रामनाथ शिवेंद्र की कहानियां चित्र कथा और वह कहानी संग्रह से



टिकट              

कोई भी घटना लम्बे समय तक जीवित नहीं रहती, सोनभद्र में तो खासतौर से किसी घटना की दो चार दिन से अधिक उमर नहीं होती। पहले के समयों में भी यहां कई तरह की दिल दहला देने वाली घटनांए हुई थीं जो अब शायद ही कुछ लोगों को याद हों। यहां होने वाली घटनांए अल्पकाल में मर जाती हैं और कुछ तो कानूनों के मकड़जाल में फसाकर मार दी जाती हैं।

खान वाली दुर्घटना जो अभी कुछ महीने पहले ही हुई थी, जिसमें बीस आदमी मारे गये थे और बाकी मृतकों का पता नहीं चल पाया था, वह भी अब किसी को याद नहीं। खान की खदानें चालू हो गयी हैं और खनन में कार्यरत मजूरों की सुरक्षा के तौर तरीकों में किसी भी तरह का बदलाव नहीं दिखाई दे रहा है। खनन का वही पुराना तरीका। कहा जाता है कि कोई भी चर्चा ज्यादा उमर लेकर नहीं आती। दूसरे स्थानों पर चाहे जैसा होता हो पर सोनभद्र में तो ऐसा ही होता है। आराध्या ने खुद को समझाया कि ऐसा तो होता रहता है, नक्सली हमले को लेकर उसे भावुकता का शिकार नहीं होना चाहिए, वह कर भी क्या सकती है? यह घटना भी कुछ दिनों में भुला दी जाएगी।

फिर आराध्या दूसरे कामों में लग गयी। मानसिक उथल पुथल के दौर में वह अपने डैड के आवास पर अवश्य जाती पर वह उनसे चिढ़ी हुई थी। देह के मामलों में आधुनिक विचारों वाली होने के बाद भी वह अपने डैड को क्षमा नहीं कर पायी थी। आधुनिकता उसे बदल नहीं पायी थी या दूसरे शब्दों में वह तन की शुचिता को लेकर पुरानी सोच वाली ही थी, जबकि दूसरे मामलों में वह पुरातनता से अलग थी।

आराध्या ने एक दिन तो खुद का सवालों के घेरों में खड़ा कर लिया। ‘उसे अपने डैड के चेहरे पर कथित शुचिता का लेप नहीं लगाना चाहिए। उसने खुद क्या किया? वह भी तो अपने मित्रा के साथ बहने लगी थी, उस समय उसके मन की शुचिता कहां गयी थी? उस दिन उसने खुद को क्यों नहीं संभाल लिया। अन्तःमन की कामुक स्वस्फूर्तता ने उसे दृढ़ नहीं रहने दिया था और वह देह जनित अतिरेकों में गोते लगाने लगी थी, कभी देह के पार तो कभी देह के भीतर। इस आर-पार की लड़ाई में वह उलझ गयी थी। अगर डैड भी अपनी  शिष्या के साथ देह के  कौतुकों में गोते लगा रहे हैं तो क्या हो गया, तन तो वैसे भी तनेन होने पर मन की नहीं सुनता।

इस तरह से शायद वह खुद को विश्लेषित नहीं करती अगर उसका मित्रा घर पर होता। घर में वह अकेली थी और अकेले में वह का करती, खुद को कहां डुबोती? उसका मित्रा दो दिन बाद घर लौटा, उसके हाथ में पारटी का टिकट था। वह खुश खुश था।

आराध्या भी खुश खुश थी। मित्रा के हाथ में चुनाव का टिकट देख कर        आराध्या झूमने लगी। चलो एक काम तो हुआ...

उसका मित्रा टिकट तो पा गया था पर आज के समय के अनुसार चुनाव खर्च का प्रबंध वह कैसे करेगा सो उसका मित्रा चिन्तित था। उसके मित्रा को पता था कि कम से कम पचास लाख रुपयों का खर्च लगेगा चुनाव में, इससे कम नहीं। अपने स्तर से बहुत करेगा तो वह दस पांच लाख खर्च कर सकता है, पर उसके आगे के खर्चों के लिए वह क्या उपाय करेगा?

आराध्या को पता था कि आज के समय में किसी वोट बैंक वाली पारटी का टिकट पाना भी जीत ही है, कम से कम सोनभद्र में तो टिकट पा लेना ही जीत माना जाता है। असल में ऐसा है भी। पूरे प्रदेश में कुछ ही तो पारटियां है जिनकी अपनी अपनी जनता है, एक ऐसी जनता जो ऑखें मूंद कर पारटी के उम्मीदवार को वोट देती हैं। वह जनता किसी दूसरी पारटी में यकीन नहीं करती, उन्हें लगता है कि वे अपने  आराध्य की तलाश कर चुके हैं, अब उन्हें किसी दूसरे आराध्य की जरूरत नहीं। आज के समय में राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां प्रत्याशियों की योग्यता नहीं परखी जाती, पारटी परखी जाती है, उनकी पारटी का कोई भी प्रत्याशी हो, वे उसे ही वोट देंगे।

आराध्या का मित्रा भी टिकट पा कर खुश खुश था। उसे तो पहले शक हो गया था कि संभव है उसे टिकट ही न मिले। वह अन्य टिकटार्थियों की तुलना में आर्थिक रूप से कमजोर था। अन्य जो थे वे काफी समर्थ थे। वे खुद चुनाव का खर्च तो संभालते ही पारटी कोष में भी काफी रुपया भी देते। ऐसे लोग भी टिकट के पैनल में थे।

पारटी के मुखिया ने आराध्या के मित्रा को परखा था...

‘क्या तुम्हें लगता है कि यह सीट तुम निकाल लोगे?’

‘हां सर! मुझे लगता ही नहीं, पूरा यकीन भी है कि यह सीट मैं निकाल रहा हूं।’

‘तुझे कैसे लगता है कि सीट तूं निकाल रहे हो, तुम्हारी विरादरी तो वहां मुश्किल से पन्द्रह बीस हजार होगी और दूसरी बिरादरी में तुम्हारा कोई दखल नहीं, यह बताओ
कि अगर तुझे पारटी का सहयोग नहीं मिले तो कितना वोट पा सकते हो?’

‘पिछले चुनाव में तो मैं तीसरे नंबर पर था सर! उससे साफ जाहिर है कि मुझे सभी जातियों का समर्थन मिला था।’

पारटी का मुखिया पिछले चुनाव का आंकड़ा देखने लगा। आराध्या का मित्रा तीसरे नंबर पर ही था।

‘हां तुम तीसरे स्थान पर थे, पर पिछली बार चुनावी परिस्थितियां कुछ दूसरी थीं। तत्कालीन सरकार की पारटी से लोग नाराज थे, इस बार ऐसा नहीं है।’

‘वैसा ही है सर!। मौजूदा सकार ने जनता के लिए किया ही क्या है? केवल एक जाति के विकास का ही तो मुद्दा रहा है उनके पास। तमाम घोटालों में फसी सरकार के पास अब वह जनता कहां जो उसे चुनाव जिता दिया करती थी।’

‘वैसे एक बात है तुम्हारे सोनभद्र में, वामउग्रवादियों की भूमिका भी कम नहीं होगी, जंगल वाले परिक्षेत्रा तो उनके अनुसार ही वोट करेगा। वे किसका साथ देंगे, इसके बारे में तुमने कुछ सोचा है क्या?’

‘हां सर! वामउग्रवादी वैसे तो सोनभद्र की राजनीति को कभी प्रभावित नहीं कर पाये हैं, वे केवल जंगल तक ही सिमटे और सिकुड़े हुए हैं फिर भी उनके राजनीतिक प्रभाव की अनदेखी नहीं की जा सकती। उनके बारे में मेरी राय है सर! कि वे सरकारी पारटी के उम्मीदवारों का समर्थन नहीं करेंगे।’

‘ऐसा कैसे बोल सकते हो तुम!’ पारटी मुखिया ने पूछा...

‘ऐसा मैं इस लिए बोल रहा हूं सर! कि जंगल के आदिवासियों व वनवासियों को नये वन अधिनियम के तहंत जमीन दिए जाने का प्रस्ताव था, उस प्रक्रिया में बहुत ही धांधलियां की गई है। सही ढंग से पात्रा व्यक्तियों को जमीनों का आवंटन नहीं किया गया है। जमीन देने के बजाय आदिवासियों की जमीनें छीन ली गईं। जिनके कब्जे में चार, पांच बीघे जमीन थी, उनसे जमीन छीन कर केवल पन्द्रह बीस बिस्वे का उन्हें पट्टा दिया गया है। अब आप ही सोचें कि उन्हें जमीनें कहां दी गईं, उनकी जमीनें तो छीन ली गईं। ऐसी हालत में जंगल के लोग सरकारी पारटी को भला वोट कैसे देंगे?

‘हां तेरी बात में दम है और वामउग्रवादी क्या करेंगे, क्या वे अपना कोई उम्मीदवार चुनाव में उतारेंगे? क्या अनुमान है तेरा?’

‘मुझे तो जान पड़ता है कि वे अपना उम्मीदवार चुनाव में नहीं उतारेंगे, वे चुनाव पर यकीन नहीं करते, केवल निगरानी रखते हैं और अपने विचारों से मिलते जुलते प्रत्याशी का समर्थन करते हैं।’

‘तो क्या उनका समर्थन तुम्हें मिल सकता है?’ आराध्या के मित्रा से पूछा पारटी के मुखिया ने...

‘अभी पक्का तो कुछ भी नहीं कहा जा सकता, पर मैं कोशिश कर सकता हूं। शायद मुझे सफलता भी मिले।’

लम्बे साक्षात्कार के बाद आराध्या के मित्रा को पारटी का टिकट मिल गया।

टिकट पाकर वह खुश हो गया पर उसे चिन्ताओं ने घेर लिया। चुनाव में कम से कम पचास लाख का खर्चा है, वह कैसे जुटाएगा इतना रुपया। े दस पन्द्रह लाख ही जुटा सकता है वह इससे अधिक नहीं। हो सकता है कि पारटी भी कुछ खर्च दे दे पर पारटी कितना देगी, पारटी तो दो चुनावों में सरकार से बाहर रही है। उसे लगातार दो बार हार झेलना पड़ा है।

जिले में बड़े बड़े विश्व स्तर के कारखाने हैं पर वे उस पारटी वालों को रुपया देते है जिसकी केन्द्र में सरकार होती है, प्रान्त स्तर की पारटियों को तो कारखाने वाले घास तक नहीं डालते, बहुत खुश हुए तो दस बीस हजार दे देंगे और कारखाने में घाटा होने का बहाना बना देंगे। इससे अधिक नहीं दे सकते। उनके यहां कारपोरेट सामाजिक दायित्व का कोई मतलब नहीं।

कारखाना वालों से रुपया निकालना बहुत बड़ी कला है, यह कला सभी को नहीं आती। केन्द्रीय सरकार की पारटी के लोग इस मामले में बहुत कलाकार होते हैं। वे चन्दा उगाहने के पहले कारखाने को कानूनी खेलों में फसा दिया करते है, उनकी जांच वगैरह करवाने लगते हैं, कभी अवैध खनन का मुद्दा उठा देते हैं तो कभी प्रदूषण का। किसे नहीं पता कि गड़बड़ी तो कारखाने वाले करते ही हैं। एक तरफ जांच दूसरी तरफ चन्दा... फिर तो उन्हें भरपूर चन्दा मिल जाता है। ऐसी कलात्मक ताकत किसी दूसरी पारटी में नहीं होती सो उन्हें चन्दा भी नहीं मिलता।

आराध्या का मित्रा घर आने पर चुनाव की गणित के बारे में गुनने लगा जो करीब करीब उसकी सोच के अनुकूल थी। कई खानों में बटे समाज को एक सूत्रा में       बांधना, उनसे वोट हासिल करना, आसान काम नहीं था। हालांकि उसने क्षेत्रा में काम किया था और वह लोकप्रिय भी कम नहीं था पर था सवर्ण, और वोट था कि वह पिछड़ी और अनुसूचित जातियों में अटका पड़ा था। इसी लिए उसने उस पारटी से टिकट लिया था जो सर्वजन का नारा लगाती थी जबकि गरीब तथा बेवश समझते थे कि सर्वहारा का नारा लगाने वाली पारटी उनकी है। सो जनमत तो उसके साथ था ही। वैसे भी सवर्णांें के मत का प्रतिशत होता ही कितना है?

सर्वजन की पारटी का नारा ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’, काफी लोकप्रिय था। आराध्या का मित्रा भी इस नारे को जादुई नारा मानता था पर यह नारा हकीकत कब बनेगा इस सवाल का उत्तर उसके पास नहीं था।   संसाधन के सवाल पर उसे मालूम था कि एक ईंच भी भूमि खाली नहीं, जिसपर किसी का स्वामित्व न हो, कहीं रोजगार नहीं, न ही रोजगार के अवसर हैं फिर संसाधनों पर बराबरी के दर्जे पर कैसे हिससेदारी हो सकती है?

ऐसा संभव नहीं है, आराध्या का मित्रा खुद को समझाता है, बिना कानूनी परिवर्तनों के ऐसा हो ही नहीं सकता। दिल्ली से लौटने के बाद उसने कार्यकर्ताओं से मिलने और चुनावी रणनीति बनाने के लिए एक मीटिंग बुला लिया था। पारटी

का जिलाध्यक्ष भी उसके साथ था। यह उसके लिए हितकर था न हीं तो पारटी      अध्यक्ष प्रकारांतर से उसके लिए संकट खड़ा कर सकता था।

कार्यकर्ताओं की मीटिंग एक सप्ताह बाद होनी थी। इस दौरान वह क्षेत्रा भ्रमण करने लगा था। सात दिन के भीतर ही उसने अपने क्षेत्रा का दौरा कर लिया था। जैसा कि होता है जनता किसी को भी निराश नहीं करती, सभी को समर्थन देने का वादा करती है पर वोट देते समय अपने मन का करती है। वह इस सचाई को जानता था और वह सावधान था इसी लिए वह उन्हीं जगहों पर जाता था जहां उसका वोट निश्चित था। वह जानता था कि जो अपना वोट है उसे न टूटने देना और जो अपना वोट नहीं है उसे हासिल करने की कोशिश ही चुनाव में जीत दिला सकती है। पिछले चुनाव के अनुभवों ने उसे चुनावी मामलों में चतुर बना दिया था। वह अपना कदम फूंक फूंक कर रख रहा था। उसने तो आराध्या के लिए भी योजना बना लिया था।

वह कभी भी चुनाव क्षेत्रा में आराध्या के साथ नहीं जाएगा, आराध्या को अकेली भेजेगा। पारटी का वैसे तो महिला संगठन भी था पर वह नाममात्रा का और कागज पर ही था, समाज में उसकी सक्रिय भूमिका नहीं थी। उसने आराध्या को उसकी जिम्मेवारियां समझा दिया था, वैसे भी आराध्या को क्या समझाना था। वह तो खुद ही परिपक्व थी और क्या करना है क्या नहीं करना है इस बाबत निर्णय लेने में समर्थ थी। आराध्या ने खुद को इतना तैयार कर लिया था कि क्षेत्रा की महिलाओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकती थी।

ठीक सातवें दिन पारटी कार्यकताओं की मीटिंग नगर के प्रेक्षागृह में प्रारंभ हो गयी। और उसी दिन नगर में वामउग्रवादियों का एक पर्चा भी नगर की दीवारों पर चस्पा दीखने लगा जिसमें कामरेडों ने चुनाव के बहिष्कार के बाबत लिखा था। कामरेडों के इस पर्चे को मीटिंग में पढ़ा गया और उसकी निन्दा की गयी।

उस पर्चे के विरोध में एक राजनीतिक प्रस्ताव भी पास किया गया और लोकतंत्रा को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए नागरिक समाज के लोगों को आगे आने का आह्वान भी किया गया। पर्चे के विरोध में मीटिंग में भाग लेने वाले पारटी जन काफी आक्रोश में आ गये। सभी ने वामउग्रवादियों की अराजक गतिविधियों की सख्त निन्दा किया।

आराध्या का मित्रा घबराया हुआ था उसे तो चुनाव की रणनीति बनानी थी और क्षेत्रों के लिए अलग अलग जिम्मेवारियां अलग अलग लोगों में बांटना था पर वहां तो माहौल ही गरम हो गया। वामउग्रवाद से समाज को बचाने की चिन्ताओं में सभी गोता लगाने लगे और भूल गये कि मीटिंग का एजेण्डा क्या था?

मीटिंग के दौरान वामउग्रवाद का सवाल किसी भूकंप की तरह आया और सभी को हतप्रभ कर गया। सभी चौक गये...हो क्या रहा है?

उन लोगों के सामने कई तरह के सवाल थे अगर वामउग्रवादी वास्तव में चुनाव

का बहिष्कार कर देते है फिर तो जंगल के क्षेत्रों में चुनाव प्रचार के लिए जाना भी मुश्किल हो जाएगा। वे कभी भी घात लगाकर हमला कर सकते हैं। इसका मतलब यह होगा कि उनका समर्थन हासिल करने के लिए प्रयास करना चाहिए। अगर उनका समर्थन हासिल नहीं किया जा सका फिर तो चुनाव परिणाम के बारे में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। इतना तो लागों को मालूम है ही कि वामउग्रवादी अपने किसी प्रत्याशी को भले ही चुनाव में जीत न दिला सकें पर वे किसी को भी हराने में सक्षम तो हैं ही। उनके बढ़ती लोकप्रियता को सामान्य रूप से खारिज नहीं किया जा सकता।

आराध्या का मित्रा जानता था कि चुनाव जीतने के लिए वामउग्रवादियों का खुला न सही पर मौन समर्थन बहुत ही आवश्यक है। वामउग्रवादियों का समर्थन कैसे मिलेगा, इसके लिए कौन प्रयास कर सकता है, वह सोच में पड़ गया। अचानक उसके दिमाग में आराध्या का नाम उभरा...

आराध्या वामउग्रवादियों तथा मुख्यधारा के लोगों के बीच पुल का काम कर सकती है, उसके रिश्ते एक प्रमुख कामरेड से हैं, जानने को तो वह भी उस कामरेड को जानता है पर केवल जानने से उसका समर्थन हासिल नहीं किया जा सकता।

उस कामरेड का वामउग्रवादियों की जमात में बड़ा नाम है पर वही उस जमात का सब कुछ नहीं है। उस जमात को तो बंगाल तथा आन्ध्र के प्रबुद्ध वामउग्रवादी चला रहे हैं। उनसे सहयोग हासिल करना तो दूर की बात है मिलना भी मुश्ष्किल है और जाहिर है बिना उनसे मिले सहयोग के बारे में किसी भी तरह की राय नहीं बनाई जा सकती।

वैसे भी वामउग्रवादियों ने जो अभी हाल में हमला किया है उसके कारण वे अपने सुरक्षित ठिकानों पर होंगे। उन्होने जन संपर्क से खुद को अलगिया लिया होगा। उक्त कामरेड भी किसी सुरक्षित ठिकाने की ओर चला गया होगा। उससे मिलना भी असंभव होगा। वामउग्रवादियों में एक खास बात होती है वे जिससे मिलना चाहते हैं मिल लेते हैं पर उनसे कोई मिलना चाहे तो वह किसी भी तरह से नहीं मिल सकता, उनका पता ठिकाना ही नहीं मालूम हो पाता।

आराध्या का मित्रा कार्यकर्ताओं की मीटिंग के बाद आराध्या के साथ घर चला आया। मीटिंग की कार्य सूची में तमाम काम ऐसे थे जिस पर राय नहीं बनाई जा सकी थी। सो उसने तय किया कि अगले सप्ताह एक दूसरी मीटिंग करनी होगी और कार्यकर्ताओं को चुनाव से संबधित कार्यो की जिम्मेवारियां सुपुर्द करनी होगी।

मीटिंग में उपस्थित कार्यकर्ताओं की एकजुटता देख कर आराध्या खुश खुश थीकृउसने अपने मित्रा से कहा भी...

‘मित्रा एक बात है कि हमारे कार्यकर्ताओं में मौजूदा चुनाव को ले कर काफी जोश है और अगर इस जोश को कायम रखा जा सका तो चुनाव जीतना मुश्किल नहीं होगा’

‘लगता तो ऐसा ही है फिर भी हम लोगों को बहुत सावधानी बरतने की जरूरत पड़ेगी क्योंकि हमारे ऊपर सवर्ण होने के ऐतिहासिक आरोप हैं, अगर हम उस आरोप को अपने कामों से निरर्थक प्रमाणित कर सके फिर तो हम यह चुनाव जीत ही लेंगे। पर इसके अलावा हमें एक काम और करना पड़ेगा वह यह कि कामरेडों को अपने साथ जोड़ना होगा। यह कैसे संभव होगा सोचना यही है।

‘पर जिस कामरेड को मैं जानती हूॅ वह तो इस समय किसी सुरक्षित व गोपनीय स्थान पर होगा।’

 कहां होगा...? आराध्या सोच में पड़ गयी।

पारटी की आम सभा तीन दिन बाद आयोजित की गयी थी उसकी सफलता के लिए आराध्या का मित्रा पूरी ताकत के साथ प्रयासरत था। उसे मालूम था कि पारटी का प्रदेश प्रभारी आमसभा में जगह जगह किकुड़ियाई बैठी हुई भीड़ देखेगा। भीड़ की संख्या के आधार पर जीत-हार का अनुमान लगाएगा फिर राजनेता होने के उसके गुणों के बारे में पारटी मुखिया को रिपोर्ट देगा। रिपोर्ट में साफ लिखेगा कि उसने भीड़ को पढ़ लिया है, लोग मौजूदा सरकार से बौखलाये हुए हैं, उनके चेहरों पर सरकार बदलने की रेखाएं नाच रही हैं। ऐसी स्थिति मंे सरकार को अपना बहुमत खोना ही है। आमसभा को सफल बनाने के लिए वह परेष्शान था और भीड़ जुटाने के लिए अथक परीश्रम कर रहा था, उसका साथ आराध्या ही नहीं जिले का पारटी मुखिया भी दे रहा था। वैसे यह अचरज ही था, ऐसा पहली बार हो रहा था कि जिले की पारटी का मुखिया और प्रत्याशी दोनों कंधे से कंधा मिला कर एक साथ चल रहे थे, नहीं तो दोनों, दो विपरीत ध्रुवों की तरह हुआ करते हैं, एक दूसरे से विपरीत, अलग अलग राग अलापने वाले।

चुनाव अभियान के लिए तीन दिन का कुछ मतलब नहीं होता, देखते देखते गुजर गये तीन दिन और वह दिन आ गया जिस दिन पारटी की आम सभा होनी थी।

पारटी की आम सभा रामलीला मैदान में आयोजित की गयी थी। अनुमान के मुताबिक सभा में भीड़ की उपस्थिति जानदार थी। लोगों ने भीड़ देख कर घोषणा करना शुरू कर दिया कि वह चुनाव जीत जाएगा। पारटी का प्रदेश स्तरीय नेता भी खुश होकर तथा उसकी जीत का अनुमान पक्का कर राजधानी लौट गया।

सोनभद्र का मौजूदा राजनीतिक कारोबार कुछ विशेष लोगों के लिए चौंकाने वाला था। पारटी की आम सभा संपन्न होने के बाद से ही हल्ला मचने लगा कि कोई बाहुबली भी इस बार यहां से चुनाव लड़ सकता है। उस बाहुबली के बारे में       आराध्या का मित्रा जानता था। वह जानता था कि बाहुबली की ताकत को चुनौती देना आसान नहीं होगा फिर भी वह चुनाव से खुद को बाहर नहीं करेगा और चुनाव लड़ेगा, पर उसे क्या पता था कि बाहुबली उसी की पारटी से चुनाव लड़ेगा और उसका टिकट काट दिया जाएगा।

हल्ला हर हाल और हर समय में हल्ला ही नहीं होता, वह सच भी होता है। वह वस्तुतः सच ही था। उस बाहुबली ने भी एक दिन आमसभा की घोषणा कर दिया और भीड़ जुटाने के प्रयास में लग गया। सोनभद्र में यह चुनावी जंग नामांकन के पहले ही शुरू हो गयी थी।

बाहुबली ने अपनी चुनावी सभा के पहले अपने एक विश्वस्त आदमी को      आराध्या का मित्रा के घर पर भेजा। वह आदमी बाहुबली का संदेश ले कर आया था। उसने उसे समझाया कि बाहुबली जी चाहते हैं कि वह चुनाव न लड़े क्योंकि बाहुबली जी को यहां से चुनाव लड़ना है।

संदेश धमकी की तरह था जिसे उस आदमी ने साफ साफ उसको समझाया पर वह भी किसी फूल की तरह नहीं था जो धमकी से कुभला जाता, उसने साफ साफ मना कर दिया और संदेशवाहक को अपने स्तर से समझा भी दिया कि वह चुनाव अवश्य लड़ेगा, किसी भी तरह से वह डरने वाला नहीं है, बाहुबली को जो करना हो करे, वह उसे देख लेगा।

आराध्या का मित्रा के लिए वह देखना बहुत ही जटिल हो गया। वह परेशान हो गया आखिर उसके साथ क्या हो रहा है, उसे राजधानी क्यों बुलाया गया है?

बाहुबली का संदेश मिलने के दूसरे दिन ही उसे राजधानी जाना पड़ा। पारटी के प्रदेश मुखिया ने उसे बुलाया था। पारटी के मुखिया से उसकी मुलाकात दिन के दो बजे हुई। प्रदेश का मुखिया पारटी के भब्य कार्यालय में था, वहां सैकड़ों की भीड़ थी, सभी अपने अपने भाग्य के परीक्षार्थी की तरह दिख रहे थे, मानो वे अपने भाग्य की परीक्षा देने के लिए आये हों। उनको देख कर साफ लगता था कि उनकी हसियां उड़ी हुई हैं और वे अपने राजनीतिक भविष्य को ले कर चिन्तित भी हैं। वह भी उसी भीड़ में शामिल हो गया, उसे पता नहीं था कि उसे वहां क्यों बुलाया गया है। करीब तीन बजे शााम उसे पारटी मुखिया के कार्यालयी कक्ष में बुलाया गया...

पारटी मुखिया अपने रोबदार चेहरे के साथ उसके सामने था। उसका चेहरा उस समय लोकतंत्रा के तमाम निष्ठुर अपवादों की तरह दीख रहा था यानि उस समय उसके चेहरे पर सामाजिक बदलावों की सैद्धांतिकियां नहीं थीं जिसके लिए लोकराज की कल्पना की गई थी। उसे जान पड़ा कि उसका पारटी मुखिया उस लोकशाह की तरह दिख रहा है जो नौकरशाही के तमाम गुणों से परिपूर्ण है। उसने उसी नौकरशाही की शैली में उसकी तरफ सवाल उछाला...

‘आप तो एक बार पहले भी चुनाव लड़ चुके हैं, उसमें आप हार गये थे, इस बार की स्थिति क्या रहेगी? इस पर कुछ बतायें

‘ठीक रहेगी सर! मैं यह चुनाव जीत रहा हूं, प्रदेश के संगठन मंत्राी जी तो गये थे मेरे क्षेत्रा में, उन्होंने रिपोर्ट दिया होगा आपको।’

’हां उनकी रिपोर्ट आपके पक्ष में है पर आप तो जानते ही हैं कि चुनाव बहुत

ही संवेदनशील मामला होता है और हम ऐसी स्थिति में नहीं है कि प्रदेश की एक भी सीट हार जांए, हमें तो हर सीट को ठोंक बजा कर, तौलकर देखना होगा, प्रत्याशियों की राजनैतिक, जातिगत, आर्थिक सभी मुद्दों का मुल्यांकन करना होगा।’

प्रदेश का मुखिया अपनी बात समाप्त भी नहीं कर पाया था कि उसी कक्ष में बाहुबली दाखिल हो गया...

प्रदेश के मुखिया ने बाहुबली का उछल कर स्वागत किया और...

‘अच्छा हुआ जो आप भी चले आये, अब आपके सामने ही प्रत्याशी बदले जाने वाले मुद्दे पर बातें कर लेते हैं। आप तो जानते ही हैं कि तिवारी जी पढ़े लिखे आदमी हैं और प्रोफेसर हैं, पारटी के समर्पित कार्यकर्ता तो हैं ही। मैं नहीं समझता कि तिवारी जी पारटी की एक भी सीट गंवाना चाहेंगे।’

‘ऐसा है तिवारी जी! हम चाहते हैं कि सोनभद्र में तीन विधानसभा सीटें हैं उनमें से कोई आप चुन लें और वहां से चुनाव लडें, मुख्यालय वाली सीट छोड़ दें क्यांेकि वहां से आपका चुनाव जीतना मुश्किल है।’

‘नहीं सर! ऐसा नहीं है, मेरा जीतना लगभग लगभग निश्चित है, दूसरी जगह से शायद मैं चुनाव न जीत पाऊं, सो मुझे ही वहां से लड़ने दीजिए। मुझे तो सिम्बल भी मिल गया है, अब काहे के लिए फेर बदल। मैंने पारटी विरोधी कोई कार्य भी  नहीं किया है, जो मुझे दण्डित किया जा रहा है।’

‘कैसी बात कर रहे हैं तिवारी जी! दण्डित करने की कोई बात ही नहीं है, केवल

फेर-बदल की बात है, जो प्रत्याशियों के नामांकन के पहले तक होता रहता है।’

‘नहीं, ऐसा करना मेरे लिए संभव नहीं है, और मैं अपनी सीट बदल नहीं सकता क्योंकि मैंने उस क्षेत्रा में बहुत काम किया है’

आराध्या का मित्रा तो बाहुबली को पारटी मुखिया के कार्यालय में देखते ही समझ गया था कि कुछ न कुछ गड़बड़ है। जो गड़बड़ था वह उसके सामने था। बाहुबली ने टिकट पाने की सारी गणित हल कर लिया था। उसे तो टिकट मिलना ही था। उसे राजधानी से खाली हाथ लौटना पड़ा।

वह घर लौट कर काफी निराश था। उसके लौटने के पहले ही उसके टिकट कट जाने की खबर शहर में घुस चुकी थी। जाहिर है शहर में तो कई तरह के लोग होते हैं, उसके समर्थक दुखी थे तो उसके विरोधी खुश थे। वैसे आराध्या का मित्रा को टिकट न मिलने के बाबत शहर में निराशा अधिक थी। बाहुबली को टिकट मिलने से लोग खुश नहीं थे पर हो क्या सकता था, बाहुबली के टिकट पर कोई प्रतिवाद भी तो करने की स्थिति में नहीं था। पारटी के स्थानीय नेताओं ने लिखित रूप से बाहुबली को प्रस्तावित कर ही दिया था।

वैसे भी अब कोई बाहुबली पहले वाला तो रहा नहीं जो नेताओं को तन बल के जोर से चुनाव जितवाया करता था, अब उसके चेहरे पर भी नेता बनने और हुकूमत

से खेलने का गाढ़ा रंग चढ़ चुका है, वह समझने लगा है कि वह भी राजनीति का खिलाड़ी बन सकता है।

अब तो लोग समझने भी लगे हैं के टिकट लेना रूपयों का खेल हो गया है, जो भी पारटी के खजाने में अधिक रुपया देगा वह टिकट पा जाएगा, आखिर पारटी कैसे चलेगी? तमाम तरह के खर्चे होते हैं। मुश्किल से पन्द्रह बीस दिन का चुनाव अभियान होता है पर खर्चा इतना ज्यादा होता है कि उसका आंकड़ा निकालना मुश्किल होता है। कभी कभी तो चुनाव में पर्याप्त रुपया न खर्च करने के कारण चुनाव हारना भी पड़ जाता है। वैसे भी अब पारटियां कहां है सभी तो मल्टीनेशनल कंपनी बन गई हैं, राजनीति की बदलती तस्वीर को देखते हुए खर्च तो करना ही होगा। अब कोई भी चुनाव बिना रुपयों के नहीं जीता जा सकता।

आराध्या का मित्रा किसी भी हाल में चुनाव नहीं छोड़ना चाहता था, उसने पक्का कर लिया था कि वह चुनाव लड़गा ही लड़ेगा।

चुनाव के नामांकन का दिन भी करीब आता जा रहा था। इस दौरान बाहुबली का कोई न कोई आदमी प्रतिदिन उसे घेर कर मनभावन प्रस्ताव दिया करता था।कृ

‘देखिए आप जितना चाहें रुपया ले लें, एम.पी. वाली सीट भी आप को ही मिलेगी पर नामांकन मत करिए। सदर वाली सीट छोड़ दीजिए।’

‘एक करोड़, दो करोड़, तीन करोड़। आखिर कितना चाहिए आपको, खुलकर बतायें।’

पारटी का एक प्रभावशाली पदाधिकारी भी एक दिन आराध्या के मित्रा के घर आ धमका...

‘देखिए तिवारी जी! इस सीट को आप छोड़ दीजिए, पारटी अध्यक्ष जी ने वादा किया है कि दो महीने बाद वे आपको विधान परिषद में ले लेंगे, उसके लिए आपके नाम का प्रस्ताव भी बन चुका है।’

आराध्या का मित्रा कई तरह के प्रलोभनों और आश्वासनों के बीच तैर रहा था पर उसका मन उस तैरने से बाहर था। वह राजनीति में इस लिए नहीं आया था कि खुद को बदल कर नरम बिस्तरों पर थिरके। उसके सामने गांधी और लोहिया के आदर्श थे। वह उन्हीं लोगों के रास्ते पर चलना चाहता था यानि अन्याय का जनतांत्रिक और अहिंसक प्रतिरोध। इसी लिए वामपंथियों से सदैव उसकी किचकिच होती रहती थी जो अहिंसक प्रतिरोध को अन्याय की पूंछ मानते थे। उनका मानना था कि ‘प्रतिरोध’ अहिंसक हो ही नहीं सकता। प्रतिरोध तो भ्रष्ट व्यवस्था के औजारों के सफाये के लिए होता है। जाहिर है किसी भ्रष्ट व्यवस्था के दमनकारी औजारों का सफाया भला अहिंसक तरीके से कैसे हो सकता है?’ आराध्या का मित्रा जानता था कि निर्दलीय उम्मीदवार की तरह चुनाव लड़ना आशाप्रद नहीं है। आज का समाज निर्दलियों को प्राथमिकता नहीं देता। निर्दलीय उम्मीदवार की तरह चुनाव लड़ने में

सबसे अधिक घाटा उन वोटों का होता है जो पारटी के चुनाव चिन्ह के कारण हासिल होते हैं। बहरहाल उसे चुनाव लड़ना है। उसे डा. लोहिया का वह कथन नहीं भूलता जो चुनाव के हार और और जीत के बाबत थे...कृ

‘गरिमापूर्ण पराजय अमर्यादित जीत से हर हाल में बेहतर होती है।’

उसने आराध्या से सलाह मषविरा किया...

पारटी का टिकट तो कट गया आराध्या! अब क्या करना है?’

आराध्या जानती थी कि उसका टिकट कट गया है। वह भी हतोत्साहित थी, उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि आगे क्या करना चाहिए पर इतना तो उसने निश्चित कर लिया था कि चुनाव छोड़ना नहीं है, हर हाल में चुनाव लड़ना है चाहे हार हो या जीत। उसे अचानक पारटी के उस नेता का ख्याल आया जिसने उसकेे मित्रा को कालेज में नौकरी दिलवाया था।कृकृ

‘तुम एक बार फिर दिल्ली क्यों नहीं चले जाते और उस नेता से मिलते जिसने तुम्हे कालेज में नौकरी दिलवाया था।’

‘हां तूं ठीक बोल रही, उनसे मिलना चाहिए हो सकता है उन्हें मेरा टिकट कटने

के बारे में कुछ मालूम हो।’

आराध्या के मित्रा ने उस नेता को फोन मिलाया...

फोन परे नेता जी थे। फिर उसने अपने टिकट के बारे में बातें की। नेता उदास था और उसने टिकट दिलवाने में अपनी असमर्थता बताया। नेता तो खुद परेष्शान था, उसे भी पारटी से कभी भी निकाला जा सकता है। उसने साफ साफ बताया।

‘तिवारी जानते हो,  हमलोग एक ऐसी पारटी के सदस्य हैं जो वन मैन रूल वाले सिद्धान्त पर चलती है तथा भाई भतीजावाद का प्रवर्तक है। उसके लिए देश और समाज का कोई अर्थ नही, अर्थ है केवल जाति का और अपने परिवार का। हमलोगों की पारटी में किसी गैर के लिए कोई उचित स्थान नहीं, चाहे वह कितनाहू योग्य हो और प्रतिनिधित्व के लिए समर्थ भी। सो ऐसी स्थिति में मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकता, पारटी के मुखिया के फैसले को बदलवाने को कौन कहे उसे पुनर्विचार के लिए भी पैरवी नहीं कर सकता। हां अगर तुम समझते हो कि चुनाव जीत सकते हो तो कोशिश कर सकते हो। मैं तो तुझे सलाह दूंगा कि ऐसे मौके हरदम नहीं आते, यह तुम्हारे लिए अच्छा मौका है, इसे आजमाना बहुत जरूरी है।’

आराध्या के मित्रा को अपने नेता से भी मदत नहीं मिली, वे तो खुद परेशान थे उन्होंने अपनी असमर्थता साफ साफ बता दिया। वैसे भी वे खुले दिमाग के आदमी हैं, साफ बोलना औार साफ काम करना उनकी आदत है तथा यह भी कि अपने समर्थकों के कामों को लेकर वे नियमों को शिथिल करवाने में भी संकोच नहीं करते। इसीलिए समर्थकांे के बीच उनकी लोकप्रियता में कमी नहीं आती। उनके समर्थक जानते हैं कि उनका नेता चाहे जहां रहे उनका अपना है, वे अपना चेहरा उस नेता में देखते हैं।

अपने मित्रा की चिन्ताओं को आराध्या जानती थी पर चिंताओं को दूर करने के लिए उसके पास कुछ उपाय नहीं थे।

‘तुम्हें क्या लग रहा है पार्टनर! पारटी के समर्थन के बिना चुनाव लड़ना अनुकूल होगा या प्रतिकूल।’

‘आराध्या! मैं कुछ सोच नहीं पा रहा हूं, अनिर्णय की स्थिति है, कुछ भी हो सकता है, अनुकूल भी तथा प्रतिकूल भी। केवल एक सहारा है चुनाव लड़ने का। मैने जनता से अपना जुड़ाव बहुत बढ़ाया है फिर भी निश्चित नहीं कर पा रहा हूं कि मेरा जनसंपर्क तथा जनता के बीच मेरा काम, वोट में तब्दील हो पाएगा या नहीं, मैं इस बारे में आश्वस्त नहीं हो पा रहा हूं।’

‘मेरा मानना है पार्टनर कि निराश होने की जरूरत नहीं है, जनता अपने बीच के आदमी को नहीं भुलाती। मैं जानती हूं कि तुमने जनता के लिए जितना कर सकते थे किया है। कदम मिलाकर जनता के साथ चलते रहे हो, उनकी हर वाजिब लड़ाई में उनके साथ रहे हो।’

किसी ने कहा है कि कल्पना करना अच्छी बात है पर हवा में नहीं, जमीन पर करना चाहिए, मैं मानती हूं कि तुम्हारी कल्पना माटी से गुंथी हुई है इसलिए सफलता भी मिलेगी, हवा में लटकी हुई किसी चीज के लिए तो तुम कल्पना नहीं कर रहे।’

‘पर आराध्या! आज के समय में चुनाव का मामला बहुत ही संवेदनशील होता है, कब कौन काम मेरे प्रतिकूल चला जाएगा कुछ कहा नहीं जा सकता, न ही उसका पहले से अनुमान ही किया जा सकता है। मैं तो समझता हूं कि जीत तो तब होगी जब चुनाव लड़ा जाएगा सो चुनाव तो मैं लड़ूगा ही, किसी दबाव के चलते मुझे अपने निर्णय को बदलना नहीं है।’

सोच विचार  जून, 2015 पृ...30-33

मरद नाहीं है

गुलबिया खुश खुश थी कि अब जंगल के सिपाही उसके गॉव वालों को परेशान नहीं करेंगे, नहीं तो जंगल से जलावन का एक टुकडा भी लाना गुनाह हो गया था। जंगल का सिपाही पकड़ लेता था, रुपया मांगता था और न देने पर देहियैं चूमने चाटने के चक्कर में पड़ जाता था।

गॉव में हर तरफ खुशियां ही खुशियां थीं, सभी मस्त मस्त थे, कम से कम अब तो जंगल वाले परेशान नहीं करेगे। गुलबिया ने उन्हें सिखा दिया है।

गुलबिया अपने मड़हा में थी और फुलवा से जानना चाह रही थी...

‘का बहिन पहिले भी अइसहीं होता था का गॉव में?’

‘अउर नाहीं तो का, पहिले का का होता था, करम बाबा न करैं ओइसहीं अब्बौ होय, पहिले तऽ बने कऽ सिपहिया हमरे गंउअै में डेरा जमाय लेते थे, जाये दो बहिन! का करोगी ई सब जानिके।’ फुलवा ने खुद को रोक लिया

‘नाहीं नाहीं बहिन! बताओ तो पहिले का का होता था गॉए में?’ गुलबिया ने फुलवा से पूछा

‘अरे होता का था, ई का बताना। जान लो एतनै कि....’फुलवा फिर रुक गई जैसे वह आगे बताना न चाहती हो।

‘बोलो तो बहिन!’ फुलवा ने दुबारा पूछा

‘बने कऽ जवन सिपहिया होते हैं नऽ हमरे गंउआ में आय के कन्हैया बन जाते  थे अउर रासलीला मचाते थे।’

‘अइसन बहिन! कोई विरोध नाहीं करता था।’ गुलबिया चकरा गयी

फुलवा हसने लगी, हसते हुए फुलवा ने बताया...कृकृ

‘कोई का बोलेगा सब कांपते रहते थे, ओनके सामने’

‘पर अब...’ मगन हो कर गुलबिया ने पूछा

‘अब तो कोई नाहीं आयेगा बहिन। सबको अपनी जान अउर मान का डर होता है’  फुलवा ने उत्तर दिया

गुलबिया मगन थी, उसे पता था कि उसका गॉव भी जंगल के बीच में ही बसा हुआ है पर मजाल कि गॉव में जंगल का सिपाही घुस जाये। गॉव वाले जंगल के

कर्मचारियों को पकड़ लेते हैं और किसी पेड़ से बांध देते हैं, मार-पीट अलग से।

‘मरद छोड़ो मेहररुअ भिड़ जाती हैं ओनसे, चाहे कोई हो, जंगल का सिपाही क्या थाने का सिपाही भी नहीं घुस पाता गॉव में। सभी डरते हैं, गॉव में घुसने से, घुस भी गये तो गरियाते हुए गॉव से बाहर निकलते हैं।’

गुलबिया जान गयी थी कि उसकी ससुराल वाले सब कांपने वाले हैं। उसे ससुराल वालों पर गुस्सा आया, पर उसे यकीन है जंगल का सिपाही गॉव में अब नाहीं आयेगा, उसे वही सब करना पड़ेगा जो उसके नैहरे में होता है।

गुलबिया भी एक दिन गॉव की दूसरी औरतों के साथ जंगल गयी थी। घर में जलावन नहीं थी। जंगल से जलावन लाना जरूरी था। उसका पति मजूरी के लिए ‘करसर खदान’ पर गया था, जाना तो गुलबिया को भी था पर गुलबिया को उसका पति वहां नहीं ले गया।

‘तूं का करेगी वहां जा कर, देह चोथवाना है का?’ पति ने गुलबिया को डांट दिया था।

गुलबिया पति के साथ डाला करसर पर नहीं गयी। घर पर ही रुक गयी। एक दिन गॉव की औरतों के साथ गुलबिया जंगल चली गयी। औरतों ने जंगल में घूम घूम कर जलावन इकठ्ठा किया और उसका बोझ बनाया फिर सिर पर लाद कर गॉव की तरफ वापस हो लीं। रास्ते में ही जंगल का सिपाही मिला उसने औरतों को रोक लिया और जलावन काटने के बारे में पूछ-ताछ करने लगा...

पूछ-ताछ तो कोई बुरी बात नहीं उसे कोई भी कर सकता है पर जंगल का सिपाही रंगीन मिजाज का था। उसने औरतों को रीति काल के कवियों की तरह निहारना शुरू किया। उसकी समझ में आया कि गुलबिया को नख-शिख तक देखा जा सकता है, उसने देखना भी शुरू किया...

गुलबिया को देखते हुए ही वह बाकी औरतों से पूछ गछ करता रहा और ‘खरवन’ देने के बारे में पूछता रहा।

‘इस साल ‘खरवन’ नहीं आया,’ सिपाही ने औरतों से पूछा

खरवन यानि जंगल के पास के गॉवों से जंगली लकड़ी बीनने तथा उठाने के लिए लिया जाने वाला कर। यह परंपरा अंग्रेजी हुकूमत के जमाने से चली आ रही है। गुलबिया के ससुराल वाले उसके आने के बाद से खरवन नहीं देते उन्हें लगने लगा है कि खरवन नहीं देना चाहिए खरवन एक तरह से घूस है।

‘काहे का खरवन हो सिपाही जी’  पूछा गुलबिया ने

‘का तूं खाली लकडियै काटना जानती है, खरवन नाही जानती, का जंगल तोहरे बाप कऽ है’ सिपाही भड़क गया

गुलबिया भी कम नहीं थी

‘अउर नाहीं तऽ का, तू नाही जानते हो जो चीज सरकारी है ऊ हमारी है, ई जगह

जमीन सब कुछ बूझ गये के नहीं बूझेे ’

‘तऽ का बिना खरवन दिए ही लकड़ी काटोगी?’

गुलबिया ने सिपाही को फटकारा...कृ

‘अउर नाहीं तऽ का, हम लकड़ी काटे कहां हैं, हम लोग तऽ लकड़ी का सुखवन बीने हैं, चूल्हा में जलाने अउर खाना पकाने खातिर।’

सिपाही भड़क गया और गुस्से में आ कर वह औरतों के सिर पर से लकड़ी के बोझों को गिराने लगा। गुलबिया ने इस दौरान सिपाही का हाथ पकड़ लिया।

‘साहब ऐसा नाहीं करो। लकड़ी तोहरे बाप की नाहीं है सरकार की है।’

सिपाही तो सिपाही होता है, जंगल विभाग का ही क्यों न हो, हुकूमती संस्कारों में पगा और सना। वह भला काहे बरदास्त करता उसने गुलबिया को फटाका एक झापड़ रसीद कर दिया और गुलबिया लकड़ी का बोझ लिए जमीन पर गिर पड़ी।

गुलबिया का जमीन पर गिरना एक अलग तरह का स्वस्फूर्त तूफान ले आया।

औरतों में जाने कहां से प्रतिवाद करने की सूझ-बूझ आ गई थी जो तमाम तरह की ट्रेनिंग के बाद भी नहीं आती। आप किसी को समझाते बुझाते रह जाओ पर वह अपना बचाव करने के लिए तत्पर हो जाये ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं।

औरतें अपने बचाव में आ गयीं उनकी समझ में आया कि यह सिपाही गुलबिया को ही नहीं हम सभी को परेशान करेगा, मारेगा पीटेगा, और न जाने क्या करेगा।

कुल सात औरतें थी, जंगली थीं, देह से गठी हुई, करईल माटी के रंग से रंगी और प्रकृति की ताकत से भरपूर। फिल्मी तरीके से अलग देहाती तरीके से सभी ने मिल कर सिपाही को मारना, चौथना, नोचना शुरू किया। झापड़ दर झापड़ फिर लात चप्पल। औरतें प्रतिरोध नहीं कर सकतीं यह चिंतन कहीं दूर फेंका गया।

बुटुली ने तो टंगारी ही उठा लिया और तभी गुलबिया ने बुटुली को पकड़ लिया।

‘ऐसा नाही करो, बाल बुतरू वाला होगा बेचारा। मर जाएगा तो एकरे बाल बुतरू को कौन खिलाएगा पिलाएगा? ’

‘नाहीं बहिन, नाहीं इस हरामी को काट देना ही ठीक होगा, तूं नाही जानती के ई केतना हरामी है, पिछली बार हमलोग जब जंगल आये थे नऽ तब तूं अपने नैहरे गई थी बहिन! जानती हो इसने का किया था...

‘हमैं एक किनारे ले जा कर पचास की नोट दे रहा था, हमैं फुसलाय रहा था। हमैं काटने दो एके बहिन, ई बड़ा पापी है।’ 

गुलबिया से अपना हाथ छुड़ा कर बुटुली फिर सिपाही की ओर बढ़ गयी लेकिन

गुलबिया ने उसे रोक लिया...

‘ऐसा नाही करो, ई ठीक नाहीं होगा। एकर जान लेने से का होगा, अइसन करो के ई फिर कब्बउं अइसन करै का नाम न ले।’

‘तऽ का ठीक होगा। उहै बताओ पर एके छोड़ना नाहीं है।’

‘हम कहां बोल रहे हैं कि एके छोड़ देना है।’

सिपाही को मारने पीटने के बाद औरतों ने उसे रस्सी से बांध दिया।

सिपाही को ऐसी उम्मीद नहीं थी कि जंगली औरतें उसका प्रतिवाद करेंगी और भिड़ जाएंगी, सिपाही छटपटा रहा था पर करता क्या। उसे तो वही करना होता जो औरतें उससे करवातीं।

और औरतों ने...वह किया जो नैतिकता के हिसाब से शायद ठीक नहीं कहा जा सकता पर पंचायती जाति व्यवस्था में यह सजा भी कम प्रचलन में नहीं है। औरतें जानती थीं कि ऐसी सजा देने पर मरद मुॅह दिखाने लायक नहीं रहता।

सजा दे देने के बाद औरतें अपने गॉव लौट आयीं पर सिपाही अपने आप से घिना गया। ऐसा दिन भी आ सकता है कि उसे अपना ही पेशाब पीना पड़ गया।

जंगल से गॉव लौटते समय फुलवा मगन थी, उसने गुलबिया को गुदगुदायाकृ

‘बहिन! तूने सिपाही को देखा कि नाहीं जैसे रो देगा, पथरा पर माथा पीट रहा था...’

गुलबिया हसने लगी।

‘उसे का देखना, वह अब कहीं अपना मुंह नाही देखाएगा, मुंह तऽ मरद देखाते हैं बरद नाहीं, ऊ मरद नाहीं है, बरद है बरद, मरद होता तऽ मेहरारून को छेड़ता।’

जुलाई 2013 सोच विचार

इनीसपेक्सन

करमनाशा नदी में बाढ़ आई हुई थी। करमनाशा नदी का पानी उसके किनारों के अगल बगल के गॉवों में घुस चुका था। लोग बताते हैं कि बीसों साल बाद करमनाशा में ऐसी बाढ़ आई है। दुलरी को आंगनबाड़ी केन्द्र जाना था, वह कैसे जाये, नहीं जायेगी तो इनीसपेक्सन हो जाएगा। सुनने में आ रहा है कि सीडीपीओ काफी सख्त हैं। चन्दौली से ट्रान्सफर हो कर यहां आये हैं। एक महीना भी नहीं हुआ होगा कि उन्होेेने दो आंगनवाड़ियों को नोटिस दे दिया है, अउर जबाब मांगा है। एक आंगनबाड़ी केन्द्र को तो उन्होंने बन्द ही करा दिया है, वहां बच्चों को दिए जाने वाले पुष्टाहार बेच दिए जाने की शिकायत थी। जांच हुई थी, जांच में क्या हुआ था नहीं मालूम। साहब ने केन्द्र की आंगनवाड़ी को बंगले पर बुलाया था, वह नहीं गयी थी और एक सप्ताह बाद उस केन्द्र को दूसरे केन्द्र से अटैच कर दिया गया था।

दुलरी पड़ोस वाले गॉव के आंगनवाड़ी केन्द्र में नियुक्त थी। जो करमनाशा नदी के पार था, था तो पास में ही पर करमनाशा में बाढ़ आने के कारण वहां जाना असंभव हो जाया करता था। उसे डर लग रहा था कि अगर वह केन्द्र पर नहीं पहुंची अउर साहब का दौऱा हो गया फिर तो उसे नौकरी से बाहर निकाल दिया जाएगा। सो वह घबराई हुई थी किसी भी हाल में केन्द्र तो पहुंचना ही होगा।

केन्द्र जाने के लिए दुलरी घर से निकल गई और करमनाशा के छलका तक जा पहुंची। छलका के दो फीट ऊपर से बाढ़ का पानी बह रहा था। अगल बगल के कई लोग करमनाशा के किनारे खड़े थे, उन्हें भी पार जाना था पर वे बेचारे पार कैसे जाते। सभी करमनाशा की बाढ़ देख रहे थे और बाढ़ के उतरने की प्रतीक्षा कर रहे थे। दुलरी भी वहीं जा कर खड़ी हो गई। देखते देखते बारह बज गया। बाढ़ का पानी नहीं उतरा। पानी तो दो चार दिन बाद ही उतरेगा।

‘अब वह केन्द्र कैसे जाये, नाव या डोंगा भी तो नहीं चल रहा।’ दुलरी घर लौट आई। पर उसका घर लौटना आसान नहीं था। उसे पता था कि उसे यह जो आंगनवाणी वाली नौकरी मिली है, बहुत बड़ी कुर्बानी के बाद मिली है। उसने नौकरी का फारम भर दिया था। उसके साथ अपना शैक्षिक प्रमाण पत्रा भी लगा दिया था। उसने हाईस्कूल पास किया था, उसकी योग्यता सक्षम अधिकारी द्वारा रात में परखी

गयी थी फिर उसे नौकरी के लिए चुना गया था। वह आगे पढ़ना चाहती थी पर नहीं पढ़ पायी थी। उसकी पढ़ाई रोक दी गयी थी। उसने अपनी अइया और बपई से बोला था...‘हमैं आगे पढ़ना है’

अइया बिगड़ गयी थीं... ‘का बोल रही तूं, का करेगी आगे पढ़ कर, कलक्टर बनना है का? बहुत हो गई पढ़ाई लिखाई अब आगे नाही पढ़ना है। हमलोग तो कुछु नाही पढ़े हैं तऽ का हमार काम नाहीं चल रहा। आगे की पढ़ाई करके करेगी का? तोहैं तऽ चूल्हा चौका ही करना है नऽ। अरे! पढ़, जीन, खुद को गढ़। खुद को गढ़ लिया, बूझ लो पढ़ लिया। यह जो अनगढ़ जिनगी है नऽ, गढ़ने से ठीक होती है, पढ़ने से नाही।’

फिर दुलरी की पढ़ाई छुड़ा दी गयी थी। उसी साल दुलरी व्याह भी दी गयी। दुलरी को पूरा ख्याल है कि उससे शादी के बारे में कुछ नाही पूछा गया था और एक ऐसे आदमी से बांध दिया गया था जो उससे दस साल बड़ा था और एक बच्चे का बाप तथा विधुर था। खैर दुलरी ने अइया के कहे के मुताबिक जिनगी गढ़ना शुरू कर दिया था।

उसने पति के पहले वाले बच्चे को अपना मान लिया था और फैसला कर लिया था कि वह बच्चा नहीं पैदा करेगी। एक बच्चा है उसके पास। बच्चे पैदा करके घर ही तो बांटना होगा, जमीन बढ़ नही सकती, जमीन बंटने से का होगा जब दो बीघे जमीन से काम नहीं चल रहा। जमीन तो तब काम देगी जब उसे पानी मिले, सिचाई हो और पानी मौसम पर निर्भर है। जमीन का भी कोई ठिकाना नाहीं है, कब जंगल विभाग उस पर जंगल विभाग की धारा 20 लगाकर बेदखल कर दे। नोटिस तो आ ही गई है, उसका जबाब देना है। साबित करना है कि वह जमीन जंगल विभाग की नहीं है उस पर दुलरी का पति बाप दादों के जमाने से काबिज चला आ रहा है।

दो बीघे जमीन से घर के खर्चे नहीं चल पा रहे थे। कभी अकाल पड़ जाता तो कभी करमनाशा की बाढ़ फसलों को तहस नहस कर देती थी। घर की हालत देख कर दुलरी ने नौकरी कर लिया था। नौकरी तथा खेती की आमदनी से घर का खर्चा चल जाया करता था।

दुलरी ने जिनगी को गढ़ना और समय को पढ़ना शुरू कर दिया था जैसे स्कूल की किताबों को पढ़ा करती थी। उसे क्या पता था कि यह जो जिनगी है नऽ बहुत अजीब है, उसे पढ़ा नहीं जा सकता और गढ़ना तो उससे भी मुश्किल। नौकरी पाने से लेकर जमीन बचाने तक उसे क्या क्या नहीं करना पड़ा था।

अचानक एक दिन जंगल का फारिस्टर दुलरी के घर आ धमका...दुलरी के पति को डांटते हुए बोला... ‘जंगल की जमीन से अपना कब्जा हटा लो, नहीं तो जेहल जाना होगा, इस कागज पर दस्तखत बनाओ।’

दुलरी घर से बाहर निकल आयी थी...

‘का है साहेब, काहे के लिए दस्तखत बनवाय रहे हैं, हमहूं तऽ देखें जरा’

फारिस्टर दुलरी को देखता रह गया। यह चांद की परी, गदराई, मस्त मस्त, ईहां का कर रही है? ई पढ़ेगी नोटिस का कागज...’

‘लो पढ़ो, पढ़ो, कुछू नाहीं है इनीसपेक्सन होना है, तोहरे जमीन का। काल्हु साहेब लोग आ रहे हैं।’

दुलरी ने कागज पढ़ लिया और उसके पति ने उस पर दस्तखत भी बना दिया। पर बात इतनी ही नहीं थी। इनीसपेक्सन तो दुलरी की जमीन का हो गया था और उसे जमीन भी मिल गयी थी पर उसे क्या पता था कि इनीसपेक्सन उसकी जमीन का ही नहीं, उसके धीरज का भी किया जाने वाला है।

दुलरी घिना गयी अपनी देह से, यह देह नहीं होती तो ऐसा नाहीं होता। उसे अइया का ध्यान आया, अइया बात बात पर टोका टोकी किया करती थी, इहां न जाओ, उहां न जाओ, शाम को जल्दी घर लौट आया करो, किसी हमउमर लड़के के साथ अइया देख लिया करती थी तो नाराज हो जाया करती थीं।

‘उसके साथ कहां गयी थी? उसके साथ का कर रही थी?’

हर काम और बात पर अइया निगरानी किया करती थी। अगर अइया मेरी जगह पर होतीं तो का करतीं?

जमीन को लेकर दुलरी का पति भी गिड़गिड़ाने लगा था...

‘देख दुलरी! कइसहूं जमीनिया बचाय ले, जमीनिया चली जाएगी तऽ फेर नाही मिलेगी। अउर एक बात जानती है कि नाहीं, गरीबन कऽ आपन कुछु नाहीं होता, न जमीन, न देहि, न दिमाग। देहियय तऽ है हम गरीबन के पास, अउर का है, भूख मेटावै खातिर मरद जांगर खटाते हैं, अउर मेहरारू आपन देह गलाती हैं। बूझ रही है हमार बात के नाहीं, देहिया में का रखा है रे दुलरी!़ जरि जाएगी एक दिन, गरीबन कऽ देहि अउर दिमाग दुन्नौ राख है राख।’

दुलरी ने माथा पकड़ लिया था, का बोल रहा उसका पति? देह का सौदा कर रहा है, एक बार तो उसने भी सोचा था।

‘देह का, का है, वह तो देह ही रहेगी, खियाएगी थोड़ै, जमीनिया चली जाएगी तो का बचेगा?  पर वह इस बार अपनी देह अपनी आत्मा से अलग नहीं होने देगी, देह नाही सौंपेगी, चाहे जमीन मिले न मिले।

दूसरे दिन दुलरी बाजार गयी और अपना सारा गहना बेच दिया उसे कुल आठ हजार रुपया मिला। पास ही में जंगल विभाग के रेंजर का आवास था। दुलरी रेंजर के आवास में घुस गयी। आवास में रेजर की पत्नी थीं और रेंजर कहीं बाहर गये हुए थे। दुलरी ने किसी तरह रंेजर की पत्नी को राजी किया और उन्हें आठ हजार रुपया दे दिया। रेंजर की पत्नी ने दुलरी की जमीन बचवा दिया। दुलरी खुश थी कि उसने जमीन ही नहीं अपनी देह भी इनीसपेक्सन से बचा लिया। रंेजर भी भला आदमी निकला, उसने दुलरी की बात सुन लिया और उसका काम कर दिया।

करमनाशा की बाढ़ देख कर दुलरी दुबारा डर गयी थी। अगर वह केन्द्र पर नहीं पहुंची तो फिर इनीसपेक्सन होगा अबकी बार वह का करेगी?

करमनाशा की बाढ़ उतरने का नाम नहीं ले रही थी। दुलरी करमनाशा के छलका तक रोज जाती और वापस लौट आती। करीब सात दिन बाद करमनाशा का बाढ़ पूरी तरह उतर चुकी थी। छलका वाला रास्ता खुल गया था। दुलरी उस दिन आंगनवाणी केन्द्र पर पहुंची। उसने हाजिरी बनाया और बाढ़ वाले दिनों को खाली ही रहने दिया। उसी दिन सीडीपीओ भी उसके केन्द्र पर आ धमका और केन्द्र का इनीसपेक्सन करने लगा।

‘ ये तारीखें खाली क्यों हैं? इसमें सात दिन की हाजिरी  भरी नहीं है? उतने दिनों तूं तो केन्द्र आई नहीं, हां समझ में आया बाद में अपनी हाजिरी बना देती, इसी लिए खाली छोड़ा हुआ है।’ बाल पोषाहार अब तक बांटा क्यों नहीं गया? 

परियोजनाधिकारी ने हाजिरी खाली रखने की बात को बतंगड़ बना कर दुलरी को स्पष्टीकरण देने की नोटिस थमा दिया।

दुलरी परेशान परेशान, अब का करेगी? दुलरी ने देखा कि सीडीपीओ की आंखें जांच किए जाने वाले रजिस्टरों पर नहीं हैं, कनखियों से वह उसकी देह ही देख रहा है। दुलरी ने खुद को सहेजा और सरके हुए आंचल को सिर पर चढ़ा लिया। नोटिस हाथ में लेते ही दुलरी घबड़ा गयी। दुलरी की समझ में नहीं आया कि वह नोटिस का जबाब क्या देगी। अब तो उसके पास गहना भी नहीं जिसे बेचकर नोटिस के जबाब पर वजन चढ़ा देगी। यानि नौकरी गयी या तो..

तत्काल उसने अन्दरूनी मुस्कान परियोजनाधिकारी की तरफ फेंका...

‘साहब ऐकर जबाब हम काल्हु बंगलवै पर आ कर दे दें का?’

परियोजनाधिकारी ने दुलरी को देखा और प्रशासनिक मुस्कान मुस्काया...

‘हां हां आ जाना, आने के पहले फोन कर लेना।’

दुलरी एक और संभावित इनीसपेक्सन से आहत हो गयी। उसके मुंह से निकला.

‘ये इनीसपेक्सन तो बहुतै खराब काम है’ बात बात पर इनीसपेक्सन।

जागरण 2 दिसंबर 2013 रविवार में प्रकाशित

        

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प्रतिनायक

उस अनजानी राह पर चलते हुए मुझे डर लग रहा था आगे जाने क्या हो!  हम जिधर चल रहे हैं उधर भी तो पुलिस के लोग हो सकते हैं, पुलिस तो कहीं भी हो सकती है कोई ऐसी जगह नहीं जहां पुलिस खड़ी न हो। मेरे डरने का कारण बबलू महतो का अकेला होना भी था। हमलोगों के पास शाक्तिबल नहीं था। दो चार कामरेड और साथ में होते तो शाायद हमें डर नहीं लगता। बात सच भी थी अगर मुठभेड़ हो गयी तो बबलू महतो अकेले क्या करेगा? हम दोनों मारे जाएंगे। उस समय मुझे लगा था कि जानबूझ कर आग में खेलने का साहस नहीं दिखाना चाहिए जो मैंने किया था। मुझे समझना चाहिए था कि बबलू महतो का मतलब आग है, और आग में कूदने का जोखिम भी। उसके साथ रहने पर कदम कदम पर आग बिछी मिलेगी, उसी पर सोना और उसे ही ओढ़ना बिछाना।
मुझे लगा कि अब जंगल में होना तथा जंगल को जंगल की तरह देखना मुझे बन्द कर देना चाहिए उसका मतलब था बबलू महतो से अलग होना। पर जाने क्या था कि मेरे दिल दिमाग पर बबलू महतो का व्यक्तित्व प्रभावी हो चुका था। मैं सोच नहीं सकती थी कि मुझे बबलू महतो से अलग होना है। बबलू महतो के व्यक्तित्व में कौन सा ऐसा जादू था जो मुझे चुम्बक की तरह खींच रहा था और मैं उससे जुडती जा रही थी, उसे आज तक नहीं समझ पायी। लगता है आने वाले दिनों में भी नहीं समझ पाऊंगी। लेकिन एक बात साफ है कि बबलू महतो की देह मेरे लिए आकर्षण की तरह नहीं थी और न ही उसे हासिल करने के लिए मैं उससे जुड़ी थी। वैसे मैं दैहिक स्वतंत्राता की पक्षधर हूं पर ऐसा भी नहीं कि मैं अपनी देह को दाह का विषय बना दूं। 
मुझे पता है कि मैं एक नारी हूं और नारी हो कर किसी पुरुष से जुड़ाव रखना कई तरह की अफवाहों को उत्पादित करता है पर बबलू महतो के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। अफवाहें पैदा होने जैसी वहां बात ही नहीं थी। 
बबलू महतो के साथ मैं जंगल में थी पर कोई भी सुबह मुझे ऐसी नहीं जान पड़ी 
जिसमें गोते लगाने का मन किया हो। जबकि सुबह तो वैसी ही होती थी जैसी होनी 
चाहिए। चॉद तारे और बादल भी आये, रिमझिम करते हुए पर मन तो जैसे जड़ हो चुका था। मन में कोई हलचल नहीं, मुझे लगता है कि छिपते, छिपाते खुद को बचाते हम मशीनों में तब्दील हो चुके थे। अगर ऐसा नहीं होता तो हम जो तन की दुनिया होती है उसमें गोते लगा रहे होते पर हमलागों के तन में कुछ भी शेष नहीं था और न ही मन में कुछ था। 
बबलू महतो भी मेरी तरह से ही जड़ हो चुका था। उसके साथ रहते हुए मैं समझ सकती थी कि हम सामाजिक वर्जनाओं वाली दुनिया से बहुत दूर हैं और अपने मन तथा तन को खुला छोड़ सकते हैं पर हमने ऐसा नहीं किया।
हमें दो दिन लगे थे जंगल में घूमते हुए। इधर उधर हम भटक रहे थे जहां जाते वहां पुलिस ही दिखती। या उसके होने की सूचना मिलती। बबलू महतो जहां जाना चाहता था वहां पहुंचना मुश्ष्कल था। बबलू महतो भी जंगल का रास्ता भूल गया था। भला हो बबलू महतो के कामरेड साथियों और अखबारों में छपी खबरों का कि हम एक सुरक्षित पड़ाव पर पहुंच गये। बबलू महतो के साथी कामरेड अखबार में छपी खबरों को पढ़ कर हम लोगों को ढूढने लगे थे? उन्हें मालूम हो चुका था कि बबलू महतो अकेला नहीं है, उसके साथ एक लड़की भी है।
वे दो दिन गज़ब के थे पर हमलोगों ने कुछ गज़ब नहीं किया। हमारे सामने जंगल था और हम उसके भीतर थे पर जंगल हमें दुलार नहीं पाया, जंगल का कुदरती प्रेम हमें हासिल नहीं हो सका। हम दोनों साथ रहते, एक साथ सोते, बतियाते, कहां जाना है उसके बारे में सोचते, गुनतेे पर यह जो मन है नऽ इतना नियंत्रित व जड़ बन चुका था कि हम देह में तब्दील नहीं हो पाये। कहा जाना चाहिए कि मन के कौतुकों के लिए मन को खुला होना आवश्यक है। वहां हमारे मन व तन दोेनों बन्द बन्द थे, खुले नहीं थे। 
कहते हैं जो होना होता है वह हो ही जाता है यह आकस्मिक और अचानक होता है जिसके बारे में पहले कुछ भी पता नहीं होता। वही बन्द मन अचानक एक दिन खुल गया और हमदोनों के बीच वर्जनाओं की जो दिवार थी भरभरा कर गिर गयी। हम दोनों नर और नारी में तब्दील होने लगे थे। यह तब्दीली कैसे हो रही थी कम से कम मुझे तो नहीं पता शायद इसे बबलू महतो भी नहीं समझ पाया होगा, हो सकता है उसने समझ लिया हो और छिपा लिया हो। कम से कम मैं तो अपने बारे में स्पष्ट हूं कि उस समय मेरी देह क्या बोलना बतियाना चाहती थी और देह के व्याकरण में मैं कैसे डूबती चली जा रही थी मुझे कुछ भी नहीं पता। देह के करतब तो वैसे भी कौतुकपूर्ण और रहस्यमय होते हैं, देह अपनी कथा भाषा का आलोचक और समीक्षक स्वयं होती है सो मेरे लिए उस समय यह समझना आसान नहीं था कि मैं देह भाषा की चेतावनियों को समझ सकूं। वहां तो देह एक दूसरे तरह की 
चुनौती लिए खड़ी थी जो प्राकृतिक थी। फिर तो हमें नर और नारी के दैहिक प्रयोगों 
का उपकरण बनना ही था। शायद ऐसे ही संबधों को नर और नारी के अन्तर्लयन की अभिव्यक्ति कहते हैं।
बबलू महतोे अपनी सुरक्षा को लेकर तनाव में रहा करता था ही। हम दोनों के बीच जो होना था हो चुका था पर बबलू महतो नर और नारी के औचक हुए अन्तर्लयन से परेशान था। वह अपराधबोध से ग्रसित हो चुका था। एक ऐसा    अपराध जिसका वह अकेले अपराधी नहीं था। वह अपने पर दुखी था कि वह अपनी दृढ़ता नहीं बचाए रख सका। यह तो कमजोरी है यानि वह कहीं भी विचलित हो सकता है और मनुष्य की सबसे मजबूत ताकत दृढ़ता को खण्डित भी कर सकता है।
उस समय बबलू महतो को देखना अद्भुत था। बबलू महतो कांपने लगा था, एक मजबूत इच्छाषक्ति का आदमी, मेरे सामने कांप रहा था, वह अपराधबोध का शिकार हो चुका था उसे लग रहा था कि वह अपने तन की शुचिता बचाने में असफल हुआ है। वैसा तो मैं भी महसूस रही थी पर मैंने उस घटना को स्वाभाविक माना और अप्रायोजित भी जिसके लिए हम दोनों ने कोई योजना नहीं बनाई थी। यही सच भी था पर वह तो खुद में डूब गया था उसे लग रहा था कि उसने गलत किया है। जिसे हमारी सभ्यता अच्छा नहीं मानती।
उसे देख कर मैं खुद को उलाहने लगी... 
‘तुमने भी तो नहीं रोका, तुमको तो रोकना चाहिए था तब शायद हमलोग खुद को बचा पाते। देह तो वैसे भी कई तरह के खेल खेलती है पर हमें तो दैहिक खेलों की मनोरंजकता से खुद को बचाना चाहिए था। अब यह क्या है कि हम देह की मनोरंजकता में गोते लगाते रहें और मन को निरंकुश छोड़ दें। हमें दैहिक करतबों पर खुद ही तो अंकुश लगाना होगा।’
मैं लगातार बबलू महतो को देख रही थी, उस देखने में उसका चेहरा तो था ही, उसके चेहरे की बदलती मुद्रंाए भी थीं। उन मुद्राओं को देख पाना मेरे लिए कठिन था। मैंने बबलू महतो को समझाने का प्रयास किया...
‘कुछ चीजें किसी योजना और विचार की प्रतीक्षा नहीं करतीं बबलू! मुझे तो डर है कि तुम मेरे बारे में जाने कैसा निर्णय लो, सोचने गुनने को तो तुम यह भी सोच सकते हो कि तुम्हारे दैहिक करतबों में गोते लगाने के लिए मैं तुम्हारे साथ हूं पर ऐसा नहीं है बबलू! मैं तुम्हारी देह की लालची नहीं हूं और न ही उसके बाबत मेरे पास कोई योजना है। मैं तो तुम्हारे दिमाग और साहस की गुलाम हूं और उसी को जानने, समझने, परखने के लिए मैं जंगल की खाक छान रही हूं। आज की बदलती और अपने में डूब जाने वाली दुनिया में ऐसा क्या है कि अपनी जान की परवाह किए बिना तुम सामाजिक बदलाव की लड़ाई लड़ रहे हो। मैं कुछ नहीं कह सकती कि 
हम दोनों के बीच जो हुआ वह कैसे हो गया? अचानक नर, नारी में कैसे तब्दील 
हो गये हम। हम सचेतन होते हुए भी अपने अपने अवचेतन के कैसे शिकार हो गये। ऐसा तो कत्तई संभावित नहीं था। ऐसा तो हम दोनों के लिए असंभावित था लगता है संभावित और असंभावित के बीच भी कोई अटूट रिश्ता होता है। मेरा मानना है कि असंभावित घटनाओं को प्रकृति का कोई अज्ञात नियम मान कर दूसरी जरूरी बातों पर हमें ध्यान केन्द्रित करना चाहिए और यहां से निकल जाने के बारे में सोचना चाहिए। सो मैं तो कहूंगी कि तुम जो हुआ उसे भूल जाओ और यहां से सुरक्षित भाग निकलने के बारे में जो करना है उसके बारे में सोचो, अब हमें कहां जाना है कुछ तय करो।’
अचानक मेरे हाथ बबलू महतो के माथे पर पहंुच गये और मैं उसे दुलारने लगी। मुझे उस समय बहुत अच्छा लग रहा था फिर मैंने बबलू महतो को अपनी बांहों में जकड़ लिया। वह क्षण  अजीब था, उस क्षण का साक्षात्कार मेरे लिए कठिन था और उसकी अभिब्यक्ति उससे भी कठिन।’
बबलू से मिलने के पहले मैं सोचती थी कि यह जो जीवन है बहुत ही सरल है पर बाद में लगने लगा कि बहुत ही जटिल और खुरदुरा है। इसके हर पड़ाव पर कोई न कोई बाधा मुंह बाए खड़ी रहती है जो जीवन की सारी हसियों को लील जाती है। पर उसे थोड़ा साहस से देखो तो जान पड़ता है कि यह जो जीवन है नऽ है बहुत ही हसीन और चूमने लायक है, बाधांए तो आती रहती हैं ऐसा मैंने बबलू महतो के साथ रहते हुए जाना।
अजीब आदमी है बबलू महतो तमाम तरह के झंझावातों में भी वह हसने और झूमने का मौका निकाल लेता है। गोलियां चल रही होती हैं फिर भी उसके चेहरे पर तनाव नहीं होता। उस दिन की घटना तो मैं भूल ही नहीं पाती...
वह साधारण घटना नहीं थी। उसके कई साथी गोलियों के शिकार हो चुके थे फिर भी बबलू महतो ने घीरज और साहस नहीं छोड़ा। जाने कौन सी ऊर्जा है उसके पास कि उतनी भयानक घटना के बाद भी खुद को नियंत्रित किये हुए था। है नऽ अचरज की बात। वह सामान्य से भी सामान्य था उस समय, जैसे उसे पता हो कि यह सब तो होगा ही। उसे बन्दूकें हताश नहीं कर पाईं थीं पर दैहिक भाषा के व्याकरणों से हताश हो गया जैसे उसे सामाजिक वर्जनाओं ने गोली मार दिया हो।
बबलू महतो के बारे में मैंने बताया था अपने मित्रा को पर मेरा मित्रा उखड़ गया था...कृ
‘हां ऐसा तो है पर बबलू महता के करतबों को तूं मुझे क्यों सुना रही हो यह 
जानते हुए कि मैं गोलियों की भाषा में न तो रुचि रखता हूं और न ही उसके करतबों से दुनिया बदल जाएगी ऐसा ही मानता हूं। फिर भी मेरे दिल दिमाग पर बबलू महतो के उन करतबों को तूं चिपकाये जा रही हो जिससे मेरा दूर दूर तक नाता नहीं।’ 
रही बात दैहिक भाषा को रचने व गढ़ने की वह तो तुम गढ़ और रच ही चुकी हो। 
तुम स्वतंत्रा हो मन से भी और तन से भी, मैं उसके बारे में क्या कह बोल सकता हूं। मैं तो सिर्फ अपने बारे में सोच सकता हूं कि कैसे तन को मन के साथ जोड़े रखना है और कैसे मन को तन के साथ।
मित्रा चिढ़ गया, उसने धारा प्रवाह बोलना शुरू किया...
‘मैं चाहता हूं कि हम दूसरी बातें करे, हमारे पास बातों की कमी भी तो नहीं, इस समय हम बात करने के लिए तमाम तरह के दूसरे विषयों का चुनाव कर सकते हैं, शायद यही हमारे लिए उचित होगा।’
‘मुझे तो लगता है कि तूं मुझे बहका रही हो जिससे मैं तुझसे यह न पूछ पाऊं कि तूं मुझे अकेला छोड़ कर जंगल की तरफ क्यांे चली गयी? जंगल चले जाने तथा बबलू महतो से जुड़ जाने को कहीं तुम उचित तो ठहराना नहीं चाह रही! क्या तुझे लगता है कि जंगल जाने के बारे में तुझे मुझसे बातचीत नहीं करनी चाहिए थी, और साफ साफ बता देना नहीं चाहिए था कि तूं जंगल के प्रति उतनी ही रुचि रखती हो जितनी कि बबलू महतो के प्रति और तूं उसके प्रतिरोधी शक्ति से भी बुरी तरह प्रभावित हो?
मित्रा के सामने जंगल और जंगल की कहानियां दीख थीं। मित्रा गलत भी नहीं बोल रहा था। जंगल की कहानियों से उसे क्या लेना देना। वह तो मेरेे लिए महत्वपूर्ण थीं तो हुआ करें। मैंने मित्रा से प्रतिवाद किया...
‘मित्रा! तुझे जंगल कथा अच्छी नहीं लग रही, अच्छी लगेगी भी कैसे। तुझे तो लग रहा होगा कि मैं तुम्हारे किसी प्रतिनायक के साथ जुड़ गई हूं और मर्दखोर हूं। तुम क्या जानोंगे मित्रा कि जुड़ाव किसी विशेष पड़ाव का मोहताज नहीं होता। वह खुद पड़ाव होता है। सच मानो वह एक पड़ाव ही था मन की गुफा से निकला हुआ एक अदृश्ष्य पड़ाव जहां हम दोनों एक दूसरे में बिना किसी योजना के अन्तर्लयित हो गये थे। अगर ऐसा नहीं होता फिर तो हम देह के करतबों की पुनरावत्ति में लग जाते और तन की गुफा के एक एक कोने को देखने की कोशिश करते पर हमने ऐसा कुछ नहीं किया। अचानक ही हम अपने में डूब गये थे वैसे भी हमें डूबना ही था। एक दूसरे में डूब जाने में खोने वाली कोई बात नहीं थी कि हमने कुछ खो दिया है।
बबलू महतो प्रतिनायक नहीं है मित्रा! प्रतिनायक है एंकात, जंगल की खोमोशी, 
और वह रात भी जो हमें एक दूसरे में विलयित कर रही थी। खैर छोड़ो जंगल की बातों को, वहां की बातें जंगली बना देती हैं, ऐसा मैं समझ सकती हूं। हां एक बात और तुझसे मिलने बबलू महतो आया था नऽ।’
उससे क्या क्या बातें हुईं थीं बता सकते हो। जानते हो वह केवल मेरे लिए तुझसे मिलने आया था। वह चाहता है कि मैं जंगल से बाहर रहूं जिससे कोई कहानी मेरे 
जिस्म पर जंगल चस्पा न कर सके। जंगल में मंगल तथा जीवन जीने की स्वतंत्रा 
आकांक्षा भी है। वहां के पत्ते पत्ते पर मुक्तता के छन्द लिखे हुए हैं और जिसने उन छन्दों को पढ़ लिया वह जंगल का हो गया फिर तो उसके लिए न कोई कानून न कोई धर्म न कोई जाति और न ही कोई परिवार। जो प्रकृति के अनुशासनों के      पक्षधर नहीं हैं जंगल स्वतः उन्हें अपना विरोधी बना लेता है। जंगल के नियमों के बारे में तो तुझे पता ही होगा...
‘खैर बताओ नऽ क्या बातें हुईं थीं बबलू महतो से?’ मैंने मित्रा से साफ साफ पूछा...
‘कोई खास नहीं सिर्फ यह कि तुझे मैं अपने पास बुला लूं।’ 
बबलू महतो ने कहा था...कृ
‘‘तेरी मित्रा इस समय हमारे संगठन के साथ है, तुम उसे अपने पास रोक लो, किसी भी तरह से उसे बुला लो। मैं नहीं चहता कि खुद को वह बारूदी बना ले और बन्दूक चलाये। ऐसा करना उसके लिए न तो समय की मांग है और न ही कोई जरूरत। वह भावुकता वश मुझसे जुड़ गई है और सोचती है कि मैं उसकी भावनाओं में गोते लगाने लगूंगा।’ तुम जानते हो मेरे लिए किसी वसंती या फगुनहटी बयार का कोई मतलब नहीं, दरअसल तेरे मित्रा के लिए मुझे तेरे पास आना पड़ा। उसका  मेरे संगठन के साथ रहना ठीक नहीं, वह जरूरत से अधिक भावुक है। कृपा करके उसे अपने पास बुला लो..।’ 
बस यही तो बबलू ने कहा था। फिर महिलाओं को संगठन में शामिल करने के सवाल पर हम दोनों बातें करने लगे थे। मुझे भी बबलू अच्छा आदमी जान पड़ा था और अपने लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध भी। उसे कोई विचलित नहीं कर सकता। उसने उस रास्ते का चुनाव खुद किया है।’
मित्रा ने मुझे उलाहा...कृकृ
‘यह तो तुमने बताया ही नहीं कि तुम किधर से आ रही हो, तुझे तो कमिश्नर के यहां आना था, मैं वहां गया भी था पर वहां की सुरक्षा व्यवस्था देखकर मैं वापस घर आ गया। उसे आना होगा तो आ जाएगी। अब तक तूं कहां थी क्या कमिश्नर के यहां...’
‘हां वहीं थी, यहां का कमिश्नर बबलू का मित्रा है पर दोनों मानसिक रूप से एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, अलग सोच, काम करने की अलग धारा। वहीं से मैं तुम्हारे पास आयी हूं। कमिश्नर का मानना है कि वह सरकार का हिस्सा बन कर समाज को बदलने का काम संतुलित ढंग से कर सकता है, हथियार उठा कर नहीं। इसी बात को ले कर बबलू और कमिश्नर में झगड़ा चला करता है। दोनों जब मिलते हैं तो एक दूसरे को फटकारते हैं। बबलू कमिश्नर को सरकारी दलाल बोलता है तो कमिश्नर बबलू को खूनी तथा देशद्रोही। दोनों के तर्क अलग अलग हैं। दोनों के तर्कों में समय की ऑच दीखती है तो समय का ठंडापन भी। एक सरकार में रहते हुए, सरकार को विनम्र बना कर समाज बदलना चाहता है तो दूसरा सरकार से टकराकर, सरकार को कमजोर बना कर। आपसी झगड़े के कारण ही दोनों ने अलग अलग रास्ता चुना है। दोनों में शर्त लगी है कि कौन समाज को बदल देता है?
मित्रा अब तो मैं आ गयी हूं, साफ बताना क्या मैं तुम्हारे साथ एक दोस्त की तरह रह सकती हूं। तुम्हें तो पता ही है कि मैंने दैहिक पवित्राता खो दिया है, तूं मुझे दैहिक रूप से एक अपवित्रा नारी मान सकते हो।’
मित्रा चकरा गया। उसे अन्दाजा नहीं था कि मैं बातचीत करने के परदे को भी फाड़ दूंगी। बातचीत में कम से कम परदा तो रहना ही चाहिए। मित्रा नहीं समझ पा रहा था कि वह मुझसे क्या बोले क्या नहीं बोले...
कुछ देर बाद मित्रा ने मुझसे कहा...कृ
‘तूं मेरे लिए आज भी वही हो, पहले वाली। मेरे लिए तन की नहीं, मन की पवित्राता जरूरी है और मैं समझ सकता हूं कि तुम्हारा मन पवित्रा है उसे देह अपवित्रा नहीं कर सकती। यह घर पहले भी तुम्हारा था और आज भी है।’
मित्रा की खुली बातें सुनकर मेरी ऑखें खुली कि खुली रह गईं। मैं सोच में पड़ गई कि मेरा मित्रा क्या है, नायक या प्रतिनायक? 
सोच विचार में प्रकाशित,अंक, 2, 2013, 9 जुलाई 2013

        
स्थितिप्रज्ञ                                       

और  ठीक दो घंटे बाद वह मेरे साथ थी, अकेली अद्भुत, सांवला रंग, गदराया जिस्म, कुछ तलाशती बेचैन ऑखें, क्षमा मांगते हुए उसने आह भरी...कृकृ
‘थोड़ी देर हो गई, क्या है कि बहुत दूर से आना था, जाने क्या है कि जंगल छोड़ता ही नहीं, बाहर निकलो तो तमाम तरह के कौतुक, डर भी किसिम किसिम के, जाने कहां, कब और कैसे प्रस्तुत होना पड़े। क्या क्या बताना पड़े अपने बारे में कि मैं कौन हूॅ। जंगली इलाके में क्यों रहती हूॅ, फिर यह समझना आसान तो नहीं कि सामने वाला मुझे कैसा समझ रहा? कहीं देह ही तो नहीं देख परख रहा? वह मुझे देख रहा या मेरी देह के भूगोल पर कोई पुष्ट अपुष्ट नक्सा बना रहा। वह कुछ भी कर सकता है या करने की कम से कम कोशिश तो कर ही सकता है, मन है तो तन की चाह भी तो होगी। 
मेरे पास ऐसी कुशलता नहीं कि आगत समझ लूं। किसी से बातें करती हूॅ तो लगता है कि जंगल बोल रहा है। डरती हूॅ जंगल से जबकि वहां रंचमात्रा भी दिखावा नहीं जिसे मुलायम औपचारिकता कहा जाता है। झगड़ना है तो झगड़ना है, प्यार करना है तो करना है। आप तक आने में देरी हो गई, देरी के लिए क्षमा करें।’
‘मोबाइल से आवाज आई थी मेरा नाम उसमें झनझनाया था। 
‘हेलो शिवेन्द्र जी बोल रहे है।’
अजनवी के द्वारा अपना नाम सुन कर मैंे चकरा गया था। क्योंकि कोई परिचित होता तो उसका नाम मोबाइल में उभरता पर किसी का नाम नहीं उभरा। मैंने सहजता से बताया...
कि हां, हां मैं ही बोल रहा हूॅ। फिर दुबारा कहाकृहां, हां मैं शिवेन्द्र ही बोल रहा हूॅ।’
मोबाइल पर लम्बी बातचीत के बाद उधर से सन्देश आया... 
‘आपका कुछ समय चाहिए मुझको’ 
आवाज साफ थी कि दूसरी ओर कोई शाालीन सी महिला है फिर महिला का परिचय भी गूंजा था मोबाइल में’
महिला का परिचय सुनते ही लगा कि मैं न तो आसमान में हूॅ और न ही जमीन पर, कहां हूॅ पता नहीं। पिछले पन्द्रह दिन के अखबार फड़फड़ाए, फड़फड़ाता हुआ प्रशासन दिखा, गॉव गॉव ऐश करती बन्दूकों के नाचने वाले दृश्य दिखे, लोग जगह 
जगह प्रताड़ित किये जा रहे थे, पकडे़ जा रहे थे, जांच की जा रही थी कि मोबाइल वाली महिला कहां है जिसने जंगल गरमा दिया है। जंगल तो कभी अपने से गरम होता नहीं फिर कैसे गरम हो गया? इतिहास साक्षी है कि केवल एक दो बार ही तो जंगल गरम हुआ है वह भी अंग्रजों के जमाने में, बिजयगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह ने भी एक बार जंगल गरमा दिया था। बाद में तो कभी ऐसा सुना ही नहीं गया। वन तो जीवन है, ऋषि, मुनियों की तपस्थली है तप करने की। पर अब तो हर तरफ ताप ही ताप दिख रहा जंगल में, अजीब महिला है जंगलियों को प्रतापी बना रही है? 
मुझे जानकारी थी कि इधर कुछ वर्षों से जंगलियों में कुछ दूसरे ढंग का ऊर्जा पैदा हुई है। वे समझने लगे हैं कि जंगल का पूरा इलाका कभी उनका था। जहां उनका अपना कानून था, रीति रिवाज थे परंपरायें थीं और वे चाहें तो अपने क्षेत्रा का मसीहा भी बन सकते हैं। इसी मसीही अन्दाज में जंगली बदलने लगे हैं। 
वह महिला मेरे पास आई थी, उस पर आरोप था कि वह जंगलियों को मसीहा बना रही है, उन्हें व्यवस्था की कुव्यवस्था के खिलाफ लड़ना सिखा रही है कि बिना लड़े कुछ हासिल नहीं होता। प्रशासन सक्रिय हो गया था कि किसी भी तरह उक्त महिला को पकड़ लेना है या एनकाउन्टर कर देना है। एनकाउन्टर करना पुलिस के लिए सधा हुआ दमन का विकल्प होता है। इस विकल्प के बारे में ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता कि पुलिस उक्त महिला की पकड़ के बाद उसके साथ कैसा व्यवहार करती। वैसे भी पुलिस के पास क्रूरताओं के विकल्पं जितना प्रभावकारी भूमिका में होते हैं विनम्रताओं के बहुत ही कम होते हैं।
पुलिस ने मुखवीरों तथा अन्य श्रोतों से पोख्ता कर लिया था कि उक्त महिला के कारण जंगल में हर ओर चिनगारी दिख रही है। ऐसी सूरत में उक्त महिला को गंभीर आरोपों में जेल भेजना जरूरी है तभी जंगल में शान्ति की आशा की जा सकती है। मुझे मालूम था कि कि उक्त महिला को पकड़ने के लिए पुलिस संभावित ठिकानों पर छापे मार रही है। उसके ऊपर रासुका लगाने की तैय्यारी चल रही है। कहीं रासुका लग न गया हो उसके ऊपर, किसे पता? 
फोन उसी महिला का था। मैंने झूठा बहाना बनाया उससे कि नहीं मिल पाऊंगा, निकलना है कहीं।’ 
लेकिन महिला को मेरी बातें न सुनना था, न मानना था सो सीधे वह मेरे घर चली आई। तब तक मैं कहीं निकल भी नहीं पाया। अब घर में होते हुए बहाना बनाना कि नहीं हूॅ, मुझे अच्छा नहीं लगता सो महिला से मिलना ही था। महिला 
वही थी अखबारों में छपी फोटो वाली।
महिला देखने में भली और सरल दीख रही थी। कहीं से भी ऐसा नहीं जान पड़ रहा था कि वह जंगल को आवेशित कर सकती है। मैं तो पहले से ही उसके बारे में अचरज पी रहा था। दुआ सलाम की औपचारिकता के बाद महिला बतियाने लगी.‘तो आपने कल का पेपर देखा होगा, मेरी फोटो छापी गई है, मुझे देश के लिए खतरनाक बताया गया है, इस बाबत सभी दैनकों ने समता के धर्म का निर्वाह किया है, पुलिस मुझे गिरफतार करना चाह रही है, हो सकता है एनकाउन्टर भी कर दे’
मेरी ऑखें महिला के खूबसूरत चेहरे की गोलाई पर टिकीं थीं। साफ साफ दिख रहा था कि उसके चेहरे पर बलिदानियों वाली उत्तेजनाएं नाच रही हैं। मुझे लगा कि मैं महिला से साफ साफ कह दूं कि किसे सुना रही हो यह सब।आखिर तुझे क्या पड़ी है जो धरती का खुरदुरापन मिटाना चाह रही हो, मिटा पाओगी क्या?’
महिला की ऑखें मेरी ओर एकटक थीं, जैसे कुछ खोज रही हों मुझमें। समझना आसान नहीं था, मुझे संशय हुआ। यदि महिला की खोजी ऑखों ने मुझे जान लिया तो... 
‘कि मैं क्या हूं और क्या दिखता हूं, कहा जाता है कि ऑखों में आदमी की असलियत हमेशा नाचती कूदती रहती हैै।’
मैंने तत्काल अपनी ऑखों को दूसरी ओर कुछ ऐसे घुमाया कि महिला धोखा खा जाये जिससे कि मैं अपनी भद्रता बचा सकूं पर ऐसा संभव नहीं हो पाया फिर भी मैंने उसे बहकाने का प्रयास किया। एक तरह से मैंने महिला के साथ उपेक्षात्मक व्यवहार किया फिर भी महिला थी कि अपनी रौ में थी, वह दुबारा बतियाने लगी-कृ
‘आपकी कहानियों एवं लेखों का पढ़ कर पहले ही मैंने अनुमान लगा लिया था कि आप घर गृहस्थी वाले ही होंगे। आज तो आपके घर के भीतर से छन कर आने वाली आवाजें भी साफ साफ बता रही हैं कि मेरा अनुमान सही था। इतनी हरियाली, आपकी नाक की सीध वाला गुलाब, चमकते महकते बेला के फूल, सामने के यूकिलिप्टस उससे थोड़ा दूर फलों से लदे हुए अमरूद के पेड़, सामने वाला नींबू अभी फूला नहीं है शायद, ओफ कितनी मादक होती है उसकी सुगन्ध। यहां तो किसी तपस्थली माफिक शान्ति फैली हुई हर ओर। मन के गहरे में डूब जाने तथा चित्त और चेतना दोनों से संवाद करने के लिए इससे अच्छी जगह मैंने आज तक कहीं नहीं देखा है। भीतर कहीं गहरे में रेगिस्तान ही क्यों न हो फिर भी उसमें कुछ न कुछ यहां की हरियाली तो रहेगी ही। मुझे विश्वास है कि आपके यहां मुझे निराश नहीं होना पड़ेगा, मेरी बातें आप अवश्य ही सुनेंगे और गुनेंगे।’
महिला धाराप्रवाह थी, उसका कहा हुआ सारा कुछ मुझे सुनना ही था। जल जमीन 
जंगल के सवाल पर जनपद के प्रशासन को हिला देनी वाली महिला जिसने अपनी सुकुमारता को कहीं फेंक रखा है, जिससे मेरी जान पहचान तक नहीं है, वह अचानक 
एक दिन मेरे घर पर आ धमकेगी। मैं उसके किसी काम का नहीं था, एक अक्षरबटोर किसी के काम का हो भी नहीं सकता। अगर कोई अक्षरबटोर हो भी तो कम से कम मुझे नहीं पता। कानून की जानकारी से मैं भयग्रस्त था, जबकि महिला मेरे सामने 
ही बैठी हुई पूरी तरह आश्वस्त थी कि जो होगा, होगा उससे क्या घबराना?
मैं डरा हुआ था क्योंकि मुझे पता है कि किसी अपराधी को अपने घर पर टिकाना, छिपाना तथा उसे संरक्षण देना अपराध है। वैसे भी मैं तो बालिग होने के बाद से ही थाने के नाम से ही कांपता रहा हूं जाने कब और कहां जिस्म के किस हिस्से पर अदना सा एक सिपाही भी अपराध की धारा लिख दे। महिला के आने के बाद से ही मैं इस कमजोरी को छिपाने की कोशिश कर रहा हूं पर मुझे लगता है कि महिला ने मेरी भद्रतागत कमजोरियों को पकड़ लिया है और हिकारत से मुझे देखते हुए कह रही है...
‘कैसे मर्द हो, अभी तो दाढ़ी के बाल भी नहीं पके हैं, यदि मेरे साथ रहना हो तो...’ 
पर ऐसा नहीं था वह तो खामोश थी, उसका मौन मुझे पोर पोर तोड़ रहा था। वह मेरे पास आई थी थोड़ी सी सहायता के लिए, और मैं उसकी सहायता करने के पहले ही हथकड़ियां पहन ले रहा था। मझे खुद पर शर्म आई। 
किसी तरह महिला से पूछा... 
‘अखबार में जो कुछ भी छपा है मैंने पढ़ लिया है, मुझसे आप क्या अपेक्षा रखती हैं यह तो बतायें...’
महिला खिलखिलाई। उसके गोरे गाल, लाल लाल हो गये। झटके से उसने ओढ़नी संभाला जो सरक गई थी। उसके उभार अनावश्यक ढंग से दिखने लगे थे। महिला कुछ बोलने ही वाली ही थी कि चाय आ गई। चाय पत्नी लेकर आई थीं, उसने शिष्श्टता का निर्वाह करते हुए पत्नी को नमस्कार किया। पत्नी तो किसी छुई मुई की तरह, उन्हें हवा से भी देह छुआने का डर बना रहता है किसी तरह बोलीं--कृ 
‘ खुष्श रहऽ ’ 
महिला ने अतिरिक्त  शिष्टता दिखाया... 
‘बैठिए भाभी जी, मेरा नाम शीला है और भाई साहब को बताने आई हूं कि मैं एक शान्तिप्रिय महिला हूं, मेरा काम खून खराबा नहीं है जैसा कि अखबारों में छपा है, पुलिस मुझे तलाश रही है, भाई साहब से थोड़ी सी मदत लेनी है जिससे कि मैं अदालत में आसानी से सरेन्डर कर सकूं फिर चाहे जो होकृ’
पत्नी कभी उसे देखतीं कभी मुझे, तोलने जैसा, क्या तोलना चाह रही थीं? कहना मुश्किल, वैसे मैं उनके चेहरे पर उभरी प्रतिक्रियाओं का पढ़ रहा था। शायद वहां अग्नि रेखायें हों, सन्देहों से जलती भभकती पर मेरे देखने में वहां शून्य का विस्तार ही दिखा। जहां किसी क्रिया की कोई प्रतिक्रिया नहीं।
पत्नी ने चाय की प्यालियां उठाते हुए कहा...कृ
‘खाना बन गया है’
मेरे बोलने से पहले ही महिला बोल पड़ी..कृ
‘थोड़ी देर में खाएंगे भाभी।’ 
पत्नी के चले जाने के बाद महिला ने सीधे पूछा जिस लिए वह मेरे पास आई थी...
‘भाई साहब मैं क्या करूं... अदालत में सरेन्डर करूं या गिरफतारी दूं, मुझे तत्काल कोई निर्णय लेना ही लेना है क्योंकि मुझे छिपाकर रखना मेरे सहयोगियों के वश का नहीं है, हमारे साथी अपराधी नहीं हैं। इतना बता चुकने के बाद महिला ने एफ.आई.आर. की कापियां मुझे थमाया यह कहते हुए कि भाई साहब पढ़िए इन्हें, एफ.आई.आर. की तीनों नकलें तीन थानों की थीं, तीनों के वजन समान थे उसमें लिखित सारी दफायें गैर जमानती थीं, अमूमन इन दफाओं में निचली अदालतें जमानतें नहीं दिया करतीं।
किसी कानूनी विशेषज्ञ की तरह मैंने महिला को समझाया कि इनमें जमानत तो हाईकोर्ट से ही संभव है। निचली अदालत से जमानत संभव नहीं है। मैंने अपनी ऑखें उसके चेहरे पर स्थिर कर दिया यह देखने के लिए कि उसके मुलायम चेहरे पर जेल की यातनाएं नाच रही हैं कि नहीं पर वहां तो कुछ भी नहीं था, जो था सिर्फ इतना कि जेल में ठूंसने से अधिक प्रशासन कर भी क्या सकता है? वह स्थितिप्रज्ञ हो चुकी थी।
मेरी राय सुनकर महिला हसने लगी... 
‘मुझे मालूम है कि जेल जाना होगा, मैं जेल जाने के लिए तैयार हूं। वहां नया अनुभव मिलेगा, मुझे जेल से डर नहीं है। डर है पुलिस से क्योंकि पुलिस मनुष्यता की सारी हदें तोड़ देती है इसी लिए चाहती हूं कि आप किसी तरह से मेरा समर्पण अदालत में करवा दें। यही तकलीफ देने के लिए मैं आपके पास आई हूं।’ 
इतना बोल कर महिला कहीं खो गई। मुझे महसूस हुआ कि महिला व्यवस्था के पेचीदा जालों के बारे में सोच रही होगी कि यहां तो अपने हक़ हकूक के लिए संघर्ष करना भी अपराध है।
मैं पहली बार आग और दरिया का करतब देख रहा था वह भी नाजुक सी दिखने 
वाली महिला  के चेहरे पर। मुझे महसूस हुआ कि चाहे जो भी हो, भले ही पुलिस मुझे गिरफ्तार कर ले पर हर हाल में इसका सरेन्डर अदालत में कराना है, वर्ना पुलिस तो इसे कुछ का कुछ बना देगी फिर पहचानना ही मुश्किल हो जाएगा कि जिस महिला से मैं मिल चुका हूं क्या यह वही महिला है आग से खेलने वाली। 
फिर मैंने महिला को साफ साफ बताया...
‘अदालत में सरेन्डर तो किसी भी हाल में तुम्हें मैं करवा दूंगा, इसके लिए चाहे जो भी बवाल मुझे झेलना पड़े पर एक दो दिन का समय लग सकता है सरेन्डर कराने में। अदालतें सरेन्डर तभी लेती हैं जब अपराध करने की सकारात्मक रिपोर्टें थाने से अदालत में आ जाती हैं नहीं तो काहे के लिए सरेन्डर लेंगी अदालतें? जेल का खाना हराम का तो है नहीं, दो ढाई सौ रुपया प्रति दिन एक कैदी पर सरकार का खरच होता है’ 
मैंने महिला को आश्वस्त किया, मेरे हां कहने पर महिला खिल उठी, उसके गालों पर फतह की रेखायें उभरीं, ऑखें थोड़ी बड़ी और गंभीर हुईं फिर उसने कहा...
‘मुझे यकीन था कि आप मुझे निररश नहीं करेंगे और मेरा सरेन्डर अदालत में  करवा देंगे।’ 
 तीसरे दिन मेरे एक वकील मित्रा ने महिला का अदालत में सरेन्डर करवा दिया। सरेण्डर कराने में कोई बाधा नहीं हुई। 
महिला के सरेण्डर के समय मैं भी अदालत था,  मैं देख रहा था कि महिला जेल वाली गाड़ी पर  चढ़ाई जा रही है।  मैं सोच रहा हूॅ उसके बारे में...आखिर वह आज के सुविधा भोगी समय में जेल की नागरिकता के लिए काहे मरी जा रही है, पढ़ी लिखी है चाहे तो समय को मुलायम और हसीन बना सकती है, इस तरह से खुरदुरा बनने की क्या जरूरत?
महिला जेल की गाड़ी पर सवार हो रही थी और उसकी ऑखें मुझसे वही आदिम सवाल पूछ रही थीं भाई साहब जल जमीन और जंगल किसका? अदालत से घर वापस होने पर पत्नी ने आद्र भाव से मुझसे पूछा था.... 
‘महिला का क्या हुआ? जेल चली गई नऽ’ अभी तक महिला की जमानत नहीं हो पाई है, कम से कम छह महीने तक तो जमानत होगी ही नहीं, बाद में क्या होगा अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ दिन बाद पत्नी ने मुझे सहलाते हुए कहा कि उसकी जमानत करवा दीजिए, भले ही पुलिस हमलोगों को परेशान करे पर बाद में कभी भी उसके चक्कर में मत पड़िएगा, मुझे तो बहुत भली लगती है बेचारी। 
   
  अंगूठा
 दीहल को क्या पता था कि एक दिन वह अपने गॉव का परधान बन जाएगा। उसे ही नहीं गॉव के किसी आदमी को भी एसा अनुमान नहीं था पर वह परधान बन गया और दिल्ली लखनऊ के नेताओं से अधिक प्रतिशत वोट भी पाया गया था। यानि कि गॉव के सत्तर फीसदी लोगों ने दीहल को अपना वोट दिया था। गोया दीहल अपनी ग्रामसभा में लोकप्रियता के शिखर पर था। दीहल जितना लोकप्रिय तो गिने चुने होते हैं, दीहल का मुकाबिला दिल्ली लखनऊ वाले क्या करेंगे? 
जिस दिन ब्लाक पर वोटों की काउन्टिंग हो रही थी उस दिन भी दीहल ब्लाक पर नहीं था। उसे चुनाव लड़ाने वाले बाऊसाहब ने सुबह ही अपने बैठका पर बुलवा कर सहेजा दिया था...कृ
‘देखो! दीहल हम तो पहिलहीं चले जांएगे ब्लाक पर तूं बाद में हमरे करिंदा के संघे ब्लाक पर चले आना।’
दस बजे दिन के आस पास बाऊसाहब का करिंदा दीहल के मड़हा की तरफ गया। मड़हा पर दीहल नहीं था। उसकी पत्नी ने बताया कि सबेरहीं कहीं निकल गये हैं, कहां चले गये हैं नाहीं मालूम। दीहल की पत्नी भी परेशान थी, उसे मालूम था कि बलाक पर वोटों की गिनती होगी, ‘आज ओन्है उहां रहना चाहिए।’
बाऊसाहब के करिंदा ने फोन से बाऊसाहब से बातें की...
सरकार! दीहल अपने घरे नाहीं है, अब का करें? उसके मेहरारू को भी नाहीं मालूम कि दीहल कहां चला गया है? हम बलाक पर आ रहे हैं सरकार! 
‘नाहीं तूं दीहल को साथ ले कर ही ब्ब्लाक पर आना’  बाऊसाहब ने करिन्दा को सहेजा।
करिंदा फिर दीहल को खोजने चला गया। ब्ब्लाक पर अभी दीहल के गॉव का नंबर वोट गिनती के लिए नहीं आया था। ब्ब्लाक वालों ने अक्षर क्रम से ग्राम सभाओं के वोटों को गिनने की व्यवस्था किया था। अनुमान था कि दीहल के ग्रामसभा के वोटों की गिनती दोपहर बाद ही शुरू होगी। बाऊसाहब अपने समर्थकों के साथ ब्लाक पर जमे हुए थे।
ब्लाक मुख्यालय के सामने एक बगीचा था, मौसम भी बरसात वाला नहीं था। 
वोटों की गिनती का परिणाम जानने वालों की भीड़ बगीचे में छितराई हुई थी, किसी पेड़ के नीचे कहीं लोग बैठे हुए थे तो कहीं खड़े खड़े गलचउर कर रहे थे। बाऊसाहब आम के एक छतनार पेड़ के नीचे अपने समर्थकों के साथ बैठे हुए थे। ब्लाक पर बाऊसाहब के अगल बगल ब्लाक के प्रमुख लोगों का जमावड़ा था। 
वहां पहले से ही बाऊसाहब के लोगों ने दरियां बिछा दिया था और प्रभावशाली लोगों के लिए पांच छह कुर्सियां भी रखी हुई थीं। पर उन पर कोई बैठा हुआ नहीं था, केवल बाऊसाहब ही कुर्सी पर विराजमान थे। वह दृश्य देखने लायक था। बाऊसाहब धूप की तरह चमक रहे थे लगता था कि यह जो चमक है उसे बाऊसाहब ने ही बनाया हुआ है, वैसे भी उनके चेहरे का रंग रूप भी चमकदार था, कोई भी चमक वह चाहे जहां से आए बाऊसाहब के चेहरे को ही चूमती उसे दूसरा चेहरा रास नहीं आता। बाऊसाहब की चमक में डूबे हुए वे लोग भी बैठे हुए थे, जो अपने चेहरों को उनके चेहरे की चमक से चमकाया करते थे। उन लोगों को पता था कि अगला ब्लाक प्रमुख भी बाऊसाहब को ही होना है। उन्हें दूसरा कोई हरा नहीं सकता।
ग्राम परधानी के हार जीत के परिणाम आने शुरू हो चुके थे। विजयी प्रत्याशी सबसे पहले बाऊसाहब के आसन के पास जाता, उन्हें सलाम बजाता, उनका आशीर्वाद लेता फिर अपने लोगों के साथ जीत की खुशी में निकले जुलूस के साथ हो लेता। गगन भेदी नारों में एक नारा उसके जिन्दाबाद का भी होता।
करीब दो बजे के आस पास ब्लाक के भीतर से खबर आई कि बाऊसाहब के गॉव की काउन्टिग शुरू होने वाली है। खबर सुनते ही बाऊसाहब ने अपने किसी खास से पूछा...
‘दीहल आया कि नहीं’ 
‘नाहीं आया सरकार!’ किसी ने जबाब दिया
जबाब सुन कर बाऊसाहब बिदक गये। दूसरी जगह होती तो दीहल को दो चार गाली भी देते पर मन में उठने वाली गालियों को बाऊसाहब चबा गये। मर्यादा पूर्ण तरीके से बोले....कृ
‘दीहल भी अजीब आदमी है, आज उसे यहां होना चाहिए था, यहां से जीत का प्रमाण पत्रा किसी दूसरे को थोड़य मिलेगा’ फिर बाऊसाहब ने अपने करिन्दा के बारे में पूछा... ‘वह कहां है?
‘दीहल को बुलाने गया है सरकार!’ यह उŸत्तर बाऊसाहब के ड्राइबर का था जो बाऊसाहब से अलग थोड़ा दूर बैठा हुआ था। दस मिनट भी नहीं बीते होंगे कि बाऊसाहब के गॉव का नंबर आ गया। बाऊसाहब ने तत्काल अपने उन दो आदमियों को काउन्टिग कराने के लिए भेजा जिनके नाम पहले ही ब्लाक कार्यालय पर दर्ज 
कराए जा चुके थे।
काउन्टिग हुई और दीहल भारी मतों से चुनाव जीत गया। चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद जुलूस निकाला जाना था पर दीहल का कहीं अता पता नहीं था। बाऊसाहब ने आदेश दिया कि जुलूस निकाल दो चाहे दीहल रहे न रहे पर उसकी जीत का नारा नहीं लगाना, वह जब है ही नहीं फिर उसके नाम का नारा काहे लगाना, माला फूल जो कुछ भी पहनाना है वह सब गॉव के सबसे बुजुर्ग बुद्धन तेली को पहना दो।
जुलूस बाजे गाजे के साथ चल पड़ा। अब जहां बाजा गाजा हो और नारा आसमान के पार न जाए ऐसा कैसे संभव है? नौजवान लड़के मानने वाले तो थे नही, वे अपनी रौ में आ गये फिर तो पूरा ब्लाक परिसर नारों से गूंज उठा...
दीहल जिन्दावाद, दीहल जिन्दावाद, गनीमत थी कि किसी के लिए मुर्दावाद नहीं हुआ। नारा गूंजते ही बाऊसाहब का कारिन्दा दीहल के साथ वहीं आ गया फिर क्या था दीहल को माला फूल से लाद दिया गया और जोरदार नारे लगाए जाने लगे। नारों तथा माला फूल में डूबते ही दीहल को लगा कि वह भी कुछ कम नहीं हैं, जो हुआ अच्छा ही हुआ नहीं तो उसने बाऊसाहब को नकार दिया था कि उसे चुनाव नाहीं लड़ना। बाऊसाहब ने उसे जबरिया चुनाव लड़वाया था, यह पूरे गॉव को पता था।
बहरहाल चुनाव खतम हो गये और गॉव अपनी पुरानी स्थिति में आ गया, सभी लोग अपने अपने कामों में लग गये। करीब साल भर गुजरे होंगे कि गॉव में एक खबर जोर से फैली...
दीहल ने बाऊसाहब का साथ छोड़ दिया है, वह अब उनके साथ नहीं रहता, उसने उनका खेत भी छोड़ दिया है जिस पर बतौर असामी खेती किया करता था। 
यह खबर गॉव के लिए बहुत बड़ी थी कोई सोच नहीं सकता था कि जल में रह कर मंगर से बैर यह कैसे संभव है? कितनों को तो यकीन ही नहीं हुआ, वे कहते कोई नाटक होगा बाऊसाहब का। बाऊसाहब का साथ यानि गुलामी दीहल कभी भी नहीं छोड़ सकता। पर खबर दमदार ही नहीं सच भी थी।
खबर सच थी फिर भी किसी को नहीं मालूम था कि दीहल ने बाऊसाहब का साथ क्यों छोड़ा? एक दिन गॉव में छलका निर्माण की जांच करने के लिए कुछ     अधिकारी आ गए। अधिकारियों ने दीहल को पकड़ लिया।अधिकारियों के साथ साथ गॉव का नया सेक्रेटरी भी था। अधिकारियों ने दीहल से पूछा...
‘आपके गॉव में छलका कहां बना है चलिए हमलोगों को दिखलाइए।’
दीहल को मालूम नहीं था कि गॉव में कोई छलका भी बना है सो उसने         अधिकारियों का साफ साफ बता दिया। साहब हमरे गॉव में छलका नाहीं बना है 
ऊ कउने दूसरे गॉव में बना होगा।
सेक्रेटरी ने भी दीहल के गॉव का चार्ज चुनाव के बाद लिया था। उसे भी छलका के बारे में नहीं मालूम था सो वह चुप चुप था। जांच अधिकारियों ने गॉव के कई 
लोगों से पूछ ताछ किया पर छलका निर्माण के बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं था। अंत में उस परधान को पकड़ा गया जिसके कार्यकाल में छलका का निर्माण हुआ था। वह भी बाऊसाहब का ही आदमी था, दीहल की तरह। बाऊसाहब ने ही उसे चुनाव लड़वाया था तथा अपने प्रभाव से जितवाया भी था।
पुराने परधान को भी पता नहीं था कि उसके कार्यकाल में कभी छलका का निर्माण कराया गया था। निर्माण वस्तुतः कराया ही नहीं गया था, सारा कुछ कागज के खेल जैसा था।
बाऊसाहब कागजी खेल में माहिर थे, उन्हीं से मिलता जुलता उस समय का पाड़े सेक्रेटरी भी था। छलका निर्माण की योजना बनी, योजना पास हुई, उस पर धन भी आया और देखते देखते सारा धन खर्च भी हो गया पर पुराने परधान जी को मालूम तक नहीं हुआ कि किस काम के लिए धन आया था और कैसे खरच हुआ? पुराना परधान परेशान हो गया, वह लगा गिड़गिड़ने... 
‘साहब हमैं कुछ नाहीं मालूम, हम एक पैसा भी नाहीं पाए हैं, हम अंगूठा छाप गंवार हैं, यह सब बाऊसाहब अउर सेक्रेटरी साहब ने किया है साहब!’
भौतिक सत्यापन वाले अधिकारियों ने पूरा गॉव घूम कर देखा पर कहीं छलका का निर्माण नहीं दिखा। पुराना परधान अवाक और रोता, गिड़गिड़ता, इसके अलावा करता भी क्या? पुराना सेक्रेटरी बुलाने पर भी नहीं आया। सत्यापन वाले अधिकारियों ने पुराने सेक्रेटरी को सत्यापन में सहयोग देने के लिए लिखा पढ़ी में बुलाया था। मालूम हुआ कि वह बीमार है और बाहर कहीं ईलाज के लिए गया हुआ है।
भौतिक सत्यापन वाले अधिकारियों ने नए परधान तथा गॉव के लोगों के बयानों को नोट किया और सत्यापन के काम को समाप्त करके गॉव से निकल गए।
एक सप्ताह बाद मालूम हुआ कि पुराने परधान तथा पुराने सेक्रेटरी पर मुकदमा कायम हो गया है और उन्हें किसी भी समय गिरफ्तार किया जा सकता है।
दीहल को समझते देर नहीं लगी कि छलका निर्माण के धन को बाऊसाहब तथा सेक्रेटरी मिलकर खा गये हैं और कागज पर निर्माण दिखा दिया गया है। बेचारा पुराना परधान तो बिना अपराध किए ही जेल चला जाएगा बाऊ साहब के कारण, उसे जेल जाना ही है। दीहल सावधान हो गया कि उसे बाऊसाहब से बच कर रहना है पर बाऊसाहब आश्वस्त थे कि वे जैसा कहेंगे वैसा ही दीहल करेगा। दीहल के मन में डर पैदा हुआ कि बाऊसाहब से बच कर रहना आसान नहीं सो उसे अपना अॅगूठा ही काट देना चाहिए, न अॅगूठा रहेगा न उसे किसी कागज पर अॅगूठा लगाना पड़ेगा। दीहल घर में से टॅगारी उठा लाया और अॅगूठा काटना चाहा पर वह डर गया, अॅगूठे के बिना वह मिहनत मजूरी का काम कैसे करेगा?कृनहीं नहीं उसे अॅगूठा नहीं काटना है फिर उसने अॅगूठा काटने के बारे में सोचना ही बन्द कर दिया।
एक दिन बाऊसाहब ने दीहल को बखरी पर बुलवाया, बखरी पर गॉव का सेक्रेटरी 
पहले से ही उपस्थित था। बाऊसाहब तथा सेक्रेटरी ने किसी कागज पर अंगूठा लगाने के लिए दीहल से कहा। दीहल ने इनकार कर दिया कि वह किसी भी कागज पर अंगूठा नहीं लगाएगा। वह अंगूठा तभी लगाएगा जब वह कागज गॉव वालों की हाजिरी में पढ़ा जाएगा, उसे पुरनका परधान की तरह जेहल नहीं जाना है।
बाऊसाहब को दीहल पर बहुत गुस्सा आया उन्होंने उसे गालियां दीं पर दीहल ने अंगूठा नहीं लगाया और बाऊसाहब की बखरी से अपने घर भाग आया तबसे आज तक वह बाऊसाहब की बखरी पर नहीं गया और न ही कभी जाएगा। उसे पता चल गया है अंगूठे की कीमत। वैसे भी वह परधान है न कि बाऊसाहब। वह कागज पर अंगूठा गॉव वालों के सामने तथा अपने लड़के छोटकुआ से पढ़वा कर ही लगाएगा फिर गलती काहे होगी, वह पुरनका परधान नाहीं है। वह गॉव का परधान है जो करना होगा अपने मन से करेगा, गॉव वालों से पूछ कर करेगा पर बाऊसाहब के कहने पर कुछ नहीं करेगा। 

आकाश वाणी ओबरा 2016, से प्रसारित

         खरीददार

‘तो भाई साहब! मैं रामचरन गुप्ता हूं, और नगर पालिका के चेयरमैन पद का उम्मीदवार हूं।’
‘हां हां भाई साहब! आप तो जानते ही हैं कि आज के समय में चुनाव किसी खिलवाड़ की तरह हो गया है, जाने कैसे कैसे कैसे लोग चुनावों में खड़े हो जाते हैं, अपनी नगर पालिका के चुनाव में ही देखिए, कुल बीस प्रत्याशी खड़े हैं जबकि उनके बारे में कोई जानता तक नहीं है।’
रामचरन जी के साथ आया हुआ प्रकाश ने मुझे समझाया...
रामचरन जी अकेले नहीं थे उनके साथ पांच लोग और थे उनमें मैं प्रकाश को जानता था। और दूसरों को भी जानता हूं पर उतना नहीं जितना प्रकाश को। जब से मैं नगर में रहने लगा हूं तभी से प्रकाश को नगर की तमाम समस्याओं को लेकर हल्ला बोलते हुए देख रहा हूं।
एक बार तो मैंने उसे तब देखा था जब वह थाने पर इन्कलाब जिन्दाबाद का नारा लगा रहा था और थाने के सिपाही अपने में गोता लगाते हुए जाने किस विचार मंथन में थे और दारोगा प्रकाश को देख देख मुस्करा रहा था। मैं नहीं समझ पाया कि दारोगा क्यों मुस्करा रहा है। समझ में आने लायक बात भी तो नहीं थी। थाने के गेट पर इन्कलाब जिन्दाबाद तथा दारोगा मुर्दाबाद हो रहा हो और दारोगा मुस्करा रहा हो, ऐसा तो होता नहीं।
मैं सोचने लगा आखिर दारोगा खामोश क्यों है? मुझे लगा कि दारोगा लोकतंत्रा के उदार संस्कारों से संस्कारित एक समझदार आदमी है, अंग्रेजी नश्ल वाला कड़ियल नहीं, या हो सकता है कि दारोगा समझ चुका हो कि इन्कलाब जिन्दाबाद से होता क्या है, नारों से समाज तो बदलता नहीं। लोग नारे लगाते रहते हैं, चिल्लाते रहते है और प्रशासन अपना काम करता रहता है। प्रशासन अगर नारे लगाने वालों पर ध्यान नहीं दे तो नारे अपने आप थोथे हो जाते है और उनका अर्थ किसी चिल्ल पों से अधिक नहीं होता।
बहरहाल मुझे थाने पर लगाए जाने वाले नारे से क्या लेना देना था मैं तो अपने काम से थाने पर गया हुआ था। मुझे थाने पर रिपोर्ट लिखवानी थी कि मेरा मोबाइल 
कहीं खो गया है। नारे की आवाजों को छोड़ कर मैं सीधे थाने की आफिस में घुसा। थाने का आफिस उतना बड़ा नहीं था जितना थाने का रोब और प्रभाव हुआ करता है। मैं थाने के रोब में डूबा हुआ था तभी आफिस में बैठे एक वर्दी वाले ने रोबदार आवाज में मुझसे पूछा...
‘का है, इहां उहां का घूम रहे हो?’
रिपोर्ट लिखवानी है सर!
‘कैसी रिपोर्ट? क्या हुआ कहीं मर्डर हो गया का?’
‘नहीं सर मर्डर नहीं हुआ है, मेरा मोबाइल खो गया है, यह है प्रार्थनापत्रा’
‘देखें’ वर्दीधारी ने प्रार्थनापत्रा मुझसे मांगा
वर्दीधरी प्रार्थनापत्रा देखने लगा...
‘तो आपका मोबाइल खो गया है। मोबाइल खो गया और आपको पता नहीं चला। कही नक्सलाइटों को तो नहीं दे दिया, आजकल यही चल रहा है।’
वर्दीधारी मुस्कराया और...
‘इसे दारोगा जी को दे देता हूं देखिए वे क्या करते हैं।’ 
मैं समझ चुका था कि यह ऐसे नहीं मानने वाला, कुछ और करना होगा, कुछ और तो पहले से ही मालूम था कि मुझे प्रार्थना पत्रा के साथ पचास रुपये की एक नोट लगा देना चहिए था जिससे प्रार्थना पत्रा में वजन आ जाये और मैने वही किया। फिर तो वर्दीधारी मुस्कारने लगा...
‘समझदार आदमी लगते हो, दूसरी कापी दो, रिसीव कर लेता हूं। मैंने उसे प्रार्थनापत्रा की दूसरी कापी दिया फिर उसने उसे रिसीव कर मुझे लौटा दिया। 
मैं खुश खुश था और परेशान भी कि थाने पर मुझे अपमान नहीं झेलना पड़ा। पचास रुपये तो आते जाते रहेंगे पर बिना मोबाइल के मेरा काम नहीं चलने वाला, बिना एफ.आई.आर. के मुझे पुराना नम्बर भी नहीं मिल सकता फिर यह भी डर था कि हो सकता है कोई मेंरे सिम का गलत उपयोग करे और मैं उसके लिए फंसू सो हर हाल में एफ.आई.आर. कराना जरूरी था, जो हो गया। एक काम खतम होने की खुशी मुझे थी। 
थाने के बाहर इन्कलाब जिन्दाबाद का नारा अपनी रौ में था और थाना उसे लापरवाही पूर्वक भूलने में था। ज्योंही मैं थाने के दफ्तर से बाहर निकलने वाला था तभी मैंने देखा कि बड़ा दारोगा अपने मातहतों को समझा रहा था...
‘नारा लगाने वालों को चिल्लाने दो, नारों से क्या होता है, जाओ उन लोगों के लिए चाय वगैरह ले आओ और पिलाओ उन्हें।’
मैं समझ नहीं पाया कि यह दारोगा किस नश्ल व गोत्रा का आदमी है, नारा लगाने 
वालों को चाय पिला रहा है। आखिर किस जमाने का है यह दारोगा? 
दारोगा आधुनिक लिवाश में था और देखने में गंभीर आदमी जान पड़ रहा था। 
मुझे दारोगा से बातें करने की इच्छा हुई और बिना परवााह किए कि वह मुझसे बातें करेगा कि नहीं, मैं उसके पास चला गया, उसे नमस्कार किया...
‘सर मैं आपसे कुछ बात करना चाहता हूं’ मैंने दारोगा से निवेदन किया
‘हां हां बात कीजिए नऽ, बातें ही तो मनुष्य को मनुष्य बनाती है नहीं तो आदमी, जाने क्या हो जाये। खैर जाने दाजिए इसे आप नहीं समझेंगे। 
‘आप क्या बात करना चाहते हैं?’ दारोगा नेे मुझसे पूछा
अभी मैंने सुना है कि नारे लगाने वालों को आप चाय पिलवाना चाहते है और एक सिपाही को ऐसा करने के लिए आपने सहेजा भी है, ऐसा क्यों सर?
‘मुझसे ऐसा क्यों पूछ रहे हैं आप ? आपको मेरे काम से क्या लेना देना, क्या मैं किसी को चाय नहीं पिला सकता?’
‘हां सर लेना देना तो कुछ भी नहीं, पर मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप नारे बाजी को रोकने के लिए हैं या उसे बढ़ावा देने के लिए...’
‘बहुत आसान बात है भाई। मेरा काम नारों को रोकना भी है और कभी कभी उसे बढ़ाना भी। उन्हें चाय पिलवाना इस लिए जरूरी है कि वे दुबारा भी इसी तरह के नारे लगांए और अपना विरोध प्रकट करें। वे विरोध प्रकट नहीं कर पायेंगेे फिर तो हमारा काम ही बन्द हो जाएगा। हमें कैसे मालूम होगा कि उन्हें हमसे क्या चाहिए बहरहाल आज जो यहां नारे लग रहे हैं वे सिर्फ इस लिए लग रहे हैं कि नगरपालिका के चुनाव होने वाले हैं, नाम फैले और वोट मिले पर मैं आपसे बता दूं कि यह जो प्रकाश है नऽ, जो उछल उछल कर नारे लगा रहा है इसे उसकी पारटी का टिकट भी नहीं मिलेगा, टिकट पाने वालों की नश्ल दूसरी होती है प्रकाश वाली नहीं।’
मेरी तरफ आंखें घुमा कर दारोगा ने गंभीर हो कर मुझसे पूछा...
आप कौन हो भाई? यहां क्या करने आये थे?
मैंने अपने बारे में उसे बताया। वह चौंका...कृ 
‘तो आप लेखक हो, कहानियां और उपन्यास लिखते हो, फिर तो आप प्रकाश पर भी कहानी लिखो। साल भर से मैं प्रकाश को देख रहा हूं यह आदमी हर जगह तनेन खड़ा मिलता है। आपको पता है एक दिन मैंने इसे उठवा लिया था। शायद आपको मालूम हो कि छह सात महीने पहले प्रकाश ने बिजली आफिस को घेर लिया था और मांग कर रहा था कि बिजली की आपूर्ति में सुधार किया जाए, इतना ही नही इसने अधिशासी अभियंता तक को भी उस दिन बंधक बना लिया था। बंधक न बनाता तो शायद मेरी वहां जरूरत भी नहीं होती, मैं मातहतों को भेज देता।’
एस.पी. साहब तो उस दिन काफी गुस्से में थे।
‘एक अदना सा आदमी अधिशासी अभियंता को बंधक बना लेता है और आप हो कि सो रहे हो। उसे उठवा लो और ऐसा सबक सिखाओ उसे कि नारे लगाना भी भूल जाये, बंधक बनाने का तो सपना ही न देखे। वही हुआ मैंने उसे उठवा लिया 
और एक ऐसी जगह रख दिया जहां उसे तकलीफ न हो। एस.पी. तो चाहते थे कि उसके ऊपर मुकदमा कायम कर दिया जाये पर मैंने उन्हें समझाया कि इस नगर में एक ही तो आदमी है जो लोगों के लिए लड़ता है। अपने लिए वह लड़ना ही नहीं जानता। उसका अपना कोई काम भी नहीं, लोगों के काम को अपना काम समझता है। उसके ऊपर मुकदमा लादना उचित नहीं होगा सर! फिर मुकदमे से क्या होता है? वह और मजबूत हो जाएगा, सो उसे इग्नोर करना ही ठीक होगा। एस.पी. देहाती दिल दिमाग वाला था से मेरी बात मान गया।’ 
उस समय मैंने प्रकाश के साथ उदारता क्यों बरती, इस बात को मैं आज तक नहीं समझ पाया बन्धु! कहीं न कहीं जनता के लिए प्रकाश का लड़ना मुझे भी अच्छा लगता है। आज भी वही प्रकाश यहां नारे लगा रहा है, कोई तो है इस शहर में जिसका यकीन नारों, घेरावों और सत्याग्रह में है हिंसा से कोसों दूर वरना आज तो हर जगह हिंसा ही लोकप्रिय हो रही है।
मैने देखा कि दारोगा भावुक हो उठा है, भावुकता में वह कुछ अधिक ही बातें करेगा सो मुझे चाहिए कि मैं उससे माफी मांगू और यहां से फूट लूं। उसने मुझे भी चाय पिलायी और पढ़ने के लिए मेरी किताबें मांगा। मैंने एक दिन उसे अपना कहानी संग्रह दिया उसने तुरंत उसका मूल्य मुझे थमा दिया। मेरे लाख मना करने पर भी नही माना। रुपया लेकर मैं थाने से लौट आया। 
आज मेरे सामने मेरे घर पर वही प्रकाश बैठा हुआ है जिसकी गिरफ्तारियों की खबरें अखबारों में पढ़ा करता था। दो तीन महीने गुजरते नहीं थे कि उसके बारे में कोई न कोई खबर अखबारों में आ जाती थी कि प्रकाश ने पी.डब्लू.डी. के दफ्तर पर घेरा डाल दिया है, कि प्रकाश कचहरी प्रांगण में अनशन पर बैठ गया है। पुलिस ने उसे उठा लिया है। 
मेरे सामने बैठा हुआ वही प्रकाश रामचरन को वोट देने के लिए मुझसे पैरवी कर रहा है कि मैं रामचरन के लिए प्रचार करूं। मैं प्रकाश को देख रहा हूं पर उसे देखना ही काफी नहीं था। मुझे अचानक दारोगा द्वारा कही बातें याद आयीं, उसने साफ कहा था कि प्रकाश को पारटी कभी भी टिकट नहीं देगी, वही हुआ। ऐसे आदमी कभी भी आज की राजनीति से कुछ हासिल नहीं कर सकते।
मैं अपनी आदत को क्या कहूं मन के भावों को मैं रोक नहीं पाता हूं फिर तो 
प्रकाश से पूछ बैठा...
भाई प्रकाश! आप चुनाव नहीं लड़ रहे हो क्या? आपने टिकट के लिए आवेदन किया था कि नहीं’
मेरे सवाल से प्रकाश मुर्झा गया, लगा कि रो पड़ेगा। धीरे से बोला... 
‘आवेदन किया था पर मुझे योग्य नहीं माना गया, माना गया कि मैं चुनाव ठीक से लड़ नहीं पाऊंगा, रुपये पैसे से कमजोर आदमी हूं, खाता कमाता भर हूं, ऐसे 
आदमी चुनाव नहीं लड़ सकते, और मैं हूं कि पारटी छोड़ नहीं सकता।’ 
मेरे घर से लौटते समय प्रकाश ने मुझसे निवेदन किया, अपने लिए नहीं रामचरन के लिए...
‘भाई साहब रामचरन जी मुझसे योग्य आदमी हैं, इस चुनाव में लाखों रुपये खर्च करने वाले हैं, हमारी पारटी खर्च करने में कमजोर नहीं पड़ेगी, आप इन पर ध्यान देने की कृपा करें।’
प्रकाश चला गया और मैं उसका जाना देखता रहा। दारोगा ने सच कहा था कि पारटी प्रकाश को टिकट नहीं देगी। हुआ वही मैंने सोचा यह आदमी मरेगा भी तो नारा लगाता हुआ पर कभी किसी पद पर विराजमान नहीं हो सकता। पद पर विराजमान होने वाली आर्थिक योग्यता इसके पास नहीं है और पद उसे ही हासिल हो सकता है जो पद को खरीद सकता है। प्रकाश की मजबूरी है कि वह कभी भी पद का खरीददार नहीं बन सकता। आज के समय में नारों का कोई मतलब नहीं, जो अच्छे नर है वे नारे नहीं लगाते, जिनके घर हैं वे घेराव नहीं करते।
प्रकाश चला गया और मैं उसमें जाने क्या खोजता रहा शायद कोई कहानी या कोई कविता।                

        पर परदर्शन हो तब नऽ
 
उस दिन रापटगंज गरम था। वैसे रापटगंज गरम होना नहीं जानता। मुगल आये, अंग्रेज आये, यहां से चुनाव लड़ने और जीतने के लिए किसिम किसिम के बाहरी चेहरे आये। वे चुनाव जीते और संसद तथा विधान सभा में बैठ भी गये। ठेकेदार आये, कारोबारी आये फिर भी रापटगंज कभी गरम नहीं हुआ यहां कभी हल्ला नहीं उठा कि हमारे जिले में ये जो बाहरी लोग आकर जम जा रहे हैं, क्यों आ रहे हैं? यहां के सारे रोजगारों और कारोबारों को हथिया ले रहे हैं। उस पर कभी हल्ला नहीं मचा न धरना न प्रदर्शन और न ही घेराव। 
और तो और साहब! मैं क्या बोलूं हमारे यहां का जो खनन उद्योग है नऽ उसे प्रशासन ने क्यों बन्द किया हुआ है कोई नहीं बोल रहा। हुआ यह कि खनन कार्य के दौरान कुछ मजूरे खनन हादसे के शिकार हो गये। जिनकी लापरवाही या गलती से मजूरे मारे गये उनको तो नहीं पकड़ा जा सका और न ही उस दुर्भाग्यपूर्ण हादसे की विधिक ढंग से जॉच ही हुई। आनन फानन में खनन कार्य को ही जिले में बन्द कर दिया गया। लाखों मजूरे जिनकी रोजी रोटी खनन उद्योग के द्वारा चलती थी वे बेचारे भूखों मरने लगे। किसे नहीं पता कि खनन ही रापटगंज का लोक उद्योग है। बेकारी ऐसी बढ़ी कि बेचारे मजूरे भीख मांगने के लिए विवश हो गये फिर भी हमारा कस्बा गरम नहीं हुआ। हमारा कस्बा तो उस समय भी गरम नहीं हुआ जब जंगल विभाग लाखों वनवासियों को वन अधिनियम की धारा 4 और 20 लगा कर उजाड़ रहा था और अब तक तो उन्हें पूरी तरह से उजाड़ भी चुका है।  
श्रीमान!् हमारे शहर को कस्बा ही बोलिए। अभी इसमें शहर वाली रौनक तथा चमक नहीं आयी है फिर भी कभी गरम होना नहीं जानता, हमेशा ठंडा रहता है पर जाने क्या हुआ कि उस दिन अचानक गरम हो गया इतना गरम कि गलियां, सड़कें और दुकानें तपने लगीं...
मामला पाकिस्तान का था, हमारे दो सैनिकों को बार्डर पर मार गिराया गया था और उनके शिर काट लिए गये थे। उसके दो दिन पहले हमारा कस्बा दिल्ली के रेप कांड को लेकर गरम हो चुका था। यह दूसरा अवसर था जब हमारा कस्बा गरम हो 
रहा था।
मैंने उस दिन अपने कस्बे की गरमी देखी। चौराहे पर आग में सनी हुई भीड़ थी मुझे लगा कि चौराहे पर खड़ा होना और अपने लोगों की गरमी सोखना मुष्किल काम है। इस समय लोग शोला बने हुए हैं और कुछ भी कर सकते हैं।
चौराहे पर भाषण हो रहे थे, भाषण क्या थे, आग परोसी जा रही थी...
‘रेप कांड के अपराधियों को चौराहे पर खड़ा करके गोली मार दो, पाकिस्तान को उखाड़ कर फेंक दो।’ 
मैं क्या करता? मैं तो असमंजस में था और खुद से पूछ रहा था अरे! तुम्हारा पक्ष क्या है। पाकिस्तान तथा रेपकांड के मुजरिमों के बारे में तुम क्या बोलना चाहते हो। मुझे अचानक लगा कि मेरा भी वही पक्ष है जो चौराहे की भीड़ का है पर मैं चौराहे पर खड़े लोगों की तरह आगबबूला नहीं हो सकता था सो मैं शान्त था।
हमारे कस्बे में उपरोक्त दोनों घटनाओं को ले कर दो तीन दिन तक लगातर गरमी बनी रह गई थी फिर अपने आप ठंडा हो गया था हमारा कस्बा। कैसे ठंडा हो गया इसके बारे में क्या बताना आखिर कितने दिनों तक किसी बात की गरमी की उमर हो सकती है? इस तरह की आकस्मिक गर्मियों की उमर वैसे भी तो बहुत कम होती है, एक दिन वाली, दो दिन वाली बहुत हुआ तो चार पांच दिनों तक वाली।
कस्बे के गरम होने वाला दिन मेरे लिए शुभ शुभ नहीं था। मुझे लगा था कि मैं एक डरपोक आदमी हूं। रेप कांड हो चाहे हमारे सैनिकों की हत्या। मेरे लिए इस लोकतंत्रा में इस तरह के सवाल नहीं ऐसे जो मुझे गरम कर सकें। पता नहीं क्या है कि मैं भयभीत हो जाता हूं, इस तरह के सवालों को सुन कर। ऐसा क्यों होता है मेरे साथ मुझे पता नहीं।
चौराहे पर भाषण चल रहा था। कोई सरकार को दोष दे रहा था तो कोई देश की मर्दानगी को धिक्कार रहा था। भाषण देने वालों के चेहरों पर पसरी मर्दानगी मुझेऔर डरा रही थी। उनके चेहरे जरूरत से अधिक चमक रहे थे और मैं उनके चेहरों की चमक में गोते लगा रहा था तथा इतिहास में दर्ज किए गये बहादुरी की परिभाषाओं को मूल्यांकित कर रहा था। ‘मारो या मर जाओ’ की संस्कृति से मैं कोसांे दूर रहने वाला आदमी हूं। मेरी समझ में आया कि निश्चित ही मैं एक डरा हुआ आदमी हूं और जाहिर है कि डरा हुआ आदमी दूसरे से डरे न डरे खुद से तो अवश्य ही डरता है।
अचानक मंच से एक आदमी का नाम पुकारा गया और उसके बारे में बताया गया कि अगले दिन से वह आदमी उपरोक्त मुद्दों को लेकर कलक्ट्रेट पर आमरण अनशन करेगा। फिर क्या था उसे मालाओं और फूलों से लाद दिया गया। उसकी जय जयकारंे होने लगीं जैसे नेहरू और गांधी जी के नाम पर हर 26 जनवरी और 15 अगस्त पर होती हैं। मैंने भी अचानक दो तीन बार ‘जय’ ‘जय’ बोला। मुझे खुशी हुई कि चलो हमारे कस्बे में एक आदमी तो ऐसा है जो अति संवेदनशील ऐसे मुद्दों 
पर गंभीर है और आमरण अनशन के लिए तैयार है।
मेरे पांव जो घर की तरफ बढ़ रहे थे अचानक रूक गये और मैं मंच की तरफ बढ़ चला। ‘ऐसे आदमी को देख लेना चाहिए और दूर से ही सही प्रणाम कर लेना चाहिए।’
मैं कैसे पहचानता कि वह जो अनशन पर बैठने वाला है, वह कौन है? मंच पर ढेर सारे आदमी थे जो सभी मालाओं से लदे फदे थे। उनकी चमक में अनशन पर बैठने वाले आदमी को पहचानना मुश्किल था। उसका नाम भी नहीं सुन सका था। मंच पर पसरी गर्मी के कारण वहां खड़ा रहना मेरे लिए कठिन था सो मैं दुबारा घर की ओर बढ़ चला रास्ते में प्रमुख दैनिक का एक पत्राकार मिला, उससे दुआ सलाम हुई फिर प्रदर्शन के बारे में बातें हुईं।
‘जाने हमारा देश कहां जा रहा है, रोज ही बलात्कार, हत्या हो रहे हैं, उसके खिलाफ अनशन, प्रदर्शन तो होना ही चाहिए।’
फिर वह रुक गया जैसे उसके बोल ही सूख गये हों। 
‘क्यों क्या हुआ? बोलते बोलते रुक क्यों गये’ मैने पत्राकार से पूछा
‘ऐसे ही जाने दीजिए इस माहौल में मैं कुछ नहीं बोलूंगा कल अखबार में आप पढ़ लीजिएगा।’
‘हुआ क्या यार! कुछ तो बताओ’ 
अखबार में प्रदर्शन के बारे में छपेगा और क्या। आज कल पूरे देश के अखबार इसी मुद्दे को छाप रहे हैं’ मैंने पत्राकार को कुरेदा
पत्राकार तो पत्राकार। सूचनाओं को चबाने खाने और पचाने वाला, वह भला क्यों कर मेरी बात पर ध्यान देता, वह टाल गया। बात को दूसरी तरफ उसने मोड़ दिया।
‘कोई बात नहीं’ एक लघु उत्तर
पर बात तो थी ही जिसे वह मुझसे गुप्त रखना चाहता था। मैं चौराहे से            सीधे घर चला आया सोचता गुनता कि हम कहां जा रहे हैं, बलात्कार और भष्टाचार क्या ये सब आज के समय की ही घटनायें हैं या पहले भी हुआ करते थे ये सब?
दिन को तो बीतना तथा दूसरे दिन को आना ही होता है और दूसरा दिनआ गया उसके साथ अखबार भी आया। आज का अखबार मेरे लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पत्राकार ने अखबार में कुछ छपने की बातें की थीं। मै अखबार के पन्नों को पलटने 
लगा और अपने अंचल वाले पृष्ठ पर आ गया।
‘तो क्या आमरण अनशन की घोषणा करने वाला रात में ही गिरफ्तार कर लिया गया?’
अखबार में तो ऐसा ही लिखा था फिर विवरण दिया गया था। आमरण अनशन की घोषणा करने वाले पर आरोप लगाया गया था कि उसने बलात्कार किया है, पुलिस उसे तीन दिन से तलाश कर रही थी पर उसका पता नहीं चल रहा था। पता चलते 
ही गिरफ्तार कर लिया गया।
अखबार में आमरण अनशन की घोषणा करने वाले की फोटो भी प्रकाशित थी। 
मैं उसे जानता था। वह वही आदमी था जिसने एक नामी कंपनी द्वारा उजाड़ी जा रही बस्ती को न उजाड़ने के लिए विरोध ही नहीं जन-संघर्ष किया था और कंपनी के अधिकारियों से लड़ गया था। वहां मारपीट भी हो गयी थी। उस समय भी उसे धारा सरपट यानि फौजदारी की धारा 107/117 में एस.डी.एम. के निर्देश पर पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया था। कंपनी उसे लाखों रुपया दे रही थी कि वह कंपनी के कार्यों में बाधा न पहुंचाये फिर भी वह कंपनी का विरोध करने पर अड़ा हुआ था। सुलह के लिए तैयार नहीं था।
कंपनी को उक्त दलित बस्ती अखरती थी। कंपनी के मुख्य गेट के सामने ही दलित व कमजोर लोग बहुत पहले से ही झुग्गी झोपड़ी लगाकर निवास बना लिए थे। कंपनी चाहती थी कि वे वहां से उजड़ जांयंे जिससे कंपनी उस जमीन पर बाउन्ड्री बनवा सके। ठीक गेट के सामने दलित बस्ती का होना कंपनी की सूरत बिगाड़ने वाला था। कंपनी अपने स्तर से तथा प्रशासनिक अधिकारियों को मिला कर आमरण अनशन की घोषणा करने वाले को किसी बड़े षडयंत्रा में फसाना चाहती थी। और उसे फसा ही दिया। बलात्कार से बढ़ कर दूसरा षडयंत्रा क्या हो सकता है?
दूसरे दिन पत्राकार का फोन आयाकृ
‘आपने अखबार पढ़ा कि नहीं’
‘पढ़ लिया’ उस पत्राकार ने पूछाकृ.
‘तो क्या आज भी चौराहे पर आमरण अनशन करने की घोषणा करने वाले आदमी की झूठे मुकदमे में गिरफ्तारी के विरोध में नारेबाजी और भाषण होंगे शिवेन्द्र जी?’
मेरी तो समझ में ही नहीं आया कि क्या जबाब दूं पत्राकार को। मैंने पत्राकार से पूछा...
‘ऐसे गलत समाचार आप अखबार में छापते ही क्यों हो। आमरण अनशन की घोषणा करने वाला बलात्कारी नहीं हो सकता उसे कंपनी वाले और अधिकारियों ने मिल कर फर्जी मुकदमे में फसाया है, कम से कम आप तो जानते ही हो।’
‘मैं भी जानता हूं ष्शिवेन्द्र जी! पर समाचार कैसे गलत है? समाचार तो सही है। पुलिस ने आमरण अनशन की घोषणा करने वाले को गिरफ्तार किया ही है। आज उसका चालान भी भेज देगी फिर समाचार कैसे गलत हुआ? गलत तो यह है कि एक निर्दोष आदमी को पुलिस ने फर्जी दफाओं में पकड़ लिया है जिसने किसी भी तरह का अपराध किया ही नहीं है। ऐसी स्थिति में तो एक जोरदार प्रदर्शन बनता है कि नहीं! 
‘प्रदर्शन तो बनता है भाई! पर प्रदर्शन हो तब नऽ’। 
लेकिन एक बात और है, कोई भी सरकार इतनी विनम्र नहीं होती कि आमरण 
अनशन की घोषणा को सामाजिक मॉग मान कर बर्दास्त कर ले, चाहे वह लोकतांत्रिक सरकार ही क्यों न हो।
मैने पत्राकार को बताया।
‘हॉ ठीकै बोल रहे हैं आप!’
पत्राकार ने फोन बन्द कर दिया, कब तक? शायद अगला फोन आने तक के लिए। 

आकाशवाणी, ओबरा दिसंबर 2017

         ‘अब मैं गलत नहीं हूं सर!’

एक दिन एक लड़का मेरे घर आया, वह अपना नाम मेरे कस्बे के कालेज में लिखवाना चाहता था उसने कक्षा आठ पास किया हुआ था।
उसने मुझे अपनी मार्क्ससीट दी। 
‘सर! मैं प्रथम श्रेणी में पास हुआ हूं और आगे पढ़ना चाहता हूं, मेरा नाम अपने कालेज में लिखवा दीजिए।’ 
मैंने उसकी मार्क्ससीट देख कर पूछा...
‘तो तुम्हारा नाम कन्हैया है?’
‘जी‘ उसने विनम्रता से बताया
वह प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण था। गॉव का लड़का और प्रथम श्रेणी; मैं लड़के से प्रभावित हुआ, लड़का तेज है, इसका नाम कालेज में लिखवा देना चाहिए। ( 1980 के पहले प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होना अचरज की बात हुआ करती थी) 
मैेने उसको सहेजा... 
‘आज ही प्रवेश फार्म खरीद लो और उसे भर दो, मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हारा नाम लिख लिया जाये।’
लड़का चुप था, उसने हां हूं कुछ भी नहीं किया, मुझे ताकता रहा जैसे कुछ कहना चाह रहा हो और कह नहीं पा रहा हो। हो सकता है फीस वगैरह न हो, लड़का गरीब घर का हो। मैंने लड़के को टोका...
‘कुछ बोलते क्यों नहीं, क्या कोई परेशानी है?’
‘जी कोई परेशानी नहीं,’ 
‘कुछ कहना चाहते हो तो निःसंकोच बोलो...’
‘हां सर!’
‘बोलो तो...कृक्या कहना चाहते हो?’ मैंने उससे पूछा
‘यह जो मार्क्ससीट आप देख रहे हैं न सर! वह एक तरह से मेरी है और नहीं भी है’ उसने बताया
‘मतलब, मैं कुछ समझा नहीं, यह कैसे हो सकता है, मार्क्ससीट पर तुम्हारा नाम 
कन्हैया लिखा हुआ है, तुम्हारे पिताजी का नाम भी लिखा हुआ है, फिर तो तुम्हारा 
ही हुआ’
‘हां हुआ तो... पर मैंने परीक्षा नहीं दी थी सर’
‘परीक्षा नहीं दी थी फिर भी पास हो गये’ मैंने उससे पूछा
‘हां सर, यही तो मैं बताना चाहता हूॅ आपको’
‘यह कैसे हुआ? मैं चकरा गया, क्या बोल रहा लड़का 
‘बस हो गया सर! यह मैं नहीं बता सकता आपको ’ 
‘‘यानि तूने परीक्षा नहीं दिया है’ मैंने उससे पूछा
‘हां सर! पर मैं ं आगे पढ़ना चाहता हूं, अच्छी तरह से, अब ऐसा नहीं करूंगा’
लड़का अद्भुत है, अपनी गलतियों के बारे में कोई नहीं बताता। यह लड़का तो साफ साफ बोल रहा है। मुझे लगा कि इस लड़के से जुड़ना चाहिए और मैं उससे जुड़ भी गया। चाहता हूं कि आप भी उससे जुड़ें। इस स्तर पर आप उस बात को छोड़ दीजिए कि उसका नाम आगे लिखा गया कि नहीं, उसने कैसी पढ़ाई की? 
आजकल वह प्रदेश की सरकार में मंत्राी है और मेरे कालेज के वार्षिकोत्सव में आया हुआ है। उसके जीवन की कई कहानियां ऐसी हैं जो ऑखें खोलने वाली हैं। उसकी कहानियों में कुछ रहस्य हैं, कुछ रोमांच हैं तो कुछ दिल को धड़काने वाले तथ्य हैं। चाहे उसकी कहानी को पाठक अच्छा मानें या बुरा पर वे ऐसी हैं जो सच के सभी किनारों को प्यार से दुलारती हैं यानि कन्हैया की कहानी में कविता के सारे गुण हैं, कविता का एक रूप सच बयानी वाला भी है जबकि कहानी को सचबयानी तक पहुंचने में सदियां लग जांएगी।
मैं समझ सकता हूं कि आपके पास प्रतिक्षा के लिए समय नहीं है और आप फटाफट कन्हैया की कहानी से दो चार होना चाहते हैं। मुझे भी जल्दी है। माननीय मंत्राी जी जिसका नाम कन्हैया है, उनके स्वागत सत्कार के लिए मुझे जाना है, तो आइए बिना देर किए कन्हैया की कहानी के साथ चलते हैं...
यह कहानी कन्हैया के स्कूल के दिनों की है, कन्हैया आठवीं में पढ़ रहा था, वह स्कूल कम ही जाता था, या कहिए कि नहीं जाता था, यह उसकी आदत थी, एक दिन प्रधानाध्यापक ने अपने कार्यालय में उसे तलब किया...
‘तुम स्कूल क्यों नहीं आते हो?’ हाथ में छड़ी लिऐ हुए मिडिल स्कूल के           प्रधानाध्यापक ने कन्हैया से सख्ती के साथ पूछा...
‘गुरू जी! मैं तो लगातार स्कूल आता हूं; आप जब स्कूल पर होते थे तब मैं स्कूल में रुकता था, नहीं तो नहीं।’
‘शिक्षा मित्रा तो आता था नऽ, और वह बालकिशुन भी जिसे मैंने अपनी जगह पर पढ़ाने के लिए स्कूल में रखा हुआ है, वह भी तो प्रतिदिन स्कूल आता है।’
हां गुरूजी! वे तो रोज ही आते हैं, उन्हीं से पूछ लीजिए मैंने भी अपनी उम्र के 
एक लड़के को अपनी जगह पर पढ़ने के लिए लगा दिया है, वह भी रोज स्कूल आता है, उसे एक रुपया रोज देता हूं। पास खड़े एक लड़के से कन्हैया ने तस्दीक भी करा 
दिया...
‘हां गुरूजी! मैं तो रोज ही आता हूं’ कन्हैया के एवजी लड़के ने प्रधानाध्यापक को बताया
प्रधानाध्यापक गुसिया गये...
‘स्कूल में तुम्हारा नाम लिखा हुआ है या इस लड़के का?’
‘मेरा लिखा हुआ है गुरूजी! पर उससे क्या हुआ, कोई तो मेरी जगह पर पढ़ रहा है नऽ।’
‘स्कूल में नाम तुम्हारा लिखाया हुआ है और पढ़ेगा तुम्हारा कोई एवजी’          प्रधानाध्यापक ने कन्हैया को डांटा...
आपका एवजी भी तो स्कूल में आपकी जगह पर पढ़ा रहा है गुरू जी! जब वह गलत नहीं फिर मैं कैसे? अब तो मैं पास भी हो चुका हूं, मेरी मार्क्ससीट दीजिए और मैं चलूं...मुझे आगे नाम लिखवाना है।’
प्रधानाध्यापक असमंजस में पड़ गये, उनकी चोरी पकड़ी गई। कक्षा आठ उत्तीर्ण का प्रमाणपत्रा कन्हैया को देते समय प्रधानाध्यापक ने कन्हैया से पूछा...कृ
‘एक बात बताओ तुम परीक्षा कैसे उत्तीर्ण कर गये?’ 
‘जैसे आपने पास किया था गुरू जी!’ एक बार फिर प्रधानाध्यापक को झटका लगा
‘मैंने कैसे पास किया था?’ गुरूजी ने कन्हैया से पूछा
‘आप तो जानते ही हैं गुरूजी, मेरे पिता जी भी तो आप ही की तरह आपके साथ पास हुए थे, क्या बोलते हैं नकल करके।
गुरूजी सोच में पड़ गये, उन्होंने भी तो कन्हैया के पिता के साथ नकल करके परीक्षा पास किया था। फिर तो बिना देर किए उन्होंने कन्हैया को मार्क्ससीट दे दिया।
‘यह लो मार्क्स सीट, फूटो यहां से, अब पिन्ड छोड़ो मेरा, तुझसे कौन मुंह लगे’
कन्हैया की एक दूसरी कथा भी थी जिसने प्रधानाध्यापक को परेशान ही कर दिया। हुआ यह कि एक दिन स्कूल में एक लड़की के प्रसंग को लेकर मार पीट हो जाती है। लड़के नाराज हैं कि वह जो प्रधानाघ्यापक का एवजी मास्टर है, बारह तेरह साल की उस लड़की को छेड़ा करता है। लड़के हाकी के राड से एवजी का माथा फोड़ देते हैं, पुलिस आ जाती है, लड़कों को पकड़ लेती है, लड़कों के साथ कन्हैया भी है। थाने पर एक रोबदार दारोगा है, कुछ कुछ हीरो किस्म का। कन्हैया को दारोगा के सामने प्रस्तुत किया जाता है। ‘इसी ने मारा है एवजी मास्टर को सर!  
‘क्या नाम है तुम्हारा? दारोगा ने कन्हैया से पूछा
‘जी कन्हैया’
‘तुमने मास्टर को मारा?’
‘नाही साहेब! मैं काहे के लिए मास्टर को मारता, मार पीट जब हो रही थी उस समय मैं अपने बचाव के लिए चारो ओर हाकी भंांज रहा था। हो सकता है उसी से चोट लग गई हो और माथा फूट गया हो मास्टर जी का, हाकी ने इन्हें मारा होगा मैंने नहीं सर!’ 
तुम्हारे पिता का क्या नाम है? दारोगा रोब में था, पूछा
‘मेरे दो पिता हैं साहब! किसका बताऊं, उनका नाम बताऊं जिनके साथ मैं रहता हूं या उनका जो मेरे साथ नहीं रहते।’
‘क्या बकते हो? दो पिता कैसे हो सकते हैं तेरे? दारोगा चकरा गया
‘यह तो मेरी अइया से पूछिए साहेब! वही बता सकती हैं बापों के बारे में’
‘तुम्हारे पिता क्या करते हैं?’ दारोगा ने पूछा
‘एक पिता जी तो रुपयों की हेरा-फेरी करते हैं और दूसरे वाले पिता जी मास्टर हैं, पर स्कूल कभी नहीं जाते हैं। मैं नहीं जानता साहेब! कि उनमें कौन असली पिता हैं मेरे और कौन नकली हैं, पिताओं से मेरा मतलब क्या है सर।’
‘तुम जिस पिता के साथ रहते हो उनका नाम बताओ।’ 
‘उनका नाम काहे बताऊं साहेब! उन्हें तो अपना पिता ही मैं नहीं मानता और फिर पिता से आपका क्या लेना देना, उन्होंने तो मास्टर जी का माथा नहीं फोड़ा।’
मुझे क्षमा करें, मैं अब कन्हैया की कहानी आपको नहीं सुना सकता, प्रिन्सिपल साहब का बुलावा आ रहा है, मुझे माननीय मंत्राी जी यानि कन्हैया के स्वागत के लिए जाना होगा। उनके स्वागत के लिए कई कार्यक्रम है, स्वागत गीत से ले कर अभिनन्दन तक, उसकी जिम्मेवारी मुझे दी गई है।
कालेज की पांच लड़कियां स्वागत गान प्रस्तुत कर रही हैं, क्षेत्रा के एक बुजुर्ग स्वतंत्राता संग्राम सेनानी मंत्राी जी का अभिनंदन कर रहे हैं। पांडाल की चमक में ऑखें चुधिया रही हैं, पत्राकार दनादन फोटो खींच रहे हैं। कार्यक्रम स्थल भरा हुआ है। कार्यक्रम तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है क्योंकि मंत्राी जी को दूसरे जिले के एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए जाना है। तमाम तरह की चमकों के बीच कार्यक्रम समाप्त हो जाता है।
मंत्राी जी जाने के लिए तैयार हैं, वे गाड़ी की तरफ बढ़ने वाले हैं, कालेज के अघ्यापक उनका माल्यार्पण कर रहे है। मैं भी मंत्राी जी को माला पहनाता हूं, मंत्राी जी माला पहन लेते हैं और एक किनारे चले जाते हैं। मंत्राी जी शिक्षा विभाग के एक अधिकारी को बुलाते हैं। उसके कान में धीरे से फुसफुसाते हैं... फिर...
‘अधिकारी अपने बैग में से एक कागज निकालता है और मेरे प्रिन्सिपल को थमाता है।
‘आपको सेवा मुक्त किया जाता है, इस कागज पर हस्ताक्षर कीजिए।’ एक प्रशासनिक बोल...
अपने क्षेत्रा के लिए मंत्राी जी यानि कन्हैया का यह पहला काम था। मंत्राी बनने के पहले से ही उसे पता था कि कालेज का प्रिन्सिपल लुटेरा है, कालेज का लाखों रुपया खा गया है। जाने कितनी जांचें हुई पर सब बेकार। 
कन्हैया ने जाते समय मुझे गौर से देखा और बोला...
‘सर जी! मैं वही कन्हैया हूं जिसका नाम आपने इसी कालेज में लिखवाया था। मैं जानता हूं कि प्रिन्सिपल गलत हैं, मैं मंत्राी रहूं न रहूं पर गलत तो नहीं होने दूंगा, मैं यहां नहीं आता सर! आपके प्रिन्सिपल ने मुझे प्रभावित करने तथा जांच रोकवाने के लिए ही यहां बुलवाया था। यही मुझे बुरा लगा फिर मैंने ऐसा आदेश दिया। जब गलत था तब था, अब मैं गलत नहीं हूं सर!’
कन्हैया चला गया मैं उसके बारे में गुनता रहा। चला गया कन्हैया फिर एक कहानी छोड़ कर। अब प्रिन्सिपल मुझे परेशान करेगा, बोलेगा कि मुझे बहाल करवा दो। मंत्राी जी तुम्हारी बात नहीं टालेंगे।’ 
क्या कन्हैया मेरी बात मानेगा और प्रधानाध्यापक को बहाल कर देगा या मेरे साथ भी अभिनव किस्म की कोई कहानी गढ़ देगा, अपने द्वारा गढ़ी गई तमाम कहानियों की तरह, राम जानें।

         वह देखना आज भी याद है मुझे

 उस दिन मैं मैडम के साथ था। मैडम काफी तनाव में थीं। उन्हें मुख्यालय बुलाया गया था। मैंने कभी मैडम को तनाव में नहीं देखा था। वह हंसमुख और शालीन महिला थीं। उन्हांेने ही मुझे ड्राइबरी की नौकरी दी थी। मुझे पता था कि रुपयों के लेन देन के बिना नौकरी नहीं मिलने वाली, सो मैंने एक बीघा जमीन बेच कर डेढ़ लाख रुपयों का इन्तजाम कर लिया था।
सवाल था कि इकठ्ठा किए गये रुपयों का क्या करूं? उसे मैडम के पास कैसे पहुंचाऊं, घूस देना भी आसान काम नहीं होता। अचानक एक दिन दफ्तर का एक आदमी मिला था जिसे दो साल पहले नौकरी मिली थी। वह एक व्यवहारिक आदमी था और चाहता था कि मुझे भी नौकरी मिल जाए। वह मेरे बारे में पहले से जानता था कि मैं एक बेरोजगार आदमी हूं और नौकरी पाने के लिए ठोकरें खा रहा हूं। वह उस कहानी को भी जानता था जो मुझसे जुड़ी हुई थी यानि मनरेगा की नौकरी वाली कहानी, कोआर्डिनेटर वाली। मैं उस नौकरी को पाते पाते रह गया था। वैसे तमाम दूसरे अभ्यर्थियों को पता था कि वह नौकरी मुझे ही मिलेगी क्योंकि पूरी तरह से मैं उसके योग्य था। कोआर्डिनेटर का काम करने के अनुभव मेरे पास थे और मैं एक एन.जी.ओ. में कोआर्डिनेटर का काम कर भी रहा था। मेरा साक्षात्कार भी अच्छा हुआ था। बावजूद इसके मुझे नियुक्त नहीं किया गया और एक ऐसे आदमी को नियुक्त कर लिया गया जिसने चार लाख रुपया परियोजनाधिकारी को दिया था। इस नौकरी का दाम चार लाख लगाया गया था, देने के लिए इतने रुपये का इन्तजाम कम से कम मेरे लिए बहुत मुश्किल था।
मुसीबत थी कि मेरे पास रुपये नहीं थे, रुपये होते तो मेरा दावा सब पर भारी पड़ जाता और मैं नियुक्त कर लिया जाता। दफ्तर वाले आदमी ने मुझे समझाया था-
‘देखो नौकरी पाने के लिए दलालों को रुपया मत देना, देना हो तो सीधे मैडम को देना, मैडम बहुत ही सख्त स्वभाव वाली हैं। मैं जानता हूं कि किसी काम के लिए घूस नहीं लेतीं और वही काम करती हैं जो उन्हें ठीक और कानूनी लगता है’
उस आदमी की बात मेरी समझ में आ गयी थी पर मैं जानता था कि बिना घूस 
दिए नौकरी मिल नहीं सकती। सो एक दिन हिम्मत जुटा कर मैं मैडम के बंगले 
पर जा पहुंचा। बंगला तो बंगला होता है। वह बाहर से ही नहीं भीतर से भी बंगला होता है जिसकी अलग तरह की संस्कृति होती है। बंगले पर पहुंच कर मैं बंगले की संस्कृति से डर गया। लगा वहां तो एक अजीब तरह की अनुशासनात्मक गंघ फैली हुई है जो मुझे बेहोश किए जा रही है। मैंने खुद को सायास संभाला कि बेहोश नहीं होना और बेहोश नहीं हुआ। बंगले पर पहुंच कर मैं असमंजस में था क्या करूं?क्या न करूं? तभी एक आदमी दिखा जो मैडम का चपरासी था।
मैंने मैडम से मिलवाने के लिए उससे प्रार्थना किया। मैंडम का चपरासी चपरासियत की कला में शायद परिपक्व नहीं था सो उसने मेरी प्रार्थना पर घ्यान दिया और बोला...
‘कागज पर अपना नाम पता और काम लिख कर दो’
मैंने कागज पर अपना नाम और पता लिख दिया, काम नहीं लिखा, काम लिखता भी क्या? ‘घूस देना है’ लिखना अपराध हो जाता।
चपरासी ने मेरी मदत की, फिर मैडम ने मुझे बंगले के बाहर वाले कमरे में बुला लिया।
अफसरी कड़क से उन्होंने पूछा... 
‘क्या काम है?’
मैं तो उनके सामने शहीदी भाव से खड़ा था यह निश्चित कर चुका था कि मैडम से सच सच बताना है, परिणाम चाहे जो भी हो फिर भी हिचक तो थी ही। तभी मैंडम ने मुझसे बैठने के लिए कहा...
‘बैठिए खड़े क्यों हैं?’ फिर मैं बैठ गया और सारा कुछ सच सच बता दिया।
मैडम हसने लगीं। 
‘तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है पर यहां ऐसा नहीं होगा, मुझे अफसोस है कि तुम्हारी एक बीघा जमीन बिक गयी।  इस बार तुमने अच्छा किया जो मेरे पास     सीधे चले आये, नहीं तो रुपया भी खतम हो जाता और नौकरी भी नहीं मिलती। ड्रायबरी तो अच्छी करते हो नऽ।’
‘हां मैंडम! आजकल ड्रायबरी के सहारे ही गुजर बसर हो रहा है।’
‘तब तो ठीक है, नौकरी के बारे में क्या होगा मैं इस समय कुछ नहीं बता सकती पर तुम्हारे साथ अन्याय नहीं होगा, हां इस रुपये को किसी कारोबार में लगा दो, मुझे नहीं चाहिए एक छदाम भी।’
मैडम के बंगले से निराश हो कर मैं  वापस हुआ। मन ने कहा...यह नौकरी भी गई। बिना घूस फूस के नौकरी मिलती है भला! सात दिन बाद मेरे पास सूचना 
पहुंची। मुझे नियुक्त कर लिया गया है। फिर क्या था...
दूसरे दिन ही मैं मैडम के आवास पर था। उनके लिए प्रसाद ले कर गया था। 
‘अब तो खुश हो नऽ’ मैडम ने मिलते ही मुझसे पूछा
‘प्रसाद का पैकेट हाथ में ले कर मैडम ने निर्देशित किया... 
‘काम जिम्मेवारी से करना, हां, रुपया बैंक में जमा करा दिया कि नहीं? उन्हांेने 
निर्देश देने के साथ पूछा भी।
‘जमा करा दिया मैडम!’
‘चलो ठीक है अच्छा किया’
मैडम मेरे लिए किसी देवी से कम नहीं थी, छुटटी के दिनों में उन्हें कहीं जाना होता तो वे मुझे ही बुलातीं। अपनी निजी कार वे मुझसे ही ड्राइव करवातीं। मुझे काम की एवज में वे मुझे रुपया देना चाहतीं पर मैं नहीं लेता और रूआंसा हो जाता। फिर वे हस देतीं। चलो ठीक है। लेकिन अपने परीश्रम का मूल्य तो तुम्हें लेना ही चाहिए। मेरे जैसे अधिकारी दिमाग बेच कर उसका दाम ले रहे हैं तो क्या तुम्हें भावुकता के कारण अपने श्रम का मूल्य नहीं लेना चाहिए। वे कुछ भी बोलतीं कहतीं पर मैं उनसे पारिश्रमिक नहीं लेता।
उस दिन मैडम को तनाव में देख कर मैं हैरान हो गया था...कृ
चार पांच महीने की नौकरी के दौरान मैडम से काफी घुल-मिल जाने के कारण। मैंने साफ साफ पूछा... नहीं तो अधिकारी से कुछ पूछना आसान नहीं होता।
‘मैडम कोई बात है क्या, आप परेशान दिख रही हैं’
‘हां नन्दू काफी परेशान हूं। मेरी मम्मी अस्पताल में हैं और आज छुट्टी के दिन डायरेक्टर ने अपने साथ मेरा दौरा नक्सल क्षेत्रा में लगा दिया है। और जानते हो..कृकृ फिर मैडम रुक गयीं, आगे कुछ नहीं बोलीं। 
‘तो इसमें का बात है मैडम!’
‘तूं बहुत भोले हो नन्दू, तुम नहीं समझते। डायरेक्टर ने परियोजना अधिकारी को नहीं एक औरत को बुलाया है और मैं अधिकारी ही नहीं एक औरत भी तो हूं। इसके आगे मैंडम नहीं बोल पाईं और पलंग पर धम्म से गिर गईं।’
मै असमंजस में, का करूं का न करूं, साहस बटोर कर मैडम को उठाया, उनके आंसुओं को पोछा।
मैडम कोई बात नाही है, मैं हूं आपके साथ, आप जीन घबराइए, वह डायरेक्टर का कर लेगा? 
‘नन्दू! यह एक दिन की बात नही है। रोज रोज की बात है, कभी कोई        अधिकारी दौरा लगा देता है तो कभी कोई। मैं तो थक गयी हूं इस नौकरी से, सोच 
रही हूं छोड़ दूं। कितना और कैसे बचाऊं खुद को।
‘नाहीं नाहीं मैडम! ऐसा कभी नाही करना, मरद तो बरद होते हैं, उनसे हार नाहीं मानने का, उनसे लड़ कर अपना हक और सम्मान लेने का। मरद केवल डंडा से 
डरते हैं मैडम!। आप डंडा उठा लो फिर कोई सामने नाही आएगा।’
‘अच्छा नन्दू गाड़ी निकालो, चलो चलते हैं, जो होगा देखा जाएगा।’
दो तीन घंटे की यात्रा के बाद हमलोग जंगल के एक डाकबंगले पर थे। वहां 
गॉव के रहवासियों की भीड़ इकठ्ठा थी। भीड़ के चेहरे पर बड़े अधिकारी को देखकर खुशियॉ नाचने लगीं। मानो उनके काम निपट जायेंगे।
अधिकारी कार से बाहर निकला, कार के पास ही भीड़ चली आई...
साहब हमारी बातें सुन लीजिए, हम लोग बहुत ही परेशान हैं।
हॉ हॉ क्यों नहीं सभी की बातें सुनी जायेंगी। आपलोग दरख्वास्त लाये हैं कि नहीं?
‘लाये हैं साहेब! यह भीड़ की सामूहिक आवाज थी जिसमें दर्द था तो कराह भी। तो ऐसा है कि आपलोग अपनी अपनी दरख्वास्तें दे दीजिए, नन्दू तुम सभी लोगों की दरख्वास्तें ले लो और एक फाइल बना लो। मीटिंग खतम होने के बाद मैं दरख्वास्तों को देखूंगा। फिर साहब उस ओर बढ़ गये जहां अधिकारी उनका इन्तजार कर रहे थे। मैं गॉव रहवासियों की दरख्वास्तंे लेने में जुट गया।
उस समय साहब का चेहरा मैं देखता रह गया था मानो उनके चेहरे पर शालीनता का कोई देवता जम कर बैठ गया हो। क्या दूसरे अधिकारी भी साहब की तरह सरल और तरल होते हैं? मैंने खुद से सवाल किया..कुछ तो होते ही होंगे, खुद उत्तर भी दिया।
करीब दो तीन घंटे तक मीटिंग चली फिर गॉवों के दौरे का कार्यक्रम बना। प्रोग्राम पहले से ही तय था कि कुछ गॉवों को देखना है।
दरख्वास्त देने वाले बंगले के सामने पहले की तरह ही खड़े थे। साहब ने उन्हें आश्वस्त किया था कि उनकी दरख्वास्तों पर निश्चित रूप से कार्यवाही होगी। आप लोग घर जाइए, पूरी फाइल मैंने बी.डी.ओ. साहब को दे दिया है और काम करने के लिए आदेशित भी कर दिया है।
दरख्वास्तें फिर मैंने बी.डी.ओ. साहब को दे दिया। दरख्वास्तों में कहीं अधूरी सड़क के निर्माण का मामला था, तो कहीं सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से राशन न मिलने का मामला था तो कहीं ऑगनवाड़ी की लापरवाही का मामला था। गोया सरकारी दरख्वास्तें समाज कल्याण तथा जनहित का पोल खोलने वाली थीं। उन पर कितना काम होगा नहीं होगा पता नहीं।
अधिकारियों के साथ हाने वाली मीटिंग काफी देर तक चली। उसके बाद साहब तथा मैडम गॉवों की तरफ निकले साथ में अधिकारियों का काफिला भी। दो जगहों पर परधान द्वारा कराये गये निर्माण कार्यों को देखना था तथा एक सड़क भी देखनी थी जिसे वन विभाग ने बनने से रोक दिया था। मौके पर ही वन विभाग के         अधिकारी भी थे।
सारा काम निपटाते निपटाते काफी देर हो गयी जिसका अन्दाजा पहले से ही था। काफी रात होने पर हमलोग डाकबंगले पर आये। डाक बंगले पर सारा प्रबंध पहले से ही था पर प्रबंध साहब के रुकने और न रुकने के बीच का था यानि साहब 
रुक भी सकते है और नहीं भी।
रात में मुख्यालय लौटना ठीक नहीं होगा साहब...!
अधिकारियों का समवेत आग्रह बहुत ही दयनीयता से उभरा... रास्ते में जंगल पड़ता है और जंगल के मिजाज के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, जंगल जाने कब गरम हो जाये कुछ कहा नहीं जा सकता सो यहीं रुक जाना ठीक होगा..
साहब को तो डाकबंगले में रुकना ही था, रुकने का रोेमांन्टिक कारण भी था जो बाद में पता चला जिससे मैडम डर रहीं थीं।
रात तो रात होती है, सोने तथा आराम करने के लिए पर कुछ रातें केवल रात ही नहीं होतीं। डाकबंगले वाली रात भी केवल रात नहीं थी वह प्रशासनिक ओहदे से और ज्यादा काली हो चुकी थी एकदम डरावनी..।
मैं डाकबंगले के बरामदे में लेटा हुआ था कि एक चीख सुनाई पड़ी, चीख मैडम की थी। मुझे भी शक था कि साहब कुछ न कुछ गड़बड़ कर सकता है सो मैं जगा हुआ था...चीख की तरफ बढ़ने में मुझे देर न लगी... दरवाजा बन्द था, कस कर एक लात जमाया और दरवाजा खुल गया, सौ बरस पहले का दरवाजा कितना मजबूत होता।
 उस समय माटी की गंध में मेरा सना होना काम आया, मैंने आव देखा न ताव, डायरेक्टर को खूब लतियाया, मैं तो फिराक में था ही और मैडम भी सचेत थीं।  डायरेक्टर किसी निरीह जैसा मैडम के सामने गिड़गिड़ाने लगा...
‘मुझे माफ कर दो बिटिया, दारू के नशे में मैं बहक गया था।’
मैडम दूर से मुझे देख रही थीं, उनका वह देखना आज भी याद है मुझे। फिर मुझे समझ आया कि मैडम दौरे से काहे डरती हैं।
आकाशवाणी ओबरा से प्रसारित

   आप तो समझ रहे होंगे

‘बुटली! तूने बताया नाही कि उस दिन कहां गई थी?
‘किस दिन?’ बतसिया से बुटली ने चकराते हुए पूछा
‘उस दिन जिस दिन तू रमेशरा के साथ गई थी।’
बतसिया को पता था कि बुटली का पैर आज कल जमीन पर नहीं पड़ रहा है। जब देखो तब वह रमेशरा के साथ कभी बाजार तो कभी मेला ठेला भाग जाया करती है। बुटली जान बूझ कर बतसिया को छेड़ रही थी, पर बतसिया बुटली को काहे बताती अपने बारे में। बतसिया तो जानती थी कि उसकी बातें केवल रमेशरा जानता है और कोंई नाहीं। उन दोनों के बीच का है, का नाहीं है। 
बुटली के सवाल ने बतसिया को चिन्तित कर दिया।कृ
आखिर बुटली को कैसे मालूम हो गया वह तो रमेशरा से छिप छिपा कर मिला करती है। रमेशरा के साथ उसका बाजार जाना कैसे जान गई बुटली? बुटली तो उस दिन गॉव पर थी भी नहीं, अपने ननिआउर गई हुई थी। बतसिया नाहीं चाहती थी कि रमेशरा से उसके संबध को कोई जाने चाहे बुटली ही क्यों न हो। बतसिया साफ साफ झूठ बोली बुटली से...कृ
नाहीं रे बुटली हम कभी भी रमेशरा के साथ बाजार नाहीं गए थे। तू सोच तो भला हम ओकरे साथ बाजार जाएंगे?
बतसिया ने बुटली से सफाई देकर मन हल्का कर लिया। हालांकि वह बुटली जैसे दोस्त से झूठ नाहीं बोलना चाहती थी पर करे का, कुछ बातें होंती ही ऐसी है जब झूठ बोलना जरूरी हो जाया करता हैै।
बतसिया और बुटुली दोनों बाहर भीतर के निए सिवान की तरफ गई हुई थीं। 
बतसिया से बुटुली खिसियाई हुई थीकृउसे बुरा लगा था बतसिया के झूठ बोलने पर।
‘तो ठीक है मत बताओ हमसे, किसी न किसी दिन हम तू लोगों को पकड़ ही लेंगे एक साथ फिर पूछेंगे कि ‘का हो रहा है’ इस तरह की नाच बहुत नाहीं चलती। तूं रमेशरा को नाही जानती, उसपर जो रीझ बैठी हो, वह पुराना रसिया है, लड़िकयन को फसाता है और छोड़ देता है। इस गॉव में तू साल भर से ह,ै तू का जानेगी ओकरे 
बारे में।’
बतसिया को फटकार कर बुटली मन में बुदबुदाती हुई अपने घर की ओर चल दी। 
‘मुझसे का मतलब जाओ मरो’
इसके बाद बुटुली ने बतसिया से कुछ बात नहीं किया। बतसिया से बातें करना अपना माथा फोड़ना है। जिसको नदी में डूबना है उसे भगवान भी नहीं बचा सकता और बतसिया नदी में डूबने जा रही है।
बुटुली की खरी खरी बातों से बसमतिया घबड़ा गई। कहीं रमेशरा वैसा ही हुआ जैसा बुटली बता रही है तोकृवह मुझे भी छोड़ देगा।
बतसिया अपनी फूआ के घर आई हुई थी और उन्हीं के घर पर साल भर से रह रही थी। उसकी फूआ बीमार रहा करती थीं। अपनी सेवा टहल करने के लिए उन्होंने बतसिया को अपने घर पर रख लिया था। 
बतसिया की अइया और उसकी और फूआ में बहुत पटरी थी। दोनों सगी बहन जैसी थीं, कोई कह नहीं सकता था कि दोनों में कभी तूं तकार भी हुआ था। बतसिया की अइया ने इसीलिए बतसिया को फूआ के पास भेज दिया था।
बतसिया के फूआ के घर रमेशरा रोज आया जाया करता था। बतसिया की फूआ को वह मामी बोलता था। सही में वह बतसिया की फूआ का दूर का भगिना था।
वैसे तो रमेशरा बतसिया के फूआ के यहां रोज ही आता जाता था पर बतसिया से बतियाने में हिचकता था। बतसिया भी रमेशरा से बतियाने में हिचकती थी पर रमेशरा बतसिया के आगे पीछे हरदम लगा रहता था। कुछ समय बाद तो बतसिया को पता ही नहीं चला कि वह कब और कैसे रमेशरा से बोलने बतियाने लगी। 
एक जवान लड़का और एक जवान लड़की के बीच होने वाली बतकहियॉ कितनी दूर जा सकती हैं इसका अनुमान कोई नहीं कर सकता। शुरू में बतसिया झिझकती थी रमेशरा से बतियानेे में पर बाद में तो उन दोनों के लिए मुश्किल हो गया बिना बतकही के रहना। बतसिया ने अपने फूआ की खेती किसानी भी संभाल लिया था। एक दिन बतसिया खेत से लौट रही थी कि रास्ते में रमेशरा मिल गया...
‘का रे बतसिया केहर से आय रही है, घांस काटने गई थी का? 
बतसिया सही में घास काटने गई थी, उसके माथे पर घास का बोझ था।  
‘बतसिया छोड़ दे घास का बोझा, इसको हम तेरे घर पहुंचा दे रहे हैं।
रमेशरा ने घांस के बोझ को बतसिया के सिर से उतार कर अपने सिर पर रख लिया। 
बतसिया घांस का बोझ रमेशरा को नहीं देना चाहती थी पर रमेशरा तो तुला हुआ था। रमेशरा ने इधर उधर कर कराके घांस का बोझा बतसिया से छीन ही लिया और अपने सिर पर रख लिया। रमेशरा ऐसे ही रोज करने लगा। बतसिया जब घर से 
बाहर खेत की तरफ जाने लगती रमेशरा उसके पीछे हो लेता और उसके पास पहुंच जाता। 
समय बीतने के लिए ही होता है वह बीतने भी लगा रमेशरा बतसिया के दिल दिमाग में जगह बनाने लगा। बतसिया को पता ही नहीं चला कि वह कैसे रमेशरा को अपने मन का मीत मानने लगी। पहले तो ऐसा कभी नहीं होता था हालांकि उसके जीवन में रमेशरा की तरह कई दूसरे लड़के भी थे जो उसके साथ खेलते और रहते हुए सयाने हुए थे पर रमेशरा की बात दूसरी थी। बतसिया के मन में पहले किसी लड़के की तस्बीर नहीं उतराया करती थी जबकि रमेशरा उतराने लगा था। पहले उसे आकाश भी इतना खूबसूरत नहीं दिखा करता था न ही मौसम उसके मन को लहराया करता था। अब तो आसमान के तारे भी उससे बोलने बतियाने लगे हैं और रमेशरा के बारे में उससे पूछने लगे हैं। 
बतसिया अजीब सी हलचलों में डूबने उतराने लगी है, वह खेत की तरफ जाती जब रमेशरा नहीं मिलता उससे फिर तो उसे लगता कि वह होते हुए भी नहीं है कहीं खो गई है किसी दूसरी दुनिया में। हालांकि बतसिया उस दूसरी दुनिया से अनजान थी फिर भी उसे पता था कि एक दुनिया ऐसी भी होती है जब मन फड़कने लगता और दिल में प्यार की लहरें उठने लगती हैं।
रमेशरा दो दिन भी बतसिया को नहीं दिखता तो उसे लगता कि वह खुद में डूब जाए और अपने को ही तलाशने लगे। उसे जान पड़ता कि उसका दिल दिमाग रमेशरा चुरा कर कहीं भाग गया है। बतसिया समझ नहीं पा रही थी कि उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है?
मन की बातें मन में ही रखे रहना ठीक नहीं होता सो बतसिया ने एक दिन रमेशरा से पूछा...कृ
‘का  हो रमेशरा ऐसे कब तक चलेगा? सारा कुछ खेत, खलिहान में ही होगा..चोरी चोरी हम लोग कब तक मिलते रहेंगे आखिर? साल भर तो गुजर गया चोरी चोरी मिलते हुए ऐसा करना ठीक नाहीं है।
तूं बोलता है कि तूं मुझसे प्यार करता है फिर तो उस प्यार को सभी से बताना भी चाहिए। तूं हमरे फूआ से बात काहे नाहीं करता? फूआ से बात आगे बढ़ाओ फिर बिआह कर लो ऐसे ठीक नाहीं है। 
बतसिया के बारे में तो रमेशरा की दूसरी योजना थी जिसे वह बतसिया से बता नहीं सकता था सो वह बतसिया को इधर उधर बहका रहा था। रमेशरा ने बतसिया को समझाया... 
‘काहे घबरा रही है रे बतसिया। हम दोनों का बिआह ऐसे ही थोड़ै हो जाएगा गॉव के गॅवारों की तरह, धूम-धाम से होगा हमार बिआह जैसा कि गॉव  में किसी का नहीं हुआ होगा। हॉ एक बात जान लो तुमको भगा के नहीं ले जाऊॅगा।    
बिआह के बाद ही घर ले जाऊॅगा तुझे । 
बतसिया गॉव की थी पर गंवार नहीं थी उसने रमेशरा को उलाहा...कृ
‘ऐसा तो तूं साल भर से बोल रहा है, पर तोहार साल अभी खतम नाहीं हुआ। एक बात जान लो रमेशरा अब ऐसा नाहीं चलेगा। तोहके बिआह के बारे में केवल एक दो दिन के भीतर ही फैसला लेना होगा। सही सही बताओ नाहीं तो हम अपने गॉव चले जायेंगे।
बुटुली को जब भी मौका मिलता वह बतसिया को समझाती पर बतसिया तों आसमान में उड़ रही थी परिन्दों की तरह जैसे पूरा आसमान ही उसका हो। बतसिया के पैर उस समय जमीन पर नहीं थे उसके पैर सपनों को फलागने में लगे हुए थे।
कभी कभी बतसिया से झगड़ जाती बुटली...कृ
‘का बक बक कर रही है तुझसे अधिक मैं रमेशरा को जानती हॅ, वह हरामी लड़का है और लड़कियन को फसाना, फिर छोड़ देना उसका काम है। सच सच बताओ कहीं तूने रमेशरा के साथ कुछ ऐसा वैसा तो नहीं किया नऽ।’
‘का बक बक करत हये तोहसे ढेर हम रमेशरा के जानते हैं। ऊ अइसन लइका नाहीं हैऽ बूझले, कहीं तूं तऽ ओकरे फेर में नाहीं हो?’
बुटुली पहले से ही रमेशरा के बारे में पता करने लगी थी कि वह करता क्या है बनी मजूरी भी नाहीं करता फिर भी ठाठ बाट से रहता है। अच्छा कपड़ा पहनता है कभी मोटर साइकिल सें गॉव में आता है तो कभी कार से। यह सब उसके पास कहां से आ गया। बुटुली को रमेशरा पर पहले से ही सन्देह था। बतसिया के गॉव में आने के पहले रमेशरा ने बुटुली पर भी डोरा डाला था और प्यार का जाल फेंका था कि उसमें फस जाएगी बुटुली। बुटुली खेत से घर लौट रही थी कि रमेशरा मिल गया उससे रास्ते में...
रमेशरा ने ही बुटुली को छेड़ा था...कृ
‘का हो बुटुली केहर से आय रही हो, तोहार चेहरा तो बर रहा है चॉद माफिक का बात है?
बुटुली तो बुटुली थी एक दम से कड़क...कृ
‘काहे का बात है, बर हम रहे हैं चॉद माफिक और जर तूं रहा है देखो मुझसे दूर रहना नाहीं तो पास आओगे तो भसम हो जाओंगे।’
बुटुली ने रमेशरा को फटकारा... फिर तो वह बुटुली को एकटक देखने लगा. 
रमेशरा भी कम नहीं था बोलने बतियाने में माहिर था, उसने बुटुली को टोका-कृ
‘नाहीं हो बुटुली ऐसी कोई बात नाहीं है और जो बात है उसे तूं मानेगी नाहीं’  हम तो कह रहे हैं कि तेरी जैसी लड़की गॉव में गोबर गोइठा करने के लिए नाहीं होती, तोहैं तो पलंग पर उठना बैठना चाहिए और महल में रहना चाहिए। यह सब देख कर मेरा मन कॉप जाता है। फिर अचानक रमेशरा ने बुटुली का हाथ पकड़ 
लिया।
बुटुली सचेते थी उसने रमेशरा का हाथ झटक दिया। कहीं हाथ पकड़ते पकड़ते पहुंचा न पकड़ ले!
‘तो यह बात है यानि कि हम सकुमार हैं, हमैं गोबर गोइठा नहीं करना चाहिए। हमार हाथ कोंअर है। अचानक बुटुली ने रमेशरा को एक झापड़ मारा...कृ
कैसा लगा? मेरा हाथ कांेअर है कि कड़ा है़?
रमेशरा खामोश था, कुछ नहीं बोला वह प्रतिक्रियाहीन बना रह गया, बोलता या करता भी क्या। बुटुली तो अचानक लाल लाल हो गई थी।
कुछ देर के लिए भी बुटुली वहां नहीं रुकी सीधे घर चली आयी।  उस घटना के बाद फिर कभी रमेशरा ने बुटुली को नहीं छेड़ा। 
बतसिया के बारे में जो सन्देह बुटुली को पहले से ही था वही हुआ।
गॉव में बसतिया के बारे में एक दिन एक शर्मनाक खबर हर घर टहलने लगी कि बसमतिया गॉव में नहीं है, रात में वह अपनी फूआ के घर नहीं आयी। बतसिया की फूआ ने गॉव भर में पता लगाया बतसिया के बारे में पर बतसिया कहीं नहीं थी जाने कहां चली गई। बतसिया अपने जाने के बारे में फूआ को भी कुछ बता कर नहीं गई थी। 
गॉव भर को बतसिया के बारे में कुछ नहीं पता था कि वह कहां चली गयी पर बुटुली कोे पक्का अनुमान था कि रमेशरा उसे कहीं भगा ले गया है। कहां भगा ले गया है उसे, यह बुटुली का पता नहीं था न ही इसका अनुमान ही उसे था। रमेशरा तो बतसिया को भगाने के चक्क्र में तभी से था जब से वह अपने गॉव से बुटुली के गॉव में आई थी। 
बुटुली ने बहुत कुछ सोच गुन कर बतसिया की फूआ से साफ साफ बता दिया कि रमेशरा बतसिया को भगा ले गया है। वह कहां ले गया भगाकर बतसिया को यह नहीं मालूम।
‘तुझे कैसे पता बुटुली कि रमेशरा बतसिया को भगा ले गया है’ बतसिया की काकी ने पूछा बुटुली से...
बुटुली तो वैसे भी खर मिजाज की थी, साफ साफ बोलने वाली, वह कुछ छिपा कर रखना जानती ही नहीं थी। उसने बतसिया के फूआ को बताया...कृ
‘हम जानते हैं काकी। रमेशरा तो हमैं भी भगाने के चक्कर में था सो हमैं पक्का विश्वास हे कि बतसिया को रमेशरा ही कहीं भगा ले गया है।’
इस घटना ने बतसिया की फूआ को हिला कर रख दिया। वे खुद पर अफसोस करने लगींकृ
‘दूसरे की सियान लड़की हमैं अपने घर में नहीं रखना चाहिए था, का जबाब देंगी वे बतसिया की अइया को।’कृ
बतसिया की फूआ गॉव भर घूम कर हल्ला करने लगीं। रमेशरा के घर पर भी गईं, उसके घर वालों को भी पता नहीं था कि रमेशरा कहां चला गया है?
गॉव में जब बतमसिया के बारे में कुछ नहीं पता चला फिर तो बतसिया की फूआ ने मन बना लिया कि थाने में रपट करेंगी। उन्हांेने थाने में रपट लिखा भी दिया।
पुलिस अपने तरीके से रमेशरा व बतसिया की तलाश करने लगी। पर उनका कहीं पता नहीं चला। समय तो समय होता है अपने ढंग से आगे सरकता है। बतसिया की फूआ का रोना धोना बन्द नहीं हुआ वे जहां होतीं रोती ही रहतीं।  
बुटुली बतसिया की फूआ को बार बार समझाती...कृ
काकी धीरज धरो एक दिन वे मिलेंगे जरूर। 
इसी बीच बतसिया के बापू और अइया भी चले आये वे अपने करम को धिक्कार रहे थे, उनकी किस्मत ही खराब है जिसके कारण यह सब देखना और सुनना पड़ रहा है। 
जिसको भागना होता है वह भाग ही जाता है। प्यार का मामला कुछ ऐसा ही होता है अन्धा बना देता है फिर आगे पीछे क्या देखना और दिखाना। देह-दाह ऐसा होता ही है जो विवेक व विचार ही लील जाता है। देह की दाह में प्यार का मतलब ही भसम हो जाता है दिमाग तो कहीं गायब ही हो जाता है। 
कहते है कि सब्र करो तो सब कुछ ठीक हो जाता है। वही हुआ। दो तीन महीने बाद रापटगंज की पुलिस ने रमेशरा को किसी दूसरे मामले में पकड़ लिया। थाने पर उसकी खूब पिटाई हुई... मरता का न करता रमेशरा ने अपने अपराध का रजिस्टर ही खोल दिया। उस रजिस्टर में बतसिया को भगाने का अपराध भी दर्ज था जो मोटे हरफों में लिख हुआ था।
बतसिया का क्या हुआ यह हाल सुन कर गॉव भर दंग रह गया। सभी के मुह से केवल एक ही बात...
‘पापी है रमेशरा, लड़िकिन को फसाय कर कहीं बेच देता है इहै रोजगार करता है।’कृ
रमेशरा का बपई भी थाने पर ही था। दारोगा रमेशरा का कच्चा चिठ्ठा बांच रहा था। इसी बीच रमेशरा का बपई उठा और रमेशरा को मारने लगा...
‘ससुर कोई काम नहीं कर पाये तो लड़िकनों के बेचने का रोजगार करने लगे।
सिपाहियों ने रमेशरा के बपई को पकड़ लिया...‘आप इसे न मारिए सजा तो इसे अदालत देगी।’
पुलिस के सामने रमेशरा ने अपना सारा गुनाह कबूल लिया और उसने कहां कहां लड़कियों को बेचा है यह भी बता दिया। पुलिस ने रमेशरा के बताए स्थानों पर  छापे मारा पर बसमतिया बरामद न हो सकी। दूसरी लड़कियॉ भी बरामद नहीं की जा सकीं। 
रमेशरा की पकड़ के दूसरे दिन के अखबारों में रमेशरा की फोटो उतरा गई। पत्राकारों ने अखबारांे में प्रकाशित किया कि ‘सोनभद्र में देह-व्यापार करने वाला अगुआ गिरफ्तार।’ करीब सप्ताह भर इस समाचार की पूरे जिले में धूम थी। इस दौरान बाहर से नेता परेता जो भी आये उन लोगों ने भी सोनभद्र में चल रहे देह-व्यापार के बारे में लम्बे भाषण दिए।
पॉच छह महीने गुजर गए पर बसमतिया का कहीं पता न चला। पुलिस किसी भी लड़की को बरामद न कर सकी जिन्हें रमेशरा ने पुलिस को बताया था। फिर भी पुलिस सक्रिय थी, पुलिस लगातार आश्वासन दे रही थी कि लड़कियां जल्द से जल्द बरामद कर ली जायेंगी।
दस बारह दिन थाने पर रोके रखने के बाद पुलिस ने रमेशरा को जेल भेज दिया।
अखबार वाले खामोश नहीं थे। वे लगातार इस समाचार को प्रकाशित कर रहे थे सो यह मामला पुलिस के लिए बहुत बड़ा हो चुका था। क्षेत्राीय विधायक ने तो इस मामले को विधन सभा में भी उठा दिया। बतसिया हालांकि बरामद न की जा सकी पर पुलिस की निगरानी पूरे जनपद में काफी तेज हो गईं है।
दूसरी तरफ बसमतिया की अइया और बपई दोनों अपनी किस्मत पर ऑसू बहा रहे थे और बसमतिया की फूआ तो रोते रोते बिमार हो गईं है, आजकल अस्पताल में हैं। बतसिया के घर के लोग अभी तक नहीं समझ पाये हैं आखिर बतसिया घर से काहे भागी। आप तो समझ रहे होंगे।
 प्रकाशित  कहानी संग्रह कथा मंजूश्षा में  पृ-74-80
         
          और नहीं तो का?
  
दिल्ली से लौटने के बाद विनय थका, थका महसूस रहा था सो वह आराम करने के लिए गॉव जाना चाहता था। आराम करने के लिए गॉव ठीक रहेगा वहां मिलने वाले कम रहेंगे।। हालांकि वह जानता था कि उसके साथ संगीता को देख कर, उसके घर वाले घबड़ा जाएगे पर संगीता के साथ ही घर जाना जरूरी था। संगीता के साथ अपने जुड़ाव को आखिर वह कब तक घर वालों से छिपाता रहेगा?
वही हुआ, जिसका अनुमान विनय को था। उसे गॉव में ही नहीं अपने घर में भी उपेक्षा मिली। किसी ने उससे बात करना भी उचित नहीं समझा। विनय तो गॉव गया था कि कुछ दिन वहां ठहरेगा, आराम करेगा, खुद को गॉव की हवा से बहलाएगा पर उसे क्या पता था कि उसकी अइया ही उस पर उखड़ जायेंगी। उसने अइया तथा बपई को संगीता के बारे में समझाया भी, पर उसकी भउजाई के अलावा किसी ने उसकी बात समझने में रुचि नहीं दिखाया। उसकी अइया ने तो उसे फटकार ही दिया....
‘का मुंह ले कर इहां आये हो। गॉव में लोग बोलते हैं कि विनय ने उढ़री रख लिया है फिर भी हम नाहीं मानते थे, अउर बोलते थे कि हमार विनय ऐसा नाहीं कर सकता, आजु तऽ देख भी रही हॅू। अब नीक इहय होगा कि तूं इहां से चले जाओ। एतनौ परवाह नाही किए कि घर में कुआंर-बार बहिन पड़ी हुई है, ओकरे बिआहे बदे तोहार बपई कहां जाएंगे, केकरे से बोलेंगे कि ओनकर बेटवा उढ़री रख लिया है। तूने तो पूरे जवार में हमलोगन कऽ नाम पानी में डुबोय दिया है, नात रिश्तेदार तक हमैं देख के मुंह फेर ले रहे हैं।’
विनय की मां उसे फटकार ही रही थीं कि उसकी भउजाई वहीं चली आईं। 
विनय की भउजाई ने सास को समझाया...कृउन्हें वह अइया बोला करती थी।
‘का अइया! ई सब का बोल रही हैं, करीब साल भर बाद तो विनय बबुआ जी गॉवे आये हैं। आते ही आप फटकार लगाने लगीं। कुछ  नाश्ता, खाना, पानी तो हो जाने देतीं। विनय बबुआ मरद हैं, अउर मरद तो कुछू कर सकता है, कउनो लड़की हैं का, कि पेट फूल जाएगा। एमें कउन बात है, आओ बबुआ, चलो घर में। अइया पुराने खियालों वाली हैं, ई सोच रही होंगी कि जाने कउन बिरादरी की लड़की उढ़ार लाया है, अउर बिना बिआहे अपने संगे रख लिया है।’
‘तऽ का बबुआ कोरट में बिआह कर लिए हो, हमलोगन के तऽ पतय नाही चला।’ विनय की भउजाई ने व्यंग्यात्मक सवाल किया विनय से
‘हम का बताते भउजी, ई सब अइसन हो गया कि... विनय इतना बोलकर चुप हो गया।
विनय को उसकी बड़ी भउजाई अपने कमरे में ले गयीं। उसे बिठाया, फिर चाय पानी कराया। विनय की मां वहां से हट गयीं। विनय किसी तरह रात भर घर में रहा, उसे लगा कि अब वह घर वालों का विश्वास हासिल नहीं कर सकता। बात भी सही थी। विनय के बपई ने भी उससे बात नहीं किया, साफ बोल दिया कि वे उसका मुंह तक देखना नहीं चाहते। 
विनय दूसरे दिन अपने घर से निराश हो कर लौटा। संगीता भी निराश थी, वह समझ नहीं पा रही थी कि यह जो विवाह का मामला है, वह है क्या? 
हमारी संस्कृति में बिना विवाह किए नर, नारी का एक साथ रहना अपराध की श्रेणी में आता है, ऐसे संबधों को कम से कम भारतीय समाज कभी भी मान्यता नहीं दे सकता। सो विनय के घर वाले भी विनय से नाराज थे।
संगीता जानती थी कि विवाह का मामला संस्कृति से कम उत्तराधिकार से      अधिक जुड़ा हुआ है। विवाह यानि उत्तराधिकारी को जन्माना, जो पति की संपत्ति का मालिक बने। इसी लिए पत्नी की शुचिता पर जोर दिया जाता है कि बच्चा हो तो उसी का। पत्नियों को इसी लिए निगरानी के घेरे में रखा जाता है। सो भला ऐसी स्थिति में विवाह के इतर की व्यवस्था को कैसे मान्यता मिल सकती है। इसी पुरुष सत्ता का वैचारिक स्तर पर संगीता विरोध करती रही है। संगीता तो विनय के घर पर भी नहीं जाती, पर विनय ने अपने घर वालों के बारे में उसे समझाया था कि वे खुले दिल-दिमाग के लोग हैं वहां उसका अनादर नहीं होगा। पर अनादर हुआ जिसका संगीता को पहले से ही सन्देह था। उसे पतोहू मानने के लिए कोई सहमत नहीं था। सभी की आंखों में उसके प्रति नफरत थी, जिसे संगीता पढ़ सकती थी। 
विनय के घर में संगीता के  प्रति नफरत ही नहीं, घृणा भी थी। आक  थू वाली.ऐसा कैसे हो सकता है कि बिना विवाह किए कोई नारी, किसी नर के साथ, एक ही छत के नीचे पत्नी की तरह रहे। एक बार तो संगीता भी घबरा गयी...
आखिर क्या हो रहा है, हमारे समाज में? नारियां इस बात के लिए भी स्वतंत्रा नहीं कि वे अपने देह और दिमाग का उपयोग अपने वांक्षित लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कर सकें। यानि नारी आज भी केवल नारा है और परतंत्रा भी जैसे हजारों साल पहले थी, फिर क्या बदला? हम तो आज भी सोलहवीं सदी के उत्पाद माफिक 
हैं। नारी के रूप में एक  ऐसा उत्पाद जिसकी न तो अपनी देह है और न ही अपना 
दिमाग। वाह रे! हमारी सभ्यता...कृकृ
विनय के घर से लौटते समय संगीता विनय की अइया से मिली, उन्हें प्रणाम कर आशीर्वाद लेना चाहा पर विनय की अइया ने अपना पैर खींच लिया...
‘हमैं तोहसे गोड़ नाही लगवाना, जाओ अपने मरद का गोड़ लागो, हमार नाहीं’
‘काहे अइया! गोड़ काहे नाहीं लगवा रही हैं आप! अब त हम भी विनय के साथ रह रहे हैं, हम उसे प्यार करते हैं, उसके साथ मरने जीने की कसम खाये हैं, बिआही में और मुझमें का फरक है, बिआहियो तो कोई मेहरारुअय होगी। बिआहो तऽ मरद और मेहरारुअय का होता है नऽ। मांग में सेन्हुर पड़ जाने से का होता है? सात ठो फेरा लगाने से का हो जाएगा अइया! आप बताओ कुछ फरक पड़ता है का?’
विनय की अइया पहले तो चुप थीं, फिर बाद में बोलने लगीं...
‘तूं नाही जानती का, कि बिआह का होता है, बिआह तो जनम जनम का साथ होता है, ओही से होता है जेसे करम में लिखा होता है। अब ई का है कि जिनावरों की तरह एक दूसरे के साथ रहो। फेर का फरक है जिनावर अउर आदमी में। हम तोहके आपन पतोहॅू कबहॅू नाहीं मानेंगे, चाहे जो करो।’
‘यह तो अच्छी बात है अइया! आप हमें पतोहू न मानिए, बिटिया मान लीजिए। हम तो पतोहू हैं भी नाहीं, हम तो आपकी बिटिया हैं। हम भी नहीं चाहते कि इस घर में हम पतोहू की तरह रहें, हम चाहते हैं कि इस घर में बिटिया की तरह रहें। विनय आपका बेटा है तो हम आपकी बेटी ही तो हुए। हम कहां बोल रहे हैं कि आप हमें अपना पतोहू मानें। हम पतोहू की तरह आपके साथ रहना भी नाहीं चाहते। आपको बता दें कि विनय को हम अपना पति नहीं मानते, वह मेरा मित्रा है। हम दोनों की मित्राता बनी रहे। जनम जनम का साथ न होता तो हम और विनय काहे मित्रा होते फिर साथ रहने लगते। भगवान भी तो यही चाहता है तभी तो ऐसा हुआ। आप भी हमें आशीर्वाद दीजिए कि हम दोनों की मित्राता में किसी तरह की बाधा न आये।’
‘तूं का बोल रही है, हमैं कुछ नाही बुझा रहा। कइसन मितरता, का मितरता एही बाती कऽ है कि पती पत्नी की तरह रहो, एक दूसरे में गलबहियां करो, चूमो चाटो, ई कउन बात है? तब तऽ सारी दुनिया तोहरे तरह से रहने लगे, अउर बोले कि हम मितर हैं, अउर साथ साथ रहते हैं। बिटिया बेटवा भी पैदा करते हैं। कम से कम आपन तऽ नाही, अपने बिटिया अउर बेटवा के बारे में गुनो के ओनकर का होगा? बिना बिआहे के ऊ, के के आपन बाप बोलेंगे, कोई पूछेगा त ऊ का बोलेंगे? कुछु सोचा है एकरे बारे में...’
‘हां हां अइया हमने सोचा है इसके बारे में, बाप और मां तो हम ही रहेंगे, इसमें कोई दिक्कत नहीं है अइया। पहिले का जमाना बदल गया है।’
अइया गुस्सा गयीं...
‘कुछ तो शरम करो, एकदम बेहया हो गयी हो का? जनमायेगी बिटिया अउर बेटवा, पर बिआह नाहीं करेगी। हम जानते हैं उढ़री मेहरारूअन के बारे में, ओन्हय केहू नाहीं पूछता, ओनकर लड़कवे गली गली घूम रहे हैं, न जात कऽ पता, न बाप कऽ पता, के पूछता है ओन्हैं, बिरादरी वाले तऽ घास नाही डालते।’
संगीता बोल उठी...
‘तऽ एमें का है अइया, हम विआह कर लेते हैं, कोई साइत दिखा लीजिए, मंतर वन्तर पढ़ा जायेगा, फेरा भी लिया जायेगा और सिन्दूर भी डला जाएगा, तब तो सब ठीक हो जायेगा नऽ अइया!’ 
अइया ने फिर कुछ नहीं कहा।कृ
संगीता जानती थी कि पुराने संस्कारों में पली, ढली, अइया को नहीं समझाया जा सकता सो वह चुप हो गई। उसकी आंखों से आंसू छलक आये। वह भी भारतीय भावुकता में डूब गयी। उसे लगा कि विनय के घर में स्वीकार्यता हासिल करने के लिए उसे विशेष प्रयास करने होंगे और एक विवाहित पतोहू तथा अविवाहत पतोहू के कार्याें की भिन्नता को तोड़ना होगा, साबित करना होगा कि एक अविवाहित नारी भी घर के मर्यादाओं का निर्वहन विवाहित नारियों की तुलना में अच्छी तरह से कर सकती है।
विनय की अइया ने दूसरे दिन ही विनय व संगीता को घर से निकाल दिया, उस समय विनय के पिता जी घर पर नहीं थे। अइया ने विनय से कहा था...
‘देखो विनय ! अब घरे कबहॅू न आना, ई तोहार घर नाही है, घरे आओगे तऽ हमार मरा मुह देखोगे, हमारी बात बूझ रहे हो के नाहीं।’ 
विनय और संगीता रूआंसा होकर दोनों घर से निकल गयेे। वही घर जहां विनय पैदा हुआ था, वहीं पला बढ़ा था उसी घर से निकल गया। वे करते भी क्या? 
गॉव से कुछ दूर पर बस स्टैन्ड था। वे बस स्टैन्ड पर पहुंचे ही थे कि विनय की भउजाई भी वहीं पहुंच गयी। भउजाई के हाथ में एक झोला था। 
भउजाई ने विनय को झोला थमा दिया। थामो बबुआ एके...
‘बबुआ एमें ताजी सेम है, अउर कोहड़उरी भी, शहर में ताहें कोहड़उरी कहां मिलेगी? एक डिब्बा में घीउ है, किसी तरह छिप छिपाकरकर तोहसे मिलने आ पायी 
हॅू।’ 
फिर भउजाई संगीता की तरफ मुड़ गयीं...
झोले में से भउजाई ने एक पैकेट निकाला। पैंकेट में कपड़े का एक सेट था, साड़ी और ब्लाउज का।
‘दुलहिन एके थामो, ई तोहार नेग है, उहां कइसे देते। तोहरे बिआहे कऽ पता होता तो कुछ गर-गहना बनवाय देते। हमरे इहां इहय तो है। फेर कबहॅू मौका मिलेगा तऽ तोहैं कुछ अउर नेग देंगे।’ कहते कहते भउजाई रुआंसा हो गईं और संगीता के 
गले में सोने की एक सिकड़ी पहना दिया।’
‘तोहार गला सुन्न है दुलहिन! गला सुन्न जीन रखा करो, बिहउती का गला सुन्न नाहीं होना चाहिए। बिआह चाहे मन से करो, आ पोथी पतरा से। बिआह तो बिआह होता है, हम तो जानते हैं कि मन का बिआह पोथी पतरा से भला होता है पर अइया नाहीं बूझती हैं ई सब।’
भउजाई का प्रेम देख कर संगीता रूआंसा हो गयी, जैसे रो देगी। बस आने में देर थी, संगीता तथा विनय दोनों भउजाई को लौटता हुआ देखते रहे। भउजाई आहिस्ता आहिस्ता घर की तरफ लौट रही थीं।
विनय ने रुआंसा हो कर संगीता से कहा...
संगीता! अइया ने तो नहीं पर भउजाई ने तो हमें स्वीकरा, भउजाई भी तो अइया ही होती हैं।
और नहीं तो का? संगीता ने सहर्ष विनय को बताया। लौटते समय दोनों खिल गये थे। फूल की तरह।
 आकाश वाणी ओबरा से प्रसारित
          


    
   

 

 

 


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