां
पकड़ लेगा जब कि दोस्त अपनी कमियों को बताना चाह रहा था इसलिए उसकी ओर देख
रहा था-
‘‘साथी! वैसे मैं लड़कियों के प्रति कुछ एक बार ही डिगा हूं, गिरा हूं पर
जाने क्या है कि सदैव डिगा हुआ ही महसूसता हूं तथा कोशिश करता हूं कि
मेरी इस बिमारी को कोई दूसरा न जान ले। दोस्त ने अपने बारे में बताया तथा
दुबारा हंसने लगा। -
दोस्त की स्वीकारोक्ति उसे अच्छी लगी। वैसे भी व्यक्ति की स्पष्टवादिताएं
उसे प्रभावित करती हैं।देवनाथ ने दोस्त को संबोधित किया दोस्त। उधर देखो
लड़कियां घुमावदार मोड़ की तरफ जा रही हैं। लगता है उन्हें भी किले पर ही
जाना है। वही एक मात्र रास्ता है जो किले तक पहुंचता है वैसे रास्ता तो
खिड़की की तरफ से भी है लेकिन वह चढ़ने में खतरनाक तथा भयावह है। घुमावदार
मोड़ के बाएं दाएं दो पगडंडियां थीं। दाएं वाली पहाड़ी पहाड़ के किसी गांव
तक जाती थी। इस दो राहे के पास, ठीक बाईं तरफ एक भयानक खाईं थी तथा उसके
बगल में दो तीन बड़ी चट्टाने आपस में ऐसी
गुत्थम गुत्था थीं जो किसी गुफा का आभास करा रहीं थीं। ऐसी गुुफा जिसमें
आदिमानव रहा करते थे तथा उनका जीवन शिकारी था। वे घुमन्तू थे तथा
आवास बनाने एवं अपने लिए खाद्य सामाग्री उपजाने की कला से अज्ञान। वे
इक्कीसवीं शताब्दी के लिए मनुष्यों के रूप में जंगली पशु थे जो पशुओं से
की जाने वाली तुलनाओं को समाप्त होने की कामना रखते थे। दो राहे पर की
खाईं तथा वे चौडे़-चौडे़ विशाल पत्थर जो गुफा की आकृति निर्मित कर रहे
थे, उनका स्थानीय दन्त कथाओं में काफी महत्व था।
उक्त खाईं तथा पत्थर पूज्यनीय थे, फलस्वरूप वहां अषाढ़ के तीसरे दिन
स्थानीय मेला लगता था सुरहिया मेला के नाम से। सुरहिया नाम की कोई जवान
अविवाहित लड़की थी जो पास के ही गांवों की रहने वाली थी। सुरहिया वस्तुतः
किस गांव की थी यह किसी को नहीं मालूम। इधर के सभी गांव वाले सुरहिया को
अपने गांव का ही मानते हैं और मेले में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, बिना
विचार किए कि सुरहिया आर्य थी या द्रविण। उस गुफा तथा खांई तक पहंुच कर
देवनाथ ने दोस्त को सुझाया कि दोस्त बाईं तरफ वाली खाईं तथा गुफा देखे-
‘‘दोस्त ! इस खाईं को देखो तथा कल्पना करो कि मृत्यु इस खाईं में ढकेल दी
जाए तो किस तरह से तड़प-तड़प कर मरेगी- इस गुफा को भी देखो ! आओ देखते हैं-
दोस्त उसकी ओर मुड़ा और गुफा की तरफ चला। गुफा नजदीक थी। वे दोनों गुफा
में घुसे तथा गुफा की भीतरी दीवारंें देखने लगे। दीवार के एक तरफ आड़ी
तिरछी लाल-लाल रेखाएं थी जो जानवर की आकृति जैसी लग रही थीं उस चित्रित
जानवर के ठीक पीछे रेखाओं के सहारे ही एक मनुष्य को रचा गया था जिसके हाथ
में भाला था। प्रथम द्रष्टया वह चित्र आखेट के दृश्य जैसा लगता था दोस्त
को यह चित्र अद्भुत लगा उसने कहा भी-
‘‘साथी!अदृभुत है यह तो।अभी रेखाओं के रंग चटख एवं ताजे हैं आखिर किस चीज
से गुफा मानवों ने इसे बनाया होगा ?क्या उन्हें रंग बनाने की समझ थी ?
दोस्त ने थोड़ा रूक कर कहा-
‘‘इसका मतलब है कि गुफा मानवों में कलात्मक अनुभूतियां थीं। निश्चित ही
वे सार्थक कल्पनाओं वाले यथार्थ मनुष्य रहे होंगे।
देवनाथ ने दोस्त का कहा सुना, पर कुछ गंूगा नहीं किया क्योंकि वह उस समय
उस गुफा चित्र को देखने में तल्लीन था। चित्र में आखेटक, मनुष्य के पीछे
कुछ और लोग थे। जो काफी पीछे थे और दूरी की अनुभूति कराने के लिए
उत्कृष्ट कला के अनुरूप उन्हें छोटा, छोटा चित्रित भी किया गया था।
यह उसे आश्चर्यजनक लगा उसने तुरन्त दोस्त से कहा-‘‘दोस्त !इन्हें देखो!
उस जमाने में कितनी सामूहिकता थी। आखेट ही प्रमुख क्या एक मात्र उद्यम था
जिसके निमित्त स्त्री, बच्चे, पुरूष सभी एक साथ उद्यत होते थे और आज’’
‘‘आज तो कुछ भी नहीं है साथी।’’ दोस्त ने गंभीर चिन्ता व्यक्त की, गुफा
से बाहर निकल कर अगल-बगल छितराए सामानों को देखते हुए दोस्त ने पूछा ‘‘
इस पहाड़ पर नारियल के छिलके , गुफा के द्वार पर लागए गये सिन्दूर या रोरी
के टीके यह सब किस लिए साथी’’
दोस्त के सवालों के उत्तर वह दन्त कथा है, है तो जाने किस काल की पर आज
भी वर्तमान है। सुरहिया एक नगरवासी बाला थी। तब से सभी पहाडी गांव नगर की
तरह हुआ करते थे, गांवों के निवासी किले के शुभचिन्तक , रक्षक कर्मचारी
या अधिकारी हुआ करते थे। उस जमाने में किले ही सामाजिक, राजनीतिक,
आर्थिक, सांस्कृतिक या औद्योगिक केन्द्र हुआ करते थे
गांवों के लोग किलों के शासकों के जाति के होते थे। लोग कहते हैं कि
सुरहिया के श्राप से ही किले का शासक किसी युद्ध में मारा गया था।
सेनापति जो शासक का सगा छोटा भाई था उसे तो ‘‘ वन देवता’’ ने उसी दिन मार
दिया था जिस दिन उसने सुरहिया का शील भंग करना चाहा था तथा उसे इसी गुफा
में दबोच लिया था। सुरहिया के पिता किले का मुख्य द्वारपाल थे। वह अपने
पिता से मिलने किले पर गयी थी। जब वापस लौटने लगी तब सेनापति ने उसे
रास्ता उतरते कहीं देख लिया था। सेनापति ने जब सुरहिया को देखा जो एक
सुगठित देह वाली खूबसूरत व जवान लड़की थी तथा अविवाहित भी- फिर तो सुरहिया
के शीलभंग की सेनापति द्वारा की जाने वाली पूरी कोशिश किसी चलताऊ सिनेमा
की तरह हो गई।
बहुत ही नाटकीय ढंग से ‘‘ वन देवता ! प्रकट हुए ! कथा कहती है कि सुरहिया
की चीखें ही शक्तिशाली , वन देवता बन गयीं। वन देवता नामक उस आघ्यात्मिक,
रहस्यमयी शक्तिशाली ने सेनापति का बध किया था तथा उसे इस खाईं में फेंक
दिया था। खाईं में से स्वतः आग के बादल उठे थे जिसमें सेनापति जलकर भस्म
हो गया था। सुरहिया सेनापति से लड़ते-लड़ते इसी गुफा में बेहोश पड़ी थी।
वन देवता ने सारे देवी-देवता, पशु-पक्षी, जड़-चेतन, पेड़-पौधों को साक्षी
मानकर इसी गुफा में सुरहिया से विवाह किया था तथा सुरहिया को तमाम दैवी
वरदानों से ओत-प्रोत किया था फिर तो सुरहिया किसी देवी सदृश्य हो गयी थी,
दैवी शक्तियों से लैश !
देवनाथ ने देखा कि दोस्त के चेहरे पर दन्तकथा का आश्चर्य सिकुड़ा पड़ा है
तथा दोस्त कुछ कहना चाहता है। वैसे दोस्त ने कुछ कहा नहीं -पूछा....
‘‘ तुम्हें दन्त कथाएं प्रभावित करती हैं क्या ?
‘‘ नहीं ! दोस्त ने आश्चर्य प्रकट किया तथा सवाल किया-
‘‘ और इतिहास।’’
‘‘वे तो विल्कुल ही नहीं, जो सिर्फ शासकों के किस्से बताते हैं तथा प्रजा
के बारे में खामोश रहते हैं।’’
दोस्त की नजरें देवनाथ पर एकटक थीं जैसे दोस्त ने कुछ सुना ही न हो या
सुना भी हो तो फिर कोई उलझा हुआ सवाल पूछना चाह रहा हो। हुआ भी यही।
दोस्त ने अविराम पूछा-‘‘ फिर हम विजयगढ़ किला देखने क्यों जा रहे हैं,
क्या तुम मेरा साथ भर दे रहे हो या तुम्हारा भी कोई साझा लक्ष्य है? हां
लक्ष्य तो है ही क्योंकि मैं समझना चाहता हूं कि किलों से जनता के रिश्ते
किस तरह के थे तथा अतीत के आदमी के पास दूसरे आदमी को मूर्ख बनाने तथा
लूटने की कैसी कला थी, आज की तरह या इससे भी धारदार एवं अजीब।कहते हुए
उसने लड़कियों की तरफ इशारा किया जो चढ़ाई वाले रास्ते पर कुछ दूर जाकर धूप
से बचने के लिए किसी छतराए सघन पेड़ के नीचे
बैठी हुई थीं। दोस्त ने लड़कियों को देखकर अनुमान किया-
‘‘कहीं वे किसी की प्रतीक्षा तो नहीं कर रहीं ?
हमारी ही तो नहीं! साश्चर्य देवनाथ ने कहा तथा रास्ते पर चलने लगा- दोस्त
बगल में था। दोनों जल्दी-जल्दी रास्ता नापने लगे जिससे पूरी चढ़ाई धूप के
परछाई हीन होने के पहले ही चढ़ी जा सके। अभी आदमी की सामान्य लम्बाई से
छोटी हुई परछाई जमीन पर पड़ रही थी। बारह बजने में दो घंटे बाकी थे। तथा
ठीक बारह बजे कड़ी से कड़ी धूप भी किसी की परछाई नहीं बना पाती। परछाई की
तरह तो वे लड़कियां थी जो बैठी हुई थीं इसलिए वे पास होती जा रही थीं। यदि
वे बैठी न होतीं चल रही होतीं तो उनका पास होना चल रहा होता फिर वह भाप
जो छनकर आ रही थी वह न आती सीधे आसमान पकड़ लेती। जमीन से निकलने वाली उस
भाप की तरह जो गर्मी के बाद पहली बारिस के कारण उपजती है। लड़कियां चढ़ाई
वाले रास्ते पर उन दोनों के लिए सवाल बन कर बैठी हुई थीं जिसका हल वे
अपने-अपने व्यक्तिगत अनुभवों से निकलने में लगे थे इस संभावना के साथ कि
शायद कोई हल ठीक-ठीक निकल जाय। पर हल निकलने के पहले ही वे स्वतः हल हुई
जा रही थीं’’
क्योंकि वे चुप-चाप बैठी हुई थी कुछ इस तरह कि वे किसी की प्रतीक्षा में
नहीं हैं। वह एक संकरा रास्ता था जिसके अगल-बगल छोटी-छोटी कटीली झाड़ियां
थीं, वहां से एक पंक्ति में दो आदमियों के साथ चलने पर फीट दो फीट की भी
जगह न बचती। इसी रास्ते पर बैठी हुई थी लड़कियां। वह छतनार, छायादार पेड़
लडकियों से तीन-चार फीट दूर था जो पहले उनके पास ही दिख रहा था। पहले तो
लड़कियां भी लाल-लाल कपड़ों से ढके हुए धोख की तरह दीख रही थीं पर समीप
होने पर उनका दिखना पूरी तरह साफ-साफ था , इतना साफ कि उनका पहनावा उनकी
उम्र, उनकी देह की अभिव्यक्ति इसी तरह कुछ दूसरी बारीक बातें भी साफ हो
चुकी थीं जो औरतों के प्रति पुरूषों के मन में पायी जाती हैं।
जैसे अब यह स्पष्ट दीख रहा था कि उनमें से एक लड़की किसी अंग्रेजिन की तरह
जैसे-तैसे साड़ी लपेटे हुई थी जो कम उम्र होने के साथ-साथ अबोध एवं मासूम
सी दीख रही थी निश्चित रूप से वह अविवाहित लड़की थी क्यों कि उसके माथे पर
सिन्दूर की लाइन या कि हाथों, गालों आदि पर गोदना न गुदे थे। उसके कान भी
खाली थे उनमें सींक की खपाचियां थी तथा नाक में चांदी पीतल या सोने की
कील की जगह कोई ठोस सी दिखने वाली कड़ी चीज थी, जो मैल जम जाने के कारण
गन्दी दीख रही थी। उस का रंग गाढ़ा सांवला था तथा चेहरे पर उदास चमक थी।
दूसरी वाली जो पहले लड़की सी दीख रही थी दूरी के प्रभाव के कारण पास होने
पर उसका दिखना स्वतः गलत हो गया अब वह वैसा नही दिख रही थी जैसा पहले दीख
रही थी। हलांकि दूर से भी उन्हें देखना कम आकर्षक या उत्तेजक न था पर एक
भ्रम की स्थिति थी कि वस्तुतः उनमें पुरूष मन को प्रभावित कर सकने वाली
क्षमता है कि
नहीं। सारे अनुमान गलत साबित हुए। दूसरी वाली भरी-पुरी, सुगन्धित देह
वाली जवान औरत थी- उसके छितराये बालों को विभाजित करने वाली सिन्दूर की
एक गाढ़ी लाइन थी। आंखें गहरे काजल के रंगों से ढकीं थीं जिनसे छनकर
पुतलियों का गाढ़ा काला हिस्सा चमक रहा था। होठों पर रात के थकान की
पपड़ियां जमीं थीं, जो न नहाने के कारण जस के तस थीं। बाहों पर गाढ़े गोदना
गुदे हुए थे जिनमें चमक थी पर भद्दे दीख रहे थे। हालांकि जंगली औरतों की
उम्र का अनुमान ठीक-ठीक नहीं हो पाता फिर भी वह औरत बीस साल से तो कम न
रही होगी। देखने में वह किकुड़ियायी सी तथा शर्म के मारे छुई-मुई सी दीख
रही थी कुछ ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर रही थी जिससे साबित हो कि वह अभिनय कर
रही है पर ऐसा न था। वह स्वतः अपने भीतर गुजरने वाली औरत थी हालांकि इस
तरह की औरतें अपवाद ही हुआ करती हैं।
अपवाद तो वहां मुंह बाए जंगल की हर सांस में थे कि आओ, हमें देखो, छुओ,
टटोलो, और एक ऐसी दुनिया की कल्पाना करो जो हमारे पुरखों की थी पर नहीं
तुम तो चन्द्रकान्ता की गन्ध पीने आये हो।
दोस्त लडकियों के बारे में सोच रहा था और देवनाथ अपने पुरखों के अतीत के
बारे में तथा यह भी कि ये लड़कियां अगर जंगल की न होतीं तो......
तभी दोस्त ने देवनाथ को संबोधित किया.....
साथी ! उधर दखो ! कितनी फुर्ती से दोनों लड़कियां किले पर चढ़ रही हैं
यही फुर्ती चन्द्रकान्ता में भी रही होगी न।
देवनाथ ने मुड़कर दोस्त का चेहरा देखा-चेहरे पर चन्द्रकान्ता की तलाश कीउद्विग्नता थी। ’’
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